Book Title: Saptapadi Shastra
Author(s): Sagarchandrasuri
Publisher: Mandal Sangh

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Page 229
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir आचार्यश्री भ्रातृचंद्रसूरि ग्रन्थमाला पुस्तक ५३ मुं २०३ करे छे. ११९. चालती बोनाने जणावे छे:-रात्रिना त्रिजा पोरसां - त्रिजी पोरसीमां निद्राने नहि करनारा मुनिओ, तेओने लोकमां ए शिथिलाचारी छे, एम कोइ पण कहेतो नथी. १२०. अने वळी बीजुं सूत्रमां पोरसी संबंधी कहेलुं कार्य जे न करता होय ते प्रमादी, शिथिलाचारी एम लोकमां पण कहेवाय छे. १२१. जिनेश्वरोनो उपदेशविधि निद्रा करवा संबंधी नथी. तेथी ते निद्रा न करवाथी दोष नथी. बीजा सिद्धांतोमां पण निद्रा करवानो प्रतिषेध बतावेल छे. १२२. प्रवचन - सिद्धान्तमां रहेला निद्रानिषेधना अक्षरो लखिए छीए: - श्रीउत्तराध्ययन सूत्रना छवीसमां अध्ययनमां जणावेल छे के:-" विचक्षण साधु रात्रिमा चार भाग करे अने रात्रिना चारे भागने विषे उत्तरगुणनी रमणता करे ? " हवे विचारवानुं के विजा पोरसां उत्तरगुण करवानुं बतावेल होवाथी निद्रा उत्तरगुण नथी, जे उत्तरगुण, ते कर्त्तव्य होय माटे, वळी श्री उत्तराध्ययन सूत्रना चोथा अध्ययनमां जणावेल छे के:- " द्रव्यथी निद्रायां सुतेला अने भावधी मोहनिद्रामां पडेला लोको होय त्यारे साधु सावधान रहे." तथा श्रीउतराध्ययनना दशमां अध्ययनमां स्थाने स्थाने " हे गौतम! समयमात्र प्रमाद न करीश !" ए प्रमाणे बतावेल छे. तथा वळी श्रीआचारांगसूत्रना लोकविजय अध्ययनना प्रथम उद्देशामां जणावेल छे के:- " हे मुनि ! अनादि संसारमां दुर्लभ आ अवसर पामी - विचारीने धीरपुरुष थयो थको तुं एक For Private And Personal Use Only

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