Book Title: Ritthnemichariyam Part 3 1
Author(s): Swayambhudev, Ramnish Tomar, Dalsukh Malvania, H C Bhayani
Publisher: Prakrit Text Society Ahmedabad

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Page 291
________________ ३८ छहिं सत्तहिं दसहि सएण विद्धु पुणु लक्खेहिं पुणु अगणिय - सरेहिं वज्जम एहिं चूरिय सयल जोह वाम एहिं उद्धविय गइंद जे जे पत्थेण ते ते दोणेण दोण महाघणेणं तेहत्तरि सरेहिं अज्जुण - मग्गए जले वोलीणए अवरेण थणंतरे जणिउ डाहु तिणि-वि आसीविस - फणि- मुहेहिं गुरु- चरिउ णिएटिपणु वासु जज्जाहि धणंजय वेय-गमणु जं एम वृत्त नारायणेण भालयले ठियउ जो पट्ट-बंधु पयहिण करेवि गड सव्वसाइ जमलीकिउ हरि रहु दारुएण फोडेपिणु व्हो तणउ वारु Jain Education International घन्ता दिव्व महासर पेसिय । पडसरेहिं णिण्णासिय ॥ पुणु सहि सहासेहिं पडिणिसिद्ध कुरु खद्ध णाई बहु विहरे हिं अग्गिएहिं दड्ढ महारदोह सूरम एहिं संताविय गरिद [१०] (हेला) णाराय - किरण - कूरो । परिपिहि पत्थ- सूरो ॥ तिहिं वाणरु पंचहि पउमणाहु पडिवारा पिहिय सिलीमुहे हिं चितवइ ण किज्जइ कालखेड गुरु- सीस किर संगामु कत्रणु रहु दिष्णु णं दु-णारायणेण सोवण सकिरहवखंधु (?) पर-वल जगडंतु कयंतु णाई णं सिहि संधु क्कर मारुएण पइसरइ करेपिणु हथियारु घत्ता रिट्ठणेमिचरिङ कुरु-गुरु पच्छ ए धावइ । वरणु विद्धउ णावइ || For Private & Personal Use Only १० ११ www.jainelibrary.org

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