Book Title: Agam 32 Chulika 02 Anuyogdwar Sutra Anuogdaraim Terapanth
Author(s): Tulsi Acharya, Mahapragna Acharya
Publisher: Jain Vishva Bharati

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Page 347
________________ ३१० अणुओगदाराई ५७६. से कि तं असंखेज्जए? असं- अथ किं तद् असंख्येयकम् ? ५७६. वह असंख्येय क्या है ? खेज्जए तिविहे पण्णत्ते, तं जहा- असंख्येयकं त्रिविधं प्रज्ञप्तं, तद्यथा असंख्येय के तीन प्रकार प्रज्ञप्त हैं, जैसेपरित्तासंखेज्जए जुत्तासंखेज्जए परीतासंख्येयकं युक्तासंख्येयकम् परीत असंख्येय, युक्त असंख्येय और असंख्येय असंखेज्जासंखेज्जए॥ असंख्येयासंख्येयकम् । असंख्येय। ५७७. से कि तं परित्तासंखेज्जए? अथ किं तत् परीतासंख्येयकम् ? ५७७. वह परीत असंख्येय क्या है ? परित्तासंखेज्जए तिविहे पण्णत्ते, तं परीतासंख्येयकं त्रिविधं प्रज्ञप्तं, परीत असंख्येय के तीन प्रकार प्रज्ञप्त हैं, जहा–जहण्णए उक्कोसए अजह- तद्यथा-जघन्यकम् उत्कर्ष कम् जैसे-जघन्य, उत्कृष्ट और अजघन्यण्णमणुक्कोसए॥ अजघन्योत्कर्षकम् । अनुत्कृष्ट । ५७८. से कि तं जुत्तासंखेज्जए? जुत्ता- अथ किं तद् युक्तासंख्येयकम् ? ५७८. वह युक्त असंख्येय क्या है ? संखेज्जए तिविहे पण्णत्ते, तं जहा युक्तासंख्येयकं त्रिविधं प्रज्ञप्तं, तद्यथा __ युक्त असंख्येय के तीन प्रकार प्रज्ञप्त हैं, -जहण्णए उक्कोसए अजहण्ण- -जघन्यकम् उत्कर्षकम् अजघन्योत्- जैसे-जघन्य, उत्कृष्ट और अजघन्यमणक्कोसए॥ कर्षकम् । अनुत्कृष्ट । ५७६. से कितं असंखेज्जासंखेज्जए? अथ कि तद असंख्येयासंख्येय- ५७९. वह असंख्येय असंख्येय क्या है ? असंखेज्जासंखेज्जए तिविहे पण्णत्ते, कम् ? असंख्येयासंख्येयकं त्रिविधं । असंख्येय असंख्येय के तीन प्रकार प्रज्ञप्त तं जहा -जहण्णए उक्कोसए प्रज्ञप्तं, तद्यथा--जघन्यकम् उत्कर्ष- हैं, जैसे-जघन्य, उत्कृष्ट और अजघन्यअजहण्णमणुक्कोसए । कम् अजघन्योत्कर्षकम् । अनुत्कृष्ट । ५८०. से कि तं अणतए? अणंतए अथ किं तद् अनन्तकम् ? ५८०. वह अनन्त क्या है ? तिविहे पण्णत्ते, तं जहा परि- अनन्तकं त्रिविधं प्रज्ञप्तं, तद्यथा--- अनन्त के तीन प्रकार प्रज्ञप्त हैं, जैसे ...ताणतए जुत्ताणतए अणंताण- परीतानन्तकं युक्तानन्तकम् अनन्ता- परीत अनन्त, युक्त, अनन्त और अनन्तानन्त । नन्तकम् । ५८१. से कि तं परित्ताणतए? परि- अथ कि तत् परीतानन्तकम् ? ५८१. वह परीत अनन्त क्या है ? ताणतए तिविहे पण्णत्ते, तं जहा परीतानन्तकं त्रिविधं प्रज्ञप्तं, तद्यथा परीत अनन्त के तीन प्रकार प्रज्ञप्त हैं, -जहण्णए उक्कोसए अजहण्ण- -जघन्यकम् उत्कर्षकम् अजघन्योत्- जैसे-जघन्य, उत्कृष्ट और अजघन्यमणुक्कोसए॥ कर्षकम् । अनुत्कृष्ट । ५८२. से कि तं जुत्ताणतए ? जुत्ताणं- अथ कि तद् युक्तानन्तकम् ? ५८२. वह युक्त अनन्त क्या है ? तए तिविहे पण्णत्ते, तं जहा- युक्तानन्तकं त्रिविधं प्रज्ञप्तं, तद्यथा - युक्त अनन्त के तीन प्रकार प्रज्ञप्त हैं, जैसे जहष्णए उक्कोसए अजहण्णमणु- जघन्यकम् उत्कर्षकम् अजघन्योत्- - जघन्य, उत्कृष्ट और अजघन्य-अनुत्कृष्ट । क्कोसए॥ कर्षकम् । तए॥ ५८३. से कि तं अणंताणतए? अणं- अथ किं तद् अनन्तानन्तकम् ? ५८३. वह अनन्त-अनन्त क्या है? ताणंतए दुविहे पण्णत्ते, तं जहा-- अनन्तानन्तकं द्विविधं प्रज्ञप्तं, तद्यथा अनन्त, अनन्त के दो प्रकार प्रज्ञप्त हैं, जहण्णए अजहण्णमणुक्कोसए। जघन्यकम् अजघन्योत्कर्षकम् । जैसे जघन्य और अजघन्य-अनुत्कृष्ट । ५८४. जहण्णयं संखेज्जयं केत्तियं जघन्यकं संख्येयकं कियद् भवति? ५८४ जघन्य संख्येय कितना होता है ? होइ ? दोरूवाई। द्विरूपे । ___ दो की संख्या जघन्य संख्येय है। ५८५. तेण परं अजहण्णमणुक्कोसयाई ततः परम् अजघन्योत्कर्षकाणि ५८५. उसके बाद उत्कृष्ट संख्येय से पहले की ठाणाई जाव उक्कोसयं संखेज्जयं स्थानानि यावद् उत्कर्षकं संख्येयकं न संख्या अजघन्य-अनुत्कृष्ट संख्येय है। न पावई ॥ प्राप्नोति । Jain Education Intemational For Private & Personal Use Only For Private & Personal use only www.jainelibrary.org

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