Book Title: Agam 32 Chulika 02 Anuyogdwar Sutra Anuogdaraim Terapanth
Author(s): Tulsi Acharya, Mahapragna Acharya
Publisher: Jain Vishva Bharati

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Page 403
________________ अणुओगदाराई ३६६ ६६२. से कि तं सचित्ते ? सचित्ते- अथ कि स सचित्त:? सचित्त:- सोसाणं सिस्सिणीणं आए। सेत शिष्याणां शिष्याणाम् आयः। स एष सचित्ते॥ सचित्तः। ६६२. वह सचित्त लोकोत्तरिक द्रव्य आय क्या है ? सचित्त लोकोत्तरिक द्रव्य आय--शिष्यों और शिष्याओं की आय । वह सचित्त लोकोत्तरिक द्रव्य आय है। ६६३. से कि तं अचित्ते? अचित्त- अथ कि स अचित्तः? अचित्तः- पडिग्गहाणं वत्थाणं कंबलाणं प्रतिग्रहाणां वस्त्राणां कम्बलानां पायपुंछणणं आए। से तं पादप्रोञ्छनानाम् आय: । स एष अचित्ते ॥ अचित्तः । ६६३. वह अचित्त लोकोत्तरिक द्रव्य आय क्या है ? अचित्त लोकोत्तरिक द्रव्य आय--पात्र, वस्त्र, कम्बल और पादप्रोञ्छन की आय । वह अचित्त लोकोत्तरिक द्रव्य आय है। ६६४. से कितं मीसए? मीसए- अथ कि स मिश्रकः ? मिश्रक:- सीसाणं सिस्तिणियाणं सभंडमत्तो- शिष्याणां शिष्याणां सभाण्डामत्रोपवगरणाणं आए। से तं मीसए। करणानाम् आय: । स एष मिथकः । से तं लोगुत्तरिए। से तं जाणग- स एष लोकोत्तरिकः। स एष सरीर-भवियसरोर-वतिरित्ते ज्ञशरीर-भव्यशरीर-व्यतिरिक्तो दवाए। से तं नोआगमतो द्रव्यायः । स एष नोआगमतो द्रव्यायः । दवाए । से तं दवाए। स एष द्रव्यायः । ६६४. वह मिश्र लोकोत्तरिक द्रव्य आय क्या है ? मिश्र लोकोत्तरिक द्रव्य आय - भाण्ड, पात्र, उपकरण सहित शिष्यों और शिष्याओं की आय। वह मिश्र लोकोत्तरिक द्रव्य आय है। वह लोकोत्तरिक द्रव्य आय है। वह ज्ञशरीर भव्य शरीर व्यतिरिक्त द्रव्य आय है। वह नोआगमतः द्रव्य आय है । वह द्रव्य आय है । ६६५. से कि तं भावाए ? भावाए अथ कि स भावाय: ? भावायः ६६५. वह भाव आय क्या है? दुविहे पण्णत्ते, तं जहा आगमओ द्विविधः प्रज्ञप्तः, तद्यथा आगमतश्च भाव आय के दो प्रकार प्रज्ञप्त हैं, जैसेय नोआगमओ य॥ नोआगमतश्च । आगमत: और नोआगमतः । ६६६. से कि तं आगमओ भावाए ? अथ कि स आगमतो भावाय: ? ६६६ वह आगमतः भाव आय क्या है ? आगमओ भावाए-जाणए उव- आगमतो भावाय: उपयुक्तः । स आगमतः भाव आय ---जो जानता है और उत्ते । से तं आगमओ भावाए॥ एष आगमतो भावायः । उसके अर्थ में उपयुक्त है। वह आगमत: भाव आय है। ६६७. से कि तं नोआगमओ भावाए ? अथ कि स नोआगमतो मावायः? ६६७. वह नोआगमतः भाव आय क्या है ? नोआगमओ भावाए दूविहं पण्णत्ते, नोआगमती भावाय: द्विविधः प्रज्ञप्तः, नोआगमत: भाव आय के दो प्रकार प्रज्ञप्त तं जहा-पसत्थे य अपसत्थे य॥ तद्यथा प्रशस्तश्च अप्रशस्तश्च । हैं, जैसे -प्रशस्त और अप्रशस्त । ६६८. से कि तं पसत्थे ? पसत्थे तिविहे पण्णत्ते, तं जहा-नाणाए दंसणाए चरित्ताए । से तं पसत्थे । अथ किं स प्रशस्त ? प्रशस्त. ६६८. वह प्रशस्त भाव आय क्या है? स्त्रिविधः प्रज्ञप्तः, तद्यथा--ज्ञानायः । प्रशस्त भाव आय के तीन प्रकार प्रज्ञप्त दर्शनायः चरित्रायः। स एष हैं, जैसे-ज्ञान की आय, दर्शन की आय और प्रशस्तः । चारित्र की आय । वह प्रशस्त भाव आय है। ६६६. से कि तं अपसत्थे ? अपसत्थे अथ कि स अप्रशस्त: ? ६६९. वह अप्रशस्त भाव आय क्या है ? चउविहे पण्णत्ते, तं जहा- अप्रशस्तश्चतुविधः प्रज्ञप्तः, तद्यथा-- अप्रशस्त भाव आय के चार प्रकार प्रज्ञप्त कोहाए माणाए मायाए लोभाए। क्रोधाय: मानाय: मायायः लोभायः । हैं, जैसे- क्रोध की आय, मान की आय, से तं अपसत्थे। से तं नोआगमओ स एष अप्रशस्तः । स एष नोआगमतो माया की आय और लोभ की आय। वह भावाए। से तं भावाए। से तं भावायः । स एष भावायः । स एष अप्रशस्त भाव आय है। वह नोआगमत: भाव आए। आयः । आय है । वह भाव आय है। वह आय है। ६७०. से कि तं झवणा? झवणा अथ किसा क्षपणा? क्षपणा ६७०. वह क्षपणा क्या है ? चउम्विहा पण्णत्ता, तं जहा- चतुविधा प्रज्ञप्ता, तद्यथा-नाम- क्षपणा' के चार प्रकार प्रज्ञप्त हैं, जैसे Jain Education Intemational For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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