Book Title: Agam 32 Chulika 02 Anuyogdwar Sutra Anuogdaraim Terapanth
Author(s): Tulsi Acharya, Mahapragna Acharya
Publisher: Jain Vishva Bharati

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Page 405
________________ अणुओगदाराई की अपेक्षा अनुपयुक्त ज्ञाता अवस्तु है क्योंकि यदि कोई ज्ञाता है तो वह अनुपयुक्त नहीं होता। वह आगमतः द्रव्य क्षपणा है। ६७५. से कि तं नोआगमओ दव्व- अथ कि सा नोआगमतो द्रव्य- ६७५. वह नोआगमतः द्रव्य क्षपणा क्या है ? ज्झवणा? नोआगमओ दव्व- क्षपणा ? नोआगमतो द्रव्यक्षपणा नोआगमत: द्रव्य क्षपणा के तीन प्रकार झवणा तिबिहा पण्णता, तं त्रिविधा प्रज्ञप्ता, तद्यथा-शरीर- प्रज्ञप्त हैं, जैसे-जशरीर द्रव्य क्षपणा, भव्यजहा-जाणगसरीरदब्वझवणा अध्यक्षपणा भव्यशरीरद्रव्यक्षपणा शरीर द्रव्य क्षाणा, ज्ञशरीर भव्यशरीर भवियसरीरदब्वझवणा जाणग- ज्ञशरीर-भव्यशरीर-व्यतिरिक्ता द्रव्य- व्यतिरिक्त द्रव्य क्षपणा । सरीर-भवियसरीर-वतिरित्ता क्षपणा। दवझवणा॥ ६७६. से कि तं जाणगसरीरदब्व- अथ कि सा ज्ञशरीरद्रव्य- ६७६. वह ज्ञशरीर द्रव्य क्षपणा क्या है ? ज्झवणा? जाणगसरीरदव्वझवणा क्षपणा? ज्ञशरीरद्रव्यक्षपणा-क्षपणा जशरीर द्रव्य क्षपणा-क्षपणा इस पद के -झवणे ति पयत्थाहिगारजाण- इति पदार्थाधिकारजस्य यत् शरीरकं अर्थाधिकार को जानने वाले व्यक्ति का जो गस्स जं सरीरयं ववगय-चुय- व्यपगत च्युत-च्यावित-त्यक्तदेहं जीव- शरीर अचेतन, प्राण से च्युत, किसी निमित्त से चाविय-चत्तदेहं जीवविप्पजद विहीणं शय्यागतं वा संस्तारगतं वा प्राण-च्युत किया हुआ, उपचय रहित और जीव सेज्जागयं वा संथारगयं वा निषीधिकागतं वा सिद्धशिलातलगतं विप्रमुक्त है उसे शय्या, बिछौने, श्मशानभूमि निसीहियागयं वा सिद्धसिलातलगयं वा दृष्ट्वा कोऽपि वदेत्-अहो अनेन या सिद्धशिलातल पर देखकर कोई कहेवा पासित्ता णं कोइ वएज्जा- शरीरसमुच्छ्येण जिनदिष्टेन भावेन आश्चर्य है इस पौद्गलिक शरीर ने जिन द्वारा अहो णं इमेणं सरीरसमुस्सएणं क्षपणा इति पवम् आख्यातं प्रज्ञापितं उपदिष्ट भाव के अनुसार क्षपणा इस पद का जिणदिठेणं भावेणं झवणे त्ति पयं प्ररूपितं दर्शितं निदशितम् उपदशि आख्यान, प्रज्ञापन, प्ररूपण, दर्शन, निदर्शन आघवियं पण्णवियं परूवियं दंसियं तम्। यथा को दृष्टान्त: ? अयं मधु- और उपदर्शन किया है। जैसे-कोई दृष्टान्त निदंसियं उवदंसियं। जहा को कुम्भः आसीत्, अयं घृतकुम्भः है? [आचार्य ने कहा -- इसका दृष्टान्त यह दिळंतो? अयं महुकुंभे आसी, आसीत् । सा एषा ज्ञशरीरद्रव्य- है] यह मधुघट था, यह घृतघट था। वह अयं घयकुंभे आसी। से तं जाणग- क्षपणा । ज्ञशरीर द्रव्य क्षपणा है। सरीरदव्वझवणा॥ ६७७. से कि तं भवियसरीरदब्व- अथ किं सा भव्यशरीरद्रव्य- ६७७. वह भव्यशरीर द्रव्य क्षपणा क्या है ? झवणा? भवियसरीरदव्व- ' क्षपणा? भव्यशरीरद्रव्यक्षपणा- ___ भव्यशरीर द्रव्य क्षपणा-गर्भ की पूर्णावधि झवणा-जे जोवे जोणिजम्मण- यो जीयो योनिजन्मनिष्क्रान्तः अनेन से निकला हुआ जो जीव इस प्राप्त पौद्गलिक निक्खते इमेणं चेव आदत्तएणं चंव आदत्तकेन शरीरसमुच्छयेण जिन- शरीर से क्षपणा इस पद को जिन द्वारा सरीरसमुस्सएणं जिणदिळेणं दिष्टेन भावेन क्षपणा इति पदम् उपदिष्ट भाव के अनुसार भविष्य में सीखेगा, भावेणं झवणेत्ति पयं सेयकाले एष्यत्काले शिक्षिष्यते, न तावत् वर्तमान में नहीं सीखता है तब तक वह भव्यसिक्खिस्सइ, न ताव सिक्खइ। शिक्षते। यथा को दृष्टान्त: ? अयं शरीर द्रव्य क्षपणा है । जैसे-कोई दृष्टान्त जहा को दिळंतो? अयं महुकुंभे मधुकुम्भः भविष्यति, अयं घृतकुम्भः है ? [आचार्य ने कहा- इसका दृष्टान्त यह भविस्सइ, अयं घयकुंभे भविस्सइ। भविष्यति। सा एषा भव्यशरीर- है] यह मधुघट होगा, यह घृतघट होगा। वह से तं वयसरोरदव्वझवणा॥ द्रव्यक्षपणा । भव्यशरीर द्रव्य क्षपणा है। ६७८. से कि तं जाणगसरीर-भविय- अथ कि सा शरीर-भव्यशरीर- ६७८. वह ज्ञशरीर भव्य शरीर व्यतिरिक्त द्रव्य सरीर-वतिरित्ता दवझवणा? व्यतिरिक्ता द्रव्यक्षपणा ? शरीर- क्षपणा क्या है ? जाणगसरीर-भवियसरीर-वतिरित्ता भव्यशरीर-व्यतिरिक्ता व्यक्षपणा ज्ञशरीर भव्यशरीर व्यतिरिक्त द्रव्य दव्वझवणा तिविहा पण्णत्ता, त्रिविधा प्रज्ञप्ता, तद्यथा--लौकिकी क्षपणा के तीन प्रकार प्रज्ञप्त हैं, जैसे Jain Education Intemational For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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