Book Title: Aradhanasamucchayam
Author(s): Ravichandramuni, Suparshvamati Mataji
Publisher: Digambar Jain Madhyalok Shodh Sansthan

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Page 308
________________ आराधनासमुच्चयम् - २९९ आचार्यों ने दोनों नयों की अपेक्षा कथन किया है, इसलिए लिखा है कि शुद्ध और अशुद्ध दोनों नयों का आश्रय लेकर कथन करना चाहिए । आराधक जन का कथन पूर्ण हुआ। आराधना के उपाय शङ्कादिदोषसंकुलसंत्यागश्चेतसा सदाभ्यासः। निःशंकादिगुणानां सम्यक्त्वाराधनोपायः॥२३६॥ अन्वयार्थ - शंकादिदोषसंकुलसंत्यागः - शङ्कादिदोषों के समूह का त्याग करके । चेतसा - चित्त के द्वारा । सदा - हमेशा। नि:शंकादिगुणानां - निःशंकित आदि गुणों का। अभ्यास: - अभ्यास करना। सम्यक्त्वाराधनोपायः - सम्यक्त्व की आराधना का उपाय है। __अर्थ - सम्यग्दर्शन के शंकादि पच्चीस दोषों के समूह का त्याग करके निरन्तर अपने चित्त के द्वारा निःशंकितादि गुणों का अभ्यास करना सम्यक्त्वाराधना का उपाय है। शंका - जिनेन्द्र भगवान के वचनों में शंका वा संशय करना। कांक्षा - सांसारिक भोगों की वाञ्छा करना, सांसारिक भोगों में आसक्ति रखना। विचिकित्सा - जिनधर्मावलम्बी वा जिनधर्म से ग्लानि करना, उनमें अनुराग नहीं रखना तथा मुनिराज के नन वा मलिन शरीर को देखकर घृणा करना। मूढदृष्टि - हेयोपादेय का निर्णय नहीं करना तथा देवशास्त्रगुरु के स्वरूप को न जानकर यद्वा तद्वा निर्णय करना। अनुपगृहन - अज्ञानी एवं अशक्त जनों के द्वारा किये गये दोषों को प्रगट करना, उनका आच्छादन नहीं करना। अस्थितीकरण - व्रतों से वा श्रद्धान से गिरे हुए प्राणियों को व्रत एवं श्रद्धान में स्थिर नहीं करना। अवात्सल्य - जिनधर्म और जिनधर्मावलम्बियों में अनुराग नहीं रखना। अप्रभावना - अज्ञानरूपी अन्धकार को हटाकर जिनधर्म का उद्योत नहीं करना। ये निःशंकितादि आठ गुणों से विपरीत उपर्युक्त आठ दोष हैं। आठ प्रकार के मद (घमण्ड) सम्यग्दर्शन के घातक होने से सभ्यग्दर्शन के दोष हैं। ज्ञानावरणीय कर्म के क्षयोपशम से होने वाले विनाशीक ज्ञान को प्राप्त कर घमण्ड करना ज्ञानमद

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