Book Title: Jain Granth Prashasti Sangraha
Author(s): Parmanand Jain
Publisher: Veer Seva Mandir Trust
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२४६1
बोरसेवामन्दिर गन्यमाला
विज्जउ पुए जसएव पन्ना, जो जीसेसहं बंबहु इन्चह। लोहहु तुरिउ समासहिं पियरहि, भावज्जिय णिम्मल गुण गियरहिं । पंचमु लक्खणु कलिउ सलक्खरण, कमल वयए कज्जेसु वियक्खरण । पंच वि मय मणगण पंचागण, पंच वि पिसुण जणोइ भयाणण । ताहं मग्झे जो सुप्पडु भायर, वरवच्छल्ला एंदिय गहयरू । जिण-पय पुज्जकरण उच्छल्लउ, नीलाग जिय पाडल पिल्लउ । .
वाम मागवंहि एह पडिजउ, भविषणु लोउ सयलु बोहिग्जत । सुन्दर पर भायरहं विराइन, काम-कोह-मच्छर प्रवराइउ । णिय जणणीए समाण सुदरु, पुज्जा विहि वि भविय पुरंदरु।
पत्तातेणेहु मणोहरु तिमिर तमीहरू णियजणणो णामंकिया । भन्मत्य वि सिरिहरु कहगुण सिरिहरु पंचमिसत्यु
कराविउ ॥३ सुप्पट तय जणणि जा सुहमद, तियरण विरिणवारय कुसुमय रह। धम्म पसत्त हे मजा खामहो, गुरुयण भत्तिहें रुप्पिणि णाम हो । होउ समाहि-बोहि रय-हारिणी, अट्ठम महि लच्छी सुह कारिणी। सुप्पट साहुहं वसु-कम्म-खउ, होउ तहय मवरूवि दुक्सक्खर । मज्म एउ गउ पण समीहमि, माजमणिहि णिवरण गिरू वीहमि । णंदउ संधु पउम्बिह सुंदर, णिय-जस-पूरिय गिरिवर कंदर। विलउ जंतु पण पडलुव दुग्धन, चिरु वंदंतु महीयले सजण। एयहो सत्यहो संख पसाहिय, पंचदह जि सय फुड तीसाहिय । जाम जउण अमर सरि सुरालय, कुलगिरि तारा भयण परायल । विजयामल गिरितास रसायर, सिसिर किरण विष्णवरय जायर।
सम्मत्ता किउ धम्म प्रसंकिउ दाण विहाण विसत्तर । सुप्पटु महिणंदउ जिण-पय-वंदउ तब सिरिहर मुणि
भत्तउ॥
(मामेर भंगर लि भ० श्रुतकीति के हरिवंस पुराण की
लिपिप्रशस्ति
(सं० १६०७) इय हरिवंस पुराणु, माइ गरिनु कहणा विहिउ । पय डमि तहो भविहाण, जे लेहाविउ पुणु लिहिउ । भू-मरह पसिबउ सुह समिट, कुरु भूमिय दह विहिरिर रितु । सुरसरि जउणा गइ मंतरालि, तरुसीमखेत्त-षण-कण विसालि। तहिं गयर अभयपुरि महि-रवष्ण, सुरणाहु व बहु विवुहहि मणषु । इक्सरस गोरस कंकणाई, तर हलह रसाला वरण-परणाई। पहियण पोसिय पयसाल जत्य, सम-विसम छुहातिस त्यि जत्य। चउवण्ण समिडउ वसइ लोउ, सुर सत्युव मण्णइ विविह भोउ । जहि पूरिउ बहु मयणाइ बासु, मण इंछिय मणहि-रह-विलासु। . . पर-णारि मणोहर गेह-गेह, पावइ सुर सच्छर मह सणेह । धम्माणरत्त जणू वसह बत्व, उदाण पोहर जग पसत्य ।

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