Book Title: Apbhramsa Bharti 1994 05 06
Author(s): Kamalchand Sogani, Gyanchandra Khinduka, Gopichand Patni
Publisher: Apbhramsa Sahitya Academy

View full book text
Previous | Next

Page 12
________________ अपभ्रंश-भारती 5-6 जनवरी - जुलाई - 1994 1 लोक और अपभ्रंश साहित्य - डॉ. शैलेन्द्रकुमार त्रिपाठी - सिरि जरखंडी लोअड़ी गलि मणि अड़ा न बीस । तोवि गोट्ठड़ा कराविआ मुद्धए उटुंबईस ॥ यह साहित्य अपभ्रंश कवि द्वारा निबद्ध उस अकिंचना सुन्दरी के समान है जिसके सिर पर एक फटी पुरानी कमली थी, गले में दस-बीस गुरियों की माला थी फिर भी उसका सौन्दर्य ऐसा मनोहर था कि गोष्ठ के रसिकों को कितनी ही बार उठा बैठी करने को बाध्य होना पड़ा - हिन्दी साहित्य का आदिकाल लिखते समय ये शब्द हैं आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के । आधुनिक आर्यभाषाओं का जन्म अपभ्रंश से ही स्वीकार किया जाता है। हमारी पूर्ववर्ती परम्परा अपभ्रंश की साहित्यिक परम्परा रही, आज हिन्दी के भाषा वैज्ञानिक भी स्वीकार करते हैं। भक्तिकाल पर या रीतिकाल पर अपभ्रंश का प्रभाव हिन्दी के विद्वान् स्वीकार करते हैं। हर समृद्ध साहित्य अपने अतीत से कुछ ग्रहण करता रहता है मात्र सैद्धान्तिक धरातल पर ही नहीं, व्यावहारिक धरातल पर भी, और व्यवहार का धरातल समाज का होता है, लोक का होता है 1 आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने लिखा है " आदिकाल का सारा काव्य केवल वीरत्व की प्रशंसा में लिप्त लोक-वाह्य काव्य नहीं था । उसमें लोक की प्रचलित भावना वीरत्व के उल्लास का प्रतिपादन किया जाता था । कहीं लोक-शत्रु का नाश होता था, कहीं केवल वीरत्व

Loading...

Page Navigation
1 ... 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22 23 24 25 26 27 28 29 30 31 32 33 34 35 36 37 38 39 40 41 42 43 44 45 46 47 48 49 50 51 52 53 54 55 56 57 58 59 60 61 62 63 64 65 66 67 68 69 70 71 72 73 74 75 76 77 78 79 80 81 82 83 84 85 86 87 88 89 90