Book Title: Jagadguru Heersurishwarji
Author(s): Punyavijay
Publisher: Labdhi Bhuvan Jain Sahitya Sadan

View full book text
Previous | Next

Page 24
________________ 13 हो सकता है ? हम एक दिन रोजा करते है तो थक जाते है, और रात को खाना खा लेते है । तब चंपाबाईनें राग-द्वेष आदि बादशाहने दो आदमी मंगल चौधरी और कमरुखां को चंपाबाई के पास भेजा और कहलाया । आप, ऐसी महान् तपश्चर्या कौन से प्रभाव से कर सकते हो । कहा, मेरा तप देव- गुरुकी कृपा से चल रहा है । १८ दोषों से रहित वीतराग देव है । और कंचन - कामिनी के त्यागी - पाद विहारी - माधुकरी वृत्ति से जीवन निर्वाह करनेवाले गुरु है । ऐसा त्यागी मेरा गुरुदेव विजय होरसूरीश्वरजी महाराज अब गुजरात के गंधार बंदर में बीराजते है । उनके प्रभाव से मेरी महान तपश्चर्या चल रही है । बादशाहनें सेवकों द्वारा चंपाबाई का वृत्तांत सुनकर बंडा आनन्द हुआ । और विजय होरसूरिजी को मिलने को बडी उत्कंठा हुई । इतना ही नही बल्कि चंपाबाई को अपने महल में बुलाकर सम्मान के साथ सोनेके चूडा की बहरामणी दी । और अपना शाही बाजे भेजकर जुलुस की शोभा द्विगुणी बढाई । कोक पक्षी जैसा सूर्य को चाहते है ऐसे अकबरको हीरसूरि को मिलने की बडी तमन्ना हुई । और इधर बुलाने के लिये आपनें सोचा, एतमादखां गुजरात में बहोत रहे है । वो जरूर पहचानतें होंगे । उसने एतमादखां को बुलाया । और होरसूरिजी का परिचय पूछा । तब एतमादखांनें कहा, वो तो बडा धर्मात्मा-फकीर है - दूसरा खुदा है । पैदल चलते है, सोना Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

Loading...

Page Navigation
1 ... 22 23 24 25 26 27 28 29 30 31 32 33 34 35 36 37 38 39 40 41 42 43 44 45 46 47 48 49 50 51 52 53 54 55 56 57 58 59 60