Book Title: Agam Suttani Satikam Part 23 Dashashrutskandh Aadi 3agams
Author(s): Dipratnasagar, Deepratnasagar
Publisher: Agam Shrut Prakashan
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महानिशीथ - छेदसूत्रम् - ८(२)/-/१४९७
पक्खवाय-मोह-संधुक्किय- माणसेहिं राग-दोसो - वहयबुद्धिहिं परंतत्तधम्मं अहो सज्जीवेणेव परिमुसिए एवइयं काल - समयं अहो किमेस णं परमप्पा भारिया छलेणासि उ मज्झभारिया-छलेणासि उ मज्झ गेहे उदाहु णं जो सो निच्छिओ मीमंसएहिं सव्वन्नू सोच्चि ए सूरिए इव संसय- तिमिरावहारिता णं लोगावभासे मोक्ख-मग्ग-संदरिसणत्थं सयमेव पायडीहूए अहो महाइसयत्थ-पसाहगाओ मज्झं दइयाए वायाओ भो भो जन्नयत्त - विण्हुयत्त - जन्नदेव - विस्सामित्त - सुमिचादओ मज्झं अंगया अब्भुट्ठाणारिहा ससुरासुरस्सा वि णं जगस्स एसा तुम्ह जननि त्ति भो भो पुरंदर-पभितीओ खंडियाओ वियारहणं सोवज्झाय-भारियाओ जगत्तयनंदाओ कसिण - किव्विस- निद्दहण-सीलाओ वायाओ पसन्नोज तुम्ह गुरू आराहणेक्क-सीलाणं
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परमप्पं बलं जजण जायणज्झयणाइणा छककम्माभिसंगेणं तुरियं विनिजिणेह पंचेंदियाणि परिञ्च्चयहणं कोहाइए पावे वियाणेह णं अमेज्झाइजंबाल-पंक-पडिपुन्ना असुत कलेवरे पविसामो वणंतं, इच्चेवं अनेगेहिं वेरग्गजननेहिं सुहासिएहिं वागरमाणं तं चोद्दस-विज्जा-ठाण-पारंगभो गोयमा गोविंद-माहणं सोऊइण अच्चंत - जम्म-जरा-मरण-भीरुणो बहवे सप्पुरिसे सव्युत्तमं धम्मं विमरिसिउं समारद्धे तत्थ केइ वयंति जहा एस धम्मो पवरो अन्ने भांति जहा एस धम्मो पवरो जाव णं सव्वेहिं पमाणीकया गोयमा सा जातीसरा माहणि त्ति ताहे तीए य संपवक्खायमहिंसो वक्खियमसंदिद्धं खंताइ-दस-विहं समण-धम्मं दिट्टंत-हेऊहिं च परमपञ्च्चयं विणीयं तेसिं तु तओ य ते तं माहणि सव्वन्नूमिति काऊणं सुरइय-कर-कमलंजलिणो सम्मं पणमिऊणं गोयमा तीए माहणीए सद्धिं अदीनमानसे बहवे नर-नारि-गणा चेच्चाणं सुहिय-जण मित्त-बंधु-परिवग्ग-गिह-विहवसोक्खमप्प-कालियं निक्खते सासय सोक्ख-सुहाहिलासिणो सुनिच्छियमाणसे समणत्तेणं सयलगुणो-धारिणो चोद्दस - पुव्वधरस्स चरिम-सरीरस्स णं गुणंधर- थविरस्स णं सयासे त्ति एवं च ते गोमा अच्चंत - घोर-वीर-तव-संजमानुट्ठाण - सज्झाय-झाणाईसुं णं असेस-कम्मक्खयं काऊणं तीए माहणीए सम्मं वियरय-मले सिद्धे गोविंदमाहणादओ नर-नारिगणे सव्वे वी महायसे त्ति बेमि ।
मू. (१४९८) से भयवं किं पुन काऊणं एरिसा सुलह-बोही जाया सा सुगहियनामधेज्जा माहणी जीए रूयावइयाणं भव्व-सत्ताणं अनंत-संसार - घोर- दुक्ख संतत्ताणं सद्धम्म - देसणाईहि तु सासयसुह-पयाणपुव्वगमब्भुद्धरणं कयं ति गोयमा जं पुव्वि सव्वभाव-भावंतरंतरेहिणं नीसल्ले आजम्मलोयणं दाऊणं सुद्धभावाए जहोवइट्टं पायच्छित्तं कयं पायच्छित्तसमत्तीए य समाहिए य कालं काऊणं सोहम्मे कप्पे सुरिंदग्गमहिसी जाया तमनु-भावेणं, से भयवं किं से णं माहणी जीवे तब्भवंतरम्मि समणी निग्गंथी अहेसि जे णं नीसल्लमालोएत्ता णं जहोवइट्टं पायच्छित्तं कयं ति गोयमा जेणं से माहणी जीवे से णं तज्जम्मे बहुलद्धिसिद्धी जुए महिड्डीयत्ते सयलगुणाहारभूए उत्तम-सीलाहिट्ठिय-तनू महातवस्सी जुगप्पहाणे समणे अनगारे गच्छाहिवई अहेसि नो णं समणी, से भयवं ता कयरेण कम्म-विवागेणं तेमं गच्छाहिवइणा होऊणं पुणो इत्थित्तं समज्जियं ति गोयमा माया पच्चएणं से भयवं कयरेणं से माया पञ्चए जे णं पयणू-कय-संसारे वि सयल-पावाययणा विबुह-जन-निंदिए
सुरहि-बहु - दव्व - घय-खंड-चुन्न- सुसंकरिय-समभाव- पमाण- पाग- निष्पन्न-मोयग-मल्लगे-इवसव्वस्स भक्खे सयल-दुक्ख-केसाणिमालए सयल-सुह- साहणस्स परमपवित्तुमस्स णं अहिंसा
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