Book Title: Agam Suttani Satikam Part 23 Dashashrutskandh Aadi 3agams
Author(s): Dipratnasagar, Deepratnasagar
Publisher: Agam Shrut Prakashan

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Page 225
________________ - २२२ महानिशीथ-छेदसूत्रम् -६/-/११०६ जिनाभिहियं सुत्तत्थं गणहरोजा परूवती॥ मू. (११०७) तावमालावगं एयं वक्खाणम्मि समागयं । पुढवी काइगमेगंजो वावाए सो असंजओ। मू. (११०८) ताईंसरो विचितेइ सुहुमे पुढविकाइए। सव्वत्थ उद्दविजंति को ताइंरक्खिउंतरे॥ मू. (११०९) हलुईकरेइ अत्ताणं एत्थं एस महायसो। असद्धेयंजने सयले किमटेयं पवक्खई॥ मू. (१११०) अचंत-कडयडं एवं वक्खाण तस्स वी फुडं। कंठसोसो परं लाभे एरिसं कोऽनुचिट्टइ। मू. (११११) ता एवं विप्पमोत्तूणं सामन्नं किंचि मज्झिमं । जंवा तं वा कहे धम्मंता लोओऽम्हाणाउट्टई ।। मू. (१११२) अहवा हा हा अहं मूढो पाव-कम्मी नराहमो। नवरं जइ नानुचिट्ठामि अन्नोऽनुचेट्टती जनो॥ मू. (१११३) जेणेयमनंत-नाणीहिं सव्वन्नूहि पवेदियं । जो एवं अन्नहा वाएतस्स अट्ठो न बज्झइ॥ मू. (१११४) ताहमेयरस्स पच्छित्तं धोरमइदुक्करंचरं। लहुं सिग्धं सुसिग्घयरं जावमचून मे भवे ॥ मू. (१११५) आसादना कयं पावं आसुंजेन विहुव्वती। दिव्वं वास-सयं पुत्रं अह सो पच्छिथमनुचरे ॥ मू. (१११६) तंतारिसं महा-घोरं पायच्छित्तं सयं-मती। काउं पञ्चेयबुद्धस्स सयासे पुणो वि गओ॥ मू. (१११७) तत्था विजा सुणे वक्खाण तावऽहिगारम्मिमागयं । पुढवादीणं समारंभंसाहू तिविहेणं वजए। मू. (१११८) दढ-मूढो हुंछ जोईता ईंसरो मुक्कपूओ। विचिंतेवं जहेत्थ जए को न ताई समारंभे ॥ मू. (१११९) पुढवीए ताव एसेव समासीणो वि चिट्ठइ। अग्गीए रद्धयं खायइ सव्वं बीय समुभवं॥ मू. (११२०) अन्नं च-विना पानेनं खणमेकं जीवएकहं । ता किं पितंपवक्खे सजंपञ्चुयमत्थंतियं ॥ मू. (११२१) इमस्सेव समागच्छे न उनेयं कोइ सद्दहे । तो चिट्ठउ ताव एसेत्थं वरं सोचेवगणहरो॥ मू. (११२२) अहवा एसो न सो मज्झएको वी भणियं करे। अलिया एवंविहं धम्मं किंचूद्देसेण तं पिय॥ मू. (११२३) साहिज्जइ जो सवे किंचि न वुण मच्चंत-कडयर्ड। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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