Book Title: Hastlikhit Granthsuchi Part 3
Author(s): Jambuvijay
Publisher: Stambhan Parshwanath Jain Trith Anand

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Page 87
________________ ७० विद्वान उपरथी कृति माहिती श्रीपाल चरित्र सं. सकलकुशलवल्ली से (पुप्रे४१९-१) सीमन्धरजिन स्तवन-(मा.गु.)बालावबोध मागु. (पुप्रे४१९-४) ज्ञानसागरसूरि-आचार्य आवश्यकसूत्र-(प्रा.)नियुक्तिनी (सं.)अवचूर्णी\ सं. ग्रं.९००५। जयति इन्द्रियवि (पाकाहेम६९२८, पाकाहेम१०४८५, भांका१६३) आवश्यकसूत्र-(सं.)अवचूरि। सं. (पाकाहेम१०४८६) इलाकुमारचोपाई\ मागु. (पाकाहेम१०२२७) उत्तराध्ययनसूत्र-(सं.)अवचूरि। सं.\ श्लोक५२५०\ कय. एषा पूर्वाच (जेकाजि१४८०, भांका३०४) ओघनियुक्ति-(सं.)अवचूरि। सं. प्रकान्तोयमावश् (पाकाहेम४८९, पाकाहेम१०४९२, पाकाहेम१०४९३, भांका२३७) कल्याणमन्दिरस्तोत्र-(सं.)अवचूरि। सं. (पाकाहेम१२३७९) चैत्यवन्दनभाष्य-(सं.)अवचूर्णि\ सं. वन्दि. वन्दनीया (भांका२२४) नेमिनाथचन्द्राउलास्तवन\ मागु. गा.७३ (पाकाहेम१०७९०) ज्ञानसोम-मुनि विमलसोमसूरि गुरु बारहमासा मागु. गा.३७\ चुवीसइ जिनपय नम (पुप्रे४५५-६) तर्कपञ्चानन - जुओ - अभयदेवसूरि-आचार्य तिलक पण्डित-अज्ञात उक्तिसङ्ग्रह। सं. (पाकाहेम८६०२) तिलकसूरि-आचार्य (प्र. नाम-आचार्य-शिवप्रभसूरि-शिष्य) आवश्यकसूत्र-(सं.)लघुवृत्ति। सं. श्लोक १२३२५\ यो मन्दरागेण न (जेताजि११४, जेताजि११५, पातासंघवी२३, पातासंघवी२०६-२, खंता६३, जेकाजि३६, जेकाजि२१२०, पाकाहेम२३, पाकाहेम६५५६, पाकाहेम१०३४८) आवश्यकसूत्र-(सं.)वृत्ति। सं. (पातासंघवी२३) चैत्यवन्दना वन्दनक प्रत्याख्यान-(सं.)लघुवृत्ति सं. ग्रं.५५०१ श्रीवीरजिनवरेन् (पातासंघवी१२१-२, पातासंघवी१८९-१) जीतकल्पसूत्र-(सं.)वृत्ति सं. ग्रं.१८०० वन्दे वीरं तपोव (जेताजि४१८, पाताखेत४५, पातासंघवी१९, पाताहेसं१७३, पाकाहेम८५७, पाकाहेम१००५९, पाकाहेम१०३२३, पाकाहेम१४०२६, भांका११७) दशवैकालिकसूत्र-(सं.)टीका सं.! ग्रं.७०००\ अर्हन्तः प्रथयन (जेताजि८२, पाताहेसं२५, खंता८०, पाकाहेम१४९२६, पुप्रे४०७) पौषधिकप्रायश्चित्तसामाचारी प्रा. गा.१०\ पोसहिओ न करेइ आ (पाताहेसं१७३) पौषधिकप्रायश्चित्तसामाचारी-(सं.)वृत्ति। सं. (पाताहेसं१७३) योगप्रायश्चित्तप्रदानविधि। प्रा.\ गा.३ (पाकाहेम७९५२) श्राद्धलघुजीतकल्प-(सं.)वृति। सं. (पाकाहेम१०३२३) श्रावकप्रतिक्रमणसूत्र-(सं.)लघुवृत्ति सं. ग्रं.२००। प्रणिधाय श्रीवी (पातासंघवी१२१-२, पातासंघवी२०६-२, पाताहेसं१०५, जेकाजि२१२०, पाकाहेम७४७३) श्रावकसामाचारीप्रकरण प्रा. गा.३८ सिरिवीरजिणं नमि (जेताजि२७५, जेताजि४१८, जेताजि४१८, पातासंघवी६२-२, पातासंघवी१८३-१, पाताहेसं१७३, पाकाहेम६५९४, पाकाहेम७९४८, पाकाहेम७९५२, पाकाहेम१०३२३) श्रावकसामाचारीप्रकरण-(सं.)श्रावकसामाचारीवृत्ति। सं.। प्रणिपत्य जिनं (जेताजि४१८, पाताहेसं१७३) तिलकाचार्य - जुओ - तिलकसूरि-आचार्य तेजपाल-जैनश्रावक सम्भवनाथचरित्र अप. (भांका२१९) तेजसिङ्घ-आचार्य विद्वानशतक। सं. श्लोक२६\ श्रृणु विद्वान् (भांका२४०) त्रिलोकचनदास - जुओ - त्रिलोचनदास-जैनेतर त्रिलोचनदास-जैनेतर (प्र. नाम-जैनेतर-त्रिलोकचनदास) कातन्त्रव्याकरणनी (सं.)दुर्गसिंहवृत्तिनुं (सं.)पञ्जिकाविवरण सं. प्रणम्य सर्वकर् (जेताजि२८५, जेताजि२८६, जेताजि२८७, जेताजि२८८, जेताजि२८८, पातासंघवीजीर्ण६२, पातासंघवी८३-१, पातासंघवी८३-२)

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