Book Title: Prashnavyakaranasutram
Author(s): Abhaydevsuri, 
Publisher: Agamoday Samiti

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Page 285
________________ यलक्षणात्, निगमनमाह-एवं प्रणीताहारविरतिसमितियोगेन भावितो भवत्यन्तरात्मा आरतमनोविरतPामधर्मा जितेन्द्रियो ब्रह्मचर्यगुप्त इति । 'एवमिदमित्यादि अध्ययनार्थनिगमनवाक्यं पूर्ववद् व्याख्येयम् ॥ समाप्तं ब्रह्मचर्याख्यचतुर्थसंवररूपनवमाध्ययनविवरणम् ॥४॥ अथ परिग्रहविरतिरूपदशमाध्ययनविवरणम् । व्याख्यातं चतुर्थ संवराध्ययन, अधुना सूत्रनिर्देशक्रमसम्बद्धमथवा अनन्तरं मैथुनविरमणमुक्तं तच्च सथा परिग्रहविरमण एव भवतीति तदभिधानीयमित्येवंसम्बद्धं च पश्चममारभ्यते, तत्रादिसूत्रमिदम् जंबू! अपरिग्गहसंवुडे य समणे आरंभपरिग्गहातो विरते विरते कोहमाणमायालोभा एगे असंजमे दो चेव रागदोसा तिन्नि य दंडगारवा य गुत्तीओ तिन्नि तिन्नि य विराहणाओ चत्तारि कसाया झाणसन्नाविकहा तहा य हुंति चउरो पंच य किरियाओ समितिइंदियमहव्वयाई च छज्जीवनिकाया छच्च लेसाओ सत्त भया अट्ट य मया नव चेव य बंभचेरवयगुत्ती दसप्पकारे य समणधम्मे एक्कारस य उवासकाणं बारस य भिक्खुपडिमा किरियठाणा य भूयगामा परमाधम्मिया गाहासोलसया असंजमअबंभणायअसमाहिठाणा सबला परिसहा सूयगडज्झयणदेवभावणउद्देसगुणपकप्पपावसुतमोहणिजे सिद्धातिगुणा य जोगसंगहे ति. Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org

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