Book Title: Agam Suttani Satikam Part 23 Dashashrutskandh Aadi 3agams
Author(s): Dipratnasagar, Deepratnasagar
Publisher: Agam Shrut Prakashan

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Page 96
________________ मूलं - 9 ववहारो पुन अवसेस-पुव्वी एक्कारसंगिणो आकप्प - ववहारा अवसेस सुए य अहिगय-सुत्तत्था सुय-ववहारिणो त्ति । आणा - ववहारो - गीयायरिया आसेविय-सत्थत्था खीणजंधा-बला दो वि जना पगिट्ठदेसंतर-निवासिणो अन्नोन - समीवमसमत्था गंतुं जया, तया मइ धारणा-कुसलं अयत्थसीसं गूढत्थेहिं अइयार-पयासेवणेहिं पेसेइ ८ त्ति । जहा - पढमस्स य कजस्स पण पएण सेवियं जं तं ९ । पढमे छक्के अब्भंतरं तु पढमं भवे ठाणं । पढमस्स य कज्जस्स पढमेण पएण सेवियं होज्जा । पढमे छक्के अब्भंतर तु सेसेसु वि पएसु ॥ पढमस्स य कज्जस्स पढमेण पएण सेवियं होज्जा । बिइए छक्के अब्यंतरं तु पढमं भवे ठाणं ॥ पढमस्स य कज्जस्स पढमेण पएण सेवियं होज्जा । बिइए छक्के अब्यंतरं तु सेसेसु वि पएसु ॥ पढमस्स य कज्जस्स पढमेण पएण सेवियं होज्जा । तइए छक्के अब्यंतरं तु पढमं भवे ठाणं ॥ पढमस्स य कज्जस्स पढमेण पएण सेवियं होज्जा । तइए छक्के अब्यंतरं तु सेसेसु वि पएसु ॥ एवं पढमममुचंतेण बिइय-तइयमाइ जा दसमं । पुढविक्काइयाईसु पुनो वि उच्चारणियाई ॥ बिइयस्स य कज्जस्स पढमेण पएण सेवियं होज्जा । पढमे छक्के अब्यंतरं तु पढमं भवे ठाणं ॥ - एवं विइयस्स वि । एयाए चेव परिवाडीए सव्वाओ गाहाओ भाणियव्वाओ पढमं ठाणं दप्पो दप्पो च्चिय तस्स वी भवे पढमं । मपढमं छक्कव्वयाई पाणाइवाओ तहिं पढमं । एवं तु मुसावाओ अदत्त- मेहुण परिग्गहो चेव । बिइ-छक्के पुढवाई तइ छक्के होंति कप्पाई ॥ ९३ एवं दप्प-पयम्मी दप्पेणं चारियाइं अट्ठरस । एवमकप्पाईसु वि एक्केक्के होन्ति अट्ठरस ॥ बिइयं कज्जं कप्पो पढमपयं १ तत्थ दंसननिमित्तंर । पढमे३ छक्किवयाई तत्थ उ पढमं तु पाणवहो । दंसणममुयंतेणं४ पुव्वकमेणेव चारिणज्जाणि । अट्ठारस ठाणाई एवं नाणाइ एक्वेक्के ॥ चउवीसट्ठारसया एवं एए भवंति ६ कप्पम्मि । दस होंती दप्पम्मी सव्वसमासे य मुन संखं ॥ - दुविहा पडिसेवणा-दप्पिया, कप्पिया य । दप्पिया दसविहा । तं जहादप्प अकप्प निरालम्ब चियत्ते अप्पसत्थ वीसत्थे । अपरिच्छिय७- Sकडजोगी ८ निरनुतावीय निस्संको ॥ तत्थ दप्पो - धावणडेवणाई । अकप्पो जं अविहीए९ सेवइ । निरालंबो - आलंबनरहिओ सेवइ । चियत्ते त्ति १०- संजमाहिकारियाणि छड्डेऊण सेवइ, स त्यक्तकृत्यः । अप्पसत्थेत्ति ११ - अप्रशस्तेन भावेन सेवइ । वीसत्थो - इहलोग-परलोगस्स न भायइ । अपरिच्छियत्ति-कज्जा- कज्जाइं अपरिक्खिउण सेवइ । अकडजोगी-जोगं अकाऊण१२ सेवइ । निरनुतावी- जो अकिच्चं काऊण नाणुतप्पइ; जहा मए दुडु कथं । निस्संको १३ - जो निस्संकितो सेवइ । एसा १४ दप्पिया ।। कप्पिया चउवीसविहा; दंसणनाणचरित्ते तवसंजमसमिइगुत्तिहेउं वा । साहम्मियवच्छल्लत्तणेण कुलओ गणस्सेव ॥ संघस्सायरियस्स य असहुस्स गिलाणबालवुडस्स । उदयग्गिचोरसावयभय१५ कंतारावाई १६ वसने ॥ एएहिं कारणेहिं जो पडिसेवेइ सा कप्पिया पडिसेवणा । 'किं पुन पडिसेवियव्वं ? ।' 'इमाई अट्ठारस पयाइं ।' तं जहा वयछक्क कायछक्कं अक्कप्पो गिहिभायणं । पलियंकनिसेज्जा य१७ सिणाणं सोभवज्जणं ॥ - सव्वसमासे य मुण १८ सु संखं १८० दप्पिया, कप्पिया ४३२ ॥ - For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org


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