Book Title: Agam 32 Chulika 02 Anuyogdwar Sutra Anuogdaraim Terapanth
Author(s): Tulsi Acharya, Mahapragna Acharya
Publisher: Jain Vishva Bharati

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Page 444
________________ परिशिष्ट : ३-टिप्पण : अनुक्रम ४०७ २१६ १७७ २३२ २८४ ६३१ ७०८ ३४५ ४९५ २८६ » २४१ ३२६ १७६ الله ३६३ नैगम व्यवहार नय सम्मत आनुपूर्वी का द्रव्यप्रमाण १२३ नेपातिक नैरयिकों के वैक्रिय शरीर का प्रमाण ४६३ नोआगमतः द्रव्यावश्यक १५-२१ नोआगमत: भाव अक्षीण व दीप का दृष्टान्त ६४३ नोआगमत: भाव अध्ययन नोआगमत: भाव सामायिक नोआगमत: भाव स्कन्ध ७२ नोगौण ३२१ पट्टसूत्र परमाणुपुद्गल अनानुपूर्वी ११५ परमाणु सूक्ष्म व व्यवहारिक ३९६-३९८ परिमाण संख्या ५७०-५७२ पर्याप्त पाषण्ड नाम ३४४ पुद्गलपरिवर्त पुराण पुर्वानुपूर्वी १४८ प्रकृतिभाव २६८ प्रतर अंगुल ३९३,४११ प्रतिपक्ष पद से होने वाला नाम प्रधानता से होने वाला नाम प्रमाण प्रमाणांगुल ४००,४११ प्रमाणांगुल के प्रयोजन प्रस्तुत प्रस्थापना की दृष्टि से आवश्यक श्रुत का....अनुयोग प्रवृत्त है बहत्तरकलाएं बहुव्रीहि बुद्धवचन २५४ २१२ rrr xxxv Xxurur १०७ १७७ मलयवतिकार ३६४ माढर मानप्रमाण ३७३-३७७ ----धान्यमान प्रमाण -रसमान प्रमाण मिश्र २७० मिश्र के संयोग से होने वाला नाम ३३२ मिश्रित बालों से बना सूत ४४ मृगरोम का सूत ४४ योजन ३९२ लोकोतर भावश्रुत में निर्दिष्ट ग्रन्थ ५० वक्तव्यता ६०५-६०८ वानमन्तर देवों के वैक्रिय शरीर का प्रमाण वेन्नातट वैदिश ३६३ वैशिक वैशेषिक व्याकरण शरीर ४४६ श्रमण व उपमाएं ७०८ -उरग सम, गिरि सम, ज्वलन सम, सागर सम, नभस्तल सम, तरुगण सम, भ्रमर सम, मृग सम, धरणि सम, जलरुह सम, रवि सम, पवन सम श्रेणी अंगुल ४११ षष्टितन्त्र संख्या ५५८,५७४ संख्याकाल ४१७ संख्यात ५७५-५८६ संग्रहनय की अनौपनिधिकी द्रव्यानुपूर्वी १३१-१३७ संमूच्छिम संयूथ नाम ३६४ संस्थान २३४,२३५ समय २१९,४१६ समवतार ६११-६१४ सम्पूर्ण लोक में हो सकता है सात नय ७१५ -ज्ञाननय -क्रियानय सामाचारी २३८-२४१ २४०,२४४ २१० ०. २११ २३२ २४४ ४१० २४२, २४४ २४३ ३२५, ३२७ २७७ ३२८ २१३ २५४ - १०५ १७६ २१५ १४९ २४३, २७१-२८७ ३४९, ५०६ बोण्डज भंभी और आसुरोक्त भाव भावप्रमाण भावसमवतार भावावश्यक भावोपक्रम (शास्त्रीय) मति १५०,१७७ २१३,३१५ ३५१ १४९, २७७ ३४६ १०१ ३८४ १२४ मलय १५० Jain Education Intemational For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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