Book Title: Acharang Sutram Dwitiya Shrutskandh
Author(s): Punyakiritivijay
Publisher: Shripalnagar Jain Shwetambar Murtipujak Derasar Trust
View full book text ________________ श्रीआचाराङ्गं नियुक्तिश्रीशीला० वृत्तियुतम् श्रुतस्कन्ध:२ // 717 // // तृतीया सप्तैकका उच्चारप्रश्रवणाख्या॥ साम्प्रतं तृतीयः सप्तैककः समारभ्यते, अस्य चायमभिसम्बन्धः- इहानन्तरे निषीथिका प्रतिपादिता, तत्र च कथम्भूतायां भूमावुचारादि विधेयमिति, अस्य च नामनिष्पन्ने निक्षेपे उच्चारप्रश्रवण इति नाम, तदस्य निरुक्त्यर्थं नियुक्तिकृदाह नि०- उच्चवइ सरीराओ उच्चारो पसवइत्ति पासवणं / तं कह आयरमाणस्स होइ सोहीन अइयारो? // 324 // शरीरादुत्- प्राबल्येन च्यवते- अपयाति चरतीति वा उच्चार:- विष्ठा, तथा प्रकर्षेण श्रवतीति प्रश्रवणं- एकिका, तच्च कथमाचरतः साधोः शुद्धिर्भवति नातिचार इति? // 324 // उत्तरगाथया दर्शयितुमाह नि०- मुणिणा छक्कायदयावरण सुत्तभणियंमि ओगासे। उच्चारविउस्सग्गो कायव्वो अप्पमत्तेणं // 325 // साधुना षड्जीवकायरक्षणोद्युक्तेन वक्ष्यमाणसूत्रोक्ते स्थण्डिले उच्चारप्रश्रवणे विधेये अप्रमत्तेनेति // 325 // नियुक्त्यनुगमानन्तरं सूत्रानुगमे सूत्रम्, तच्चेदं से भि० उच्चारपासवणकिरियाए उब्बाहिज्जमाणे सयस्स पायपुंछणस्स असईए तओ पच्छा साहम्मियं जाइज्जा ॥१॥से भि० से जंपु० थंडिल्लं जाणिज्जा सअंड० तह० थंडिलंसि नो उच्चारपासवणं वोसिरिजा ॥२॥से भि० जंपुण थं० अप्पपाणं जाव संताणयं तह० थं० उच्चा० वोसिरिजा ॥३॥से भि० से जं० अस्सिंपडियाए एगं साहम्मियं समुद्दिस्स वा अस्सिं० बहवे साहम्मिया स० अस्सिं प० एणं साहम्मिणिं स० अस्सिंप० बहवे साहम्मिणीओ स० अस्सिं० बहवे समण पगणिय 2 समु० पाणाई 4 जाव उद्देसियंचेएइ, तह० थंडिल्लं पुरिसंतरकडं जाव बहियानीहडं वा अनी० अन्नयरंसि वा तहप्पगारंसि थं० उच्चारं नो वोसि०॥४॥से भि० से जं० बहवे समणमा० कि०व० अतिही समुद्दिस्स पाणाइंभूयाइंजीवाइंसत्ताईजाव उद्देसियंचेएइ, तह० थंडिलं पुरिसंतरगडंजाव बहियाअनीहडं श्रुतस्कन्धः 2 चूलिका-२ सप्तसप्तिका, तृतीया सप्तकका उच्चार प्रश्रवणम्, नियुक्तिः |324-325 सूत्रम् 388 उच्चारप्रश्रवणविधि: // 717 //
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