Book Title: Ananthnath Jina Chariyam
Author(s): Nemichandrasuri, Jitendra B Shah, Rupendrakumar Pagariya
Publisher: L D Indology Ahmedabad
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सिरिअणंतजिणचरियं सेसा वि खयरपहुणो पणमिय दिन्नासणेसु उवविट्ठा । पणयाए बहुयाए भव पुत्तवइ त्ति भणइ निवो ॥ ८८६५ ॥ तो सा पणमित्तु कुमारमायरं वामपासमुवविट्ठा । सुयहरणा विणयं खमसु राय ! इय भणइ खयरवई ॥ ८८६६ ॥ जइ न हरावंतो हं तुह तणयं ता सुया मरंती मे । विहिओ मए अनाओ इमो सुया जीवणनिमित्तं ॥ ८८६७ ॥ रायाह एस अनओ न होउ खयरिंद ! नणु इमा नीई ।। *समयाणुवत्तणं बहुगुणं च जं सो नरिंदनओ ॥ ८८६८ ॥ खयराहिव ! बहुसुहमिच्छिरेहिं कटुं सहिज्जए थोवं । किमणंतसिवसुहत्थे कलै न कुणंति मुणिवसहाँ ? || ८८६९ ॥ विणओ च्चिय एसो अविणओ वि अहियं नरिंद ! तुह मन्ने । कन्ना तए विइन्ना जं मह भूगोयरसुयस्स ॥ ८८७० ॥ इय जंपिय सम्माणो तस्स कओ राइणा खयरपहुणो । परिवारजुयस्स जहा सविम्हओ सो ठिओ दूरं ॥ ८८७१ ॥ एवं नरवरसम्माणकरणसंजायसमहियसिणेहा । ठाऊणं दिवसदुगं सट्ठाणे खेयरा पत्ता ।। ८८७२ ॥ नवकंता संजुत्तो विविहविणोएहिं कीलइ कुमारो । उवविसइ य अत्थाणे पिउपासे उभयसंझं पि ॥ ८८७३ ।। कइया वि परभवो चिय सुकज्जकरणुज्जुएण नरवइणा । गुरुरिद्धिवित्थरेणं कुमरो अहिसिंचिओ रज्जे ॥ ८८७४ ।। तो मोहमल्लनामस्स सूरिणो पायपउममणुसरिउं । गहिया दिक्खा रन्ना तवियतवं सो सिवं पत्तो ॥ ८८७५ ॥ नवनिवई वि नएणं पालेइ पयं विणिग्गहइ दुढे । समुवज्जइ विमलजसं कुणइ य सद्धम्मकिरियाओ ॥ ८८७६ ॥ कइया वि रणज्झणमाणकिंकिणीगणविमाणमारुहिउं । गंतुं मंदरनंदीसरेसु सासयजिणे थुणइ ॥ ८८७७ ॥
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