Book Title: Agam 32 Chulika 02 Anuyogdwar Sutra Anuogdaraim Terapanth
Author(s): Tulsi Acharya, Mahapragna Acharya
Publisher: Jain Vishva Bharati

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Page 463
________________ ४२६ प्रवत्त । अथ शब्द ते वाक्य ग्रहबा : अर्थे प्रवत्त । तथा कि ए शब्द प्रश्न नै अर्थे प्रवत्त । अनै तं शब्द जे प्रारंभ्यो छ ते ग्रहवा नै अर्थे प्रवत्त ! इम शब्दार्थ करी नै पछ ए समुदायार्थ करवो। अथ किसो स्वरूप छै ते आवश्यक नों इम पूछये हुंते आचार्य शिष्य नो वचन अणउथापता अति आदर देवा नै अर्थे तेहज वचन उच्चरी नै उत्तर दीई छ७९. नाम आवश्यक पहिलू जेह, द्वितीय आवश्यक स्थापना लेह। द्रव्य आवश्यक ती कहिये, भाव आवश्यक चउथो लहिये ।। अणुओगदाराई वर्त्तते, अथशब्दस्तु वाक्योपन्यासार्थः तथा "किमिति प्रश्ने, तदिति सर्वनाम पूर्वप्रक्रान्तपरामर्शार्थे, ततश्चायं समुदायार्थ --अथ किस्वरूपं तदावश्यकम् ? एवं प्रपिनते सत्याचार्यः शिष्यवचनानुरोधेन आदरा धानार्थ प्रत्युच्चार्य निदिशति-- (वृ. प. ९) ७९, नामावस्सयं ठवणावस्सयं दवावस्सयं भावावस्सयं । (सू. ८) ८०. अवश्यं कर्त्तव्यमावश्यकम् । (वृ. प. ९) ८१. अथवा गुणानां आ–समन्ताद्वश्यमात्मानं करोतीत्या वश्यकम् । सोरठा ८०. अवश्य करवू जेह, आवश्यक कहिये तसुं। लोकिक लोकोत्तरादेह, आगल कहिस्ये भेद ते॥ ५१. अथवा गुण नैं विषेह, आ कहितां सर्व प्रकार करि । आत्मा ने वश्य करेह, तेह आवश्यक जाणवू ।। गीतक छंद ८२. अथवा जु प्राकृत शेलीइं, आवासकं इम पिण लो । रहवास कहितां तिहां वसवं, आगल क प्रत्यय का । ८३. आ कहितां सर्व प्रकार करि, गुण शून्य आत्म प्रति सही। गुण करी ने ज वसाविय, आवासकं कहिये वही॥ ८२. अथवा-आवस्सयंति प्राकृतशैल्या आवासक, तत्र 'वस निवासे' इति । (व. प. ९) ८३. गुणशून्यमात्मानम् आसमन्तात् वासयति गुणैरित्यावासकं । (वृ. प. ९,१०) (लय : सोही सयाणा) ८४. अनुयोगद्वार सूत्र नीं न्हाल, प्रवर कही ए पहिली ढाल । श्री जिन वच श्रध्यां सुख सार, आनंद 'जय-जश' हरष उदार।। दूहा १. से कि तं नामावस्सयं ? नामावस्सयं--- १. अथ स्यूं ते नामावश्यक ? शिष्य इम पूछचे सार । गुरु भाख नामावश्यक, कहूं तास अधिकार ।। ढाल : २ १. जस्स णं जीवस्स वा अजीवस्स वा जीवाण वा अजीवाण वा, (लय : सेवो रे साधु सयाणा) १. जे इक जीव वस्तु नुं अथवा, इक अजीव वस्तु नुं जाण वा बहु जीव वस्तु नो अथवा, बहु अजीव वस्तु नों माण। रे भवियण ! जिन वच महा जयकार, प्रभु कह्या निक्षेपा च्यार, रे भवियण ! ए नाम निक्षेपो विचार ॥ध्रुपद।। २. ते एक उभय न वा घणां उभयं नं, आवश्यक इसो नाम करीये । नाम आवश्यक कहिये तेहनें, से तं नाम आवश्यक वरीय, रे ।। २. तदुभयस्स वा तदुभयाण वा आवस्सए ति नाम कज्जइ । से तं न'मावस्सयं । (मू. ९) Jain Education Intemational For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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