Book Title: Agam Suttani Satikam Part 23 Dashashrutskandh Aadi 3agams
Author(s): Dipratnasagar, Deepratnasagar
Publisher: Agam Shrut Prakashan

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Page 242
________________ २३९ अध्ययनं ७, (चूलिका-१) मू. (१३६६) जरमरण-मयर-पउरे रोग-किलेसाइ-बहुविह-तरंगे। कम्मट्ठ-कसाय-गाह-गहिर-भव-जलहि मज्झम्मि॥ मू. (१३६७) भमिहामि भट्ट-सम्मत्त-नाण-चारित्त-लद्ध-वरपोओ। कालं अनोर-पारं अंतंदुकखाणमलंभतो॥ मू. (१३६८) ता कइया सो दियहो जत्था-हं सत्तु-मित्त-सम-पक्खो। नीसंगो विहरिस्सं सुह-झाण-नीरंतरो पुणोऽभवट्ठ। मू. (१३६९)एवं चिर-चिंतयाभिमुह-मनोरहोरु-संपत्ति-हरिस-सुमल्लसिओ। भत्ति-भर-निब्मरोणय-रोमंच-उकंच-पुलय-अंगो॥ मू. (१३७०) सीलंग-सहस्स अट्ठारसह धरणे समोत्थय-क्खंधो। छत्तीसायारुकंठ-निट्ठियासेस-मिच्छते॥ मू. (१३७१) पडिवज्जे पव्वज्जे विमुक्क-मय-मान-मच्छरामरिसो। निम्मम-निरहंकारो विहिणेवं गोयमा विहरे॥ मू. (१३७२) विहग इवा पडिबद्धो उजुत्तो नाणं-दंसण-चरित्ते। नीसंगो घोर-परीसहोवसग्गाइंपजिणंतो॥ मू. (१३७३) उग्गाभिग्गह-पडिमाइ राग-दोसेहिं दूरतर मुक्को । रोद्दट्टजाण-विवजिओ य विगहासु य असत्तो॥ मू. (१३७४) जो चंदनेन बाहुं आलिपइ वासिणा व जो तच्छे । संथुणइ जो अनिंदइ सम-भावो हुन्ज दुण्हं पि॥ मू. (१३७५) एवं अनिगूहिय बल-विरिय-पुरिसकार-परक्कमो सम-तण-मणि-लिट्ठ-कंचनोवेक्को परिचत्त-कलत्त-पुत्त-सुहि-सयण-मित्त-बंधव-धन-सुवन्न-हिरन्न-मणी-रयणसार-भंडारो अचंत-परम-वेरग्ग-वासनाजणिय-पवर-सुहज्झवसाय-परम-धम्म-सद्धा-परो अकिलिट्ठ-निक्कलुस-अदीन-माणसोयवय-नियम-नाण-चरित्त-तवाइ-सयल-भुवणेक्क-मंगल-अहिंसा-लक्खणसंताइ-दस-विह धम्मानुट्ठाणेकंत-बद्ध-लक्खोसव्वावस्सग-तकाल-करण-सज्झाय-झाणंआउत्तो संखाईय-अनेग-कसिण-संजम-पएसुअविखलिओसंजय-विरय-पडिहय-पच्चक्खाय-पाव-कम्मो अनियाणो माया-मोस-विवजिओ साहू वा साहूणी वा एवं गुण-कलिओ जइ कह वि पमायदोसेणं असइंकहिंचि कत्थइ वाचाइवा मनसाइवाति-करण-विसुद्धीए-सव्व-भाव-भावंतरेहिं चेव संजममायरमाणो असंजमेणं छलेज्जा तस्सणं विसोहि-पयं पायच्छित्तमेव तेनं पायच्छित्तेणं गोयमा तस्स विसुद्धि उवदिसिज्जा न अन्नह त्ति तत्थ णं जेसुंजेसुंठाणेसुंजत्थ जत्थ जावइयं पच्छित्तंतमेव निटंकियं भन्नइ से भयवंकेणंअटेणं भन्नइजहाणं-तं एव निसृकियं भन्नइ गोयमा अनंतरानंतर-कमेणंइणमोपच्छित्त-सुत्तं'नेग-गुणगणाइन्नस्सदढ-व्वय-चरित्तस्सएगंतेन जोगस्स एव विवक्खिएपएसे चउक्कन्नंपनवेयव्वं नोछक्कन्नंतहा य-जस्स जावइयेणंपायच्छित्तेणं परमविसोही भवेजा तंतस्सणंअनुयट्टणा-विरहिएणंधम्मेक-रसिएहिं वयणेहिं जह-ट्ठियंअनुणाहियं तावाइयंचेवपायच्छित्तंपयच्छेजा एएणंअड्डेणंएवंवुच्चइजहाणंगोयमातमेव निटंकियं पायच्छित्तं भन्नइ। For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org


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