Book Title: Jain Granth Prashasti Sangraha
Author(s): Parmanand Jain
Publisher: Veer Seva Mandir Trust
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१४
वीरसवामन्दिर ग्रन्थमाला
णंउ दिट्ठाणउ सेविय सुसेय, मई सह-सत्य-जाणिय ण भेय । णो कता कम्मु ण किरिय जुत्ति, णउ जाइ धाउ णवि संधि उत्ति । लिंगालंकाह ण-पय-समत्ति, ण बुज्झिय मइ इक्कवि वि विहत्ति । णिग्घंटु वि यो जो अमरकोसु,
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धत्ता
भो सुणु बुद्धीसर वरमहि दुहुहर, इल्लराज सुमणा खिल्जइ । सण्णाण सुभ साहारण दोस
णिवारण वरणरेहिं धारिज्जइ ॥ इय सिरि संतिणाह चरिए णिरुवम गुणरयण संभरिए अण्णाणमयो (?) इल्लराजसप्र-महिदु विरइए सिरिणाणा सुप-संघाहिव-महाभव्व साहारणस्स णामंकिए भन्बयण जण-मणाणंदयरे सिरि इद्रदेव-णमायारकरणं सेणिय महाराय सिरि वड्डमाण समवसरण गमणं-धम्मक्खाणनिसुणणं पढमो इमो परिछेप्रो समत्तो। मन्तिमभाग:-- घत्तामहणा णामावलि, वण्णवि पाउलि पभणउ अइसुहयारी। सिरि वीरु णवेपिणु हियइ घरेविण सुद्धविदा पहुकेरी। पद्धड़ी
इह जोयरिणपुरु पुरवरहँ सारु, जहु वण्णणि इह सक्कु वि असारु । सालत्तय मंडिउ सो विभाइ, कोसी सहि परिहा दुग्गणाइ । जो वण-उववण-मंडिउ विचित्त, गं मेरुवि चेईहर-पवित्तु । तण्णियड वि जउणा-णइवहेइ, गं गंग वि ईसहु सहु बहेइ । खंड गोउराई अइ जिगि मिगंति, खण मुहहु वि णं प्रवयारु दिति । जहु रक्सह गोउव दंडधारि,
भारयण-गणाह जो संपहारी पच्चंत णिवइ संगहइ दंडु. रायाहिराउ वव्वरु पयंडु। मिच्छाहिउ अइव विणाय जाण, महसूलणोन्व जणदिण्णमाणु । जहि चाउवण्ण पय सुहि बसंति, णिय णिय किरियाइविरत्तचित्ति । तहिं चेत्तालउ उत्तुग सहइ, धयमंडिय मोक्ख [सु] मग्गु वहह । जहिं मुणिवर सत्यइं वायरति, मह जण्ण-पूय सावय करंति तहि कट्टसघ माहुर वि गच्छि , पुक्खर गण मुणिवर चइविलच्छि । जसमुत्ति वि जस कित्ति वि मुणिदु, भन्वयण-कमल-वियसण-दिणिदु । तहु सीसुवि मुणिवरु मलय कित्ति, प्रणवरय भमइ जागि जाह कित्ति । तहु सीसु वि गुण गणरयण भूरि,
भुवणयलि सिद्ध गुण भद्द सूरि। सोरठातहु पय भत्तउ साहु भोमराउ जाणिज्जइ । गुण वट्ठियइ णिवास जोयणिपुरि णिवसज्जइ ॥१॥ चौपाई
जे तित्थयर वि गोत णिबद्धउ, करि पयट्ट सुह-पुण्ण वि लद्धउ । संघाहिउ गयपुरि संजायउ, अयरवालु सघह सुह-भायउ । गग्गगोत्त-णिम्मल गुण सायरु । सुथिरें मेरुवि तेय-दिवायरु ।
पद्धडी
तहु भज्जवि घोल्हाही विसार, णाहहु गामिणि णं गंगफार। तहु पुत्त पंचणं मेरुपंच, मह-वयइ पंच णं समिइ पंच ।

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