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तुलसी प्रज्ञा
अयानधान त्रैमासिकी
खण्ड १७
25 जैन विश्व
वज्जा
मोक्खी!
(अहं)
भारती लाइन
अक्टूबर-दिसम्बर, १९६१
अङ्क ३
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तुलसीप्रज्ञा - त्रैमासिक अनुसंधान पत्रिका जैन विश्व भारती संस्थान, लाडनूं- ३४१३०६
अक्टूबर-दिसम्बर
अंक ३
बीस रुपये
खण्ड - १७
०
शुल्क - ४५ ) वार्षिक : आजीवन - ५०१ )
'तुलसी प्रज्ञा' प्रतिवर्ष - मार्च, जून, सितम्बर और दिसम्बर माह के तीसरे सप्ताह में प्रकाशित होती है ।
• प्रकाशनार्थ लेख इत्यादि कागज के एक ओर टंकण कराके भेजें । साधारणतया दस पृष्ठों से बड़ा लेख न हो । जरूरी हो तो विवेच्य विषय दो भागों में विभाजित किया जा सकता है ।
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० 'सम्पादक-मण्डल' द्वारा लेखादि में काट-छांट सम्भव है किन्तु भाव और मंशा को सुरक्षित रखा जावेगा । दुर्लभ फोटो और रेखाचित्र मुद्रित हो सकते हैं।
प्रकाशन स्वीकृति दो माह के भीतर भेज दी जाती है । अस्वीकृत लेख लौटाने संभव नहीं होंगे। अतः प्रतिलिपि सुरक्षित रख लें ।
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• समीक्षा और समालोचना के लिए प्रत्येक ग्रंथ की दो-दो प्रतियां भेजें ।
• सभी प्रकार के पत्र व्यवहार के लिए - 'सम्पादक, " तुलसी प्रज्ञा" जैन विश्वभारती संस्थान, लाडनू - ३४१६०६' को संबोधित करना चाहिए !
सम्पादक
डॉ० परमेश्वर सोलंकी
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ঞ্জিন্সিী
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अक्टूबर-दिसम्बर, १९९१
___ अंक ३
अंक ३
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अनुक्रमणिका
पृष्ठ १०७
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१. सम्पादकीय २. आदिकर्तृन् अर्हत् पञ्चेन्द्र ३. संस्कृत वाङमय में लोक-अवधारणा ४. जैन-बौद्ध विनय का तुलनात्मक अध्ययन ५. जैननय न्याय द्वारा तत्त्वार्थ-निर्णय ६. भारतीय दर्शन की आशावादिता एवं प्रगतिशीलता ७. वर्षाऽऽवास का इतिहास ८. सामान्य प्राकृत भाषा में मध्यवर्ती त=द ७. संयमधारी साधु में लेश्याएं-एक विवेचन १०. पुस्तक समीक्षा ११. सहयोगी पत्र-पत्रिकाएं
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१५१ १५७ १६१ १६५ १७५
English Section 1. Contribution of German scholars to Prakrit
studies with special reference to A. Weber 2. Leśya-the ethical aspect of an individual 3. Some thoughts on Tirukkural 4. How I become what I am 5. Three Magadhi Sutras6. Teshub or Reshub, the Arhat 7. Book-Review
नोट- इस अंक में प्रकाशित लेखों में व्यक्त विचार लेखकों के हैं । यह आवश्यक नहीं है
कि सम्पादक-मंडल अथवा संस्था को वे मान्य हों।
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सपादकीय
मुरियकालवोछिने चोयठ अंगे
मई-जून, १९६१ के अंक की इन पंक्तियों में खारवेल-प्रशस्ति में 'मौर्यकाल१६५' लिखे होने की बात दोहराई गई थी किन्तु उसके बाद शिलालेख की छाप और ट्रांसक्रिप्ट वगैरह को पुनः यत्नपूर्वक अध्ययन से यह सूत्र समझ पड़ा कि लेख खोदने वाले सिलावटों ने प्रशस्ति के प्रत्येक वाक्य को, एक दूसरे वाक्य से पृथक-पृथक रखा है और राजा खारवेल के १३ शासन वर्षों के विवरण को भी अलग-अलग पैरा बनाकर उत्कीर्ण किया है। ___ इस सूत्र से खारवेल-प्रशस्ति के मूलपाठ को पुनः संशोधित करने पर १५ वीं ओळी में एक अलग वाक्य बना-'मुरियकाल वोछिने च चोयठ अंगे सातिकं तिरियं उपादयति ।' गत अंक (जुलाई-सितम्बर, १९६१) में यह पाठ प्रकाशित किया गया और 'चोयठ अंगे' को जैनागमों की संख्या का वाचक होने की संभावना प्रकट की गई।
'चोयठ अंगे' पद में चोयठ-पद संख्या वाचक ही हो सकता है किंतु 'अंकानां वामतो गतिः'-अनुसार यह ८४ का द्योतक है; ६४ है अथवा ४+८ का योग १२ या ८४ ४ का गुणन--३२ है ? अधिक संभावना यही है कि दोनों अंकों का योग ही यहां अभिप्रेत होगा! तत्कालीन शिलालेखों में संख्या-अंकों की गणना इसी तरह लिखी मिलती है। जैनागमों की परंपरागत संख्या भी १२ ही बताई जाती है। समवायांग के प्रकीर्णक समवाय में सूत्र है-"दुवालसंगे गणिपिडगे।" पालि-साहित्य में बुद्ध वचनों को भी 'द्वादशांगमिदं वचः' कहा गया है।
दूसरा प्रश्न है ? अंग क्या हैं ? वैदिक-साहित्य में वेदांगों की संख्या छह
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है। शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और ज्योतिष । वहां वेद-पुरुष की भी कल्पना है। उसकी नासिका-शिक्षा, कल्प-हाथ, व्याकरण-मुख, निरुक्तश्रोत्र, छन्द-पैर और ज्योतिष-नेत्र हैं। जैन-वाङ्मय के ग्रंथ-मूलाराधना (विजयोदया) में श्रुत-पुरुष का जिक्र है-"श्रतं पुरुषः मुख चरणाद्यङ्गस्थानीयत्वादंग शब्देनोच्यते।" नंदी में भी आगम-पुरुष या श्रुत पुरुष का उल्लेख है। ___ नि:संदेह उस काल में आगम श्रुत-सन्निधि के रूप में ही वर्तमान रहे होंगे; इसलिये विचारणीय यह भी है कि मौर्य काल में क्या उच्छिन्न हुआ ? और राजा खारवेल ने कैसा, क्या 'सातिक तिरिय' बनवाया? इस संबंध में भी संभावना यही की जा सकती है कि श्रुत-सन्निधि को सुरक्षित रखने हेतु उस समय चैत्य-स्तूप आदि में जो वाचना-प्रवाचना की श्रुत-प्रतिश्रुत परंपराएं प्रचलित थीं वे मौर्य काल में हुए आक्रमण-प्रत्याक्रमणों में नष्टभ्रष्ट हो गईं अथवा कर दी गईं। केवल सुदूर पार्वतीय क्षेत्र में एक मात्र भद्रबाहु आचार्य के यहां ही वाचना-प्रवाचना का क्रम शेष रहा जिससे मुनि स्थूलभद्र लाभान्वित हुए और उनकी मृत्यु (वीर नि० सं० २१६) से आगम उच्छिन्न हुए। दिगम्बर-परंपरा के अनुसार यह उच्छेद-काल ६२+१००+१८३=३४५ वीर निर्वाण संवत् हो सकता है जबकि मुनि धर्मसेन दिवंगत हुए।
अनुयोगद्वार सूत्र के द्रव्यावश्यक प्रसंग में आगम पाठ की १६ विशेषताएं बताई गई हैं-शिक्षित, स्थित, जित, मित, परिजित, नामसम, घोषसम, अहीनाक्षर, अन्त्यक्षर, अव्याविद्धाक्षर, अस्खलित, अमिलित, अव्यत्यानंडित, प्रतिपूर्ण, प्रतिपूर्णघोष और कण्ठोष्ठविप्रमुक्त । विशेषावश्यक भाष्य में आगम-लेखन पर रूपक दिया है-'तप, नियम तथा ज्ञानरूपी वृक्ष पर आरूढ़ अमित-अनन्त सम्पन्न केवलज्ञानी, भव्य जनों को उद्बोधित करने के लिए ज्ञान पुष्पों की वृष्टि करते हैं और गणधर उसे बुद्धिरूपी पट में ग्रहण करके उसका प्रवचन के निमित्त ग्रन्थन कर लेते हैं।"
उपरोक्त दोनों उद्धरण आरंभिक अवस्था का दिग्दर्शन देते हैं। पूर्वात्मकज्ञान के रूप में जो १४ पूर्व थे वे उच्छिन्न हो गए। चतुर्दश पूर्वो में प्रथम चार पूर्वो की चूलिकाएं (परिकर्म, सूत्र, पूर्वगत और अनुयोग) भी थीं, जो विलुप्त हो गई।
राजा खारवेल ने कुमारी पर्वत पर महासंघ आहूत किया। वहां धर्मचक्र प्रवर्तन हुआ। ४ महत्त्वपूर्ण अंगों के रूप में आचार, सूत्र, स्थान और समवाय तथा आठ उपांगों के रूप में भगवती, ज्ञातधर्मकथा, उपासकदशा अन्तकृद्दशा, अनुत्तरोपातिकदशा, प्रश्नव्याकरण, विपाक और दृष्टिवाद की गणना की गई । संभवतः यह पहली वाचना है।
दूसरी वाचना में, नंदी में उल्लिखित आगम-पुरुष अथवा श्रुतपुरुष की
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कल्पना साकार हुई जिसमें १२ अंग और १२ ही उपांग मान लिए गए । विशेषावश्यकभाष्य में एक गाथा इस प्रकार है - " गणहर थेरकयं वा, आएसा मुक्कवागरणओ वा । धुव चल विसेसओ वा, अंगाणंगेसु नाणत्तं ॥” कि जो गणधर कृत है अथवा गणधरों के प्रश्नों के उत्तर में भगवान् तीर्थंकर ने कहा है वही ध्रुव है और अंगप्रविष्ट है । 'आचारांग सूत्र' के आरंभ में भी एक पद आता है - "सुयं मे आउ ! तेण भगवया एवमक्खायं " - हे शिष्य ! मैंने सुना है कि उस श्रमण भगवान् महावीर ने इस प्रकार प्रतिपादन किया है । यह उल्लेख प्रविष्ट और अनंग प्रविष्ट-भेद होने का है । उसके बाद आगमों में ये भेद हुए । कालिक, उत्कालिक तथा अंग, उपांग, मूल, छेद, चूलिका, प्रकीर्णक आदि विभाजन हुए और आज आगमों की संख्या ८४ तक गिनी जा सकती है ।
जहां तक आगम-लेखन काल का प्रश्न है, तुलसी- प्रज्ञा के अप्रैल-जून अंक में 'निर्वाणकाल वर्ष संख्या' - शीर्षक एक अति प्राचीन पत्रक प्रकाशित किया गया है । उसमें "वीरात् ६५० कल्प सिद्धान्त पुस्तके न्यस्तः "... "यह उल्लेख २१ बार दोहराया गया है; अतः उसे सर्वमान्य किया जाना चाहिए | कल्प सिद्धान्त लेखन के साथ उस समय जैनागमों की क्या गणना रही होगी ? यह शोध का विषय है ।
- परमेश्वर सोलंकी
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आदिकर्तृन अर्हत् पञ्चेन्द्र
] डॉ. परमेश्वर सोलङ्की
सन् १९७५ में एक जापानी टीम ने स्कन्दर (काबुल) से खोदाई में उमा-महेश्वर की खण्डित मूत्ति प्राप्त की। मूत्ति पर लिखे लेख में अग्नि के तीन रूप-अग्नि, विद्युत् और सूर्य की तरह ब्रह्मा, विष्णु और महेश को एक ही देव के तीन रूप बताया गया है। यह उल्लेख कठोपनिषद् के वाक्य-"अग्नियंत एको भुवनं प्रविष्ठो रूप-रूपं प्रतिरूपो बभूव"-की मान्यता के अनुरूप है। दूसरे शब्दों में विक्रमपूर्व की सदियों में ब्रह्मा, विष्णु, महेश-त्रिदेव को संस्थापक, प्रतिपालक और संहारक के रूप में न मानकर एक ही शक्ति को तीन रूपों में स्थित मानने की परम्परा प्रचलित थी।
मथुरा के कंकाली टीले की खोदाई में एक चतुस्स्तंभ मिला है। उस पर भी तीन जिन मूत्तियां बनी हैं । यह चतुस्स्तंभ श्रेष्ठि वेणी की पत्नी और भट्टिसेन की माता कुमारमिता द्वारा प्रदत्त और आचार्य जयभूति शिष्या संघमिका शिष्या वसुला के कल्याणार्थ प्रतिष्ठापित हुआ है और उस पर सं० १५ का अंकन है। वहीं से प्राप्त एक पेनल के ऊपरी भाग पर स्तूप बना है और उसके दोनों बाजू दो-दो जिन प्रतिमाएं बनीं हैं । पेनल पर नीचे श्रमण काह्न और धनहस्तिन पत्नी तथा तीन सेवकों का अंकन है । पेनल पर सं० ६५ लिखा है। इसी टीले पर एक पश्चात्कालीन वर्धमान प्रतिमा भी मिली है जिसके बोर्डर पर सीधे ७ और दाएं बाएं ८, ८-कुल २३ जिनफलक बने हैं।
कंकाली टीला, मथुरा से एक टूटा हुआ फलक और मिला है जिस पर सं० ७६ वर्षा ऋतु के चतुर्थ मास की २० वीं तिथि अंकित है और उसे 'पूर्वा' बताकर लिखा है कि कोट्टिय गण की भइरा शाखा के किसी अपवृधहस्ति द्वारा अरहतनंदीव्रत की प्रतिमा का निवर्तन हुमा और उसे किसी श्राविका के कल्याणार्थ देवनिर्मित जैन स्तूप में प्रतिष्ठित किया गया।
यह फलक और उस पर लिखा लेख भी महत्त्वपूर्ण है। क्योंकि १३ वीं सदी में हुए जिनप्रभसूरि ने अपने 'तीर्थकल्प' में उक्त स्तूप को देव-निर्मित कहने के अलावा स्वर्णमंडित बताया है और लिखा है कि धर्मरुचि और धर्मघोष के कहने पर ईंटों से बने देवनिर्मित स्तूप के बाहर स्वर्णिम पत्थरों का मंदिर निर्मित हुआ था। परम्परानुसार निर्माण बाद, १३०० वर्ष में बप्पभट्टिसूरि के समय भी उसका जीर्णोद्धार हुआ।
स्तूप का तल गोलाकार है । नीचे केवल गोल चबूतरा है, जिस पर ढोल या कुंए खण्ड १७, अंक ३ (अक्टूबर-दिसम्बर, ६१)
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की नाळ के समान इमारत बनी है और उसपर अर्द्धगोलाकार प्रदक्षिणापथ, आडी पटरियां और चारों दिशाओं में चार तोरणद्वार बने हैं। दीवालों के भीतर मिट्टी भरी है और उसकी बाहर की ओर मूर्तियां जड़ी थीं। हमारी पहचान अनुसार उपर्युक्त चतुरस्तंभ, पेनल और फलक पर लिखा संवत्सर ( देवपुत्र शक संवत्सर) विक्रमपूर्व ५४३ वें वर्ष शुरू किया गया, जिससे ये तीनों उल्लेख विक्रमपूर्व के हैं ।
कहायूं (कहोम) जिला गोरखपुर (उत्तरप्रदेश) से प्राप्त एक शैल स्तंभ लेख' शक्रोपमस्य क्षितिपतपतेः स्कन्दगुप्तस्य शान्ते ( ? ) वर्षे त्रिंशदर्शकोत्तरकशततमे ज्येष्ठमासि प्रपन्ने' – के अनुसार गुप्तसंवत् १४९ का है । उस शैल स्तंभ पर“अर्हतानादिकर्तृन् पञ्चेन्द्रान् स्थापयित्वा धरणिधरमयान् सन्निखातास्ततोऽयम् शैलस्तंभ : " - अर्हत्, आदि कतृ और पंचेन्द्र कहे जाने वाले धरणिधरों की स्थापना की गई थी ।
इस प्रकार बप्पभट्टिसूरि के समय जीर्णोद्धार हुआ देवनिर्मित स्तूप उनसे १३०० वर्ष पूर्व अर्थात् ५०० वर्ष विक्रमपूर्व पुनः निर्माण हुआ था जो अतिप्राचीन होने से उस समय देवनिर्मित कहा जाने लगा था । उस स्तूप में स्थापित चतुरस्तंभ, पूर्व्वा फलक और पेनल क्रमश: सं० १५ = ५२८ विक्रमपूर्व, सं० ७६ = ४६४ विक्रमपूर्व और सं० ६५ = ४४८विक्रमपूर्व के हैं और वे क्रमश त्रिदेव ( तीन जिन) और चार जिन ( आदि कतन् रूप में पूजित होते थे । इस स्तूप में चरण चिह्न, आयागपट्ट, ध्वज और स्तंभ आदि भी स्थापित होते थे । किन्तु संभवतः पूजनीय पूर्व्वा अथवा पेनल ही होते थे । गुप्तकाल में कहायूं शैलस्तंभ की भांति पांच जिनों के रूप में पञ्चेन्द्रों की स्थापना होने लगी और कंकाली टीले से मिली गुप्तोत्तरकालीन वर्द्धमानमूर्ति पर बने २३ जिनों की भांति २४ तीर्थंकरों की परिकल्पना भी साकार हो गई। यह चौथी पांचवीं सदी में हुआ होगा !
प्राचीन जैन परम्परा में १४ कुलकर हैं । प्रतिश्रुति, सम्मति, क्षेमंकर, क्षेमंधर, सीमंकर, सीमंधर, विमलवाहन, चक्षुष्मान्, यशस्वी, अभिचन्द्र, चन्द्राभ, मरुदेव, प्रसेनजित् और नाभि । नाभिपुत्र ऋषभ पहले तीर्थंकर हैं, जो महेश्वर की तरह पूजनीय हैं। जैसे महेश्वर को अग्नि, विद्युत् और सूर्य के रूप में तीन रूपों वाला मान लिया गया, उसी प्रकार ऋषभ भी रूद्र के रूप में पार्श्व और महावीर के रूपों के साथ त्रिदेव बन गए । पुनः उनके शांति-रूप की कल्पना की गई और चार आदिकर्तन् बने । गुप्तकाल में ये आदिकर्तृन् पंचेन्द्र बन गए ।
महावीर, पार्श्व, ऋषभ... तीन परमेष्ठी देवों की ऐतिहासिकता संदेहों से परे हो चुकी है, किन्तु पंचेन्द्रों में दो अन्य तीर्थंकरों (शांतिनाथ और नेमिनाथ ? ) के इतिवृत्त को उद्घाटित किया जाना है। इस संबंध में इतिवृतात्मक विवरण आगम-ग्रन्थों और प्राचीन जैन पुराण कथाओं में अनुसंधेय हैं ?
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लोहानीपुर ( बिहार ) से प्राप्त जिन प्रतिमा
( ईसा पूर्व तीसरी सदी)
काली टीला (मथुरा) कीर्तिस्तंभ पर तीन जिन मूर्तियाँ (सं० १५ ग्रि ३ दि १ की पूर्व्वा ) जो आर्य जयभूति की शिष्या आर्य संघमिका शिष्या आर्य वसुला के लिए निवर्त्तन की गई ।
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खण्ड १३, अंक ३ ( अक्टूबर-दिसम्बर, 8१ )
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तुलसी प्रज्ञा
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स्तूप के साथ चार जिन मूर्तियाँ कंकाली टीला
(i) सिद्धं सं० ६५ ग्रि २ दि १८ कोट्टियतो गणतो थानियातो कुलातो वैरातो शाखातो अ अर्हत्
(ii) शिशिनि धमथाये ग्रहदतस्य धि धन हथि ...
कण्ह श्रमणो
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संस्कृत वाङ्मय में लोक-अवधारणा
गोपाल शर्मा
[लेखक ने लोक-शब्द की व्युत्पत्ति में भाव में घञ् प्रत्यय किया है जो कर्म में होना चाहिए। उसने लोक-शब्द की अवधारणा खोजने का प्रयास किया है। संस्कृत-साहित्य में उसके प्रचलित अर्थों का विलोडन भी किया है किन्तु अधिकांश में वह ‘मानव समाज' में सीमित हो गया है जबकि लोक-शब्द से चराचर जगत् और विश्व भी अभिप्रेत है। विश्व एक प्रहेलिका है। उस पर भारतीय वाङ्मय में पर्याप्त चिंतन हुआ है जो दार्शनिक और वैज्ञानिक दोनों दृष्टियों से विवेच्य है।
-संपादक "लोक" शब्द की व्युत्पत्ति (लोक्यतेऽसौ लोक्न घञ् । भुवने भुवनशब्दे दृश्यम् । जने च अमरः । भावे धन ।) तीन अर्थों में हुई है।' हलायुधकोश में "लोक" शब्द का अर्थ संसार, सप्तलोक एवं प्रजा किया गया है। शब्दकोशों में "लोक" शब्द के कितने ही अर्थ मिलते हैं, जिनमें से साधारणतः दो अर्थ विशेष प्रचलित हैं । एक तो वह जिससे इहलोक, परलोक अथवा त्रिलोक का ज्ञान होता है । “लोक" का दूसरा अर्थ है जनसामान्य । इसी का हिन्दी रूप “लोग" प्रचलित है। विश्व-साहित्य में प्राचीनतम ग्रन्थ वेद में "लोक" शब्द संसार, स्थान' आलोक एवं स्वर्गान्तरिक्षादि' विभिन्न लोकों के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । कीथ एवं मैकडोनल के अनुसार लोक “संसार" का द्योतक है । अक्सर तीन लोकों का उल्लेख हुआ है और अयं लोकः (यह लोक) का नित्य ही असौ लोकः (दूरस्थ अर्थात् दिव्यलोक) के साथ विभेद किया गया है। कभीकभी स्वयं लोक शब्द भी द्युलोक का द्योतक है, जबकि कुछ अन्य स्थलों पर अनेक प्रकार के लोकों का उल्लेख हुआ है ।" उपनिषदों के अनुसार "इहलोक' और 'परलोक' ये ही दो लोक हैं । भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः और सत्यम्—ये सब सप्त व्याहृतियां कहलाती हैं । पौराणिक काल में ये ही सात लोकों के आधार हुए और फिर सात पाताल मिलकर कुल चौदह लोक बने । १° बृहदारण्यकोपनिषद् एवं हरिवंशपुराण में "लोक" शब्द विभिन्न लोकों के साथ आया है। तथा इहलोक-परलोक २ एवं जन अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । स्मृतियों में "लोक" से तात्पर्य इहलोक (संसार) स्वर्गादि तीन लोकों से है । ४ आदिकाव्य रामायण एवं महाभारत में "लोक" शब्द संसार" एवं जनसामान्य अर्थात् प्रजा के अर्थ में आया है। महावैयाकरण पाणिनि ने "लोक" की सत्ता को स्वीकार किया है-"लोकसर्वलोकाट्ठञ् । १७ महाभाष्यकार पतञ्जलि ने भी लोक-प्रचलित शब्दों का उल्लेख किया और कृत्रिमाकृत्रिमन्याय की प्रवृत्ति के सन्दर्भ में "लोक" का
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ग्रहण धूलिधूसरित पाद वाले, शिक्षादि से दूर ग्रामीण से किया है ।" भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र में अनेक नाट्यधर्मी तथा लोकधर्मी प्रवृत्तियों का उल्लेख किया है, जिसके अनुसार सामान्य, प्रजाजन के आचार एवं क्रियाओं को सादगीपूर्ण एवं अविकृत रूप में प्रदर्शित करने वाली अभिनय विधि लोकधर्मी कही गयी है । भगवद्गीता में इहलोक,२१ परलोक२२ एवं सामान्यजन २३ के अर्थ में प्रयुक्त "लोक' की संज्ञा एवं महत्ता को स्वीकार किया गया है-"अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ।"२४ लौकिक संस्कृत साहित्य के काव्य-नाटक एवं काव्य-शास्त्रादि ग्रन्थों में "लोक" शब्द विशेष रूप से संसार२५ एवं सामान्यजन के लिए ही आया है । साहित्य में प्रयुक्त विभिन्न लोकान्त, लोकनाथरे, लोकपाल२९, लोकलोचन", लोकयात्रा", लोकस्वभाव", लोकप्रवाद", लोकापवाद" एवं प्राकृत-अपभ्रंश में प्रचलित “लोकजत्ता", "लोअप्पवाय", शब्दों के सन्दर्भ में "लोक" का अर्थ "जनसामान्य" या "प्रजा" है ।
इस प्रकार "लोक" का अर्थ विभिन्न लोकों से नहीं है, अपितु प्रजा, जनता, जनसमुदाय से है । इसी अर्थ में "लोक" शब्द साहित्य का विशेषण भी है। किन्तु "लोकसाहित्य"३५ किस प्रकार का साहित्य है ? भारतीय साहित्य परम्परा में "लोक" और "वेद" का विभेद प्रायः प्रतिपादित किया जाता है । 'लोके वेदे च' की यह परम्परा साहित्य-विशेषण के रूप में लोक शब्द के प्रयोग में बाधक है । क्योंकि लौकिक-साहित्य में वेद से इतर सारा साहित्य आ जाता है, जबकि वाल्मीकि की रामायण, कालिदास की शाकुन्तलम् तथा माघ, भारवि आदि की रचनाओं को पूर्णरूप से "लोक-साहित्य" में समाविष्ट नहीं किया जा सकता । इसके अलावा साहित्य-परम्परा में "लोक" शब्द संज्ञा के रूप में या विशिष्ट "आलोक" आदि अर्थ में ही प्रयुक्त हुआ है। विशेषण के रूप में प्रयुक्त "लोक" का अर्थ यदि जन समाज या जनता ग्रहण करें तो समग्र साहित्य "लोकसाहित्य" कहा जायेगा, क्योंकि साहित्य समाज का दर्पण होता है । फिर "लोक" विशेषण का औचित्य या विशिष्ट अर्थ क्या होगा?
___ क्या "लोक" शब्द अंग्रेजी के फोक (FOLK) शब्द का समानार्थी है ?" FOLK "शब्द ऐंग्लोसेक्शन शब्द" FOLC का विकसित रूप है । जर्मन में यह VOLK हो गया । Herder ने लोक-संगीत Volkslied, लोक-आत्मा Volksseela और लोकविश्वास Volkglable आदि शब्दों का प्रयोग १८ वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में किया। उनका प्रसिद्ध लोक-गीत संग्रह Stimmender Volker १७७८-१७७६ में प्रकाशित हुआ, परन्तु लोक-जीवन के व्यवस्थित अनुशीलन के रूप में यह विज्ञान बाद में ही आरम्भ हुआ। ग्रिम भाइयों ने उनके प्रसिद्ध ग्रन्थ "Kinder und Hausmarchen" का पहला भाग १८१२ में प्रकाशित किया जबकि अंग्रेजी में "FOLK" शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम थोमस ने सन् १८४६ में किया। इससे पहले "पॉपूलर एण्टीक्विटीज" (लोक-प्रिय) शब्द प्रयोग में आता था। विशेषण के रूप में प्रयुक्त "लोक"३८ शब्द को भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानों ने विभिन्न प्रकार से परिभाषित किया है।
लोक-साहित्य के शोधकर्ताओं में अग्रणी डॉ० सत्येन्द्र ने "लोक" के विषय में कहा है-"लोक" मनुष्य समाज का वह वर्ग है जो अभिजात्य, संस्कार, शास्त्रीयता ११२
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और पाण्डित्य की चेतना अथवा अहंकार से शून्य है और जो एक परम्परा के प्रवाह में जीवित रहता है । ऐसे लोक की अभिव्यक्ति में जो तत्त्व मिलते हैं वे लोक-तत्त्व कहलाते हैं ।" डॉ० कृष्णदेव उपाध्याय के मत में "आधुनिक सभ्यता से दूर, अपने प्राकृतिक परिवेश में निवास करने वाली, तथाकथित अशिक्षित एवं असंस्कृत जनता को "लोक" कहते हैं जिनका आचार-विचार एवं जीवन परम्परागत नियमों से नियंत्रित होता है।" काका कालेलकर पारम्परिक जीवन जीने वाले गरीब ग्रामीणों को "लोक" मानते हैं।" महावीर प्रसाद उपाध्याय की दृष्टि में “वे लोग, जो सभ्य या सुसंस्कृत माने जाने वाले लोगों के रहन-सहन, शिक्षा-संस्कृति तथा जीवन-शैली से भिन्न प्राचीन परम्पराओं के प्रवाह में आदिम प्रवृत्तियों से संलग्न होकर अकृत्रिम, सरल या प्राकृतिक ढंग से जीवनयापन करते हैं..... 'चाहे नगर निवासी हों या ग्रामीण, लोक के अन्तर्गत आते हैं, यह लोक मानव का बहुसंख्यक वर्ग होता है। श्री लक्ष्मीधर वाजपेयी कहते हैं कि "लोक" से तात्पर्य "सर्वसाधारण जनता से है तथा दीन-हीन, दलित, शोषित, पतित, पीड़ित लोग और जंगली जातियां कोल, भील, संथाल, गोंड, नागा, शक, हूण, किरात, धुक्कस, यवन, खस, इत्यादि सभी लोक समुदाय मिलकर “लोक" संज्ञा को प्राप्त होता है।" डॉ० श्याम परमार ने साधारण जन-समाज को", डॉ० त्रिलोचन पाण्डेय ने उन सभी मानव-समूहों को जो नगर अथवा ग्राम में कहीं भी रहते हों"५, मदनमोहन सिंह ने जनसामान्य को तथा डॉ. हरगुलाल ने जनपद-निवासियों को "लोक" संज्ञा से अभिहित किया है।
डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल ने ग्राम-जन" को "लोक" की संज्ञा दी है । हिन्दी के शीर्षस्थ साहित्यकार डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार "लोक" शब्द का अर्थ जनपद या ग्राम्य नहीं है, बल्कि नगरों और गांवों में फैली हुई वह समूची जनता है जिनके व्यावहारिक ज्ञान का आधार पोथियां नहीं हैं। ये लोग नगर के परिष्कृत रुचि-सम्पन्न सुसंस्कृत समझे जाने वाले लोगों की अपेक्षा सरल और अकृत्रिम जीवन के अभ्यस्त होते हैं और परिष्कृत रुचिवाले लोगों की समूची विलासिता और सुकुमारता को जिला (जिन्दा) रखने के लिए जो भी वस्तुएं आवश्यक होती हैं उनको उत्पन्न करते हैं ।
"पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार सामाजिक वर्गीकरण की कल्पना दो रूपों में हुईउच्च वर्ग और निम्न वर्ग। निम्न वर्ग के व्यक्तियों से संबंधित समस्त विकारों एवं व्यापारों को "फोक-लोर" शब्द से आबद्ध किया गया ।"५० एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका में (FOLK) की व्याख्या इस प्रकार की गयी है-"एक आदिम समाज में उस समुदाय के समस्त व्यक्ति "लोक" हैं और शब्द के व्यापक अर्थ में इसे एक सभ्य राज्य की समस्त जनसंख्या के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है। इसके सामान्य प्रयोग में, पश्चिमी प्रकार की सभ्यताओं में (लोक-संगीत, लोक-साहित्य आदि शब्द-युग्मों में) उसको संकीर्ण अर्थ में प्रयुक्त किया जाता है तथा इसमें वे ही लोग शामिल किये जाते हैं जो व्यवस्थित शिक्षा और नगरीय संस्कृति की धारा से बाहर हों, जो अशिक्षित अथवा अल्प शिक्षित तथा ग्रामीण क्षेत्रों के निवासी हों ।'५१ कभी "लोक" जो समाज के भद्र ऊपरी वर्ग की तुलना में निचले वर्ग में आते हैं, उनके समूह को समझा गया। एक ओर उन्हें “सभ्यता खण्ड १७, अंक ३ (अक्टूबर-दिसम्बर, ६१)
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के विपरीत रखा गया-वे एक सभ्य समाज का असभ्य हिस्सा थे, दूसरी ओर उन्हें "आदिम" अथवा "जंगली" लोगों से भी अलग माना गया जो ऊर्ध्व विकास के क्रम में इनसे भी निचली सीढ़ी पर थे।५२
इस प्रकार "लोक" शब्द को लेकर भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानों ने प्रायः साम्य रखने वाले विचारों को ही अभिव्यक्त किया है । जिसके अनुसार "लोक" शब्द न केवल एक साहित्यिक विशेषण ही है अपितु समाज के एक बहुत बड़े वर्ग का वाचक बन गया है । "लोक" कभी समाज के पर्याय के रूप में स्वीकृत किया गया तो कालान्तर में समाज का एक अंग मात्र--"जनसाधारण" बन गया। समाज दो भागों में विभाजित हुआ-~~-वेदरीति प्रधान अर्थात् विशिष्ट और लोकरीति प्रधान अर्थात् सामान्य । समाज में ये वर्ग बहुत प्राचीन काल में बन गये होंगे। गीता में श्री कृष्ण ने अपनी स्थिति विशिष्ट और सामान्य के भेदक "वेद और लोक” दोनों में बताई है । साधारण जनता शिक्षादि की परम्परा से दूर होती है । इस बात का समर्थन महाभारत के इस श्लोक से भी होता है
अज्ञानतिमिरान्धस्य लोकस्य तु विचेष्टतः । ज्ञानांजनशलाकाभिनेत्रोन्मीलनकारकम् ॥"५५
परवर्ती विद्वानों की परिभाषा में भी जनसामान्य असभ्यवर्ग हैं, आदिम अर्थात् प्रिमिटिब या जंगली हैं, अनपढ़ एवं ग्रामीण, गंवार हैं, शास्त्रीयता एवं पाण्डित्य से दूर, अकृत्रिम-जीवन का अभ्यस्त, परिष्कृत या सुसंस्कृत तथा तथाकथित सभ्य प्रभावों से दूर रहकर प्राचीन परम्परा के प्रवाह में जीवन यापन करने वाला है ।
सहज ही प्रश्न उठता है कि परम्परा के प्रवाह में जीवन यापन करने वाले को "लोक" मानें तो सभ्य एवं सुशिक्षित कहे जाने वाले उच्च-विशिष्ट समाज के लोगों में भी आदिम-मानव-परम्परा, विश्वास एवं धार्मिक अनुष्ठान के अवशेष मिलते हैं। इस स्थिति में तो समग्र समाज ही “लोक" कहा जायेगा। प्रायः यह भी देखा जाता है कि सभ्य एवं सुशिक्षित वर्ग जिन्हें अंधविश्वास मानता है उन लोक-विश्वासों व अनुष्ठानों आदि को प्रायः प्राकृतिक एवं अन्य प्रकार की संकटापन्न स्थितियों में अपनाता भी है ।
उक्त विवेचन से स्पष्ट है कि संस्कृतवाङमय में सर्वप्रथम 'लोक" शब्द से समाज के पिछड़े वर्ग का अर्थ ग्रहण किया गया, फिर उसका आदिम जाति के साथ सम्बन्ध स्थापित किया गया और उसके बाद वह कृषक एवं ग्रामीण जन समुदाय के अर्थ में प्रयुक्त किया गया। किन्तु वर्तमान में "लोक" शब्द का यह सीमित एवं एकपक्षीय अर्थ स्वीकार नहीं किया जा सकता। कृषक एवं ग्राम में रहने वाले को ही "लोक" की संज्ञा नहीं दी जा सकती। जंगली एवं गंवारू को ही लोक नहीं कहा जा सकता। क्योंकि एक ओर तो ग्रामवासियों का नगरों में आवागमन हो रहा है । दूसरे नगरों में रहने वाले लोगों के बीच भी लोक-परम्परा प्रतिष्ठित होती रही है, जिनकी संख्या अब श्रमिक वर्गों के रूप में उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है ।५६
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निष्कर्ष रूप में "लोक" शब्द को इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है कि लोक वह है जो ग्राम या नगर कहीं भी रहता हो, साक्षर हो या निरक्षर, किसी भी जाति या धर्म का हो, परिस्थितियों एवं अभावों के कारण समाज का एक ऐसा वर्ग जो सम्पत्ति, सम्मान एवं शक्ति की दृष्टि से सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक एवं धार्मिक जीवन में तथाकथित उच्च, सभ्य, सुशिक्षित एवं सम्पन्न वर्ग की दृष्टि में उपेक्षित है एवं निम्न है या उसके शोषण का शिकार है, फिर भी जिसके जीवन में उस देश की पारम्परिक पुनीत संस्कृति का जीवन्त रूप झलकता है ।
संदर्भ :
१. वाचस्पत्यम् (बृहत्संस्कृताभिधानम् ) षष्ठो भागः पृ. ४८३३ ।
२. हलायुधकोश ( अभिधानरत्नमाला) पृ. ५८१ ।
३. हिन्दी - साहित्य कोश, प्रथम भाग, पृ. ७४७,
लोक के भुवन, दिश्व, स्वर्ग, पाताल, समाज, प्रजा, जनता-समूह, मानव-जाति, यश, दिशा, ब्रह्मा, विष्णु, महेश, पापी आदि अर्थ किये जाते हैं ।
४. ऋग्वेद- १०१८५१२४, २८, ८६।२१, १०२४५६, १०।१३३ । १ ।
५. ऋग्वेद – ७।३३।५, ७१६०१६, ७१८४१२, १०/१६/४, २०१८५।२० ।
६. वही. १०।१०४।१०,
२५,
७. ऋग्वेद. ७२६६१४, ६ ११३७, १०६०१४, २०११८०३ ।
८. वैदिक इण्डेक्स, भाग दो, पृ. २५६ ।
६. अतल, वितल. सतल, रसातल, तलातल, महातल और पाताल ये सात पाताल हैं । १०. पौराणिककोश, पृ. ४५३,
११. बृहदारण्यकोपनिषद्. १।५।१६, ३।६।१ ।
हरिवंश पुराण, ६३८८, ११७१, ४२४, ५६ ७४ ।
१३. बृहद् ११४११५, ११५/४, २।१।१२ । १३. बृहद् - "न वा अरे लोकानां कामाय लोकाः प्रिया ।
भवन्त्यात्मनस्तु कामाय लोका: प्रिया भवन्ति । " २|४|५| हरिवंश - "लोकानां भूतये भूतिमात्मीयां सकलां दधत् ।
सर्वलोकातिवार्तित्या भासास्थानमाधितिष्ठतः ।। ५७।१६७ ॥ - लोकोपालम्भतो भीत्या मयकाऽयं निकाकृतः । ३३।२० । १६, ५२।७५, २४/४४, १६।१२१, ६८७ ।
१४. लोकानां तु विवृद्धयर्थं मुखबाहूरुपादतः । मनु १।३१ । तद्विसृष्टः स पुरुषो लोके ब्रह्म ेति कीर्त्यते ॥ मनु १११ । त एवहि त्रयो लोकास्त एव त्रया आश्रमाः । मनु, २।२३० ।
मनु, १६, १८४, २१५. २५७, २।११०, २।१६३, २१२१४, २१२३२, २।२३३ ।
ये लोका दानशीलतां स तानाप्नोति पुष्कलान् ॥ याज्ञ ०
खण्ड १७, अंक ३ (अक्टूबर - दिसम्बर, ६१ )
आचाराध्याय १२/३ |
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याज्ञ-प्रायश्चित्ताध्याय-३।१४५, ३.१८७, ३।१६३, ३।१६४, ३।३६६ । ३।२२०, ३१२५६, ३३३२६ । आचाराध्याय--१।३३, ११५०, ११७८, १११५६, १२२१२, ११२१३ ।
व्यवहाराभ्याय-२।७३, २०७४ । १५. रामायणम्-३।५०१४, ३॥५०॥५, ५।५।२, ६।४०।१०।
महाभारत-११।११४०, १११५४४४, २।२२।८ । १६. रामा.-२२८३.१४, १३१६६।७, ४।३०।५७, ६।२५।२६, ७।१०१४४, ७८४१२०,
७।६७।१६।
महा.-१३११४६, ११४।१२६, १११०२।८ । १७. अष्टाध्यायी-५॥१॥४३ । १८. केषां शब्दानां । लौकिका वैदिकानां च । लौकिकास्तावत् गौरश्व, पुरुषो हस्ती शुकु
निर्मगो ब्राह्मण इति । व्याकरण महाभाष्य, प्रथमआह्निक-पृ. २ । १६. "प्रकरणाद्वालोके कृत्रिमाकृत्रिमयोः कृत्रिमे कार्यसम्प्रत्ययो भवति । अर्थो
वास्यैवंसंजकेन भवति प्रकृतं वा तत्र भवति । इदमेवं संज्ञकन कर्तव्यमिति । आतश्चार्थात् प्रकरणाद्वा । अंग हि भवान् ग्राम्यं पांशुलपादमप्रकरणज्ञमागतं ब्रवीतु गोपालकमानय कटजकमानयेति । उभयगतिस्तस्य भवति । साधीयो वा यष्टिहस्तं गमिष्यति ।"
-व्याकरण महाभाष्य, पंचम आह्निक, पृ. २६१ । २०. स्वभावमावोपगतं शुद्धन्त्वविकृतं तथा ।
लोकवार्ता क्रियोपेतमङ्गल लीलाविवजितम् ॥ ६॥ स्वभावाभिनयोपेतं नानास्त्रीपुरुषाश्रयम् । यदीदृशं भवेन्नाट्यं लोकधर्मी तु सा स्मृता ॥ १७० नाट्यशास्त्र चतुर्दशः
अध्यायः, पृ. १६५। २१. भगवद्गीता २१५, ३३३, ३६, ३२०, ३।२४, ३।२५, ४।१२, ४।४०, ६।४२ ।
७।२५, ६।३३, १०१६, १७, १५॥१६, १६०६ । २२. वही. ११०२८, १११४३, ३४२ । २३. वही. ३१२१, ५॥१४, ५।२६, १८।१७ । २४. वही. १५३८ । २५. क. स. सा. १।६।५६, २।२।११३, २।२।२१५, को. अर्थशास्त्रम् ६२।४।१, अभि.
शा. ४।२. ७।३३, काव्यप्रकाश. १।३, ११२७, उत्तरराम च. ७.६, दशरूपक.
२१६३, नीति. श. १३, २२, ३३, ८७. २६. अभि. शा. ५७. उत्तरराम. १११२, १४९३, नीति. श. ४६, ६२, १०८, वशरूपक
२॥१, ३॥६३, सांख्यतत्त्वकीमुदी, पृ. ५८. २७. रामायणम्. २॥३८॥६. २८. राजतरङ्गिणी ११३८ । २६. वही, १३३४६ ।
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३०. क. स. सा. १८१९२। ३१. को. अर्थशास्त्रम्-१२।४।१, महाभारत-११११४६ । ३२. रामायणम् ३३६६७ । ३३. वही, २५।१२। ३४. वही. ७।६७।१६। ३५. बंगला साहित्य, हिन्दी-साहित्य, भारतीय-साहित्य, सोवियत-साहित्य इत्यादि । ३६. "वेदाच्च वैदिकाः शब्दाः सिद्धा, लोकाच्च लौकिकाः, महा. १२२८८।११,
अतोऽस्मि लोके थेवे च प्रथितः पुरुषोत्तमः। भगवद्गीता १३८ । 37. Herder had used such terms as volkslied (Folksong), volksseela
(Folk soul) and volksglable (Folk belief) in the late Eighteen century. His famous anthology of folksongs, "stimmen der volker in liedern'' was first published in 1778-1779, but folkloristics proper, in the sense of the scholarly study of folklore, did not emerge quite later. The Grimm brothers published the first volume of their celebrated kinder und Hausmarchen in 1812. While the English work folklore was not coined until, Thomas
first proposed it in 1846. -Essays in Folkloristics, p, 1. ३७. लोक-साहित्य (Folk-literature) लोक-कहानी (Folk-tale) लोक-गीत
(Folk-song) लोकवार्ता (Folk-lore) आदि । ३८. लोक-पाहित्य विज्ञान, पृ. ३ । ३६. लोक-साहित्य की भूमिका-पृ. २८।। ४०. भारत की सच्ची शक्ति गांवों में रहने वाले हिन्दुस्तान के करोड़ों गरीब और
उनकी लाखों बरस की मंजी हुई संस्कृति के अन्दर है ।" लोक-जीवन, पृ. ५ । ४१. अष्टछाप कृष्णकाव्य में लोकतत्त्व, पृ. २५ । ४२. सूर साहित्य में लोक-संस्कृति, पृ. ५७ । ४३. वही, पृ. ५७। ४४. लोक-साहित्य का अध्ययन, पृ. १०४ । ४५. मानसेतर तुलसी-साहित्य में लोक-तत्व की विवेचना, पृ.८ । ४६. "जनपदों ने नगरों को अपने जीवन का नवनीत प्रदान करके उन्हें पुष्ट किया है ।
अतः उनकी उपेक्षा करना भारतीय जनता के उस विराट् जन-समूह का निरादर करना है जिसने अपना रक्त-दान करके अपने नगरों को जीवन प्रदान किया है तथा अपने परिश्रम के बल पर नगरों की काया-पलट दी है, उन्हें भव्य बनाया
-सूर-सागर में लोक-जीवन, पृ. ११ । ४७. पृथ्वीपुत्र, पृ. ३८ । ४८. जनपद, वर्ष १, अंक १, "लोक साहित्य का अध्ययन", पृ. ६५ । ४६. लोक साहित्य, विद्या चौहान, पृ. ११-१२ । खण्ड १७, अंक ३ (अक्टूबर-दिसम्बर, ६१)
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51. In a primitive community the whole body of persons comprising
it is 'Folk' and in the widest sense of the word it might equally be applied to the whole population of a civilized state. In its common application however to civilizations of the western type (In such compounds of Folk lore. Folk music etc.) It is narrowed down to include only those who are mainly out side the currents of urban culture and systematic education, the lettered or little lettered inhabitants of village and country side.
Encyclopaedia-vol, 9, p. 444. 52. The folks were understood to be a group of people who consti
tuted the lower stratum, the so called “Vulgus in peopl"-in contrast to the upper stratum or elite of that society. The Folk were contrasted on the one hand with civilization. They were the uncivilized element in a civilized society, but on the other hand, the folk was also contrasted with the so called Savage or primitive society which was considered even lower on the evolu tionary ladder.
___Essays in Folkloristics, p.2. ५३. वेदाच्च वैदिकाः शब्दा सिया लोकाश्च लौकिकाः ।
उपपत्योपलब्धेषु लोकेषु च समो भव ॥ महाभारत १२।२८८।११, ५४. अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः, गीता ॥१८, ५५. अज्ञानरूपी अंधकार से विचरते इस लोक की आंखों को यह ग्रंथ (महाभारत)
खोल देता है । निश्चित ही अज्ञानान्धकार में विचरता यह लोक जनसाधारण ही
-अष्टछापकृष्णकाव्य में लोक तत्त्व, पृ. १६, ५६. लोक-साहित्य का अध्ययन, पृ. ५६ ।
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न्याय तुम जीना चाहते हो, मरना नहीं। तुम सुखी बनना चाहते हो, दुःखी नहीं। तो भला औरों को मारना और दुःख देना कहां का न्याय है ? प्रतिपक्ष को पूरी ईमानदारी से सामने रखकर फिर उसका यौक्तिक प्रतिवाद करना न्याय है।
--आचार्य तुलसी ముంబం భు గ ద స స . the final కు కు భం భం భం భం భం భం భట్టు (1 - 0 ] బుట్ట
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जैन-बौद्ध विनय का तुलनात्मक अध्ययन
0 डॉ० भागचंद जैन 'भास्कर'
जैनधर्म और बौद्धधर्म श्रमण संस्कृति के अन्यतम अंग हैं । आचार उनकी मूल आधारशिला है जो अहिंसा और समता पर प्रतिष्ठित है। बौद्ध धर्म की तुलना में जैनधर्म निर्विवाद रूप से प्राचीनतर है। त्रिपिटक में प्रतिबिम्बित जैन इतिहास और सिद्धांत इस तथ्य का स्वयं प्रतिपादक है।' इतना ही नहीं, बल्कि बुद्ध ने स्वयं जैन-दीक्षा लेकर कठोर योग साधना की थी, यह भी मज्झिमनिकाय से प्रमाणित होता है।'
___ यह भी ऐतिहासिक सच है कि महावीर और बुद्ध समकालीन चिन्तक रहे हैं । वे एक ही देश और काल में अपने-अपने धर्म का प्रचार-प्रसार करते रहे हैं। उनके पारिवारिक वातावरण और चिन्तन की भूमिका में भी कोई विशेष अन्तर नहीं था । इसलिए उनमें प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से आदान-प्रदान होना स्वाभाविक है। हां, यह बात अवश्य है कि जैनधर्म अनेक कारणों से बृहत्तर भारत के बाहर अधिक नहीं जा सका, जबकि बौद्धधर्म अपने व्यावहारिक दृष्टिकोण के कारण विदेशों में अधिक फूला-फला । इस लचीलेपन ने बौद्धधर्म के सिद्धान्तों में भारी परिवर्तन कर दिया। यहां तक कि तान्त्रिकता के वीभत्स रूप ने उसे अपनी जन्मभूमि से खदेड़ने में अहम भूमिका अदा की। दूसरी ओर जैनधर्म ने अपने आचार-विचार की सीमा का अतिक्रमण नहीं किया, इसलिए उसका न उतना अधिक विकास हुआ और न वह अधिक फैल ही पाया । फिर भी वह अविच्छिन्न रूप से सांस्कृतिक योगदान करता रहा। जैनधर्म की यह अनुपम विशेषता उसके सांस्कृतिक इतिहास के पृष्ठों पर अंकित है ।
बौद्धधर्म के विकासात्मक वैविध्य को विनय के साथ सीमित करने के बावजूद प्रस्तुत निबन्ध का विस्तार रोका नहीं जा सकता । इसलिए जैनाचार के साथ तुलना करते समय हमने स्थविरवादी विनय को ही सामने रखा है।
जैनधर्म की आचार-व्यवस्था को समझने के लिए पांच साधन द्रष्टव्य हैं(i) आगम, (ii) सूत्र (वृहत्कल्प, व्यवहार, निशीथ आदि) (iii) आचार्य की आज्ञा, (iv) धारणा और (v) जीत (परम्परा) । बौद्धधर्म में इस दृष्टि से चार महोपदेशों का उल्लेख मिलता है--(i) बुद्ध, (ii) संघ, (iii) मात्रिकाधर स्थविर और (iv) बहुश्रुत स्थविर । यहां अन्तर यह है कि बौद्ध-विनय का उद्भावन बुद्ध से हुआ है जबकि जैनधर्म, जो काल की दृष्टि से प्राचीन है, ने उस स्थान पर आगम और परम्परा को प्रतिष्ठापित किया है।
दोनों धर्मों के प्रासाद रत्नत्रय के सबल स्तंभों पर खड़े हुए हैं। जैनधर्म सम्यग्खण्ड १७, अंक ३ (अक्टूबर-दिसम्बर, ६१)
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दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र को मोक्ष का मार्ग मानता है और बौद्धधर्म व्यक्ति को प्रज्ञा, शील और समाधि से निर्वाण तक पहुंचाता है। महावीर और बुद्ध दोनों महापुरुषों ने संसार को अनित्य और दुःखदायी माना है । उनकी दृष्टि में सांसारिक पदार्थ क्षणभंगुर हैं और उनका मोह जन्म-मरण की प्रक्रिया को बढ़ाने वाला है । इसका मूल कारण मोह, अविद्या, मिथ्यात्व अथवा राग-द्वेष है । रागद्वेष से अशुद्धभाव, अशुद्धभाव से कर्मों का आश्रव (आगमन ), बंधन और कालांतर में उदय, उदय से गति, गति से शरीर, शरीर से इन्द्रियां, इन्द्रियों से विषयग्रहण और विषयग्रहण से सुखानुभूति और दुःखानुभूति होती है । महावीर ने इसी को भवचक्र कहा है और रागद्वेष से विनिर्मुक्ति अवस्था को ही मोक्ष बताया है । बुद्ध ने इसी को 'प्रतीत्यसमुत्पाद' कहा है जिसे उन्होंने उसके अनुलोम-विलोम रूप के साथ सम्बोधिकाल में प्राप्त किया था । उत्तरकाल में प्रतीत्यसमुत्पाद का सैद्धान्तिक पक्ष दार्शनिक रूप से विकसित हुआ और यह विकास स्वभावशून्यता तक पहुंचा ।
भेदविज्ञान और धर्मप्रविचय
जिसे जैनधर्म में तत्त्वदृष्टि अथवा भेदविज्ञान कहा गया है उसी को श्रमण संस्कृति की अन्यतम शाखा बौद्धधर्म में 'धर्मप्रविचय' की संज्ञा दी गई है । धर्मप्रविचय का अर्थ है - साश्रव - अनाश्रव का ज्ञान । इसी को 'प्रज्ञा' कहा गया है। प्रज्ञा का तात्पर्य है ..... अनित्यादि प्रकारों से धर्मों को जानने वाला धर्म । यह एक कुशल धर्म है जो मोहादि के दूर होने से उत्पन्न होता है । इसी प्रज्ञा को तत्त्वज्ञान कहा गया है । जैनधर्म इसे 'सम्यग्ज्ञान' कहता है । अष्टसाहस्रिका में प्रज्ञापारमिता को बुद्ध का धर्मकाय माना गया है । दोनों की व्याख्या में कोई विशेष अन्तर नहीं है । सम्यग्दर्शन और बोधिचित्त
जिसे जैनदर्शन सम्यग्दर्शन कहता है, उसे बौद्धदर्शन में 'बोधिचित्त' कहा गया है । बोधिचित्त उत्तरकालीन बौद्धधर्म के विकास का परिणाम है । बोधिचित्त शुभ कर्मों की प्रवृत्ति का सूचक है । उसकी प्राप्ति हो जाने पर साधक नरक, तिर्यक्, यमलोक, प्रत्यन्तजनपद, दीर्घायुष देव, इन्द्रिय विकलता, मिथ्या दृष्टि और चित्तोत्पाद - विरागता इन आठ लक्षणों से विनिर्मुक्त हो जाता है । इस अवस्था में साधक समस्त जीवों के उद्धार के उद्देश्य से बुद्धत्व की प्राप्ति के लिए चित्त को प्रतिष्ठित कर लेता है ।' बोधिचर्यावतार में इसके दो भेद किए गए हैं - बोधिप्रणिधिचित्त और बोधिप्रस्थान चित्त ।
स्व-पर भेदविज्ञान अथवा हेयोपादेय ज्ञान सम्यग्दर्शन है । वह कभी स्वतः होता है, कभी परोपदेशजन्य होता है । संवेग, निर्वेद, निन्दा, उपशम, भक्ति, अनुकम्पा और वात्सल्य ये आठ गुण सम्यग्दृष्टि के होते हैं। निश्चय और व्यवहार दोनों प्रकार के सम्यग्दर्शन बोधिचित्त में भी दिखाई देते हैं पर उसके अन्य भेद बोधिचित्त के भेदों के साथ मेल नहीं रखते । सम्यग्दृष्टि के सभी भाव ज्ञानमय होते हैं । मिथ्यात्व आदि भावों के अभाव होने के कारण ज्ञानी को दुर्गतिप्रापक कर्मबन्ध नहीं होता । सम्यग्दृष्टि भी अधिकांश लक्षणों से विनिर्मुक्त रहता है । वह नरक, तिर्यंच, नपुंसक, स्त्रीत्व तथा निम्नकुल, विकलांग, अल्पायु और दरिद्रता को प्राप्त नहीं होता है ।
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श्रमण-श्रमणी विनय
गृहावास आर्तध्यान का कारण है, काम-क्रोधादि वासनाएं और कषाय उसमें जागृत होते हैं, चपल मन को वश में करना कठिन हो जाता है। इसलिए व्यक्ति प्रव्रज्या ग्रहण करता है। बुद्ध भी इस तथ्य से अपरिचित नहीं रहे। उन्होंने लिच्छविपुत्र सुनक्खत्त से यही कहा कि भिक्षु बनने का मूल उद्देश्य समाधि भावनाओं की प्राप्ति और निर्वाण का साक्षात्कार करना है। पर कुछ ऐसे भी उदाहरण मिलते हैं जिनसे पता चलता है कि कतिपय लोग प्रव्रज्या किसी दूसरे ही उद्देश्य से लिया करते थे । दीघनिकाय के सामञफल सुत्त में सत्कार, मधुर भोजन और अपराध क्षमा को प्रव्रज्या के बाह्य सद्यःलाभों में गिनाया है। टीकाकार अभयदेवसूरि ने कुछ और गहराई से इन कारणों पर विचार किया है। उन्होंने ऐसे दस कारण प्रस्तुत किए हैं. छन्दा (स्वयं की इच्छा), २. रोषा (क्रोधजन्या), ३. परिघुना (दरिद्रताजन्या), ४. स्वप्ना, ५. प्रतिश्रुता, ६. स्मारणिका, ७. रोगिणिका ८. अनादृता, ६. देवसंज्ञप्ति और १०. वत्सानु बन्धिका। वहीं पर उन्होंने कुछ और भी कारण दिए हैं-इहलोक प्रतिबद्धा, परलोक प्रतिबद्धा, उभयत : प्रतिबद्धा, पुरतः प्रतिबद्धा, पृष्ठत : प्रतिबद्धा।
__ प्रव्रज्या ग्रहण करने वाला शान्त और चरित्रवान् हो । कुरूपों, हीनाधिक अंगवालों तथा कुष्ठ आदि रोगवालों को दीक्षा का अधिकारी नहीं माना गया ।' महावग्ग में भी प्रव्रज्या के अयोग्य व्यक्तियों में कुष्ठ, फोड़ा, चर्मरोग, सूजन और मृगी बीमारियों से पीड़ित व्यक्ति राजसैनिक, ध्वजबन्ध, डाकू, चोर, राजदण्डप्रापक, ऋणी और दास को गिनाया गया है ।१५
__जैनधर्म में दीक्षाकाल का कोई विशेष समय निर्धारित नहीं है। बाह्य-आभ्यन्तर परिग्रह का त्याग और प्रशान्त भाव हो जाने पर कभी भी दीक्षा ली जा सकती है।" इसलिए बाल दीक्षा के भी अनेक उदाहरण मिलते हैं। अतिमुक्तककुमार की आयु, दीक्षा के समय मात्र छः वर्ष थी। पर साधारणतः आठ वर्ष से कुछ अधिक अवस्था होने पर ही दीक्षा (प्रव्रज्या) दी जाती है।" इस दीक्षा को प्रव्रज्या कहा जाता है और छ: माह बाद उसकी उवट्ठवणा होती है । इस छह माह के काल को शिक्षाकाल (सेहभूमि) कहा जाता है । इस काल में साधक के सफल हो जाने पर उवट्ठवणा दे दी जाती है अन्यथा छेदोपस्थापना परिहार हो जाता है।५
बौद्धधर्म में भी पहले तो बुद्ध "एहि भिक्खू" कहकर साधक को दस वर्ष की अवस्था में भी दीक्षित करते थे और कुछ काल व्यतीत होने पर उपसंपदा देकर संघ में पूर्ण प्रवेश दे दिया जाता था। बाद में प्रव्रज्या और उपसंपदा 'त्रिशरण' देकर दी जाने लगी और भिक्षुओं को भी दीक्षित करने का अधिकार दे दिया गया । संघ को अनुशासित करने के लिए उपाध्याय और आचार्य की नियुक्ति की गई। प्रव्रज्यार्थी के लिए पन्द्रह तथा उपसंपदा के लिए बीस वर्ष की आयु का निर्धारण हुआ । श्रमणों को दसशिक्षापदों का पालन करना आवश्यक बताया गया--पाणातिपात, अदिन्नादान, मुसावाद, सुरामेरयमज्जप्पमादट्ठात, विकाल भोजन, नच्चगीतवादित्तवीसूकदस्सन, मालागन्धविलेपन-धारण-मण्डन विभूसगट्ठान, उच्चासयन-महासयन और खण्ड १७, अंक ३ (अक्टूबर-दिसम्बर, ११)
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जातरूपरजतपटिग्गहण से दूर रहना ।" ज्ञप्तिचतुर्थकम का भी प्रारंभ हुआ।"
उवट्ठवणा और उपसंपदा में थोड़ा अर्थ-भेद है। जैनधर्म में उपसंपदा को समाचारी (सम्यक्चर्या या आचरण) के दस भेदों में अन्तिम भेद के रूप में सम्मिलित किया गया है । ज्ञानादि की प्राप्ति के लिए साधक जब किसी अन्य गण-गच्छ के विशिष्ट गुरु के समीप जाता है तब उसकी इस गमन क्रिया को उपसंपदा कहा जाता है। यहां उपाध्याय को आचार्य से बड़ा माना गया है। बौद्धधर्म में उपसंपदा का प्रयोग इस अर्थ में नहीं हुआ है । वहां उपसंपदा भिक्षुत्व की दृढ़ता का प्रतीक है ।
जैनाचार में दस प्रकार का कल्प (आचार) बताया है ।" उसमें सचेल-अचेल, दोनों परम्पराएं हैं। दिगम्बर-परम्परा में क्षुल्लक दो लंगोटी और दो न्यूनप्रमाण काषाय चादर तथा एलक मात्र लंगोटी रखते हैं । वहां मुनि को किसी भी प्रकार के वस्त्र रखने का प्रश्न ही नहीं उठता । पाणिपात्री होने के कारण पात्रों की आवश्यकता नहीं पड़ती। हां, कमण्डलु और पिच्छिका अवश्य साथ में रखते हैं । श्वेताम्बर श्रमण मुखवस्त्रिका. रजोहरण और एक-दो अथवा तीन चादर रखते हैं । इस विषय में सम्प्रदायगत मतभेद भी है।
___ बौद्धधर्म में मूलतः चार प्रकार का निश्रय मिलता है ---१. भिक्षामांगना, और पुरुषार्थ करना । इसमें संघभोज, उद्दिष्टभोजन, निमंत्रण, शलाका भोजन, पाक्षिक भोजन आदि भी विहित है। २. श्मशान आदि मे पड़े चिथड़ों से चीवर तैयार करना । इस में क्षौम, कापासिक, कौशेय, कम्बल, सन और भंग का वस्त्र भी विधेय है । तीन चीवरों का विधान है।" उत्तरासंग, अन्तर्वासक एवं संघाटी । उपासकों से ग्रहण करने के लिए भिक्षुओं को चीवर प्रतिग्राहक, चीवर निधायक, चीवरभाजक जैसे पदों पर नियुक्त किया जाता था। इन प्राप्त चीवरों को रखने के लिए एक भाण्डागारिक होता था। इन चीवरों को काटने, सीने और रंगने का भी विधान है । आसनों के लिए प्रत्यस्तरण, रोगियों के लिए कौपीन, वार्षिक साटिका, मुंह पोंछने के लिए अंगोछा एवं थैला आदि रखा जाता था। रुग्णावस्था में जूते पहिनने का भी विधान है। पर आरोग्यावस्था में बिहार में भी जूता पहिनना निषिद्ध था। साधारणतः चमड़े का उपयोग वजित था ।२
__ जैन भिक्षुओं में यह सब बिलकुल निषिद्ध है । नव दीक्षित साधु के लिए रजोहरण गोच्छक प्रतिग्रह अर्थात् पात्र एवं तीन वस्त्र तथा साध्वी के लिए चार पूरे वस्त्रों को ग्रहण करने का विधान है। साधु के लिए अवग्रहानन्तक अर्थात् गुह्यदेशपिधानक रूप कच्छा एवं अवग्रहपट्टक अर्थात् गुह्यदेशाच्छादक रूप पट्टा रखना वर्ण्य है । साध्वी इनका उपयोग कर सकती है । बृहत्कल्प में निर्ग्रन्थ-निर्ग्रन्थियों के लिए पांच प्रकार के वस्त्रों का उपयोग विहित माना गया है—जांगिक, भांगिक, सानक,पोतक और तिरीडपट्ट । रजोहरण के लिए दिगम्बर साधु मयूरपंख का उपयोग करते हैं और श्वेताम्बर परंपरा में ओणिक,
औष्टिक, सानक, वच्चकचिप्पक और मुंजचिप्पक धागों को कल्प्य बताया है। निर्दोष वस्त्र की कामना, याचना और ग्रहण अनुमत है पर उनका धोना और रंगना निषिद्ध है। इसी प्रकार सादे अलाबू, काष्ठ व मिट्टी के पात्र रखना कल्प्य है पर धातु के पात्र रखना वर्जित है । वृद्ध साधु भाण्ड और मात्रिका भी रख सकता है। १२२
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आवश्यक सूत्र में सचेलक साघु के लिए चौदह पदार्थ ग्रहणीय बताये हैं-अशन, पान, खादिम, स्वादिम, वस्त्र, पात्र, कंबल, पादपोंच्छन् पीठ फलक, शय्या, संस्तारक, औषधि, भेषज । उत्तराध्ययन* में आहारग्रहण के लिए छ: कारण दिए गए हैं- क्षुधा - शान्ति, २. वैयावृत्य, ३. ईर्यापथ, ४. संयम, ५. प्राणप्रत्यय और ६. धर्म चिन्ता । संखडि ( सामूहिक भोजन ), उद्दिष्ट और सचित आहार वर्जित माना गया है । बौद्धधर्म में ऐसे कोई नियम नहीं हैं । वहां उद्दिष्ट विहार में स्वयं पकाया भोजन भी विहित है । भोजन के बाद अरण्य और पुष्करिणी की उपज अर्थात् कमलनाल और आम्ररस ग्रहणीय माना है । नयातिल, शहद्, गुड़, मूंग, नमकीन, पंचगोरस, त्रिकोटिपरिशुद्ध मांस, यवागू और लड्डू भी भक्ष्य माने गए हैं । पाथेय में तंडुल, मूंग, उड़द, नमक, गुड़, तेल और घी लिया जा सकता है। फलों का रस विकालभोजन में नहीं गिना जाता । २५
जैनाचार इसकी तुलना में अधिक नियमबद्ध और कठोर हैं । वहां आहार के ४६ दोषों का वर्णन है जिनसे साधु को निर्मुक्त रहना आवश्यक है - १६ उद्गम दोष, १६ गवेषणा दोष ( उत्पादन दोष), १० ग्रहणैषणा दोष ( अनशन दोष), और ४ संयोजनादि ग्रासैषणा दोष । ९ १६ उद्गम दोष – १. आधाकर्म २. औद्देशिक अथवा अवधि, ३. मिश्र, ४. स्थापित, ५. बलि ६. पूति, ७ प्राभृत, ८ प्रादुष्कार ( संक्रमण व प्रकाशन ) ६. क्रीत १०. प्राभृष्व (सवृद्धिक और अवृद्धिक), ११. परिवर्त, १२. अभिघट, १३. उद्भिन्न, १४. मालारोहण, १५. आछेद्य, १६ अनिसृष्ट । इसी प्रकार अन्यदोष भी द्रष्टव्य हैं । पिण्डनिर्युक्ति में ग्रासैषणा में अकारणदोष मिलाकर ४७आहार दोषों का उल्लेख मिलता है । अट्ठावीस मूलगुणों के अन्तर्गत दिगम्बर- परम्परा में स्थितिभोजन और एकभक्त व्रत का पालन भी मुनि करता है ।" पंक्तिबद्ध सात घरों से लाया भोजन करणीय है ।" भोजन में कोई आसक्ति न हो, आहार सादा हो, दातार पर उसका कोई बोझ न हो, भ्रामरीवृत्ति हो ।" बौद्धधर्म में इस प्रकार के विशेष प्रतिबन्ध नहीं हैं ।
२७
जैनधर्म में बावीस परीषहों का वर्णन मिलता है जिन्हें श्रमण श्रमणी सहन करते हैं ।" इनके सहन करने से कर्म निर्जरा होती है । बौद्धधर्म मध्यममार्गी होने के कारण तप की उतनी कठोर साधना का निर्धारण तो नहीं कर सका । परन्तु यह कठोरता आंशिक रूप में उपलब्ध होती ही है । मज्झिमनिकाय के सब्बासव सुत्तन्त में आश्रवों का क्षय सात प्रकार से बताया है – १. दर्शन (विचार), २. संवर, ३. प्रतिसेवन, ४. अधिवासन ( स्वीकार ), ५. परिवर्जन, ६. विनोदन (विनिर्मुक्ति - हटाना ) और ७. भावना । इन प्रसंगों में क्षुधा, पिपासा, शीत, उष्ण, दंशमसक आदि बाधाओं की चर्चा की गयी है पर
हां यह बताया है कि भिक्षु को भोजन, पानी, वस्त्र आदि उसी परिमाण में ग्रहण करना चाहिए जिससे वह इन बाधाओं से मुक्त हो सके। इसी प्रकार सुत्तनिपात के सारिपुत्तसुत्त में भिक्षुचर्या का वर्णन करते समय इस प्रकार की बाधाओं को सहन करने का उपदेश दिया गया है | वहां उन्हें परिस्य ( परीषह ) भी कहा गया है । २
जैन परीयों की तुलना बौद्ध धुतांगों से की जा सकती हैं । धुतांग का तात्पर्य है -क्लेशावरण को दूर करने की ओर ले जाने वाला मार्ग ( किलेस धुननतो वा धुतं ) ।
खण्ड १७, अंक ३ (अक्टूबर-दिसम्बर, ९१ )
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राग-मोह मुक्त चरित वालों के राग-मोह आदि दोषों को दूर करने की दृष्टि से इनका उपयोग निर्दिष्ट है । शील की परिशुद्धि के लिए भिक्षु को लोकामिष (लाभ-सत्कार आदि) का परित्याग, शरीर और जीवन के प्रति निर्ममत्व तथा विपश्यना भावना से संयुक्त होना चाहिए । इसकी प्रपूर्ति के लिए तेरह धुतांगों का पालन उपयोगी बताया है-पांसुकूलिकांग, चीवरिकांग, पिण्डपातिकांग, सापदान चारिकांग, एकासनिकांग, पात्रपिंडिकांग खलुपच्छाभत्तिकांग, आरण्यकांग, वृक्षमूलिकांग, अभ्यपकासिकांग, श्मशानिकांग, यक्षसंस्थरिकांग एवं नैसद्यकांग ।३।।
जैन और बौद्ध आगमों में कल्प पर भी विचार हुआ है । कल्प का अर्थ हैनीति, आचार, योग्य । जो कार्य ज्ञान, शील और तप का उपग्रह करता है और दोषों का निग्रह करता है वह कल्प है। ये कल्प दस प्रकार के हैं—आचेलक्य, औद्देशिक शय्यातर राजपिण्ड, कृतिकर्म, व्रत, ज्येष्ठ, प्रतिक्रमण, मासकवासता, और पर्युषणाकल्प ये साधु के दस स्थितिकल्प है । ३५
__ चुल्लवग्ग में भी दस कल्पों का उल्लेख है जिनका सम्बन्ध वज्जिपुत्तक भिक्षुओं के आचार से है--गिलवण कल्प, व्यंगुल, ग्रामान्तर, आवास, अनुमत, आचीर्ण, अमथित, जलोगीपान, अदेशक, निसिदन और जातरूपरजत । ये ही कल्प संघभेद के कारण बने थे। इन दस विनयविरुद्धवस्तुओं के उपयोग का विरोध यश ने किया था। परिणामतः द्वितीय संगीति हुई जिसमें वैशाली के वज्जिपुत्तकों का पूर्णतः विरोध हुआ । आध्यात्मिक दृष्टि से ये कल्प यद्यपि गौण कहे जा सकते हैं पर जैन-बौद्ध विनय में इनका उल्लेख तुलनात्मक अध्ययन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हो जाता है।
___ महावग्ग के प्रारम्भ में ही यह कहा गया है कि बुद्ध ने महावीर का अनुकरणकर वर्षावास प्रारंभ किया था। उसी क्रम में निगण्ठोपोसथ को भी बौद्धों ने स्वीकार किया था । चतुर्दशी, पूर्णमासी और अष्टमी को सभी भिक्ष एकत्रित होकर प्रातिमोक्ष की आवृत्ति करते थे। उपोसथ या संघकर्म में सभी भिक्षु ओं का उपस्थित होना आवश्यक हैं। प्रातिमोक्ष का पाठक र "परिसुद्धो हं आवुसो परिसुद्धो त्ति मं धारेथ" तीन बार कहा जाता । यदि कोई किसी नियम से च्युत रहता तो वह निश्छल भाव से उसे स्वीकार करता । इसी को "प्रवारणा" कहा गया है । इसमें इष्ट, श्रुत और परिशंकित अपराधों का परिमार्जन किया जाता है तथा परस्पर में विनय का अनुमोदन होता हैअनुजानामि भिक्खवे...........।" उपोसथ में अपने अपराधों की पाक्षिक परिशुद्धि होती है ओर प्रवारणा में वार्षिक परिशुद्धि होती है।३९ जैनधर्म में उपोसथ जैसा प्रोषधोपवास नामक ग्यारहवां व्रत है । प्रवारणा की तुलना प्रतिक्रमण से की जा सकती है।
जैन विनय में तप का महत्त्व बौद्ध विनय की अपेक्षा बहुत अधिक है । बाह्यतप के रूप बौद्धधर्म में नहीं मिलते । अन्तरंग तप के छहों प्रकार अवश्य मिल जाते हैं पर उनमें भी वह सघनता नहीं जो जैनधर्म में है। प्रायश्चित्त के आलोचना, प्रतिक्रमण, तदुभय, विवेक, व्युत्सर्ग, तप, छेद, मूल, अनवस्थाच्य और पारांचिक ये दसोंभेद बौद्ध विनय के विभिन्न रूपों में प्राप्त हो जाते हैं । विनय में अनुशासन बनाए रखने के लिए तथागत बुद्ध ने अनेक प्रकार की दण्ड व्यवस्था की थी। स्मृतिविनय, अमूढ़विनय, प्रतिज्ञातकरण,
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शमथ, तत्पापीयसक जैसे दण्डकर्मों में आलोचना और प्रतिक्रमण के दर्शन होते हैं। प्रजाजनीय, मानत्व, संघादि शेष पाराजिक की तुलना जैन परंपरा के छेद, मूल और पारांचिक से की जा सकती है । गुरुमासिक, लघुमारिक, गुरुचातुमासिक और लघु चातुर्मासिक प्रायश्चित्त भी उन्हीं दण्ड कर्मों के साथ मेल खा जाते हैं।
जिन कारणों से चित्त में एकाग्रता की प्राप्ति नहीं होती उन्हें असमाधिस्थान कहा जाता है । जैन धर्म में उनकी संख्या २० मानी गई है । १. दव दव चारी-जल्दी-जल्दी चलना, २. अप्पमार्जायचारी (रजोहरण से मार्ग को प्रमार्जित किए बिना चलना), ३. दुप्पमज्जियचारी, ४. अतिरित्त सेज्जासणिए--- (शय्या का परिमाण अधिक रखना), ५. रातिणि अवरिमासी (गुरु से विवाद करना), ६. थेरोवधाइए (स्थविर को वध आदि करने का विचार करना), ७. भूओवधाइए (प्राणियों के वध का विचार करना), ८. संजलणे (प्रतिक्षण क्रोध करना), ६. कोहर्ष (अधिक क्रोध करना) १०. अभिक्खणंअभिक्खणं ओहारइत्ता (बारम्बार निश्चयात्मक भाषा बोलना), ११. पिट्टिमंसिए (पैशून्य करना), १२. णवाणं अधिकरणाणं अणुप्पण्णाणं उप्पाइत्ता (नवीन नवीन अनुत्पन्न विवादों को उत्पन्न करने वाला, १३. पोराणाणं अधिकरणाणं खामिअविउसविआणं पुणोदीरित्ता (पुराने शान्त झगड़ों को पुनः खड़ा कर देने वाला, १४. अकाल सज्झाय कारए (अकाल में स्वाध्याय करने वाला, १५. ससरवख पाणिपाए (सारक्त गृहस्थ से भिक्षा लेना), १६. सद्दकरे (उच्चस्वर से स्वाध्याय करने वाला) १७. झंझकरे (संघ में विभेद पैदाकारी) १८. कलहकरे, १६. सुरप्पअण भोई (सूर्यास्त तक भोजन करने वाला), २०. एसणाऽसमिते (एषणा समिति का पालन न करने वाला) । इनमें से कुछ असमाधिस्थानों की तुलना बौद्ध पातिमोक्ख के सेखिय (शैक्ष्य) नियमों के साथ और कुछ की पाचित्तिय नियमों के साथ कर सकते हैं । इसी प्रकार जैन विनय के शबलदोषों को संघादिशेष और पाचित्तिय नियमों में खोजा जा सकता है।
बिनयों की शाब्दिक तुलना जैन श्रमण विनय
बौद्ध श्रमण विनय १. गृहवासपरित्याग
गृहवासपरित्याग २. मुण्डन-केशलुञ्चन
मुण्डन आवश्यक परन्तु केशलुञ्चन वजित (अपवाद में उस्तरे से) ३. दिगम्बरत्व
अस्वीकार्य ४. काषाय और सफेद वस्त्र काषायवस्त्र ५. मूलगुण"
प्रातिमोक्षसंवर शील ७. पंच समिति
गोचर संपन्न, कुशल कायवचन
कर्मपरिशुद्ध ८. महाव्रत पालक
महाशील पालक ६. त्रिगुप्ति पालक
कायवचन कार्ययुक्त तथा चित्त विशुद्धि १०. अप्रमादी
स्मृतिमान् खण्ड १७, अंक ३ (अक्टूबर-दिसम्बर, ६१)
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११. संयमी १२. रत्नत्रय संपन्न १३. प्रतिक्रमण १४. वर्षावास १५. असमाधिस्थान २०-१-३
-रातिणि अपरिमासी - भूओवघाइए --संजलणे -पिट्ठिमंसिए ----अभिक्खणं २ ओहारपत्ता |
इन्द्रिय गुप्ति प्रज्ञा, शील, समाधि संपन्न प्रातिमोक्ष वर्षावास सेखिय, ११-२० पाचित्तिय, २-ओमसवादे पाचित्तिय, ॥ (भूतगामपातन्यताय) पाचित्तिय, १३ (उज्झापने) पाचित्तिय, ३ (पेसुने) पाचित्तिय, ३६ (भुत्तावि) पुन पवारणे, ३७ भी पाचित्तिय, ६३ अधिकरण उक्कोटने से खिय, १३-१४ संघादिसेस, १० पाचित्तिय, २
संघादिसेस १ (सुक्कविसट्ठियं) पाराजिक १, संघादिशेष २ पाचित्तिय, ३७ (विकालभोजने) पाचित्तिय.१ (मुसावादे) पाचित्तिय ११
निस्सग्गिय, २०
----णवाणं अधिकरणं, १२.१३
-सद्दकरे -झंझकरे
-कलहकरे १६. शबलदोष २१
प्हत्थ कम्मं करेमाणे (१) मैथुनसेवन (२) रात्रिभोजन ३ औद्देशिक मृषावादन (१४) औद्देशिक मूल भोजन (१६) व कंदभोजन क्रीत या उधार भोजन ग्रहण करना (६-७) जलप्रवेश व मायास्थानों का सेवन (१२ व २०) हिंसा करना (१३) मृषावादन (१४) अदत्तादान (१५) सचित्त भूमिपर बैठना
(१६-१६) सचित्त जलपान करना १७. पाप श्रेणियां
अतिक्रम व्यतिक्रम अतिचार अनाचार
पाचित्तिय, ५७
पाराजिक ३, पाचित्तिय, ६१ पाचित्तिय, १ पारा जिक, १ पाचित्तिय, १०-११ सेखिय, ७४ पाचित्तिय, ६२ किसी को मारने के लिए गड्ढा खोदना
दुक्कडे
उसमें उसके गिर जाने पर दर्द होथुल्लच्चय उसके मर जाने पर-पाराजिक
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१५. आसादना दोष १६. गुरु-शिष्य विनय
२०. शबल
२१. निर्ग्रन्थ तथा सवस्त्र । वस्त्र हों तो जंगिय, भंगिय, साणिय, पोत्तग, खोय, तूलक । बहुमूल्य वस्त्र निषेध
२२. मांसग्रहण पूर्णत- वर्जित २३. इर्यापथगामी ( इसका क्षेत्र
अपेक्षाकृत विस्तृत है ) 1
२४. विभजवादी
२५. एक पात्र, और वह भी अलाबू, या मिट्टी का
२६. उपकरणों से वस्त्र, पात्र, कंबल
२४. आभूषण, साजसज्जा वर्जित है । २५. परक्रिया निषेध
२६. संखडिभोजन निषिद्ध
मिट्टी व लोहे का पात्र विहित है, काष्ठादि का नहीं ।
पादपुच्छन, अवग्रह, तथा कटासन विहित हैं ।
उपकरणों में कैंची, वस्त्र, खण्ड, सुई, नाली, नलिका, गोंद, जलगालन, मसहरी, उदकपात्र आदि विहित है ।
२७. आहार-विहार में प्रतिबंध अधिक है प्रतिबद्ध है, पर उस सीमा तक नहीं । २३. स्नान वर्जित है
स्नान की मात्रा अधिक न हो । चूर्णादि का उपयोग न हो ।
वर्जित है ।
परक्रिया निषेध
संखडिभोजन निषिद्ध
२७. औद्देशिक भोजन वर्जित
२८. उपसर्गों की तीव्रता तथा कठोर व्रतों का पालन
२६. उपानह तथा छते का उपयोग वर्जित है ।
३०. परिग्रह तथा आरम्भ वर्जित है ३१. शाश्वत सुख की प्राप्ति के लिए
कष्टसहन या तप आवश्यक है । ३२. आहार दोषों का सूक्ष्म विश्लेषण ३३. अधर्म क्रिया - स्थानों का सूक्ष्म विश्लेषण
सेखिय धम्म, ५७-७२ गुरु-शिष्य विनय
खण्डकारी, चिद्दकारी, सबलकारी, कम्मस्स
कारी ( अंगुत्तर ii -६५) सवस्त्र | वस्त्र हों - कौशेय कोजव, शाप, भंग, कंबल, क्षौम । बहुमूल्य वस्त्र ग्रहण निषेध नहीं | तीन संद्माटी विहित है ।
ग्रहण त्रिकोट परिशुद्ध हो । ईर्यापथगामी ( स्थान, गमन, निषद्या और शयन में ] विभज्जवादी
३४. विद्या, मन्त्र-तंत्र का निषेध फिर भी उनका यदा-कदा अहिंसक प्रयोग प्रचलित है ।
खण्ड १७, अंक ३ (अक्टूबर-दिसम्बर, ६१ )
वर्जित नहीं ।
कठोर व्रत और तप आवश्यक नहीं । अतः उपसर्गों की तीव्रता भी कम है । वर्जित नहीं ।
सीमित है ।
आवश्यक नहीं । मध्यममार्ग अनुमत है ।
स्थूल विश्लेषण
अकस्मात् अनर्थदण्डादि को हिंसामय नहीं
माना गया ।
गर्हित प्रयोग हुआ । पंच मकारों का भी प्रयोग प्रारम्भ हो गया ।
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३५. पंडक आदि को दीक्षा के अयोग्य पंडक आदि को उपसंपदा के अयोग्य माना माना गया।
गया। ३६. आठवर्ष से कम अवस्था वाले को दस वर्ष से कम अवस्था वाले को उपसंपदा - प्रव्रज्या का निषेध
का निषेध ३७. प्रव्रज्या के लिए माता-पिता की यहां भी अनुज्ञा अनिवार्य है।
अनुज्ञा अनिवार्य है । ३८. प्रायश्चित्त स्वरूप दण्ड-व्यवस्था । प्रायश्चित्त स्वरूप दण्ड व्यवस्था ३६. प्रायश्चित्त
प्रवारणा ४०. गणी की योग्यताएं-आचार, महावग्ग में भिक्षु की योग्यताएं-बहुश्रुत,
श्रुत, शरीर, वचन, वाचना, मति, आगतागमों, धम्मधरो, विनयधरो, मातिकाप्रयोग, संघपरिज्ञा । ये अनेक धरो, पण्डितो, व्यत्तो, मेधावी, लज्जी, प्रकार से वर्गीकृत है
कुक्कुच्चको, सिखाकामो [आयारदसाओ] ४१. द्वादशानुप्रेक्षा
दस अनुस्मृतियों ३२. चार भावनाएं
चार ब्रह्मविहार ४३. मिथ्यात्व, प्रमाद, कषाय, अविरति अश्रद्धा, आनस, प्रमाद, विक्षेप, सम्मोह ये और योग बन्ध के कारण
पांच इन्द्रियां कर्माश्रव के कारण ४४. सम्यक्त्व, व्रतस्थापन, अप्रमाद, पांच बल-श्रद्धा, अनालस, अप्रमाद, अविक्षेप,
उपशान्तमोह ऐवं क्षीणमोह संपन्न और अमोह संपन्न ४५. अप्रमाद, धर्मानुप्रेक्षा, वीर्य, प्रमोद, सप्त बोध्यंग-स्मृति, धर्म-विचय, वीर्य ,
गुप्ति, ध्यान एवं माध्यस्थ भाव युक्त प्रीति, प्रश्रब्धि, समाधि उपेक्षायुक्त ४६. रत्नत्रय
आष्टांगिक मार्ग ४७. कर्म उपशम, कर्मक्षय
कर्मप्रहाण, कर्मसमुच्छेद ४८. शुभध्यान में बाधक स्थलों का त्याग कसिण की खोज में कतिपय विहारों का
त्याग ४६. सम्यग्दर्शन
बोधिचित्त ५०. सम्यग्ज्ञान
प्रज्ञा ५१. सम्यक् चारित्र
शील और समाधि ५३. भेदविज्ञान
धर्मप्रविचय ५३. पारमाथिकनय और
पारमार्थिक सत्य और सांवृतिक सत्य व्यावहारिक नय ५४. आश्रव और संवर-निर्जरा आश्रव और संवर-निर्जरा ५५. आत्मवाद
पुद्गलवाद संप्रदाय ५६. गुणस्थान
भूमि ५७. आत्मा
चित्त ५८. कर्म और कषाय
कर्म और चैतसिक भाव
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५६. चार भूमियां
चार गतियां ६०. त्रिरत्न
त्रिरत्न ६१ चतुश्शरण
त्रिशरण जैन और बौद्ध विनयों की यह एक सामान्य तुलना की छोटी-सी तालिका है। प्रत्येक शीर्षक को स्पष्ट करने के लिए यहां मात्र इतना ही कथ्य है कि जैन और बौद्ध विनय एक ही संस्कृति से संबद्ध होने के कारण एक दूसरे से अधिक दूर नहीं है। उनमें आचार-विचार गत पर्याप्त समानताएं हैं। यह समानत। स्थविरवादी विनय में अधिक दृष्टव्य है । तान्त्रिकता के अंश को छोड़ दिया जाए तो महायानी परम्परा में भी वह रूप देखा जा सकता है।
संदर्भ ग्रन्य-सूची १. Jainism in Buddhist Literature/Dr. Bhagchandra Jain, Nagpur
1972 २. मज्झिम निकाय, P.T.S. लंदन, नागरी संस्करण, नालन्दा, १९५६ ३. विनय पिटक, P.T.S. London, १८७६; नागरी संस्करण, नालन्दा, १९५८ ४. दीघनिकाय, P.T.S. London, १८६०; नालन्दा संस्करण, १९५६ ५. अंगसुत्ताणि, जैन विश्व भारती, लाडनूं ६. रत्नकरण्डश्रावकाचार, वीर सेवा मंदिर ट्रस्ट, १९७२ ७. विसुद्धि मग्ग, सं० द्वारिकादास शास्त्री, वाराणसी, १९७६ ८. ज्ञानावि, रायचन्द्र ग्रन्थमाला, बम्बई, १९०७ ६. बोधिचर्यावतार, सं० शान्तिभिक्षशास्त्री, लखनऊ १०. ठाणांगसूत्र, आगमोदय समिति, बम्बई-१९१८-२० ११. तत्त्वार्थ राजवातिक, सं० महेन्द्रकुमार वाराणसी, १९४४ १२. भगवती आराधना, बम्बई, १९६६ १३. उत्तराध्ययन-सं० आ० तुलसी, कलकत्ता, १९६७ १४. भगवती सूत्र, अहमदाबाद, १६२२-३१ १५. आचारांग सूत्र,लुधियाना, १९६३-६४ १६. मिलिन्दपञ्हो, वाराणसी, १६३७ १७. मूलाचार, बम्बई, वि० सं० १९७७ १८. योगसार, दिल्ली, १९७० १६. अष्टपाहुड, सं० पं० पन्नालाल जैन, १९७८ २०. अनगार धर्मामृत, बम्बई, १९१८ २१. अंगुत्तर निकाय, P.T.S. London, १८८५-१६००; नागरी संस्करण, नालन्दा,
१९५६ २२. जैन दर्शन और संस्कृति का इतिहास-डॉ० भागचन्द्र जैन भास्कर, नागपुर
विद्यापीठ, १९७७
खण्ड १७, अंक ३ (अक्टूबर-दिसम्बर, ११)
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२३. बौद्ध संस्कृति का इतिहास-डॉ० भागचन्द्र जैन, आलोक प्रकाशन,नागपुर,
१९७२ २५. आवश्यक नियुक्ति, मलयगिरिकृत वृत्ति, बम्बई, १९२८-३२ २६. आचारांग चूणि, रतलाम, १९४१ २७. निशीथ चूणि, आगरा, १९५७-६० २८. सूत्रकृतांग, राजकोट, वि० सं० १९६३-६५ २६. पंचास्तिकाय, बम्बई, १६०४ ३०. अभिधम्मत्थ संगहो (बौद्ध मनोविज्ञान) डॉ० भगचन्द्र जैन, नागपुर, १९८५
पाद टिप्पणी १. विशेष देखिए-लेखक का ग्रन्थ "Jainism in Buddhist Literature", अध्याय
पहला, PP-३१. आलोक प्रकाशन, नागपुर, १९७२ २. मज्झिम निकाय, रोमन संस्करण, भाग-I, P-७७-अचेलको होति, मुत्ताचारो...."न इतो बहिद्धा । देखिए लेखक का उपयुक्त ग्रन्थ, pP-११६
११८. ३. भगवती सूत्र, Viii, ८.३०; ठाणांग, V-२.२४; व्यवहारसूत्र, १०.३, यहां आगम
और सूत्र समानार्थक प्रतीत होते हैं पर अन्तर यह है कि आगम का सम्बन्ध चौदह पूर्वो तथा बारह अंगों से है जबकि 'सूत्र' पूर्वो और अंगों पर आधारित
ग्रन्थों के लिए प्रयुक्त हुआ है। ४. दीघनिकाय, महापरिनिब्बाण सुत्त, Vol. ii. PP. 96-97 ५. विसुद्धिमग्ग, P.३२४, अभिधम्मत्थसंगहो, सप्तम अध्याय; बोधिचर्यावतार,
द्वितीय-तृतीय अध्याय ६. रत्नकरण्डश्रावकाचार, ३५ ७. ज्ञानार्णव, ४.१०; दीघनिकाय, सा० भाग १, पृ-५५ ८. दीघनिकाय, महालिसुत्त, १.६ ६. दीघनिकाय, सामञफल सुत्त, नालन्दा, भाग १, पृ० ५४ १०. स्थानांगसूत्र, अभयदेव टोका, पत्र ४४६; दीक्षा के कुछ और भी प्रकार यहां
दृष्टव्य हैं-(i) तोदयित्वा-कष्ट पूर्वक ग्रहीत प्रव्रज्या, (ii) प्लायित्वा-अन्यत्र ग्रहीत प्रवज्या, (iii) वाचयित्वा-वार्तालाप के माध्यम से ग्रहीत प्रव्रज्या (iv) अवपात प्रव्रज्या-गुरु सेवा से प्राप्त प्रव्रज्या, (v) आख्यात (उपदेश से
प्राप्त) प्रवज्या, (vi) संगार (प्रति जाबद्व होकर ग्रहीत) प्रव्रज्या । ११. स्थानांग, ३,४,२०१; निशीथ भाष्य, ११.३५०६-७; योगसार, ८.५२; बोध
पाडुड टीका, ४६; १२. महावग्ग, १.३१.८८,P-७५७६ १३. पंचास्तिकाय, तात्पर्यवृत्ति, १७३; निशीय भाष्य, 11,२५३७-३६. १४. भगवती सटीक, भाग I,५.४.१८८, पत्र २१६-२ १५. आचारांग गि, २-७२; सूत्र तांग, १.३.३; १.१४.१३; भगवती, ८.२९८; १३०
तुलसी प्रक्षा
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१६. महावग्ग, P. ७५-७६
१७. प्रारम्भ में ज्ञति तृतीय कर्म का प्रचलन था - ज्ञप्ति, अनुश्रावण, और धारणा । बाद में चतुर्थ कर्म के रूप में अनुमति को जोड़ दिया गया । यही ज्ञप्ति चतुर्थ कर्म है- महावग्ग, वि० PP- २३
१८. उत्तराध्ययन, २६-७
१६. आवश्यक निर्युक्ति, मलय, १२१; भगवती आराधना, ४२७, नि० भाध्य
५६३३
२०. आवश्यक नियुक्ति, V-६६६;
२१. मज्झिमनिकाय, १. P. १४-१५, महावग्ग, P.७५
२२. विनय पिटक, चीवर स्कन्धक
२३. आचारांग, श्रुतस्कन्ध, २.५.११; मिलिन्दपञ्हो, ३६७, बृहत्कल्प, २.२४
२४. वेयण वेयावज्जे इरिएट्ठाए य संजमट्ठाए ।
तह पाणवत्तियाए छट्ठे पुण धर्मांचिताए । उत्तराध्ययन, २६३३
२५. विनय पिटक, महावग्ग, भेसज्जखन्धक
२६. मुलाचार, ४२७-४६५
२७. भाव पाहुड, १०१; मुलाचार, ४२१,४८२-८३
२८. अनगार धर्मामृत, ६.६३; मूलाचार, ३५,८११,६३७
२६. मूलाचार, ४३८-४४०
३०. राजवार्तिक, ६.६.१७
३१. उत्तराध्ययन, द्वितीय अध्ययन, समवायांग २२, तत्त्वार्थसूत्र, ६.८
३२. विक्खम्भये तानि परिस्सयानि सुत्तनिपात, ४.१६.१५
३३. विसुद्धिमग्ग, धुताङ्गनिद्देस, PP-४८- ६७
३४. प्रशभर तिप्रकरण, १४३
३५. मूलाचार, ४२१; भगवती आराधना, ४२७; निशीथभाष्य, ५६३३ ३६. विनय पिटक, I १३७
३७. अन्गुत्तर निकाय, I २०६
३८. महावग्ग, P। १६७
३६. देखिए, लेखक का गन्थ - "बौद्ध संस्कृति का इतिहास, PP. २०५-२२६
४०. समवायांग २०; दशाश्रुतस्कण्ध i, उत्तराध्ययन, ३१.१४
४१. मूलगुण की विभिन्न परम्पराओं के लिए देखिए - लेखक का ग्रन्थ--- "जैन दर्शन और संस्कृति का इतिहास, PP. २६४-५
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'तुलसीप्रज्ञा' से संबद्ध नियतकालिक प्रकाशन
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१. प्रेक्षाध्यान । तुलसी अध्यात्म नीडम्, जैन विश्व भारती, लाडनूं से प्रकाशित और श्री शंकरलाल मेहता द्वारा संपादित मासिक । वार्षिक शुल्क - ५० /- रुपए । आजीवन - ५०० /- रुपए और संरक्षक सदस्यता --- २१०१/- रुपए ।
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कृपया अधिक जानकारी के लिए अभिप्रेत प्रकाशन के संपादकीय कार्यालय से पत्र व्यवहार करें ।
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जैन-नय-न्याय द्वारा तत्त्वार्थ-निर्णय
E डॉ० सुषमा सिंघवी
किसी भी वस्तु के वस्तुत्व युक्त अर्थ को समझना यथार्थ समझना है । यदि उससे भिन्न समझ लिया जाता है तो वह मिथ्या होता है, अत: प्रत्येक अर्थ को उसके तत्त्व से संयुक्त होने पर ही अर्थ मानना जिस न्याय के द्वारा निर्णय होता है वह न्याय ही मनुष्य को जन्मजन्मातर के बंधनों से मुक्त करके मोक्ष का अधिकारी बनाता है । जैन-दर्शन में मोक्ष-प्राप्ति में सहायक एवं अनिवार्य तत्त्व सम्यगदर्शन, सात तत्त्वों के यथार्थ अर्थ को समझकर उसके यथार्थ होने की श्रद्धा रखने को कहते हैं । आचार्य कुन्दकुन्द ने भी अपने आध्यात्मिक ग्रन्थों में तत्त्वों का ही विशेष रूप से निरूपण किया है। द्रव्यार्थिक एवं पर्यायार्थिक नय अथवा व्यवहार नय एवं निश्चय नय का अवलंबन लेकर कुन्दकुन्दाचार्य ने तत्त्वों का स्वरूप इतना स्पष्ट कर दिया है कि उसकी यथार्थ जानकारी एवं श्रद्धा होने पर शुद्धाचार का पालन कर मुमुक्षु अवश्य ही मोक्षगामी हो सकते हैं।
मोक्षमार्ग के साधन सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन एवं सम्यग्चारित्र रूप रत्नत्रय में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण सम्यग् दर्शन है। सम्यग्दर्शन के लिये सात तत्त्व तथा चार प्रकार के अर्थों में जो तत्त्व स्थित रहते हैं। उनको अधिगम से समझने हेतु तत्त्वार्थ श्रद्धा को नयन्याय के सिद्धान्तों से विश्लेषण कर पांचों ज्ञानों में से अपनी मति और श्रुत ज्ञान के अनुरूप निर्णय करने का विधान है। सप्त-तत्त्वों को समझने हेतु जैन दर्शन में दो उपाय
(१) निसर्ग और (२) अधिगम । तात्त्विक अर्थ को स्वयं समझ लेना और उसके यथार्थ होने का विश्वास कर लेना निसर्ग है और वास्तविक अर्थ की परीक्षा करना अधिगम।
अधिगम के दो प्रकार माने गये हैं:- (१) अनुयोग और (२) अनुगम ।
(१) अनुयोग के प्रकारों में किसी पदार्थ का ज्ञान उससे सम्बन्धित अन्य वस्तु द्वारा होता है । अनुयोग के निम्नलिखित छः भेद है:
(i) निर्देश-किसी तत्त्व के स्वरूप को बताने वाली परिभाषा को निर्देश कहते हैं । इस परिभाषा द्वारा वस्तु-तत्त्व का ज्ञान होता है। यह परिभाषा उस वस्तुत्व से भिन्न वस्तु है किन्तु परिभाषा तत्त्व से सम्बन्धित होती है अत: वस्तु से भिन्न होने पर भी उसका स्वरूप बोधन कराती है । (ii) स्वामित्व --ज्ञेय वस्तु से भिन्न किन्तु सम्बन्धित । उसके स्वामी को पहचानने से भी उस वस्तु का १. 'तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम्"-तत्त्वार्थसूत्र १२ २. 'तन्निसर्गादधिगमावा'-तत्त्वार्थसूत्र १.३ खण्ड १७, अंक ३ (अक्टूबर-दिसम्बर, ६१)
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बोध होता है । (iii) साधना-ज्ञेय वरतु के निर्माण की साधना द्वारा उस वस्तु को पहचाना जा सकता है। (iv) अधिकरण-ज्ञेय पदार्थ जिसके आश्रय में स्थित हो उस आश्रय के निमित्त इसे पहचाना जाता है। (v) स्थिति--ज्ञेय पदार्थ जिस काल में स्थित हो उस काल के द्वारा उसको पहचानना होता है। (vi) विधान--जो भी विधान किसी वस्तु तत्त्व के सम्बन्ध में हो उस विधान द्वारा वस्तु को पहचाना जाता है।
इस प्रकार इन छहों रूपों में ज्ञेय तत्त्व से सम्बन्धित किन्तु भिन्न तत्त्व द्वारा ज्ञेय तत्त्व का ज्ञान होता है अतः इन्हें अनुयोग कहना उचित है।
(२) अनुगम के निम्नांकित आठ प्रकारों में वस्तु के अपने स्वरूप द्वारा ही उसको जाना जाता है।
(i) सत्-सत् शब्द यद्यपि अनेक अर्थों में प्रयुक्त होता है किन्तु प्रसंगानुकूल सत् शब्द की निम्न परिभाषा ग्राह्य समझी गई है:--"उत्पादव्यय ध्रौव्ययुक्तं सत्" अर्थात् जो वस्तु द्रव्य और गुण की अपेक्षा से ध्रुव या अविनाशी हो तथा उसमें गुण से उत्पन्न होने वाले पर्यायों अर्थात् भावों की अपेक्षा से प्रतिक्षण उत्पाद और व्यय होता रहता हो उसे सत् कहते हैं। यह अविनाशी सत् अर्थात् विद्यमान भाव और असत् अर्थात् अविद्यमान भाव उस वस्तु में ही देखे जा सकते हैं, इस प्रकार सत् भाव के द्वारा वस्तु का जो निर्णय होता है वह अनुगम समझा जाता है। (ii) संख्या-ज्ञेय वस्तु की जितनी संख्या हो उस संख्या द्वारा, (iii) क्षेत्र-जितने क्षेत्र में उसकी अवगाहना हो उस क्षेत्र द्वारा, (iv) स्पर्श-ज्ञेय वस्तु का जैसा स्पर्श हो उस स्पर्श के द्वारा, (v) काल-- जितने समय तक वस्तु स्थिर रहने वाली हो उस काल द्वारा तथा (vi) अन्तर-वस्तु के होने और मिटने में जो अन्तर रहता हो उसके द्वारा जो निर्णय होता है वह समस्त अनुगम के अन्तर्गत है। (vii) भाव-भाव का स्वरूप भी जैन दर्शन में अति विस्तार से समझाया गया है। जीव द्रव्य में समुच्चय की दृष्टि से देखा जाय तो पांच प्रकार के भाव पाये गये हैं:-यथा
[१] कर्म प्रकृति के उपशम से उत्पन्न होने वाला औपशमिक भाव । [२] कर्म प्रकृति के क्षय से उत्पन्न होने वाला क्षायिक भाव। [३] कर्म प्रकृति के कुछ अंश के क्षय और कुछ अंश के उपशम से उत्पन्न होने वाला क्षायोपशमिक भाव । [४] कर्म प्रकृति के उदय से जीवत्व का विकार उत्पन्न करने वाला औदयिक भाव । (५] एक पर्याय के नष्ट होने और दूसरी के उत्पन्न होने तथा फिर भी उसी क्रम से नष्ट होने और उत्पन्न होते रहने से उन पर्यायों के नष्ट हो जाने पर भी उनके परिणाम-स्वरूप रह जाने वाला पारिणामिक भाव । जैसे-चलचित्र में प्रथम चित्र के निकल जाने पर भी दूसरे चित्र के साथ उसका सम्बन्ध पूर्व चित्र के पारिणामिक भाव के कारण ही प्रतीत होता है।
अजीव द्रव्य में कोई कर्म प्रकृति का संबंध नहीं होता, इसलिये उसमें केवल एक पारिणामिक भाव ही हुआ करता है। अतः जैसी जो वस्तु हो, उसके विद्यमान भाव, जिसको "अस्ति' कहते हैं अथवा अविद्यमान भाव, जिसे "नास्ति' कहते हैं अथवा अवक्तव्य भाव जो, जो "अकथनीय' होते हैं, उनमें से जो भी जैसा भाव हो उससे उसके तात्त्विक स्वरूप को पहचान लिया जाता है। १३४
तुलसी प्रज्ञा
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(viii) अल्पबहुत्व-अर्थात् उन भावों के अल्प या बहुत्व से, जो उसी वस्तु में निहित हैं, उस वस्तु का ज्ञान होता है।
इस प्रकार स्पष्ट है कि सत्, संख्या आदि आठ प्रकार वस्तु स्वरूपनिष्ठ हैं अत: अनुगम' कहलाते हैं । अनुयोग व अनुगम द्वारा तत्त्वार्थ का अधिगम होता हैं, यह उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है. तथापि एक ही पदार्थ के अनेकों अर्थ होते हैं, उनमें से उस पदार्थ के किसी एक अंश से सम्बन्ध रखने वाले अर्थ को ही सम्पूर्ण पदार्थ का अर्थ समझ लेना अनेकान्तवाद नामक मिथ्यात्व समझा जाता है, उससे बचने का उपाय यह है कि उस पदार्थ के जितने भी अर्थ हों, उन सभी को सामने रखकर उस पदार्थ के स्वरूप (अर्थ) को स्वीकार किया जाय, जैसा कि अंधे पुरुषों और हाथी का उदाहरण प्रसिद्ध है अतः उसे जानने हेतु निक्षेपों का विधान किया गया है। तत्त्वों के न्यास अर्थात् स्थिति के चार प्रकार हैं :--'नामस्थापनाद्रव्यभावतस्तन्न्यासः ।"
(१) नाम (२) स्थापना (३) द्रव्य (४) भाव
[१[ नाम-नाम संज्ञा को कहते हैं। संज्ञा रखने में जाति गुण आदि की कोई अपेक्षा रखना जरूरी नहीं है । जो जिसकी जैसी संज्ञा रखना चाहे, वैसी रख सकता है। किन्तु संज्ञा के द्वारा भी वस्तु के वस्तुत्व का ज्ञान होता है। इसीलिये जिस वस्तु की जो संज्ञा हो, वही संज्ञा अन्य विपरीत भाव वाली वस्तु में होने पर भी उसको उस वस्तु का तत्त्व तो स्वीकार करना पड़ता है। उदाहरणार्थ---घोड़ा जीवतत्त्व है और शतरंज का मोहरा जो अजीव तत्त्व है, उसकी भी संज्ञा घोड़ा होती है अतः शतगंज के मोहरे को भी घोड़ा स्वीकार करना ही पड़ता है।
[२] स्थापना-स्थापना में भी जाति या गुण आदि की अपेक्षा रखना जरूरी नहीं है क्योंकि किसी वस्तु की कल्पना ऐसी वस्तु में करना, जिसमें उसके गुण विद्यमान न हों, स्थापना कहलाता है । संज्ञा के सदश स्थापना में भी स्थापित वस्तु में मूलवस्तु के सदृश गुण विद्यमान न होने पर भी उस वस्तुतत्त्व को स्वीकार करना ही पड़ता है । संज्ञा और स्थापना प्रायः एक ही प्रकार के होते हैं-संज्ञा, शब्द की अपेक्षा से होती है और स्थापना, द्रव्य की अपेक्षा से । अन्तर केवल इतना है कि संज्ञा जो एक बार रख दी जाती है प्रायः वही रहती है, बदली नहीं जाती और स्थापना जब चाहे की जा सकती है, जब चाहे विसर्जित की जा सकती है।
[३] द्रव्य-द्रव्य शब्द का स्वरूप जैन दर्शन में अति विस्तार से बताया गया है । संक्षेप में द्रव्य को समझने हेतु उसकी परिभाषा इस प्रकार की जाती है- "गुणपर्यायवद्रव्यम्"२ अर्थात् अनादि तथा अविनाशी गुण एवं गुण से उत्पन्न होने वाला, प्रतिक्षण उत्पाद एवं व्यय करने वाला पर्याय द्रव्य होता है। कुन्दकुन्दाचार्य के अनुसार भी अपने उन (गुण से उत्पन्न होने वाले) सद्भाव पर्यायों को जो प्राप्त होता है तथा जो सत्ता से अनन्यभूत् है, उसे द्रव्य कहते हैं।' १. तत्त्वार्थसूत्र १.५ २. तत्त्वार्थ सूत्र ५.१७ ३. दवियदि गच्छदि ताई ताई सम्भाबपउजवाइं । बवियं तं मण्णते अण्णभूवं तु सत्तादो ॥
पंचास्तिकायखण्ड १७, अंक ३ (अक्टूबर-दिसम्बर, ६१)
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सामान्यतया द्रव्य छः प्रकार के माने गये हैं— जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्मं, आकाश और काल । सम्पूर्ण लोक इन छहों द्रव्यों का एक समूह समझा जाता है। छह द्रव्यों के अतिरिक्त सम्पूर्ण लोक में और कुछ नहीं है तथा सम्पूर्ण लोक में ऐसा कोई स्थान नहीं है, जहां ये छहों द्रव्य विद्यमान न हों । इन द्रव्यों में से जीवादि क्रमशः पांचों द्रव्य बहुप्रदेशी अथवा अलग-अलग काय वाले हैं इसीलिये इन्हें अस्तिकाय कहा जाता है । ( काय का गुण और गुण का पर्याय होता है | ) प्रसंगवश काय के सम्बन्ध में संक्षेप में यह कहना आवश्यक है कि जिसके स्कन्ध, देश और प्रदेश हों उसे काय कहते हैं । देश और प्रदेश के समूह को स्कन्ध कहते हैं । स्कन्ध के प्रत्येक विभागी अंश को देश कहते हैं, और देश के प्रत्येक अविभागी अंश को प्रदेश कहते हैं । उक्त पांचों काय वाले द्रव्यों की अपने अपने गुणों के अनुसार वर्तना होती है और उस वर्तना से प्रति समय उन उन गुणों के पर्यायों का उत्पाद - विनाश होता रहता है ।
छठे काल द्रव्य की कोई काय नहीं होती, उसमें केवल वर्तना गुण ही होता है ।
द्रव्यों के आश्रित रहने वाले गुणों में कोई अन्य गुण नहीं रहते ।' छहों द्रव्यों के गुण इस प्रकार हैं--- जीवास्तिकाय का गुण उपयोग, पुद्गलास्तिकाय का गुण संघात और भेद, धर्मास्तिकाय का गुण गति में सहायक होना, अधर्मास्तिकाय का गुण स्थिति में सहायक होना, आकाशास्तिकाय का गुण अवगाह देना तथा काल द्रव्य का गुण वर्तना
है |
इन गुणों के अनुसार ही प्रति समय भावों के उत्पाद-व्यय के परिणामस्वरूप पर्याय बनते हैं । जीव के योग और उपयोग नामक पर्याय अनादि हैं तथा रूपी द्रव्य पुद्गल के पर्याय' हैं । इस प्रकार - "गुण और पर्याय के आश्रय को द्रव्य कहते हैं" यह परिभाषा निर्दोष सिद्ध होती है । ये द्रव्य भी तत्त्व को समझने में अर्थ का कार्य करते हैं अतः निक्षेपों के अन्तर्गत द्रव्य- निक्षेप को कहा गया है ।
(४) भाव - निक्षेप - - छहों द्रव्यों के भिन्न-भिन्न गुणों के अनुसार भावों का उत्पाद व्यय होता रहता है । उन्हीं के विपाक रूप पर्याय होते हैं, जो दो प्रकार के होते
(१) अर्थ पर्याय
( २ ) व्यञ्जन पर्याय ।
पर्याय में अवक्तव्य भावों का जो अवग्रह होता है उसे ईहा, अवाय और धारणा के क्रम से जाना जा सकता है, जिससे वह वक्तव्य हो जाता हैं, किन्तु व्यंजन पर्याय द्वारा विषय के व्यंजन मात्र का बोध होता है, जो अवक्तव्य ही रहता है ।
इस प्रकार चारों निक्षेपों द्वारा तत्त्व के निक्षेप तत्त्वान्तरों का भी ज्ञान कराते हैं, अतः
अर्थ का ज्ञान होता है, किन्तु ये चारों सही तत्त्वार्थ क्या है - इसका निर्णय
१. " ब्रव्याश्रया निर्गुणा गुणाः " तत्त्वार्थसूत्र ५.४० २. " उपयोगो लक्षणम्" तत्वार्थ सूत्र २.८ ३- "रूपिणः पुद्गलाः” तस्वार्थसूत्र ५.५
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करना आवश्यक है । तत्त्वार्थ के सम्यक् निर्णय हेतु जैन दर्शन में प्रमाणों का निरूपण किया गया है । मति, श्रुत, अवधि, मन:पर्यय और केवल ये पांच ज्ञान हैं जिनमें मति आदि क्रमश: चार ज्ञान इंद्रियों एवं मन की सहायता से उत्पन्न होने के कारण परोक्ष प्रमाण कहे जाते हैं तथा इन्द्रियादि की अपेक्षा न रखकर केवल आत्मबल से उत्पन्न होने वाला केवल ज्ञान प्रत्यक्ष प्रमाण है ।
तत्त्वार्थ के निर्णय हेतु मतिज्ञान, श्रुतज्ञान तथा अवधिज्ञान -- ये तीन ज्ञान ही प्रयोग में आने वाले प्रमाण हैं, क्योंकि मन:पर्ययज्ञान सम्यग्दर्शन प्राप्त योगी को होता है तथा केवलज्ञान वीतरागी को होता है, अतः दोनों ज्ञान स्वयं ज्ञानियों के लिये ही उपयोगी हैं, और उनके उपदेश से हुआ ज्ञान हमारे लिये श्रुतज्ञान ही होता है ।
मति श्रुत व अवधि ज्ञान रूप परोक्ष-प्रमाण भी मोह की तीव्र - मन्दता के कारण विपरीत भी होते हैं । यथा-मति अज्ञान, श्रुत अज्ञान और विभंगज्ञान । ऐसा होने पर सत् अर्थात् विद्यमान भाव और असत् अर्थात् अविद्यमान भाव की विशेषता न जानने से उन्मत्त की भांति कभी शुद्ध अथवा कभी अशुद्ध अर्थ भी ग्रहण किये जाते हैं । अतः इन कठिनाइयों के होते हुए भी नय-न्याय में जिन सिद्धान्तों की प्ररूपणा की है, उनके द्वारा निर्णय करने से अधिगम की तथा अर्थों में स्थित तात्त्विक स्वरूप की यथार्थ जानकारी हो सकती है । इस प्रकार यहां नय-सिद्धान्तों के स्पष्टीकरण द्वारा तत्त्वार्थ के सत् और असत् की विशेषता को जानना आवश्यक है ।
नयों के सिद्धान्त
उमास्वाति रचित तत्त्वार्थाधिगम सूत्र यद्यपि दिगम्वर व श्वेताम्बर दोनों परम्पराओं में मान्य है तथापि दोनों के ग्रन्थ अलग-अलग हैं तथा पाठान्तर भी है । नय के विषय में श्वेताम्बर सम्मत सूत्र इस प्रकार है - " नैगम संग्रह व्यवहारर्जु सूत्रशब्दा नयाः””, “आद्यशब्दी द्विभेद "", अर्थात् नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र और शब्द ये पांच नय हैं । प्रथम नैगम नय के देशग्राही और समग्रग्राही दो तथा शब्दनय के सांप्रतशब्द, समभिरूढ़ और अवंभूत ये तीन भेद हैं । दिगम्बर ग्रन्थों के अनुसार " नैगमसंग्रहव्यवहारर्जु सूत्रशब्दसमभिरूढ़ें वंभूता नयाः ॥' अर्थात् नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ़ और अवंभूत ये सात नय हैं । नयों के उक्त विवरण में श्वेताम्बर परम्परा में शब्द के तीन भेद किये और दिगम्बर परम्परा में शब्द को सांप्रत शब्द न कहकर शब्द ही कहा और समभिरूढ़ तथा अवंभूत् नय को पृथक् कहा। इतना होने पर भी परस्पर भावार्थ में विरोध नहीं है ।
(१) नंगम नय - नैगमादि सात नयों के अन्तर्गत प्रथम नैगमनय को स्वोपज्ञभाष्य में इस प्रकार परिभाषित किया है- " निगमेषु ये अभिहिताः शब्दास्तेषामर्थ : शब्दार्थपरिज्ञानं च देशसमग्रग्राही नैगमः" अर्थात् जनपद देश में जो शब्द जिस अर्थ के
१. तत्वार्थसूत्र I. ३४
२. तत्वार्थसूत्र . ३५
३. सर्वार्थसिद्धे, राजवातिकालंकार, श्लोकातिकार . ३३
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लिये नियत हो, वहां पर उस शब्द के और अर्थ के सम्बन्ध को ग्रहण करने वाला, वस्तु के सामान्य अंश और विशेष अंश की अपेक्षा से प्रवृत होने वाला नंगमनय कहलाता है।
"नैगमनय सामान्य विशेष का अवलम्बन करने वाला है। इस सम्बन्ध में सिद्धसेन गणी ने भाष्य की टीका करते हुये लिखा है कि घट का निरूपण करते समय सभी घटों की समानता को लेकर सामान्य घट का कथन किया जाता है तब समग्रग्राही नंगम नय कहा जाता है तथा घट की सुवर्णमय, रजतमय आदि विशेषता का कथन किये जाने पर देशग्राही नैगमनय कहा जाता है। ___महर्षि विद्यानन्दि तत्त्वार्थश्लोकवातिकालंकार में नैगमनय की परिभाषा करते हुये लिखते हैं कि संकल्प मात्र का ग्राहक नैगमनय है । अथवा "नैकं गमो नैगमः" इस व्युत्पति के अनुसार जो धर्म और धर्मी में से एक अर्थ को ही नहीं जानता वरन् गौण-प्रधान भाव से धर्म-धर्मी दोनों को विषय करता है, वह नैगमनय है।' जैसे “जीव का गुण सुख है, या "जीव सुखी है" इस प्रकार से नैगमनय द्वारा धर्म व धर्मी दोनों की ज्ञप्ति हो जाती है।
यहां पर यह शंका नहीं करनी चाहिये कि धर्म-धर्मी दोनों को विषय करने वाला होने से नैगमनय, प्रमाण हो जायेगा; क्योंकि नैगमनय में धर्म-धर्मी में से एक की प्रधान और दूसरे की गौण रूप से ज्ञप्ति की जाती है। उपर्युक्त उदाहरण में "जीवगुणः सुखं" में विशेष्य सुख प्रधान है और जीव अप्रधान । जबकि "सुखीजीवः” में जीव प्रधान है और सुख अप्रधान ।
- विद्यानंदि के अनुसार की गई नैगमनय की प्रथम परिभाषा को पुष्ट करते हुए प्रायः वही भाव यूज्यपाद ने सर्वार्थसिद्धि में तथा आचार्य भट्टाकलंक ने तत्त्वार्थराजवातिकालंकार में प्रस्फुटित किया है कि वास्तव में विद्यमान न होने पर भी, अपूर्ण अर्थ को संकल्प मात्र से ग्रहण करने वाला नैगमनय है।
नैगमनय के विषय में उपर्युक्त विवेचनानुसार शाब्दिक अन्तर को देखते हुये भी सभी कथनों में परस्पर विरोध परिलक्षित नहीं होता । तत्त्वार्थ के सत् अर्थात् विद्यमान भाव एवं असत् अर्थात् अविद्यमानभाव-की विशेषता की दृष्टि से श्वेताम्बर और १. "यदा हि स्वरूपतो धटमयं निरुपयति-तदा सामान्य घटं सर्वसमान- व्यक्त्या धितं घट इत्यभिधानप्रत्ययहेतुमाश्रयत्यतः समग्रमाहीति । तथा विशेषमपि सौवर्णो मृण्मयो राजतः श्वेतः इत्यादिकं विशेष निरूपयत्यतो देशग्राहीति भण्यते नैगमनयः ।" सिखसेन भाष्यटीका I. ३५ २. तक्नार्थश्लोकवातिकालंकार 1. ३३–टीकाश्लोक १७ । ३. वही-I. ३३ टीकाश्लोक २१. ४. "एकदेशोविशिष्टोऽर्थो नयस्य विषयो मतः" ५. तत्वार्थश्लोकवा• I. ३३ टीकाश्लोक २२ ६. सर्वार्थसिदि . ३३ ७. राजवा. I. ३३
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दिगम्बर दोनों मान्यताओं में असमानता नहीं है क्योंकि यहां जनपद देश में कहे जाने वाले शब्दों का अर्थ या संकल्प मात्र से पद्धार्थ का ग्रहण करना नैगमनय का स्वरूप कहा गया है । इस प्रकार यहां वाचक शब्दों द्वारा ग्रहण किया जाने वाला शब्दार्थज्ञान तो सत् है किन्तु वाच्य पदार्थ असत् है ।
(२) संग्रह नय-स्वोपज्ञभाष्यानुसार- "अर्थानां सर्वेकदेश संग्रहणं संग्रहः ।" अर्थात् पदार्थों के सर्वदेश (सामान्य) और एक देश (विशेष) का सम्यक् रूपेण ग्रहण करना संग्रह नय कहलाता है।
सिद्धसेन गणी ने टीका में सामान्य और विशेषात्मक पदार्थों का एकीभाव से ग्रहण होने को संग्रह नय कहा है । संग्रह नय एकी भाव में सामान्य विशेप में से सतास्वभाववाले सामान्य की ही स्थापना करता है, क्योंकि विशेष, सत्ता से व्यतिरिक्त नहीं है।'
विद्यानंदि के अनुसार “एकत्वेन विशेषाणां ग्रहणं संग्रह नयः । स्वजातेरविरोधेन दृष्टेष्टाभ्यां कथंचन ।" अर्थात् सता स्वरूप जाति के दृष्ट इष्ट प्रमाणों द्वारा अविरोध पूर्वक सभी विशेषों का कथंचित् एकत्व करके ग्रहण करना संग्रह नय है।
पूज्यपाद ने भी संग्रह नय की उक्तभावानुसार व्याख्या की है। अपनी जाति में अविरोधपूर्वक एकत्व स्थापित करके अथवा अपनी जाति को प्रकट करके पर्यायों का भेद न करके समस्त पदार्थों को समुदाय रूप से या सामान्य रूप से ग्रहण करने वाला संग्रहनय है।
यही भाव अकलंक के राजवार्तिक में है
"स्वजात्यविरोधेनेकत्वोपनयात्समस्तग्रहणं संग्रहः।" सत् एवं असत् की विशेषता की दृष्टि से उपर्युक्त सभी मान्यताओं में विरोध नहीं है और इस विवेचन से स्पष्ट है कि संग्रह नय में एक जाति वाले पदार्थों के भेदों को सामान्यरूप से ग्रहण किया जाता है । अतः पदार्थ की सत्ता यहां सत् है और भिन्नभिन्न (पर्यायों की अपेक्षा से) रूप से पदार्थ असत् है। नैगमनय से संग्रहनय की विशेषता इस बात को लेकर है कि नैगमनय में पदार्थ असत् रहता है, वह केवल कल्पना से सत् माना जाता है जबकि संग्रहनय में सत्ता पदार्थों का विद्यमान भाव है। (३) व्यवहार नयः
___ व्यवहारनय की परिभाषा स्वोपज्ञ भाष्यानुसार-“लौकिक-सम उपचारप्रायो विस्तृतार्थों व्यवहारः" की गई है अर्थात् लौकिकव्यवहार के समान उपचार में प्रवृत हुए विशेष अंश को लेकर व्यवहार करने वाला नय व्यवहारनय है।
__ भावार्थ यह है कि जिस प्रकार विशेषों के द्वारा घटादि व्यवहार करते हैं, उसी प्रकार सिद्ध अर्थ का अन्यत्र अध्यारोप करना जैसे "पुरुष के चलने पर, मार्ग चलते हैं" ऐसा कहना आदि उपचार बहुल से जानने योग्य अनेक अर्थों का निश्चय करना व्यवहार
१. सिद्धसेन भाष्य टीका I. ३५ २. "स्वजात्यविरोधेनैक्यमुपनीय पर्यायानाक्रान्तभेदानविशेषेण समस्तग्रहणात्संग्रहः
---सर्वार्थसिद्धि I. ३३
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नय है ।
संग्रहनय द्वारा ग्रहण किये गये पदार्थों का विधिपूर्वक भेद करना व्यवहारनय है ।" संग्रहनय का विषय सत् है, किंतु सत् शब्द से संसार का व्यवहार हो नहीं सकता । अतः जो सत् है वह द्रव्य और गुण है और यह व्यवहार नय से मानना पड़ता है तथा ऐसे ही संग्रह नय से ग्रहण किये गये द्रव्य के विषय में उसके जीवद्रव्यादि भेद करके व्यवहार किया जाता है ।
रहा होने से ये तीनों आरोप पर आश्रित
इस प्रकार व्यवहार या उपचार से भेदपूर्वक ग्रहण किये जाने वाले पदार्थ का व्यवहारनय में सद्भाव है, इसके अतिरिक्त शेष सभी असत् है । उपर्युक्त तीनों नयों का उद्गम द्रव्यार्थिक की भूमिका में द्रव्यार्थिक नय कहे जाते हैं । इनमें नैगमनय का विषय लोकरूढ़ि होने से सर्वाधिक विशाल है । सामान्यलक्षी होने से संग्रह नय का अपेक्षाकृत न्यून है; तथा व्यवहारय का विषय संग्रहनय से भी संग्रहन द्वारा संकलित विषय की ही प्रमुख प्रमुख विशेषताओं के आधार पर पृथक्करण करने वाला होने से केवल विशेषग्राही है । उक्तरीत्या इनमें परस्पर पौर्वापर्य सम्बन्ध के साथ-साथ उत्तरोतर क्रम से नयदृष्टि की सूक्ष्मता पाई जाती है । इन तीन नयों के अतिरिक्त शेष चारों नय पर्यायार्थिक नय हैं, क्योंकि ये द्रव्य के स्थान पर उसकी पर्यायों को विषय करने वाले हैं । द्रव्यार्थिक-पर्यायाथिक भेद के समान ही उपर्युक्त तीनों नय व्यवहारनय माने जाते हैं तथा शेष निश्चय-नय कहे जाते हैं ।
(४) ऋजुसूत्र
“सतांसाम्प्रतानामर्थानामभिधानपरिज्ञानमृजुसूत्र: । ' तत्त्वार्थ
भाष्य की इस परिभाषा के अनुसार वर्तमान अर्थपर्याय ही ऋजुसूत्रनय का विषय है अतः ऋजुसूत्रनय वर्तमानकालिक सत् पदाथों की पर्यायों को ही ग्रहण करता है; अतीत - अनागत समय की पर्याय को ग्रहण नहीं करता है ।
विषय नैगमनय से कम है क्योंकि दह
पूज्यपाद, अकलंक एवं विद्यानंदि आदि आचार्यों ने भी अपने-अपने ग्रन्थों में ऋजुसूत्र को उक्त अभिप्राय से ही समझाया है ।
सत् एवं असत् की विशेषता की दृष्टि से देखा जाय तो ज्ञात होगा कि ऋजुसूत्रनय में द्रव्य की वर्तमान पर्याय का सद्भाव है और भूत-भविष्य पर्याय का असद्भाव है । ऋजुसूत्र पर्यन्त चारों नय अर्थनय, तथा शेष तीन नय शब्दनय कहे जाते हैं ।
(५) शब्दनय
शब्दनय को श्वेताम्बर - परम्परा में साम्प्रतशब्द कहा है क्योंकि वे शब्द नय के तीन भेदों में प्रथम नय को साम्प्रतनय कहते हैं । तत्त्वार्थभाष्यानुसार नाम, स्थापना, द्रव्य १. "यथा लौकिका विशेष रेव घटादिभिर्व्यवहरन्ति तथा इयमपीत्यतस्तत्समः उपचार बहुल- " सिद्धसेन भाष्य टीका . ३५
२. "अतो विधिपूर्वकमवहरणं व्यवहारः ।" तत्वार्थराजवा० I ३३ वार्तिक ६
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और भाव इनमें से किसी पदार्थ के वाच्यवाचकभाव का ज्ञान जिस शब्द से हुआ हो उसके ज्ञान होने को साम्प्रतनय कहते हैं।'
शब्द नय के विषय में पूज्यपाद आदि अन्य आचायों के कथनों के सार रूप में यह कहा जा सकता है कि घट, पट आदि शब्दों के उच्चारण करते ही उन पदाथों के जानकार पुरुष को जिसके द्वारा अपने वाच्यपदार्थ का ग्रहण हो वह शब्द नय है और यह नय लिङ्ग, वचन, साधनादि के दोषों से रहित होता है।
सिद्धसेन गणी ने अपनी टीका में नामादि में आदि शब्द के लिये जो स्थापना द्रव्य और भाव अर्थ लिये हैं उसकी अपेक्षा नामादि के लिङ्ग, संख्या, साधनादि अर्थ अधिक उचित प्रतीत होते हैं क्योंकि यहां शब्द की प्रधानता है अतः शब्द शुद्धि पर बल दिया जाता है।
शब्द नय में सत् एवं असत् भाव की विशेषता के अन्तर्गत लिङ्गादिव्यभिचार रहित शब्द की विद्यमानता अपेक्षित है तथा अन्य अर्थों की असत्ता है। (६) समभिरुढ़नय
तत्त्वार्थभाष्य में लिखित परिभाषा के अनुसार "सत्स्वर्थेष्वसंक्रमः समभिरुढ़: अर्थात् वर्तमान अर्थों में शब्द का असंक्रम जिसके द्वारा ग्रहण किया जाय उसे समभिरुढ़ कहते हैं।
पर्यायवाची अनेक अर्थों के विद्यमान होने से उन अनेक अर्थो को छोड़कर एक ही अर्थ में रूढ़ हो जाने से यह नय समभिरुढ़नय कहलाता है। सत् व असत् भाव की विशेषता-शब्दनय अथवा साम्प्रतनय में तो लिङ गादिदोषरहित शब्द का होना आवश्यक है किन्तु समभिरुढ़नय में लिङ गादिदोषरहित एकार्थवाची शब्दों में से भी एक रुढ़ हुये शब्द को ग्रहण किया जाता है। यही उसके सत्स्वरूप की विशेषता है। (७) एवंभूतनय
विद्यानन्दि के अनुसार एवंभूतनय के द्वारा जिस समय, जिस क्रिया रूप परिणाम होता है, उस समय उसी विशेष प्रकार से उसका निश्चय किया जाता है और यह नय अन्य क्रियाओं से परिणत हुये उस अर्थ को जानने हेतु अभिमुख नहीं होता । जैसे---जिस समय अध्यापन कार्य चल रहा है उसी समय अध्यापक कहा जाएगा, भोजनादि करते समय अध्यापक नहीं है।
यही भाव अकलंक ने तत्त्वार्थ राजवातिकालंकार में कहा है कि जो पदार्थ जिस १. "नामादिषु प्रसिद्धपूर्वाच्छब्दार्थे प्रत्ययः साम्प्रतः।" तत्वार्थभाष्य I. ३५ २. "नामेत्यादि । नामस्थापनाद्रव्यभावेष नम्यमाने वस्तुनि घटादौ स्थाप्यमाने वाऽऽकारात्मना द्रव्ये च गुणसंद्रावात्के भावे च प्रतिविशिष्टपर्यायरूपे-"भाष्य टीका I. ३५। ३. तरिक्रयापरिणामोऽर्थस्तथैवेति विनिश्चयात् । एवंभूतेन नीयेत क्रियोतरपराङ मुखः ॥ तत्वार्थश्लोकवा. I. ३३ टीकाश्लोक ७८.
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स्वरूप अर्थात् अर्थ-क्रिया से जिस समय परिणित हो, उसका उसी स्वरूप अर्थ-क्रियापरिणाम से निश्चय करना एवंभूतनय का विषय हैं।'
पूज्यपाद ने भी एवंभूत की यही परिभाषा की है।
एवंभूतनय में सत् और असत् की विशेषता को समझने हेतु इस नय का जो स्वरूप बतलाया गया है वह यह है कि शब्द और अर्थ अर्थात् पद व पदार्थ परस्पर एक अपेक्षा लिये हुये होने चाहिये । इसी प्रकार अर्थ और व्यन्जन भी परस्पर एक दूसरे के बोधक होने चाहिये।
__ व्यक्त पदार्थों का ग्रहण अर्थावग्रह कहलाता है और अव्यक्त या अप्रकट पदार्थों का ग्रहण व्यन्जनावग्रह कहलाता है। अर्थावग्रह की भांति व्यन्जनावग्रह के ईहा, अवाय, धारणादि नहीं होते किन्तु ये मान लिया जाय कि व्यन्जनपर्याय का अर्थपर्याय के साथ योग में संक्रमण भी रहता है, जैसा कि-उपशम श्रेणी और क्षपक श्रेणी में पृथक्त्व को समझे जाने वाले विचार की परिभाषा करते हुये उमास्वाति ने कहा है-"विचारो अर्थ व्यन्जनसङक्रान्तिः तब भी सत् असत् की विशेषता को समझने हेतु जब तक ये निर्णय न हो जाय कि किस विवक्षा में कौन सी अर्थ पर्याय का सद्भाव और किस विवक्षा में कौन-सी अर्थपर्याय का असद्भाव तथा कौन-सी अर्थ पर्याय का सद् और असद्भाव दोनों हैं ? ; इसी प्रकार उस व्यन्जन की अव्यक्त ग्राह्य पर्याय के सम्बन्ध में भी प्रश्न उठते हैं कि वह व्यन्जन वास्तव में है, नहीं है अथवा है भी और नहीं भी है ?, तब तक इस नय के द्वारा सत् असत् की विशेषता को नहीं जाना जा सकता।
इस प्रकार सभी वाचक शब्दों और वाच्य पदार्थों के व्यन्जन और अर्थ के सम्बन्ध में यह बतलाना कठिन है कि किस विवक्षा में कौन-सा पदार्थ कहां है ? या नहीं है ? इसीलिये प्रस्तुत कठिनाई के समाधानार्थ जैन-दर्शन में सप्तभङ्गी सिद्धान्त का निरुपण किया है ताकि सप्तभङ गी रूप मापदण्ड के अनुसार वे तत्-तत् विवक्षा को जानकर स्वयं उसका निर्णय करें। इस सम्बन्ध में सप्तभङगी के सात भङग हैं, जिनमें से प्रथम तीन अर्थ के विषय में तथा शेष चार अव्यक्त व्यन्जनार्थ हैं। कुन्दकुन्दाचार्य ने सप्तभङ गी का कथन पञ्चास्तिकाय में किया है
"सिय अत्थि णस्थि उहयं अव्यत्तव्वं पुणो य तत्तिदयं । दन्वं खु सत्तभंगं आदेसवसेण संभवदि ॥ पञ्चा० १४
(१) स्यादस्ति--अर्थात् कथञ्चित् (किसी अपेक्षा से) अर्थ है ही। स्यादस्ति के अनुसार जिस अपेक्षा से अर्थ है उसका ज्ञान कर उस अर्थ का निर्णय किया जाना चाहिये।
(२) स्यान्नास्ति- अर्थात् कथञ्चित् अर्थ नहीं ही है। यहां पर जिस अपेक्षा से अर्थ नहीं है उसका ज्ञान कर उस अर्थ का निर्णय किया जाना चाहिये। १. "येनात्मना भूतस्तेनैवाध्यवसाययतीत्येवंभूतः -तत्वार्थराजवा० I. ३३ वातिक ११ २. सर्वार्थसिद्धि 1. ३३ ३. तत्वार्थसूत्र IX. ४६
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(३) स्यावस्तिनास्ति-अर्थात् कथञ्चित् अर्थ है भी और नहीं भी है। यहाँ पर जिस अपेक्षा से अर्थ की सत्ता और जिस अन्य अपेक्षा से अर्थ की असत्ता दोनों विद्यमान हों, उसका ज्ञान कर उस अर्थ का निर्णय करना चाहिये ।
(४) स्यादवक्तव्यम्-अर्थात् कथञ्चित् व्यन्जन अवक्तव्य (कहने योग्य नहीं) है । यहां पर जिस अपेक्षा से व्यन्जन की अबक्तव्यता हो उसका ज्ञान कर व्यन्जन का निर्णय करना चाहिये।
इसी प्रकार क्रमशः स्यादस्त्यवक्तव्यम्, स्यान्नास्त्यवक्तव्यम् तथा स्यादस्तिनास्त्यवक्तव्यम् इन तीन भंगों द्वारा भी अर्थ एवं व्यन्जन की तत्-तत् अपेक्षा का ज्ञान कर उसके तत्वार्थों का निर्णय करना चाहिये । निष्कर्षः
इस प्रकार तत्व और तत्वार्थ को अधिगम द्वारा, नय न्याय के सिद्धान्तों का पालन करते हुए, अपने ज्ञान रूप प्रमाणानुसार निर्णय करके समझने हेतु सप्तभंगी के सातों प्रश्नों की ज्ञान द्वारा जानकारी करके, रत्नत्रय आदि के स्वरूप में विद्यमान रहने वाले सत् एवं असत् की विशेषताओं को नय न्याय द्वारा समझने का जैन दर्शन में निरूपण किया गया है।
। यही कारण है कि यदि किसी एक द्रव्य-नय या व्यवहारनय अथवा अर्थनय या शब्द नय अथवा निश्चय नय या पर्यायनय के सद्भाव या असद्भाव को ही सम्पूर्ण तत्वार्थ का स्वरूप मानकर अन्यों की पूर्ण उपेक्षा कर दे, तो वह एकान्त मिथ्यात्व कहा जाता है । इसके विपरीत किसी भी एक नय को उसकी विवक्षा के अनुसार अन्यार्थों की उपेक्षा न करते हुए अर्थग्रहण करने योग्य माना जाना यथार्थ है।
एक नय के आश्रय से समस्त अर्थ को समझने रूप एकान्तमिथ्यात्व के सदृश ही गीता में भी कहा है
"यतु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहेतुकम् ।
अतत्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥ भगवद्गीता १५-२२ अर्थात् जो बिना किसी हेतु और तत्वार्थ के परिज्ञान के बिना भी यह समझ कर आसक्त रहता है कि “यही सब कुछ है" तो वह अल्प और तामस ज्ञान कहा गया है। __इसलिये इस विषय में जो सात अन्धे पुरुषों एवं हाथी का दृष्टान्त दिया जाता है, उसमें जनेतरों के प्रति आक्षेप करने का कोई लक्ष्य नही वरन् वह तो जैन एवं जैनेतर सभी उन अल्पज्ञाताओं के लिये है, जो अन्यार्थी की पूर्ण उपेक्षा करके केवल एकान्त का आश्रय लेते हैं।
इसी प्रकार सत् असत् की विशेषता को उपर्युक्त विवरणानुसार न जानने वाले एकान्त मिथ्यात्वियों के लिये उमास्वाति ने उन्मत की संज्ञा दी है-- "सदसदोरविशेषात् यदृच्छोपलब्धरुन्मत्तवत्"
___ तत्वार्थसूत्र I. ३३ • खण्ड १७, अंक ३ (अक्टूबर-दिसम्बर, ६१)
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एक बूंद : एक सागर सं० समणी कुसुमप्रज्ञा
आचार्यश्री तुलसी के साहित्य से संगृहीत सूक्तियों / अभिवचनों का पांच खंडों में प्रकाशित विशाल संग्रह
'संचयनकर्त्री ने आचार्य तुलसी के विशाल साहित्य - सागर का मंथन करके सूक्तियों का अमृत निकाला है । यह सुभाषितामृत जीवन-निर्माण के लिये पुष्टिकारक है, तुष्टिकारक है ।'
- आचार्य विद्यानंद
'जीवन और व्यवहार के हर पक्ष से संबंधित हर विषय पर इसमें दिशासंकेत प्राप्त होता है। हर वाक्य में एक नया दर्शन और नया विचार है । इस एक ग्रंथ को पढ़ने से आचार्यश्री के समग्र ग्रंथों का पारायण सहज हो जाता है ।'
- विश्वम्भरनाथ पाण्डे
'जीवन का ध्येय मोक्षमार्ग है । उसमें आने वाली बाधाओं का निराकरण और उस मार्ग में अग्रसर होने का उपदेश प्रस्तुत संग्रह में मिलेगा । किसी भी पृष्ठ को देखें यही बात सिद्ध होती है ।' - दलसुख मालवणिया 'शुभश्री समणी कुसुमप्रज्ञा ने आचार्यश्री के बृहद् वाङ्मय-सागर से अमृत-बिंदुओं का संचयन कर श्लाघनीय कार्य किया है ।' - डॉ० नगेन्द्र 'मैंने इस ग्रंथ की एक एक बूंद में जीवन ज्योति का प्रकाश विकीर्ण होते देखा है । एक एक बूंद में अमृत-बिन्दु का आह्लादरस पाया है । जीवन, जागृति, बल और बलिदान की भावना का जैसा आलोक इस ग्रंथ की पंक्तिपंक्ति में समाया हुआ है, वैसा अन्यत्र मुझे सुलभ नहीं हुआ ।'
-डॉ० विजयेंद्र स्नातक
'मैंने लघु से गुरु तक, एक खंडीय से बहुखंडीय तक अनेक सूक्ति कोश देखे हैं । मैं निस्संकोच रूप से यह कह सकता हूं कि “एक बूंद : एक सागर " उनमें से किसी से भी न्यून नहीं है । मैं तो इसे 'समग्र जीवन : शंकाएं और समाधान' मानता हूं ।'
-डॉ० रामप्रसाद मिश्र
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'ये सूक्तियां आचार्यश्री के जीवन का निचोड़ हैं। यहां मनोविज्ञान, समाजशास्त्र, लोकतंत्र, राजनीति, साम्प्रदायिक सद्भाव, मानव एकता, राष्ट्रीय भावना, संयम, समता, आचारशास्त्र आदि जीवन-मूल्यों की प्रेरणादायक अभिव्यक्ति है ।' -डॉ० निजामउद्दीन
प्राप्ति-स्थान
जैन विश्व भारती, लाडनूं - ३४१३०६
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भारतीयदर्शन की आशावादिता एवं प्रगतिशीलता
डॉ० जगन्नाथ जोशी : डॉ० (श्रीमती) कमला पंत
कुछ आलोचकों ने भारतीय दर्शन को निराशावादी, अकर्मण्यताजनक एवं अप्रगतिशील दर्शन की संज्ञा दी है।
भारतीय आध्यात्मवाद के मूल में दुःख का निरोध एक विशिष्ट उद्देश्य के रूप में प्राप्त होता है । महात्मा बुद्ध ने जिन आर्य-सत्यों को खोजा, वे सभी दर्शन-सम्प्रदायों में मान्य हैं । वे हैं-दुःख है, दुःखसमुदाय है, दुःख निरोध है और दुःख निरोध मार्ग है। इनमें प्रथम आर्यसत्य है-दुःख । व्यास एवं विज्ञानभिक्षु चिकित्सा-शास्त्र की तरह (रोग, रोगनिदान, आरोग्य और भैषज्य) आध्यात्मशास्त्र में भी चतुर्दूह मानते हैं-दुःख, दुःखहेतु, मोक्ष एवं मोक्षोपाय ।' सांख्याचार्य के विचार में संसार निरन्तर तीन दुःखों (आध्यात्मिक, आधिभौतिक एवं आधिदैविक) के आघात से पीड़ित रहता है। योग दर्शन के अनुसार विचारशील व्यक्ति के लिए सम्पूर्ण संसार दु:खमय है। इसलिए वह पांच प्रकार के क्लेशों या दुःखों से मुक्ति के लिए ईश्वर-प्रणिधान आदि उपाय बताता है। अन्य दर्शन भी जन्म-मरण को दुःख मानते हैं...."पुनरपि जननं, पुनरपि मरणं, पुनरपि जननी-जठरे शयनम् ।"
दुःख शाश्वत सत्य है और सर्वानुभूत भी है । जितना अधिक ज्ञान होगा उतना ही सांसारिक अनुभवों के प्रति असन्तोष होगा। जो सुख दिखाई देते हैं, वे भी परिणामतः दुःखदायी होते हैं । सुख प्राप्ति में कष्ट, सुख न मिलने एवं प्राप्त सुखों के खोने पर दुःख, सुखों के विषय में चिन्ता एवं स्मृति से दुःख इत्यादि अनेक कारणों से सुख, दुःखों को उत्पन्न करने लगते हैं । दार्शनिक दृष्टि से जन्ममरणादि दुःख हैं। हम प्रत्यक्ष देखते हैं कि संसार में सभी जीव किसी न किसी दुःख से दुःखी हैं । शारीरिक कष्ट, मानसिक पीड़ा, आजीविका की कठिनाई, रोग, पारिवारिक क्लेश, दैवी बाधा, सामाजिक अवमानना, मानसिक सन्ताप इत्यादि अनेक रूपों में दुःख का अस्तित्व है। शायद् ही ऐसा कोई प्राणी हो, जिसे दुःख ने कभी स्पर्श न किया हो। भारतीय दार्शनिकों ने (नामों की भिन्नता रखते हुए भी) दुख का एक ही मूल कारण माना है वह है-अज्ञान, अविद्या, माया, विवेक का अभाव, कषाय, सकाम कर्म अथवा मिथ्या ज्ञान । इसके कारण व्यक्ति दुःखमय जगत् को सुखरूप मानकर उसका उपभोग करते हैं और जन्म-मरण के पाशों में उलझ जाते हैं । इसीलिए भारतीय विचारकों ने दु:ख के कारणों, दुःख-मुक्ति के उपायों एवं मुक्ति के स्वरूप की व्याख्या की है।
दुःखवाद, संसार के प्रति वैराग्य, क्षणभंगुरता, प्रपञ्च के मिथ्यात्व (ब्रह्म सत्य खण्ड १७, अंक ३ (अक्टूबर-दिसम्बर, ११)
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जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह, मैव नापर: ) जैसे विचारों के कारण भारतीय दर्शन जीवन का निषेधक, पलायनवादी, नैराश्यपूर्ण, अन्धकार में भटकाने वाला एवं काल्पनिक सुखी संसार की खोज में वर्तमान जीवन की सच्चाइयों को नकारने वाला दीख पड़ता है । किन्तु वह ऐसा नहीं है । वास्तव में भारतीय दर्शन की उत्पत्ति का मूल कारण है— संसार में सर्वत्र दु:ख की सत्ता का अनुभव | इसके विपरीत पाश्चात्य दर्शन की उत्पत्ति संसार के प्रति आश्चर्य से होती है । दुःख की सत्ता का अनुभव कर भारतीय दार्शनिकों ने दुःखों से मुक्ति को ही परम पुरुषार्थ माना है ।
निस्संदेह भारतीय दर्शन संसार को क्लेशबहुल मानकर, उससे सदा के लिए छुटकारा दिलाना चाहता है किन्तु इतने से ही किसी विचारधारा को निराशावादी और पलायनवादी नहीं कहा जा सकता है क्योंकि वहां एक नए जीवन एवं सुख की आशा भी विद्यमान है ।" भारतीय दर्शनों में संसार के दुःखमय स्वरूप की विवेचना की गयी है । इस दृष्टि से देखा जाए तो संसार का प्रत्येक दर्शन निराशावादी हो जाएगा क्योंकि किसी न किसी रूप में (भारतीय एवं पाश्चात्य) दोनों दर्शनों में भौतिक संसार की वर्तमान परिस्थितियों से असन्तोष, भोग, भोगातिरेक जन्यकष्ट एवं अनेक प्रकार की कठिनाईयां मानी गयी हैं । वर्तमान से असन्तोष ही सबल भविष्य का आधार है । सत्य तो यह है कि भारतीय दर्शनों ने संसार को रहने के अयोग्य और दुःखमय ही नहीं समझा है अपितु इससे आगे वे कहते हैं कि संसार में दुःख है और व्यक्ति दुःखरहित, इससे अच्छी स्थिति पा सकता है ।" भारतीय दर्शन दुःखों के कारण, उन्हें दूर करने के उपाय एवं आनन्द प्राप्ति के मार्ग भी बताता है । इसीलिए सांख्य दर्शन विचारशास्त्र की प्रवृति का एकमात्र कारण, दुःख की आत्यन्तिक निवृत्ति के उपाय खोजना स्वीकार करता है । संसार को दुःखमय बताने का अभिप्रायः वर्तमान जीवन के प्रति असन्तोष की अभिव्यक्ति है और इसमें मानव के सुखद भविष्य का संकेत भी अन्तर्निहित है ।
भारतीय दर्शन दैवी अन्याय को अपने कष्टों का उत्तरदायी नहीं ठहराता, न ही आत्महत्या एवं निष्क्रियता की प्रवृत्ति को प्रेरित करता है । भारतीय मान्यता के अनुसार अपने कष्टों का दोष दैवी शक्ति पर लगाकर आत्महत्या कर एवं निष्क्रिय रहकर दुःखों से कभी छुटकारा नहीं मिल सकता है क्योंकि कष्ट एवं समस्याएं इस जीवन में ही नहीं अगले जन्मों में भी आती रहेंगी ।' अतः इनकी जड़ काटना के उत्तरदायी प्राणी स्वयं हैं और निष्क्रिय रहना जीवों के प्रतिक्षण मानसिक, वाचिक और कायिक – कुछ न कुछ चेष्टा पुनः दुखों और जन्म-मरण के चक्कर में फंसाती है ।
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आवश्यक है । अपने दुःखों
लिए असम्भव है ।" हम
करते रहते हैं, आत्महत्या
मानव जीवन के अन्तिम उद्देश्य के विषय में भारतीय दर्शन पूर्णतः आशावादी है । दुःखों एवं जन्म-मृत्यु के कष्टों से सदा के लिए छुटकारा पाकर सदैव के लिए एक आनन्दपूर्ण अपने आत्मा में स्थित, सुखद और दिव्य जीवन की प्राप्ति ही मोक्ष है ।' ज्ञान से उत्पन्न होने वाली ऐसी सर्वोत्कृष्ट स्थिति को पाना भारतीय अध्यात्मवाद का लक्ष्य है । इसे निराशावादी नहीं अपितु यथार्थवादी दृष्टिकोण ही कहा जा सकता है । शारीरिक दुःखों को शरीर से हटाना कठिन है किन्तु ये आत्मा को प्रभावित करना छोड़
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देते हैं । सांसारिक वस्तुओं एवं सम्बन्धों के प्रति मोह, राग, लोभ, क्रोध, ईर्ष्यादि से रहित होने पर मानसिक दुःख भी नहीं रहते हैं क्योंकि इच्छाओं और कामनाओं से ही अनर्थकारी भावनाएं उदित होती हैं । अतः दु:खों का मूल रागादि ही हैं । स्पर्श, रसना, घ्राण, चक्षु और श्रोत्र की इन्द्रियों के वशीभूत होकर क्रमशः हाथी, मछली, भ्रमर, पतंगा और हिरण मौत के मुंह में समा जाते हैं। जब एक इन्द्रिय के विषयों में आसक्ति मृत्यु का कारण बनती है तो पंचेन्द्रियों के विषयों के सेवन में आसक्त मनुष्य की क्या गति होगी ? विषयों का उपभोग मर्यादा के अन्दर ही उचित भी होता है । अत्यधिक विषयोपभोग शारीरिक और मानसिक रोगों, नैतिकपतन, आर्थिक और सामाजिक हानि को निमन्त्रण देना है। भोगासक्ति अन्ततः यंत्रणादायी ही होती है । भोगों में आसक्ति का निषेध है, भोग का नहीं । यहां त्याग-भावना बलवती है। भारतीय दर्शनों ने त्यागभाव अथवा निष्काम भाव से विषय-भोग का उपदेश दिया है।" गृहस्थों के लिए भोग निषिद्ध नहीं हैं अपितु मर्यादा के अनुकूल एवं निष्काम-भाव से भोग का आदेश दिया गया है । किसी दार्शनिक ने यह नहीं कहा है कि व्यक्ति अपने परिवार, कार्य और उत्तरदायित्वों को निस्सहाय छोड़कर साधु बन जाए, ज्ञान-प्राप्ति करे। व्यक्ति को धर्म और अर्थ के साथ विषय-भोग करते हुए मोक्ष की ओर अग्रसर होना है.---"धर्मार्थकामाः सममेव सेव्याः यस्त्वेकसक्तः स नरो जघन्यः ।
अतः इन्द्रिय दमन का अभिप्रायः विषयों का त्याग नहीं है, अपितु विषयों के मूल में सन्नद्ध रागात्मक भावों को समाप्त करना है । विषयों में अत्यासक्ति से निवृत्ति, जीवन को नैराश्यपूर्ण न बनाकर भूमा सुख की ओर प्रवृत्त करती है । परम तत्त्व ही भूमा है-“यो वै भूमा तत् सुखम्, नाल्पे सुखमस्ति ।........यो वै तदमृतम्, अथ यदल्पं तन्मय॑म् ।"--छान्दोग्योपनिषद्, ८।२२.
___ भारतीय दर्शन सुख-दुःख, जय-पराजय, शीत-उष्ण इत्यादि द्वन्द्वों एवं परीषहों को समभाव वे सहने का परामर्श देते हैं। इसका उद्देश्य व्यक्ति को कायर बनाना नहीं है । अनुकूल एवं प्रतिकूल-दोनों परिस्थितियों में तटस्थ रहने का तात्पर्य है कि व्यक्ति हताश होकर जीवन-संघर्ष में न टूटे एवं निःस्पृह भाव से परिस्थिति को अनुकूल बनाए । रागद्वेष-क्रोधादि से अप्रभावित रहकर पारिवारिक और सामाजिक दायित्वों को पूर्ण करे। विपरीत परिस्थितितों में भी अपना मनोबल बनाए रखे। सुख की दशा में अत्यधिक प्रसन्न हो उठने वाला व्यक्ति कष्टमय दशा में उतनी ही तेजी से निराश भी हो जाता है। अतः ऐसे उपदेश मानव को पलायनवादी न बनाकर उसे मनोवैज्ञानिक समस्याओं का ग्रास बनने से रोकते हैं।
वर्तमान परिस्थितियों के प्रति असन्तोष और दैनिक घटनाओं से निराशा विचारशास्त्र की उद्गम भूमि मानी जाती है। सर्वानुभूत तथ्य है कि सुखद परिस्थितयां व्यक्ति की वैचारिक शक्ति को अधिक तीव्र गति से नहीं बढ़ा पाती हैं । मानव-स्वभाव विश्लेषण करने से ज्ञात होता है कि मानव-स्वभाव से आशावादी होता है । आत्मा का आनन्दमय रूप कभी नष्ट नहीं होता है जिसके कारण अत्यधिक कष्टप्रद परिस्थिति में भी व्यक्ति सुखद भविष्य की आशा रखता है और दुःख में भी हंस सकता है। उसके जीवन और विचार के गगन पर पल भर के लिए भले ही निराशा के बादल छा जाएं
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किन्तु आशावाद की नैसर्गिक प्रवृत्ति इन बादलों को दूर कर देती है।
__ भारतीय संस्कृति में निराशावाद के अभाव का साहित्यिक प्रमाण भी है । संस्कृत साहित्य में दुःखान्त नाटक नगण्य हैं । इसका उद्देश्य मनुष्य मात्र के हृदय में आशा का संचार करना और आनन्द की उत्पत्ति करना है । इसीलिए संस्कृत साहित्य में दुःखमय अन्त दिखाना अच्छा नहीं माना गया है । अतः निराधार ही भारतीय दर्शन को जीवन का निषेधक कहना उचित नहीं है।
भारतीय दार्शनिकों ने अविद्या को दुःख का मूल माना है । दुःख विज्ञान (विशिष्ट ज्ञान, विद्या अथवा तत्त्वज्ञान) से ही दूर हो सकते हैं । जैन, बौद्ध, सांख्य, न्याय, वैशेषिक आदि सभी दर्शनों का उद्देश्य दुःखों की आत्यन्तिक निवृत्ति कर अपवर्ग, मोक्ष, कैवल्य अथवा निर्वाण पाना है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य एवं अपरिग्रह का यथाशक्ति अथवा पूर्ण पालन, तत्त्वज्ञान, विभिन्न साधनाएं निर्मल भक्ति आदि व्यक्ति को नैतिक उच्चता एवं आत्मोन्नति के मार्ग पर ले जाती हैं। आत्मानुभूति होने पर सांसारिक वस्तुओं की लालसा नहीं रहती और व्यक्ति के आकर्षण के केन्द्र बदल जाते हैं । दासगुप्ता भारतीय आध्यात्मवाद के सार को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि "दुःख हमें नहीं डरा सकते हैं यदि हम याद रखें कि यथार्थत: हम दु:खरहित हैं। निराशावादी दृष्टिकोण, अपने आत्मा में आशावादी विश्वास, भाग्य और मोक्ष के लक्ष्य पर समाप्त होने से, सारे भय को दूर कर देता है ।"१७ भारतीय दर्शन का दुःखवाद, आशावाद में समाप्त होता
स्पष्ट हैं कि भारतीय दर्शनों द्वारा प्रतिपादित मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति को किसी ने आत्महत्या, दूसरों का अनिष्ट एवं दुष्कर्म करते हुए नहीं सुना होगा क्योंकि भारतीय दर्शन और धर्म ऐसी प्रवृत्ति को जघन्य मानता है। यह मानव को आत्मिक, मानसिक उन्नति करने, तार्किक शक्ति बढ़ाने और मर्यादाशील बनने की प्रेरणा देता है । भारतीय दर्शन इस अर्थ में निराशावादी या दुःखवादी महीं है, जैसा कि कुछ लोग समझ बैठे हैं। संसार को दुःखमूलक मानने का तात्पर्य मुख्यतः संसार के प्रति अनासक्ति की भूमि को मजबूत करना है न कि लोगों को हताश करना । भारतीय दर्शन मानसिक कौतूहल ही नहीं हटाता है अपितु दुःख की सत्ता, कारण एवं निवृत्ति के उपायों को बताने के साथ ही राग-द्वेष दु:खादि रहित दिव्य जीवन की प्राप्ति को अन्तिम लक्ष्य बनाकर अपनी व्यावहारिक बुद्धि का स्पष्ट परिचय देता है।
कर्मवाद के पोषक भारतीय दर्शन पर अकर्मण्यता का आरोप सर्वथा असंगत है। भारतीय आध्यात्मवादी एकमत हैं कि कार्यकारणवाद प्रकृति का नियम है । अच्छे कार्यका परिणाम अच्छा और बुरे कार्य का परिणाम बुरा होता है । अपने सुख-दुःख, उन्नति एवं अवनति का उत्तरदायी व्यक्ति रवयं है, अपने कार्यों का परिणाम व्यक्ति को स्वयं भोगना होता है । " कर्म कैसे त्याज्य हो सकता है जबकि वह जीवन के स्पन्दन को अभिव्यक्त करता है । भारतीय दर्शनों ने निष्क्रिय रहने के लिए नहीं कहा है और न ही हाथ पर हाथ धरे बैठने की प्रेरणा दी है । गीता (२/४७) में स्पष्ट कहा गया है-"मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ।" भारतीय दर्शन निष्काम (फल प्राप्ति की चिंता किए बिना) कर्म करने की प्रेरणा देता है । निष्काम कर्म का अर्थ- कर्मत्याग नहीं है अपितु फल की चिन्ता किए
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बिना अपना कर्त्तव्य पूर्ण करना हैं। परपीड़क चेष्टाएं, अशुभ संकल्प, रागद्वेष स्वार्थादि से रहित होकर निष्ठापूर्वक अपना कार्य करना है। वस्तुत: मन के भाव ही कर्म की ओर प्रेरित करते हैं और शुभ भाव एवं कर्म करने से उन्नति ही होगी। इसलिए शुभ संकल्प वाले, सर्वहितकारी एवं किसी का अनिष्ट न करने वाले कार्य करणीय हैं जो शुभफलदायी होते हैं । फलासक्ति से रहित कर्म बन्धन उत्पन्न नहीं करते। जीवनाधार होने से कर्मचक्र से दूर रहना किसी प्राणि के लिए सम्भव नहीं है । प्राणी को कर्म त्याग नहीं करना है अपितु कर्मफल में आसक्ति और कर्तृत्वाभिमान का त्याग करना है । अशुभ भावनाओं का त्याग करना है ।" कर्मवाद की ऐसी सुन्दर व्याख्या करने वाले भारतीय दर्शन पर अकर्मण्यता का आरोप सतही ज्ञान का बोधक है। अद्वैत-वेदान्त जगत् के मिथ्यात्व के सिद्धान्त पर सूक्ष्म विचार करने की आवश्यकता है । वस्तुतः ब्रह्म के पारमार्थिक रूप के साथ तुलना करने पर जगत् असत्य है । व्यावहारिक दशा में संसार सर्वथा सत्य माना गया है । तत्त्वज्ञों एवं ज्ञानियों को ही जगत् के मिथ्यात्व की अनुभूति होती है, सामान्य प्राणियों को नहीं । व्यवहार के लिए उत्पत्ति, भोग और मरण वाले संसार की सत्यता को कौन अस्वीकार कर सकता है ? अद्वैत वेदान्त ने जगत् को असत्य मानकर कर्मत्याग करने की प्रेरणा नहीं दी है। ___भारतीय दर्शन पर अप्रगतिशीलता का आरोप लगाने वालों का कहना है कि भारतीय दर्शन जगत्, आत्मा, ईश्वरादि तत्वों की विवेचना करता रहता है । जिनके विषय में दार्शनिकों का मतैक्य नहीं है और न ही किसी निर्णायक सीमा पर पहुंचा जा सका है । गीता और उपनिषदों पर विचारों का आधारित होना अप्रगतिशीलता का द्योतक नहीं कहा जा सकता है। इस भौतिकता प्रधान युग में जीवन के आधार रूप विचार करना भले ही कुछ लोगों को व्यर्थ लगता हो किन्तु आत्मा, जगत्, ईश्वरादि तत्त्वों की गहनता कभी न कभी बिचारशील चित्त को अवश्य ही उद्वेलित करती है। हमारे शरीर के अन्दर कौन-सा ऐसा तत्त्व है जो सोचता है, बोलता है, अनुभव करता है ? सारे शरीर को सजीव बनाए हैं । मृत्यु क्या है ? शरीरादि का या उस चेतन तत्त्व का अन्त अथवा दोनों का वियोग । शरीरादि तो यहीं रहते हैं तो फिर वे अचेतन क्यों हो जाते हैं ? चेतन तत्त्व कहां चला जाता है ? चेतन तत्त्व की नित्यता, अनित्यता, संसार की सुव्यवस्था, मोह, अहं, राग-द्वेषादि, मृत्यु को अनिवार्य जानते हुए भी जीवन से मोह, दुःख, सुख, जीवों एवं संसार का रचयिता और नियन्ता ईश्वर नामक कोई तत्त्व
या नहीं, अनेक प्रकार की अलौकिक घटनाएं इत्यादि प्रश्न ही प्रश्न हैं। श्मशान से वैराग्य अथवा क्षणिक वैराग्य होता है किन्तु फिर वहीं सांसारिक क्रिया-कलाप चलने लगते हैं । इन अनबूझे प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयास दर्शन ने किया है । जिन सच्चाईयों को दर्शन जगत् उद्घाटित करता है वे नित्य और शाश्वत हैं । ये कभी पुराने नहीं पड़ेंगे।
इस युग में भी मानव मन इन पर विचार करता है। प्राचीन काल के समान तीव्र गति से, प्रगति के अभाव में भी भारतीय दर्शन पर्याप्त प्रगति कर रहा है । आत्मादि का विभिन्न दृष्टियों से विवेचन करने में भारतीय दर्शन ने पर्याप्त मौलिकता दिखायी है। टीकाकारों ने भी अपने स्वतंत्र विचारों को प्रकट किया है । दर्शन शाश्वत सत्यों के
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विषय में एक वैचारिक प्रवाह है और भारतीय दर्शन बौद्ध, जैन, न्याय, सांख्य, वेदान्त, व्याकरणादि अनेक धाराओं के रूप में प्रवाहित होता रहा है । वैज्ञानिक उन्नति होने से इनमें कोई परिवर्तन नहीं आया है । गीता और उपनिषदादि मानव को पूर्ववत् प्रभावित करते रहे हैं। भारतीय दर्शन ने जीवन के नवीन विषयों की विवेचना करने में भी कभी असमर्थता नहीं जतायी है।
संदर्भ १. (क) The six systems of Indian philosophy, Max muller,
p. 106
(ख) A History of Indian philosophy, Das Gupta, V.I p.75
(ग) भारतीय दर्शन, बलदेव उपाध्याय, पृ० ५३६-५४० २. द्रष्टव्य-दीर्घनिकाय, मज्झिम निकाय ३. (क) व्यास भाष्य, २०१५
(ख) न्याय-सूत्र' १३१२२१ ४. सांख्यकारिका-१ ५. योगसूत्र २॥३, और १५ ६. (क) वही, २।४ (ख) Yoga and personality, k.s, Joshi, P.31
(ग) आचारांगनियुक्ति, १८६ (घ) बृहदारण्यक भाष्य, वार्तिक, १८१
(ड) नैष्कर्म्य सिद्धि, २०६६ (च) न्याय-सूत्र, ११११२ परभाष्य ७. Dr. Radhakrishnan (Quoted in) Indian philosophy,
Vatsyayan, P-8 5. Outlines of Indian philosophy, M. Hiriyanna, P.16 ६. भारतीय दर्शन, उमेश मिश्र, पृ० १२ १०. A History of Indian philosophy, DasGupta, V.J, P.76 ११. (क) गीता, ३।५ (ख) तत्त्ववैशारदी, पृ० १४१' (आनन्दाश्रम संस्करण) १२. (क) न्यायसूत्र, १११।२२, ४।२।३८-४६ (भाष्य सहित) (ख) सांख्यकारिका
६४ (ग) न्यायमञ्जरी, पृ० ७७ (घ) योगसूत्र, ३१३४ (ड) तत्त्वार्थ सूत्र,
१०।२-३ १३. (क) कठोपनिषद्, २।३।१४ (ख) गीता, २१४७ (ग) योगवार्तिक, पृ० १४० १४. (क) उत्तराध्ययन, ३२।११ (ख) योगसूत्र, २।४८ (ग) गीता, १४०२१-२७,
४।२२,१२।१३ (घ) मनुस्मृति, ६१८०-८१ चौ० वाराणसी संस्करण १४. संस्कृत नाटककार, क्रान्ति किशोर भरतिया, पृ० ३, नाट्य संस्कृति सुधा, रमेश
चंद्र शुक्ल, पृ० ४८ १६. कलुषित भावों, विचारों एवं आसक्ति से सदा के लिए मुक्त होना ही मुक्ति का
वास्तविक अर्थ है। १७. A History of Indian philosophy, V.I. P.77 १८. CT. The mysteries of karma, revealed by a Brahmin yogee,
Allahabad, 1898 १६. (क) गीता, २७१ (ख) प्रशस्तपाद भाष्य, पृ० १३६, किरणावली भास्कर,
पृ० २१ २०. (क) गीता, ६।२०,१८८ (ख) मुक्तिकोपनिषद्, २।५।६ (ग) यथाकामो
भवंति त ऋतुर्भवति, तत्कर्म कुरुते ।--वृहदारण्यकोपनिषद्, ४।४।५ २१. ब्रह्मसूत्र २।१।१४ पर शांकरभाष्य
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बुद्ध-महावीर को ज्येष्ठता/कनिष्ठता के संदर्भ में
वर्षाऽऽवास का इतिहास
पण्डित चन्द्रकान्त बाली
['नए अनुसंधान' और 'इतिहास सम्मत कालान्तराल'-इन दो अवलंबों के सहारे लेखक ने अजातशत्रु के शासनकाल में भगवान् महावीर और महात्मा बुद्ध के राजगृह-वर्षावास पर शंका उठाई है।
अपनी बात को उन्होंने लम्बी गणना के द्वारा परन्तु बिना कोई ठोस आधार बताए अपने नए अनुसंधान (महावीर जन्म १२६८ ईसवी पूर्व) के आंकड़ों से मान्य करने का आग्रह भी किया है। इस आग्रह से सहमत होना कठिन है किन्तु भगवान् महावीर और महात्मा बुद्ध के निर्वाण में २२ वर्ष का अन्तराळ खोज निकालना सही जान पड़ता है। वायुपुराण, मत्स्यपुराण, भागवत और कथा सरित्सागर आदि में चंड प्रद्योत का शासनकाल २३ वर्ष दिया है। जैन-परंपरा में प्रद्योत-पुत्र पालक का अभिषेक और महावीरनिर्वाण एक ही दिन होने के उल्लेख मिलते हैं और तिब्बती-परंपरा में प्रद्योत का राज्यारोहण और गौतमबुद्ध को संबोधि भी एक ही दिन होना मान्य है, इसलिए महावीर-निर्वाण और बुद्ध-निर्वाण में २३ वर्षीय अन्तर सही हो सकता है।
एक स्थान पर उन्होंने लिखा है-'वायु पुराण और अन्य विविध पुराणों के अनुसार १२२० ईसवी पूर्व बिम्बसार का निधन हुआ और अजात शत्रु का अभिषेक हुआ'--यह कथन अथवा इस प्रकार के नतीजे निःसंदेह भयावह हैं। फिर भी तथ्य-अन्वेषण के प्रचोदन हेतु प्रस्तुत विचार मुद्रित किए जा रहे हैं।
-संपादक] राजतरंगिणी के गंभीर अध्ययन से ज्ञात होता है कि उसके प्रणेता कल्हण पंडित ने महावीर स्वामी तथा महात्मा बुद्ध के दरम्यान उत्पन्न ज्येष्ठता/कनिष्ठता के विवाद का समाधान दो पीढ़ियों में संभाव्य और इतिहास-सम्मत कालान्तराल में खोजा है । अर्थात् दो पीढ़ियों की दूरी जितने वर्षों के लिए मान्य हो सकती है, उतनी ही दूरी के हिसाब ने इन युगपुरुषों की ज्येष्ठता/कनिष्ठता विचारणीय है । हम राजतरंगिणी में पढ़ते हैं कि गोनन्दवंशी राजा अशोक जनधर्मावलम्बी था, और उसके आत्मज (जलौक) की आस्थाएं बौद्धधर्म में केन्द्रित थीं। इन दो पीढ़ियों का दरम्यानी गणित महावीर स्वामी को ज्येष्ठता प्रदान करता है और महात्मा बुद्ध को कनिष्ठता। खण्ड १७, अंक ३ (अक्टूबर-दिसम्बर, ६१)
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नए अनुसंधान के अनुसार महावीरस्वामी का जन्म १२६८ ई० पूर्व का है तथा महात्मा बुद्ध का जन्म १२७६ ईसवी पूर्व का है । वही २२ वर्षों की ज्येष्ठता/कनिष्ठता की विज्ञप्ति दो पीढ़ियों के अन्तराल काल के अनुरूप है। यह उपलब्धि मागध वंश के दो राजाओं (अर्थात् दो पीढ़ियों) के साथ जुड़ी होने से वह राजगृह की उपलब्धि भी है । सभी इतिहासविद् जानते हैं कि महावीर स्वामी मगध-नरेश बिम्बसार के समकालीन रहे हैं । यही समकालिकता महात्मा बुद्ध और अजातशत्रु को भी साथ-साथ रखती है । बात दो पीढ़ियों की है। वायुपुराण तथा अन्य विविध पुराणों के अनुसार १२२० ईसवी पूर्व में बिम्बसार का निधन हुआ और अजातशत्रु का अभिषेक हुआ। साफ-साफ कहा जाय तो यही १२२० ई० पूर्वका इतिहास-विभाजन महावीर-युग और बुद्धयुग की विभाजक-रेखा है।
पुराणशास्त्र, जैनशास्त्र, महावंश और राजतरंगिणी के समवेत चिन्तन से पूर्वोक्त सभी महापुरुषों की समय-सारिणी इस प्रकार क्रमबद्ध होती हैमहावीर स्वामी महात्मा बुद्ध
विम्बसार अजात० जन्म = १२९८ ई० पूर्व १२७६ ई० पूर्व बिम्बसार-शासन दीक्षा/बोधिलाभ = १२५६ ई० पूर्व १२४१ ई० पूर्व १२२० ई० पूर्व/सत्ता परि० परम निर्वाण = १२२७ ई० पूर्व १२११ ई० पूर्व ११६६ ई० पूर्व/निधन
यह सारिणी कितनी आप्त है ? कितनी अनाप्त है ? इसका निर्णय महावीर स्वामी तथा महात्मा बुद्ध के वर्ष-प्रतिवर्ष संभूत वर्षाऽऽवास के श्रृंखला बद्ध इतिहास के अवलोकन से हो जाएगा । यथामहावीर स्वामी ईसवी पूर्व
महात्मा बुद्ध का साल महावीर स्वामी जन्म
१२९८ १२७६
महात्मा बुद्ध का जन्म महावीर स्वामी की दीक्षा १२६८ महावीर स्वामी का प्रथम वर्षा- १२५६ महात्मा बुद्ध का गृह त्याग प्रथम वर्षावास : राजगृह
वास (ऋषिपतन) (२) वैशाली १२५५
राजगृह (२) (३) वाणिज्यग्राम १२५४
राजगृह (३) (४) राजगृह १२५३
राजगृह (४) (५) वाणिज्यग्राम १२५२
वैशाली (५) (६) राजगृह १२५१
संवुल पर्वत (६) (७) राजगृह १२५०
त्रयस्त्रिंश (७) (८) वैशाली
१२४६
सुंसुंमार गिरि (6) (E) वैशाली १२४८
कौशाम्बी (8) (१०) राजगृह
१२४७
पारिलेयक (१०) (११) वाणिज्यग्राम १२४६
नाला (११) १५२
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(१२) राजगृह १२४५
वरंजा (१२) (१३) राजगृह
१२४४
कालिय पर्वत (१३) (१४) मिथिला १२४३
श्रावस्ती (१४) (१५) मिथिला १२४२
कपिलवत्तु (१५) (१६) वाणिज्यग्राम १२४१
आलवि (१६) (१७) राजगृह १२४०
राजगृह (१७) (१८) वाणिज्यग्राम
१२३६
कालिय पर्वत (१८) (१६) वैशाली
१२३८
कालियपर्वत (१९) (२०) वैशाली १२३७
राजगृह (२०) (२१) राजगृह १२३६
श्रावस्ती (२१) (२२) नालन्दा १२३५
श्रावस्ती (२२) (२३) वैशाली १२३४
श्रावस्ती (२३) (२४) वैशाली १२३३
श्रावस्ती (२४) (२५) राजगृह १२३२
श्रावस्ती (२५) (२६) नालन्दा १२३१
श्रावस्ती (२६) (२७) मिथिला
१२३०
श्रावस्ती (२७) (२६) मिथिला
१२२६
श्रावस्ती (२८) (२६) राजगृह १२२८
श्रावस्ती (२६) १२२७
श्रावस्ती (३०) १२२६
श्रावस्ती (३१) १२२५
श्रावस्ती (३२) १२२४
श्रावस्ती (३३) १२२३
श्रावस्ती (३४) १२२२
श्रावस्ती (३५) १२२१
श्रावस्ती (३६) १३२० श्रावस्ती (३७) अजातशत्रुका अभिषेक १२१६
श्रावस्ती (३८) १२१८
श्रावस्ती (३६) १२१७
श्रावस्ती (४०) १२१६
श्रावस्ती (४१) १२१५
श्रावस्ती (४२)
श्रावस्ती (४३) १२१३
श्रावस्ती (४४) १२१२
श्रावस्ती (४५) १२११
वैशाली (४६) संदर्भ:-'तुलसी प्रज्ञा' १७/२, जुलाई-सितम्बर१९६१, इंगलिश सेक्सन -पृष्ठ-३२ र १७, अंक ३ (अक्टूबर-दिसम्बर, ६१)
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विमर्श-परामर्श पूर्वोक्त 'सारिणी' में आपत्ति योग्य कई बाते हैं । इनका समाधान खोजना जरूरी है। (१) हमने महावीर स्वामी और महात्मा बुद्ध में ज्येष्ठता/कनिष्ठता के लिए जो आधार चुना है, उसमें आपत्ति-आशंका की गुंजायश 'नहीं' के बराबर है । यह आधार (दो पीढ़ी-योग्य वर्ष) ठोस और इतिहास-सम्मत है । इस गणित से महावीर स्वामी का जन्म १२६८ ई० पू० में तथा महात्माबुद्ध का जन्म १२७६ ई० पू० में होना अपरिवर्तनीय है । (२) दोनों युगपुरुषों का निर्वाणसमय निश्चित है। (क) हमने ६२२-ईसवी पूर्व का शककाल खोज निकाला है। उससे ६०५ वर्ष प्राक्-जैसा कि जैनग्रन्थों से ज्ञात होता है-अर्थात् ६२२+६०५= १२२७ ईसवी पूर्व में महावीर स्वामी का निर्वाण मान लेना चाहिए। (ख) अजातशत्रु के अभिषेक काल से-जैसा कि पुराणों में निश्चित तौर पर १२२०-१६ ईसवी पूर्व निश्चित है-आठ वर्ष पश्चात्, अर्थात् १२१६-८= १२११ ईसवी पूर्व में महात्मा बुद्ध का निर्वाण भी मानने योग्य है।
(३) जन्म और निर्वाण की रेखाओं में आबद्ध दोनों युगपुरुषों का वयोमान इस इस ढंग से विचारणीय है
१. महावीर स्वामी : १२६८-७१ वर्ष= १२२७ ई० पूर्व तक । २. महात्मा बुद्ध : १२७६ -६५ वर्ष-१२११ ई० पूर्व तक ॥
(४) इस प्रकार महात्मा बुद्ध और महावीर स्वामी का संशोधित वर्षावासीय कार्यक्रम इस प्रकार होगा:(६) बैशाली १२४८
ऋषिपत्तन (१) (१०) राजगृह
राजगृह (२) (११) वाणिज्य ग्राम १२४६
राजगृह (३) (१२) राजगृह १२४५
राजगृह (४) (१३) राजगृह
वैशाली (५) (१४) मिथिला
१२४३
संकुल पर्वत (६) (१५) मिथिला १२४२
त्रयस्त्रिशं (७) (१६) वाणिज्यग्राम
१२४१
सुंसुंमार गिरि (८) (१७) राजगृह १२४०
कौशाम्बी (8) (१८) वाणिज्यग्राम
१२३६
पारिलेयक (१०) (१६) वैशाली १२३८
नाला (११) (२०) वैशाली १२३७
वरंजा (१२) (२१) राजगृह
१२३६
कालिय पर्वत १३ (२२) नालन्दा १२३५
श्रावस्ती (१४) (२३) वैशाली
१२३४
कपिलवस्तु (१५) (२४) वैशाली १२३३
आलणि (१६) (२५) राजगृह
१२३२
राजगृह (१७)
तुलसी प्रशा
१२४७
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(२६) नालन्दा (२७) मिथिला (२८) मिथिला (२६) मिथिला (३०) पावा
१२३१ १२३० १२२६ १२२८ १२२७ १२२६
कालिय पर्वत (१८) कालिय पर्वत (१६)
राजगृह (२०) श्रावस्ती (२१) श्रावस्ती (२२) श्रावस्ती (२३)
१२११
श्रावस्ती (३८) इस शृंखला में आठ वर्षावासों की कटौती हो जाएगी जो २१ से ३८ श्रावस्ती के वर्षावास में कम किए जा सकते हैं ।
(५) जहां तक 'राजगह' में दोनों युगपुरुषों के अनुसंगिक सह-वर्षावास का जिक्र है, दोनों में समानता है । अर्थात् केवल दो बार 'राजगृह' में दोनों ने वर्षावास बिताया। यथापरम्परागत
संशोधित प्रथम वर्षावास १२५३ ई० पूर्व प्रथम वर्षावास १२४५ ई० पूर्व; द्वितीय वर्षावास १२४० ई० पूर्व; द्वितीय वर्षावास १२३२ ई० पूर्व ।
आश्चर्य का विषय है-यदि परम्परा को सामने रखें तब "राजगह' में व्यतीत वर्षावासों में १४ वर्षों का व्यवधान है और यही स्थिति संशोधित वर्षावासीय इतिहास की भी है । सत्य उभयत्र सुरक्षित है ।
(६) राजगृह में सम्पन्न महावीर स्वामी के वर्षावास में अथवा राजगृह में हुए महात्मा बुद्ध के वर्षावास में जहां तक अजातशत्रु की भूमिका का प्रश्न है; वह सर्वथा विश्वसनीय नहीं है। कारण, अजातशत्रु का अभिषेक १२२० ई० पूर्व में हुआ था। महावीर स्वामी के १२५३ अथवा १२४० ई० पूर्व में [संशोधित १२४५/१२३२ ई० पूर्व] सह-वर्षावास में सम्राट् अजातशत्रु की उपस्थिति अविचारणीय है । अलबत्ता राजकुमार अजातशत्रु की चर्चा संभव है । बिम्बसार ने अनुमानत: ६० वर्ष राज्य किया था : १३१० ईसवी पूर्व में १२२० ईसवी पूर्व तक। यदि अजातशत्रु का जन्म १२७० ई० पूर्व [अनुमानत:] मान लें तो संशोधित वर्षावासीय इतिहास में राजकुमार अजातशत्रु की भूमिका स्वीकार्य हो सकती है। परन्तु परम्परागत वर्षावासीय इतिहास में केवल एक बार [१२४० ई० पूर्व] अजातशत्रु उपस्थित रहा होगा?
उपसंहार डॉ० परमेश्वर सोलंकी ने जिस संक्षिप्त शैली से महावीर स्वामी तथा महात्मा बुद्ध के वर्षावास क्रम को रेखांकित किया है, वह आप्त सूत्रों पर आधृत है, पर हम उनके इस निष्कर्ष से सहमत नहीं है । महात्मा बुद्ध की २७ वर्षीय वरिष्ठता न तो पुराण शास्त्रों से अनुप्राणित है, और न ही 'राजतरंगिणी' से अनुमोदित है । विद्वद्वर विजयेन्द्र
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सूरि के अनुसंधान - निष्कर्ष अवहेलनीय नहीं हैं, जबकि 'अंगुत्तरनिकाय' पर सहसा भरोसा नहीं किया जा सकता । श्रावस्ती में हुए २४ अथवा १६ वर्षावासों का नैरन्तर्य ही सबसे बड़ा सबूत है कि यहां [ श्रावस्ती ] पहुंचकर कुछ गड़बड़ हुई है - यह अलग शोध का विषय बन गया है ।
हमने कभी अनुमान का आश्रय लेते हुए महावीर और बुद्ध का एक स्थानीय वर्षावास १२४३ ई० पूर्व का लिखा था ।' डॉ० सोलंकी के उक्त संक्षिप्त नोट ने उसमें जान फूंक दी है । यदि अंगुत्तरनिकाय के पारम्परिक वर्षावासीय क्रम को देखें, तो १२४० ई० पूर्व का समय आता है । यदि संशोधित वर्षावास कमावली को देखें, तो १२४५ ई० पू० का समय आता है । फिर हम पूछते हैं- महावीर और बुद्ध के एक स्थानीय वर्षावास के लिए १२४३ ई० पू० का अनुमान गलत क्यों है ?
संदर्भ
१. शोध पत्रिका, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् पटना वर्ष २६ / १ १९८६ ईसवी । पृष्ठ ३१/ पंक्ति ७.
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सामञ्ञफलसुत्त में अजातशत्रु संबंधी उल्लेख
"एवं बुत्ते, राजा मागधो अजातसत्तु वेदेहिपुत्त भगवन्तं एतदोवाचअभिक्कन्तं, भन्ते, अभिक्कन्तं, भन्ते ! सेय्यथापि, भन्ते, निक्कुज्जितं वा उक्कुज्जेय्य, पटिच्छन्नं वा विवरेय्य, मूल्हस्स वा मग्गं आचिक्खेय्य, अन्धकारे वा तेल पज्जोतं धारेय्य चक्खुमन्तो रूपानि दक्खन्ती ति, एवमेवं, भन्ते, भगवता अनेक परियायेन धम्मो पकासितो । एसाहं, भन्ते, भगवन्तं सरणं गच्छामि धम्मं च भिक्खुसङ्घ च । उपासकं मं भगवा धारेतु अज्जतग्गे पाणुपेतं सरणं गतं ।
सामञ्ञफल सुत्तं निट्ठितं दुतियं दीघनिकाय ( २.६.१०१) पृ० ७४
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- ( नालन्दा- देवनागरी संस्करण, १९५८ )
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सामान्य प्राकृत भाषा में मध्यवर्ती त-द
[] डॉ० के० आर० चन्द्र
सामान्य प्राकृत भाषा के अन्तर्गत वररुचि के 'प्राकृत प्रकाश' (E.B. cowell )
में मध्यवर्ती त = द का उल्लेख तीन प्रकार से मिलता है
[१] नियम कोई अन्य है परन्तु उदाहरण के रूप में दिए गए शब्दों में त के स्थान पर द मिलता है ।
[२] कुछ शब्दों में त का द होता है ऐसा नियम दिया गया है ।
[३] विभक्ति और कृदन्त प्रत्ययों में त का द मिलता है परन्तु वर्तमानकाल के --- सि, – ते, आज्ञार्थ - तु, हेत्वर्थक ---तुं और सम्बन्धक भूत् कृदन्त —— तूण के स्थान पर कहीं पर भी उदाहरणों में या नियम में त के स्थान पर द नहीं मिलता है । [१] उदाहरणों में
सूत्र – उदृत्यादिषु १.२९ अर्थात् ऋ का उ होने के उदाहरणों में उद्दू, विउदं, संवदं णिव्वदं (ऋतुः, विवृतम, संवृतम्, निर्वृतम्) ।
सूत्र २-२ - मध्यवर्ती अल्पप्राण व्यंजनों के लोप के उदाहरणों में रअदं (रजतम्) ।
सर्वनामों में - सूत्र - ६.२० – पं० ए० व० की विभक्ति के उदाहरण - एदाहि । सूत्र - ६.२२ – तदेतदोः सः साव नपुंसके —एदे, एवं
सूत्र - ६.२६ - युष्मद् के प्र० ए० व० के उदाहरणों में तं आगदो, तुमं आगदो ।
सूत्र --- ६.३४- युष्मद् के पंचमी एक वचन उदाहरण में-- तुज्झेंहि तुम्हें हि-तुम्मे हिं
।
सूत्र - ६.३५ - युष्मद् के पंचमी ए० व० के उदाहरणों में-तत्तो आगदो, तुमाहि आगदो ।
सूत्र---६.३६ - युष्मद् के पंचमी ब० व० के उदाहरण में— तुम्हासुं तो आगदो । निपात के उदाहरण में
सूत्र - ६.५ पेक्ख इर तेण हदो ।
[२] कुछ शब्दों में त का द होने का नियम :
सूत्र – २.७, ऋत्वादिषु तो दः
उदू, रअदं, आअदो, णिव्वुदी, आउदी, संवृदी, सुइदो, आइदी, हदो, संजदो, विउदं संजादो, संपदि और पडिवद्दी ।
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(ऋतुः, रजतम्, आगतः, निवृत्तिः, आवृत्तिः, संवृतिः, सुकृतिः, आकृतिः, हतः, संयतः, विवृतम्, संयातः संप्रति और प्रतिप्रत्तिः ।)
सूत्र-६.३२-युष्मद् के षष्ठी एकवचन और तृतीया एकवचन का-'ते'- दे' होता
ते धणं; दे धणं; ते क; दे कअं । [३] कृदन्त प्रत्यय और विभक्ति
[अ] सूत्र--४.२२ तल्त्वयोत्तिणी [भाववाचक प्रत्यय दा और तण] वीणदा, मूढदा, पीणत्तणं, मूढत्तणं [ब] सर्वनामों में पंचमी ए० व० की विभक्ति
सूत्र-६.६-त्तो दो इसेः
--कदो, जदो, तदो। सूत्र-६.१०-तद ओश्चः-तत्तो, तदो। सूत्र-६.२०-तो उसे:-एदादो, एदादु । सूत्र-६.३५-ङसौ (तत्तो तइत्तो) तुमादो, सुमादु, (तुमाहि)।
अर्थात् पंचमी एकवचन की विभक्ति-तो के बदले में-दो का और भाववाचक प्रत्यय-ता के बदले में-दा का स्पष्ट उल्लेख है।
पू० आचार्यश्री हेमचन्द्र के प्राकृत-व्याकरण के अनुसार त का द शौरसेनी और मागधी भाषा में ही होता है । सामान्य प्राकृत के लिए वररुचि के सूत्र-२.७ का नियम उन्हें स्वीकृत नहीं था इसीलिए उन्होंने उसका निषेध किया (सूत्र ८.१.२०६) है । वे कहते हैं-ऋत्वादिषु द इत्यारब्धवन्तः स तु शौरसेनी-मागधी-विषय एव दृश्यते इति नोच्यते । प्राकृते हि ऋतुः=रिऊ; उऊ; रजतम् = रययं और जितने भी त=द वाले उदाहरण वररुचि के व्याकरण में मिलते हैं वे त का लोप करके उन्होंने दिए
उनके सूत्र नं० ८.३.८ में सर्वनामों की पं० ए० व० की विभक्ति में-दो औरदु का भी उल्लेख है (इसेस् त्तोदोदुहिहिन्तो लुक:) परन्तु वृत्ति में कह दिया कि 'दकार-करणं भाषान्तरार्थम्' अर्थात् द कार वाली विभक्ति अन्य भाषाओं में प्रयुक्त होती है।
उन्होंने सामान्य प्राकृत में त=द का निषेध किया और अन्य भाषा में ऐसे प्रयोग मिलते हैं वह भी स्पष्ट किया है । फिर भी उन्होंने अपने सूत्रों में त के द वाले प्रयोग क्यों दिए ? उनके बारे में ऐसी ही स्पष्टता क्यों नहीं की? यह स्पष्ट नहीं है । सूत्र नं० ८.१.३७ 'अतो डो विसर्गस्य' के उदाहरण में 'कुत: कुदो' दिया गया है । जबकि त के द का निषेध बहुत बाद में आगे ८.१.२०६ सूत्र की वृत्ति में किया गया है । इसी प्रकार सूत्र नं० ८.२.१६० 'तो दो तसो वा' । प्राकृत भाषा के लिए इस सूत्र की वृत्ति में सव्वदो, एकदो, अन्नदो, कदो, जदो, तदो और इदो के उदाहरण दिए हैं जब कि
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८.१.२०६ में पहले ही निषेध कर दिया गया था कि त का द प्राकृत में नहीं होता है। सूत्र-८.३.७१ किमः कस्त्र-तसोश्च में भी कओ, कत्तो के साथ कदो का भी उदाहरण
त के द का निषेध करते हुए उसी सूत्र [८.१.२०६] की वृत्ति में यह भी कह दिया कि [८.४.४४७ के अनुसार कभी-कभी व्यत्यय भी होता है अर्थात् त का द भी प्राकृत में मिलता है। इसका अर्थ यह हुआ कि त का द नियमित नहीं परन्तु कभी-कभी सामान्य प्राकृत में मिलता है। सूत्र नं० ८.१.१७७ में भी कभी-कभी क का ग और च का ज होना बतलाया गया है और वहां पर भी इन्हें 'व्यत्यय' की कोटि में रखा है। तो क्या इसी सूत्र में त के क्वचित् द होने का उल्लेख नहीं किया जा सकता था ?
भाषा शास्त्र की दृष्टि से यह प्रवृत्ति तो अघोष व्यंजनों के घोष बनने की है जो लोप की प्रवृत्ति से पूर्ववर्ती मानी जाती है । इस पूर्ववर्ती प्रवृत्ति का प्रभाव ही परवर्ती भाषा पर क्वचित् मिलता हो ऐसा प्रतीत होता है ।
क का ग, च का ज और त का द ये सब अघोष बनने की प्रक्रिया है जो महाराष्ट्री प्राकृत के पूर्व की कुछ प्राकृतों की लाक्षणिकताएं हैं। जब शौरसेनी और मागधी में त का द बनने का एक सूत्र ही दे दिया और ८.४.४४७ में 'व्यत्यय' सर्वव्यापी बना दिया गया तो फिर सामान्य प्राकृत में त=द के उल्लेख की क्या आवश्यकता थी
और सामान्य प्राकृत में ही पं० ए० व० के विभक्ति प्रत्यय-दो और दु देने की क्या जरूरत थी । उनका उल्लेख शौरसेनी में ही उचित था जैसा कि उन्होंने उस भाषा में सं० भू० कृ० के लिए इण [८.४..२७१, २७२] व. काल. तृ० पु० ए० व० के प्रत्यय-दि--दे [८.४.२७३, २७४,२७५] का उल्लेख किया है और पंचमी ए० व० की विभक्ति--दो और–दु का भी उल्लेख [८.४.२७६] अलग से किया ही है।
तद वाले इन सूत्रों का सामान्य प्राकृत में समावेश करके क्या उन्होंने एक प्राचीन परम्परा का ही अनुसरण नहीं किया है ? या जिस प्रकार क=ग के प्रयोग अर्धमागधी में अधिक मिलते हैं उसी प्रकार त -द के प्रयोग भी अर्धमागधी में रहे होंगे। अतः सामान्य प्राकृत में क=ग की तरह त-द का भी समावेश [भले ही 'व्यत्यय' के नियम से] कर दिया गया है । अर्धमागधी में त=द के और अघोष के घोष बनने के जो प्रयोग बच पाए हैं वे इस प्रकार दिए जा सकते हैं :
इसिभासियाई ग्रन्थ से : भविदव्वं [३.१] ; पक्खिदा [३८.२३ पाठान्तर] तधेव [२५.१४]; तधा [४५.२६]; कधं [पृ० ५५.५] ; जधा [४०.१०;४५(५)] पृ० ५५.१३, १५, १८; सव्वधा [३५.१२; ३८.२६; ४५.२५] ।
अर्धमागधी आगम साहित्य की प्राचीन प्रतियों में भी ऐसे घोषीकरण के प्रयोग मिलते हैं । पू० जंबूविजयजी ने स्पष्ट कहा है कि मूल सूत्र एवं चूर्णि की प्रतियों में मिल रहे जधा और तधा के स्थान पर जहा और तहा पाठ लिये गए हैं [आचारांग, भूमिकापृ० ४४, म० ज० वि० संस्करण] ।
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पालिभाषा में भी अत्र तत्र ऐसे घोषीकरण के कुछ प्रयोग मिलते है : क-ग-पटिगिच्च (दीघनिकाय, धम्मपद-अट्ठकथा)।
मागन्दि (मज्झिम निकाय, जातकट्ठ कथा)।
गाइगर ने (३८) ये उदाहरण नहीं दिए गए हैं । त=द-निय्यादेति (जातकट्ठ कथा)
पटियादेति (दीघनिकाय) रुदं (जातकट्ठ कथा)
विदत्थि )धम्मपद अट्ठकथा) थ-ध-गधित (ग्रथित)
शिलालेखों में भी ऐसे उदाहरण मिलते हैं-डॉ० मेहेण्डले (पृ० २७३) के अनुसार ई० स० पूर्व तीसरी शती में उत्तर, उत्तर-पश्चिम और दक्षिण में, ई० स० पूर्व दूसरी शती में पूर्व और पश्चिम में और ई० स० पूर्व प्रथम शती में उत्तर-पश्चिम और मध्यक्षेत्र में त-द कभी-कभी मिलता है। उसी प्रकार थ=ध प्रथम बार पूर्व और दक्षिण में ई० स० पूर्व दूसरी शती में और मध्यक्षेत्र में ई० स० पूर्व प्रथम शती में मिलता है। डॉ० आल्सडर्फ के अनुसार तो घोषीकरण की प्रवृत्ति पूर्वी भारत से ही अन्य क्षेत्रों में फैली है।
जहां तक वररुचि का सवाल है उनके बारे में ऐसा कहना ही उचित होगा कि नाटकों में जो प्राकृत भाषा मिलती है उसमें त का द प्रचुर मात्रा में मिलता है अतः उन्होंने त-द को अपनी प्राकृत में भी स्थान दिया होगा।
अतः उपसंहार के रूप में ऐसा कहना अनुचित नहीं होगा कि प्राकृत की प्रारंभिक अथवा प्राचीन अवस्था में अमुक अमुक अघोष व्यंजनों के लिए घोष व्यंजनों का प्रयोग होता था। परंतु पू० हेमचंद्राचार्य ने जब इस प्रवृत्ति का अर्थात् तद का निषेध कर दिया तब प्राचीन प्रतों में मिलने वाले ऐसे तद के प्रयोग प्राचीन प्राकृत में से निकल गए और अर्धमागधी जैसी प्राचीन भाषा में से भी ऐसे प्रयोग निकल गये होंगे ऐसा मानना अनुचित नहीं है । श्रीमती नीति डोल्ची की मान्यता यही है । 40
1. Kleine schriften, p.451 (1974 A.D.) 2, I rather believe that Hemachandra is responsible for normalization of the treatment of intervocalic-t-in posterior mss.-- The prakrit Grammarians, p.159, f.n 4 (1972)
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संयमधारी साधु में लेश्याएं : एक विवेचन
संयमधारी साधुओं में तेजस्, पदम् और शुक्ल ये तीन भाव लेश्याएं प्राप्त होती हैं। कृष्ण, नील और कापोत लेश्याएं नहीं होती। यह भगवती प्रथम शतक प्रथम उद्देशक में कहा गया है किन्तु यह कथन अप्रमत्त संयत संयमधारी साधुओं के लिए है और सभी संयमधारी साधुओं के लिए नहीं कहा जा सकता। ___षष्ठम् गुणस्थानवर्ती प्रमत्त संयत साधु में तो छहों लेश्याएं प्राप्त हो सकती हैं। सिर्फ तेजस्, पदम् और शुक्ल ये तीन शुभ लेश्याएं ही नहीं, कृष्णादि तीनों अशुभ लेश्याएं भी प्राप्त हो सकती हैं । क्योंकि षष्ठम् गुणस्थानवर्ती साधु में प्रमाद विद्यमान रहता है जो कि उस गुणस्थान के नाम "प्रमत्तसंयत" से ही अभिव्यक्त है । वह अनेक बार अनजान में या जान-बूझकर भी प्रमादात्मक प्रवृत्तियां कर लेता है। उसमें क्रोध, मान, माया और लोभ स्वरूप कषाय भी विद्यमान है। वह कषायपूर्ण प्रवृत्तियों से भी सर्वदा मुक्त नहीं होता। उस प्रमत्तसंयत साधु में हिंसा आदि पांच आश्रवों को उभारने वाले अशुभ योग भी विद्यमान हैं। पंचम अंग सूत्र भगवई में इन्हीं अशुभ योगों की अपेक्षा से उसे आत्मारंभी, परारंभी और उभयारंभी बताया गया है तथा शुभ योगों की अपेक्षा से उसे अनारंभी भी बताया गया है। ___जबकि षष्ठम् गुणस्थानवर्ती प्रमत्तसंयत साधु में अशुभ योग का होना स्पष्टतः आगम-सम्मत है, तब भला अशुभ लेश्या उसमें क्यों नहीं हो सकती ? योग जौर लेश्या सहवर्ती है । अशुभ योगात्मक प्रवृत्ति करते समय साधु में लेश्या भी अशुभ होगी। जहां पर जिस समय अशुभ अध्यवसाय, अशुभ परिणाम, अशुभ योग हैं, वहां पर उस समय लेश्या भी अशुभ ही होगी।
विवेचन आगम-प्रमाण को पुरस्सर करके अगर विवेच्य विषय पर चिन्तन करें तो अनेक आगमीय स्थलों में संयमधारी साधु में छ्व लेश्याओं का होना प्रतिपादित है । पंचम अंग सूत्र भगवई में पांच प्रकार के निर्ग्रन्थ बताये गये हैं—पुलाक, बुक्कस, कुशील, निर्ग्रन्थ और स्नातक । उसके बाद पुलाक और बुक्कस के पांच-पांच भेद बताये गये हैं। फिर कुशील, निर्ग्रन्थ के लिए जिज्ञासा की गई तो भगवान् ने बताया-कुशील निर्ग्रन्थ दो प्रकार के होते हैं--प्रति सेवना कुशील और कषायकुशील । फिर निर्ग्रन्थ-स्नातक के भेदोपभेद भी बताए गये हैं ।।
निरूपण के उसी क्रम में लेश्या के संदर्भ में भी प्रश्नावली चली है । गौतम स्वामी ने जिज्ञासा की-प्रभो ! कषायकुशील निर्ग्रन्थता सलेश्यी में प्राप्त होती है या अलेश्यी में ? भगवान् ने बताया-वह सलेश्यी में ही प्राप्त होती है, अलेश्यी में नहीं ।
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फिर पूछा गया -प्रभो ! वह किन-किन दो लेश्याओं में प्राप्त होती है ? भगवान ने बताया-गोतम ! कषायकुशील निर्ग्रन्थता छहों लेश्याओं में प्राप्त होती है । कृष्ण लेश्या में यावत् शुक्ल लेश्या में।'
. कषायकुशील निर्गन्थता-साधुता का छहों लेश्यओं में प्राप्त होना यहां स्पष्टतः प्रतिपादित है फिर यह कैसे माना जा सकता है कि साधु में सिर्फ तीन शुभ भाव लेश्याएं ही होती हैं, छहों लेश्याएं नहीं ? उसी पंचम अंग सूत्र भगवती के पच्चीसम शतक के सप्तम उद्देशक में संयत-साधु के संबंध में जिज्ञासा करते हुए गणधर गौतम पूछते हैं--प्रभो ! संयत कितने प्रकार के होते हैं ? भगवान् ने बताया—गौतम ! संयत पांच प्रकार के होते हैं। वे पांच प्रकार ये हैं-सामायक संयत, छेदोपस्थापनीय संयत, परिहारविशुद्धि संयत, सूक्ष्मसंपराय संयत और यथाख्यात संयत । पुनः क्रमशः सामायकादि इन पांच संयतों में लेश्याओं की प्राप्ति के बारे में जिज्ञासा करते हुए गौतम स्वामी ने पूछा-प्रभो ! यह सामायक संयत सलेश्यी में होता है या अलेश्यी में ? भगवान् ने बताया-गौतम ! यह सलेश्यी में ही होता है। फिर जिज्ञासा की गयी-प्रभो ! यह सामायक संयत कौन-कौन-सी लेश्याओं में होता है ? भगवान् ने बताया---यह कषायकुशील निर्ग्रन्थ की तरह कृष्णादि छहों लेश्याओं में प्राप्त होता है।
इसी प्रकार छेदोपस्थापनीय संयत के लिए जिज्ञासा की गई तो भगवान् ने बताया—छेदोपस्थापनीय संयत भी कषायकुशील निर्ग्रन्थ की तरह छहों लेश्याओं में प्राप्त होता है। भगवती सूत्र के इस निरूपण में सामायक और छेदोपस्थापनीय संयत में कृष्णादि छहों लेश्याओं का होना स्पष्टत: प्रतिपादित है। भगवती सूत्र के आठवें शतक के दूसरे उद्देश्य में भी कृष्ण, नील, कापोत लेश्यी में चार ज्ञान की भजना बतायी गयी है। ज्ञात रहे मनः पर्यव ज्ञान साधु के सिवा अन्य किसी में भी प्राप्त नहीं होता। मनःपर्यवज्ञानी में कृष्ण लेश्या का भी होना यहां प्रतिपादित है। इससे साधु में कृष्ण लेश्या का होना स्वतः सिद्ध हो जाता है।
विशाल आगम साहित्य में से और भी वे अनेक स्थल प्रस्तुत किये जा सकते हैं जो संयमधारी, साधु में स्पष्टतः छव लेश्याओं का प्रतिपादन करते हैं। यहां उन सभी का प्रस्तुतीकरण अपेक्षित नहीं लगता । फिर भी द्रव्यानुयोगप्रधान आगमसूत्र श्री पन्नवणा का एक पाठ तथा आचार्य श्री मलयगिरि-कृत उसकी टीका यहां और उद्धृत की जा रही है
प्रज्ञापना सूत्र के सतरवें पद का नाम है-लेश्या पद । इसमें छवों लेश्याओं का विस्तृत वर्णन किया गया है । उसके तृतीय उद्देशक में गौतम स्वामी ने एक जिज्ञासा प्रस्तुत की है-प्रभो ! कृष्ण लेश्यी जीव में कितने ज्ञान प्राप्त हो सकते हैं ? भगवान् ने बतलाया--गौतम ! कृष्ण लेश्यी जीव में दो, तीन या चार ज्ञान भी प्राप्त हो सकते हैं । उसमें मति, श्रुत ये दो ज्ञान प्राप्त हो सकते हैं। उसमें मति, श्रुत और अवधि या मति, श्रुत और मनः पर्यव ये तीन ज्ञान भी प्राप्त हो सकते हैं । उसमें मति, श्रुत, अवधि और मनः पर्यव ये चार ज्ञान भी प्राप्त हो सकते हैं । उसमें केवलज्ञान प्राप्त नहीं होता। वह सिर्फ शुक्ल लेश्यी या अलेश्यी में ही प्राप्त होता है।" ___ इस पाठ की टीका करते हुये आचार्य मलयगिरि-स्वयं एक वितर्क उपस्थित करते
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हैं - मनः पर्यव ज्ञान तो अति विशुद्ध अध्यवसाय वाले को प्राप्त होता है । कृष्ण लेश्या संकलिष्ट अध्यवसाय स्वरूपा है । तब फिर कृष्ण लेश्यी में मनःपर्यव ज्ञान कैसे संभव है ? अपने ही बितर्क का स्वयं समाधान प्रस्तुत करते हुए वे कहते हैं- प्रत्येक लेश्या के असंख्य लोकाकाश प्रदेश-प्रमाण अध्यवसाय स्थान है । उनमें से कोई मन्द अनुभव बाले अध्यवसाय स्थान प्रमत्त संयत में भी प्राप्त हो सकते । इसीलिए प्रमत्त संयत साधुओं में कृष्ण, नील, कापोत, लेश्या भी कही गयी है ।
ज्ञातव्य है कि मति, श्रुत और अवधि ये तीन ज्ञान सद् गृहस्थ श्रावक में भी प्राप्त हो सकते हैं, पर मनः पर्यव ज्ञान तो संयमधारी साधु में ही प्राप्त होता है, अन्य किसी में नहीं । ( नंदी सूत्र, मणपज्जवनाण पदं ) । कुष्ण लेश्यी में भी मन:पर्यय ज्ञान का प्राप्त होना यहां निर्दिष्ट है । मनःपर्यव ज्ञान नियमतः साधु में ही प्राप्त होता है, अन्य किसी में नहीं । इससे संयमधारी साधु में भी कृष्ण लेश्या का होना सर्वथा असंदिग्ध है । इसी प्रकार प्रज्ञापना के सतरवें पद में भी कृष्ण लेश्यी सम्यग्दृष्टि जीवों के तीन भेद बतलाये हैं- संयंती, असंगती और संयतासंयती ।" अगर संयमधारी साधु में कृष्ण लेश्या ही प्राप्त न हो तो कृष्ण लेपयी सम्यग्दृष्टि का संयती भेद क्यों बताया
गया ?
वस्तुतः संयमधारी प्रमत्त साधु में तीन शुभ लेश्याएं ही नहीं, कृष्णादि छहों लेश्याएं प्राप्त हो सकती हैं। इसलिए भगवती सूत्र के प्रथम शतक के प्रथम उद्देशक के जिस पाठ को पुरस्सर कर साधु में सिर्फ तीन शुभ लेश्याओं का होना प्रतिपादित किया जाता है वह यथार्थ में षष्ठम् गुणस्थानवर्ती प्रमत्त संयत में सिर्फ तेजस्, पदम् और शुक्ल ये तीन शुभ भाव लेश्याएं प्राप्त होने की नहीं, कृष्णादि छहों लेश्याएं प्राप्त होने की भी पुष्टि करता है । भगवती सूत्र का वह मूल पाठ इस प्रकार हैं----
"सलेस्सा जहा ओहिया । कण्ह लेसस्स नील लेसस्स काउलेसस्स जहा ओहिया जीवा । नवरं पमत्तापमत्ता न भाणियव्वा ।" ( भगवती शतक - १ उद्देशक - १ ) इसका अर्थ है - सलेशी जीवों का सारा निरूपण औधिक समुच्चय जीवों की तरह होगा । कृष्ण नील एवं कापोत लेश्यी जीवों का निरूपण भी औधिक सर्व सामान्य जीवों की तरह होगा, पर इतना विशेष कि इनमें प्रमत्त अप्रमत्त भेद नहीं करने हैं । उक्त पाठ के आघाय को और अधिक स्पष्टता से समझने के लिए पूरे संदर्भ के साथ भगवती सूत्र का वह प्रकरण यहां दिया जा रहा है
भगवान् महावीर के सम्मुख गौतम अपनी जिज्ञासा प्रस्तुत करते हैं कि प्रभो ! जीव आत्मारंभी, परारंभी, उभयारंभी होते हैं या अनारंभी ?" समाधान में भगवान् महावीर ने बताया कि गौतम ! जीव दोनों ही प्रकार के होते हैं— कुछ आत्मारंभी, परारंभी, उभयारंभी होते हैं, अनारंभी नहीं होते । कुछ जीव आत्मारंभी, परारंभी, उभयारंभी नहीं होते अनारंभी होते हैं । गौतम ने फिर जिज्ञासा प्रस्तुत की - प्रभो ! ऐसा क्यों कहा जाता है कि जीव दोनों ही प्रकार के होते हैं--कुछ अनारंभी होते हैं, कुछ अनारंभी नहीं भी होते ? भगवान् ने बताया- गौतम ? जीव दो प्रकार के हैं(१) संसार - समापन्नक, ( २ ) असंसार समापन्नक । इन दो में जो असंसार समापन्नक
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हैं वे सिद्धात्माएं हैं । वे न आत्मारंभी हैं, न परारंभी, न उभयारंभी । बे अनारंभी हैं ।
I
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जो संसार समापन्नक जीव हैं वे दो प्रकार के हैं-संयत, असंयत । असंयत जीव अविरति की अपेक्षा से आत्मारंभी भी हैं, परारंभी भी हैं और उभयारंभी भी । वे अनारंभी नहीं हैं । जो संयत जीव हैं वे दो प्रकार के हैं-प्रमत्त संयत, अप्रमत्त संयत । जो अप्रमत्त संयत हैं वे न आत्मारंभी हैं, न परारंभी, न उभयारंभी । वे अनारंभी हैं । जो प्रमत्त संयत हैं वे शुभ योग की अपेक्षा से न आत्मारंभी है, न परारंभी, न उभयारंभी वे अनारंभी हैं । अशुभ योग की अपेक्षा से प्रमत्त संयत आत्मारंभी भी हैं, परारम्भी और उभ यरम्भी भी हैं । वे अनारम्भी नहीं हैं ।
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इसी प्रकरण में कुछ आगे कृष्ण लेश्यी जीवों के संबंध में जिज्ञासा करते हुए गौतम स्वामी ने पूछा – प्रभो ! कृष्ण लेश्यी जीव, आत्मारम्भी, परारम्भी, उभयारम्भी हैं या अनारम्भी ? भगवान् ने गौतम की इस जिज्ञासा के समाधान में औधिक सर्व समान्य पाठ की तरह ही सारा निरूपण किया । इतना विशेष कि उसमें प्रमत्त अप्रमत्त भेद नहीं किये । क्योंकि अप्रमत्त संयत में कृष्णादि तीन अशुभ लेश्याएं प्राप्त ही नहीं होतीं । वे सिर्फ प्रमत्त संयत में ही प्राप्त होती हैं । संयत मात्र में प्राप्त नहीं होती - इसलिए इस वक्तव्य में प्रमत्त अप्रमत्त भेद करने अपेक्षित नहीं थे ।
इस वक्तव्य में औधिक पाठ में दिये गये संसार समापन्नक जीवों के प्रमत्तअप्रमत्तभेद से पूर्व जो संयत-असंयत भेद किये गये हैं वे गृहीत होंगे । आगमकार ने उन्हें गृहीत करने का निषेध नहीं किया है । अतः कृष्ण लेश्यी जीव संयत-असंयत दोनों ही प्रकार के होते हैं। अगर आगमकार के अभिमत में संयत मात्र में कृष्ण लेश्या का न होना होता तो वे इस वक्तव्य में " प्रमत्ताप्रमत्ता न भाणियब्बा" न कहकर "संजया न भाणिब्बा" कहते, पर ऐसा नहीं कहा गया । इससे साधु में कृष्ण लेश्या का भी होना स्पष्टतः सिद्ध है ।
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संदर्भ :
१. भगवती शतक I उद्देश- I
२. भगवती शतक २५ उद्देशक ६ पन्नवणा पद
३. भगवतीशतक २५ उद्देशक ६ लेखपद
४. भगवती शतक २५, उद्देशक ७ पन्नवणापद
५. कण्ह लेसाणं भंते ! णोरइया सच्चे समाहरा सम शरीरा सब्वेव पुच्छा, गोयमा ! जहां ओहिया णवंर णेरइथा वेदणाए, माई मिच्छ विट्ठी उवषण्णगाय अमायी सम्मदिट्ठी उवषण्णगाथ भाणियव्या । सेसं तहेवजहा ओहिताणं असुरकुमारा जाव वाणमंतरा एते जहा ओहिया णवरं मणसाणं किरियाहि विसेसो जाव तत्थणं जे ते सम्मदिट्ठी ते तिविहा पण्णत्ता तंजहा संजया, असंजया, संज यासंजया जहा ओहियाण | पन्नवणा पद- १७-१३०.
६. आत्मारम्भी - स्वयं की हिंसा करने वला । उभयारम्भी— दोनों की हिंसा करने वाला । परारम्भो-दूसरे की हिंसा करने वाला । अनारम्भी किसी की हिंसा न करने वाला ।
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पुस्तक समीक्षा
ग्रंथमाला-४६५)
१. मूकमाटी : - महाकाव्य (लोकोदय विद्यासागर | प्रथम संस्करण- १९८८ / मूल्य - ५०/- रु० प्रकाशक- भारतीय इस्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड, नई दिल्ली-३ । पृष्ठ २४+४८८ ।
जैसलमेरी ( माडवी) भाषा में मनुष्य को माटी कहते हैं । "माटी केत ? " हे चेत ? " = हे मनुष्य तूं चेता कर । सावधान अर्थ - गौरव भरे हैं । बेकळू-बालू रेत धूल दूसरे शब्दों में वहां माटी चैतन्य है । सुसंस्कारित
मनुष्य तूं कहां जा रहा है । और हो । - ये दो वाक्य छोटे होने पर hari माया मिट्टी नहीं कहते है ।
-
।
"माटी
भी
कवि के शब्दों में भी 'सामाजिक, शैक्षणिक, राजनैतिक और धार्मिक क्षेत्रों में प्रविष्ट हुई कुरीतियों को निर्मूल करना और युग के शुभ संस्कारों से संस्कारित कर भोग से योग की ओर मोड़ देकर वीतराग श्रवण-संस्कृति को जीवित रखना है और इसका नामकरण हुआ है मूकमाटी ।'
"मढ़िया जी (जबलपुर) में / द्वितीय वाचना का काल था / सृजन का अथ हुआ और / नयनाभिराम नयनागिरि में / पूर्ण पथ हुआ । समवसरण मंदिर वना / जब गजरथ हुआ ।" अर्थात् श्री पिसनहारी मढ़िया जी ( जबलपुर - मध्यप्रदेश) और श्री नयनागिरिजी ( छतरपुर - मध्यप्रदेश) की पुण्यभूमि को संबोधित करके यह काव्य रचा गया और दूध में से घी की तरह मूकमाटी से काव्य तत्त्व प्रकट हुआ है जो श्रमण संस्कृति के शाश्वत सिद्धान्त की प्रतिष्ठापना करता है ।
'मूकमाटी' में चार खंड हैं : १. संकर नहीं वर्णलाभ २. शब्द सो बोध नहीं, बोध सो शोध नहीं ३. पुण्य का पालन : पाप प्रज्ञालन और ४. अग्नि की परीक्षा, चांद सी राख । इन चारों खड़ों का विधान और सम्पूर्ण काव्य का वितान लगभग ५०० पृष्ठों है जो परिमाण की दृष्टि से महाकाव्य की सीमाओं को छूता है । हालांकि महाकाव्य की अपेक्षाओं के अनुरूप शास्त्रीय समीक्षा में "मूकमाटी" खरा नहीं उतरता किन्तु उसमें माटी नायिका है, कुम्भकार नायक है, आध्यात्मिक रोमांस है, प्राकृतिक परिवेश है, शब्दालंकार, अर्थालंकारों के मोहक संदर्भ हैं और शब्द का, व्याकरण की सान पर तराशा नया नया अर्थ है । जैसेः
"युग के आदि में / इसका नामकरण हुआ है / कुम्भकार | 'कु' यानी धरती / ओर / 'भ' यानी भाग्य | यहां पर जो / भाग्यवान् / भाग्य विधाता हो
कवि - आचार्य ज्ञानपीठ, १८,
खण्ड १७, अंक ३ ( अक्टूबर-दिसम्बर, ६१ )
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कुम्भकार कहलाता है ।"
भावना भाता हुआ गदहा ( गधा ) भगवान् से प्रार्थना करता है :
"मेरा नाम सार्थक हो प्रभो !
यानी / 'गद्' का अर्थ है रोग 'हा' का अर्थ है हारक मैं सबके रोगों का हन्ता बनूं / बस / और कुछ वांछा नहीं / गद - हा. . गदहा ।" आधि, व्याधि, उपाधि की व्याख्या देखिए
.....
"व्याधि से इतनी भीति नहीं इसे जितनी आधि से है / और आधि से इतनी भीति नहीं इसे जितनी उपाधि से ।
इसे उपधि की आवश्यकता है उपाधि की नहीं, मां ! इसे समधी समाधि मिले, बस !
अवधि प्रमादी नहीं । उपधि यानी उपकरण - उपकारक है ना ! उपाधि यानी परिग्रह - अपकारक है, ना !"
नारी के विविध रूपों के लिए कवि कहता हैनारी- इनकी आंखें हैं करूणा की कारिका शत्रुता छू नहीं सकती इन्हें
मिलन सारी मित्रता ! मुफ्त मिलती रहती इनसे । यही कारण है / कि इनका सार्थक नाम है 'नारी' यानी 'नअरि' नारी अथवा
कुमारी -- 'कु' यानी पृथिवी
अबला --
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ये आरी नहीं हैं सो नारी ।
'मा' यानी लक्ष्मी और 'री' यानी देनेवाली
इसी से यह भाव निकलता है कि
यह धरा सम्पदा सम्पन्न / तब तक रहेगी
जब तक यहां कुमारी रहेगी । - जो पुरुष - चिन्तन की वृत्ति को विगत की दशाओं और
अनागत की आशाओं से
पूरी तरह हटाकर
'अव' यानी / आगत वर्तमान में लाती है। अबला कहलाती है वह ।
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बला यानी समस्या संकट है। न बला. 'सो अबला। समस्या-शून्य-समाधान । अबला के अभाव में सबल पुरुष भी निर्बल बनता है। समस्त संसार है , फिर समस्या-समूह सिद्ध होता है।
इसलिए स्त्रियों का यह 'अबला' नाम सार्थक है। स्त्री-'स्' यानी सम-शील-संयम
'त्री' यानी तीन अर्थ है : धर्म, अर्थ, काम-पुरुषार्थ में पुरुष को कुशल संयत बनाती है
सो 'स्त्री' कहलाती है। सुता---'सुता' शब्द स्वयं सुना रहा है
'सु' यानी सुहावनी अच्छाइयां
और/'ता' प्रत्यय वह भाव-धर्म, सार के अर्थ में आता है यानी/सुख-सुविधाओं का स्रोत-सो
'सुता' कहलाता है। दुहिता-उभय-कुल मंगल-वधिनी, उभय-लोक-सुख सजिनी
स्व-पर-हित सम्पादिका/कहीं रहकर किसी तरह भी हित का दोहन करती रहती सो "दुहिता" कहलाती है। इसी प्रकार अन्य वाक्य अथवा उक्तियां भी सबल सार्थक ढंग से व्यक्त हुई
अति के बिना/इति से साक्षात्कार संभव नहीं, और/इति के बिना, अथ का दर्शन असंभव ।
'भी' के आस पास/बढ़ती-सी भीड़ लगती अवश्य किन्तु भीड़ नहीं/'भी' लोक तंत्र की रीढ़ है ।
धरती की प्रतिष्ठा बनी रहे/और हम सबकी/धरती में निष्ठा घनी रहे/बस ।
योग के काल में भोग का होना/रोग का कारण है, और भोग के काल में रोग का होना/शोक का कारण है ।
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संहार की बात मत करो/संघर्ष करते जाओ। हार की बात मत करो उत्कर्ष करते जाओ।
खण्ड १७, अंक ३ (अक्टूबर-दिसम्बर, ६१)
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मैं यथाकार बनना चाहता हूं / व्यथाकार नहीं । ओर / मैं तथाकार बनाना चाहता हूं / कथाकार नहीं ।
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हमारी उपास्य देवता / अहिंसा है / और
जहां गांठ-ग्रन्थि है / वहां निश्चित ही / हिंसा छलती है ।
ग्रंथि हिंसा की संपादिका है / और / निर्ग्रन्थ दशामें ही अहिंसा पलती है ।
सर्वांश में 'मूकमाटी' की तुलना किसी दूसरी कृति से अथवा शास्त्रीय मापदण्डों से उसकी विवेचना की जानी ठीक नहीं है । युगचेतना के रूप में नैतिक मूल्य और श्रमणसंस्कृति के परिवेश की अवधारणा इस काव्य में है जो एक वीतरागी, नंगधडंग महात्मा का जन होने से मानवजीवन के अन्तर्बाह्य द्वन्द्वों का सटीक चित्रण करता है । संत कवि ने मूकमाटी को मातृ रूप में देखा है और उसी के अनुरूप सबके लिए मंगल कामना की है—
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यहां - सबका सदा / जीवन बने मंगलमय छा जावे सुख छांव / सबके सब टलें / अमंगल भाव सबकी जीवनलता / हरित भरित विहंसित हो
गुण के फूल विलसित हों / नाशा की आशा मिटे / आमूल महक उठे / बस ।
ऐसे श्रेष्ठ, उदात्त और दिशाबोधकारक काव्य स्रजन और प्रकाशन के लिए उसमें निमित्त बने सभी लोग साधुवाद के पात्र हैं । ग्रंथ सभी ग्रंथालय और वाचनालयों में पहुंचना चाहिए । आधुनिक युग के युवक, युवतियां इसे जरूर पढ़े, ऐसे प्रबंध होने चाहिए ।
- परमेश्वर सोलंकी
२. आखिरी शर्त — कहानी संग्रह । लेखक - मुनि प्रशान्त कुमार | प्रथम संस्करण - १९६१ | मूल्य - दस रूपये । प्रकाशक - आदर्श साहित्य संघ, चूरू । पृष्ठ-- १३६ ।
प्रशान्त कुमार कृत पंद्रह कहानियों का संग्रह 'आखिरी शर्त' सामाजिक एवं वैयक्तिक जीवन के यथार्थ को अत्यंत संतुलित शैली में चित्रित करने वाली प्रशस्य कलाकृति है । इसमें चित्रित सामाजिक सत्य कमलेश्वर की कहानियों के सदृश भयावह नहीं है, वैयक्तिक सत्य निर्मल वर्मा की कहानियों के सदृश जटिलतर नहीं है, वह सहज सत्य है -- भले ही बंकिमता एवं कला के भड़कीलेपन से रहित प्रायः हो । 'आखिरी शर्त' की कहानियों का कथाकार नारी - जीवन के प्रति अत्यन्त संवेदनशील कलाकार है । नारी के विधवा, बहन, भाभी, माता, धनिक संबंधियों के मध्य अल्पार्थमयी संबंधी युवती, इस, उसका चित्रण करने में कलाकार को अच्छी सफलता प्राप्त हुई है । नारीसंवेदन की दृष्टि से 'आखिरी शर्त' एक उत्कृष्ट कृति हैं । महान् नारी-संवेदक जैनेन्द्र का स्मरण आता है ।
मुनि प्रशांत कुमार का मनन प्रशान्त है, कुमार - दृष्टि अकुंठित । वे नारी के
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माध्यम से कुंठा, विकृति और संत्रास का हौवा नहीं खड़ा करते; अजनबीयत की दुनिया में ले तो जाते हैं पर भटकाते नहीं। स्वस्थ एवं विरेचक यथार्थ चित्रण की दृष्टि से मुनि प्रशांत कुमार एक श्रेष्ठ कथाकार सिद्ध होते हैं । आशा है, उनकी प्रशान्त दृष्टि एवं प्रभावी सृष्टि से हिन्दी-कथासाहित्य संपन्न होता रहेगा।
-डॉ० रामप्रसाद मिश्र
१४, सहयोग अपार्टमेंट्स
मयूरविहार-१, दिल्ली-११००६१ ३. अब किसकी बारी है। लेखक विमल मित्र । अनुवादक योगेन्द्र चौधरी । मूल्य-४५/- रूपए । संस्करण-१९८९ । प्रकाशक-राजपाल एण्ड सन्स, कश्मीरीगेट, दिल्ली।
विमल दा की यह कृति पूज्य गुरूदेव आचार्य श्री तुलसी के चरणों में भेंट हुई है और इसके प्राक्कथन में विमल मित्र ने युवाचार्य श्री महाप्रज्ञ को संबोधन कर लिखा है-'आप मेरे लिए लिखते हैं, मैं जनता के लिए लिखता हूं।' दरअसल इसका सम्पूर्ण प्राक्कथन २४ अक्टूबर सन् १९८७ को विमल मित्र द्वारा युवाचार्यश्री के दर्शन करने पर हुए कथोपकथन की हूबहू नकल है। जो प्रेक्षाध्यान, लाडनूं के जुलाई १९८८ अंक में छप चुका है।
अब किसकी बारी है ? प्रश्न को विमल मित्र ने केवल शीर्षक रूप में लिखा है। पुस्तक की मूल कथा में कहीं यह प्रश्न नहीं है किन्तु हसीना बेगम और दर्शनसिंह की लड़की मिसेज सुलताना के स्वकथ्य में यह प्रश्न बार-बार उभरता है। विमल दा को यह महारथ हासिल है कि वे पुरानी और घिसीपिटी घटना को प्राणवंत कर देते हैं
शत शत श्रद्धांजली ! दो दिसम्बर १९९१ को शाम साढे छह बजे कलकत्ते में विमलदा की मृत्यु हो गई। वे २२ मार्च १९१२ में जन्में थे। उनके उपन्यास "खरीदी कौड़ियों के मोल" का नायक दीपांकर भी सन् १९१२ में ही जन्मा था। उनसे १०० वर्ष पहले चार्ल्स डिकन्स जन्मा जिसके उपन्यास-"टेल ऑफ द टू सिटीज" से उन्होंने उपन्यास लिखने की प्रेरणा पाई।
स्मरणीय है कि विमलदा के अन्तिम दर्शन को नेशनल लाइब्रेरी से केवडातला घाट तक दोनों ओर खड़े हजारों पाठकों ने, जिनमें छात्र-छात्राएं अधिक थों, उन्हें अपनी मूक श्रद्धाजंलियां समर्पित की। -संपादक
और पाठक बरबस उसमें रम जाता है । इस कृति में विमलदा ने भारत-पाक विभाजन का दोष सीधे लार्ड माउन्टबेटन, लेडी माउन्टबेटन और पं. जवाहरलाल तथा सरदार पटेल के मत्ये मंड दिया है। श्री खुशवंतसिंह की पुस्तक-'ट्रेन टु पाकिस्तान' में इसी कथानक की भयावह प्रस्तुति है। 'ग्रोव प्रेस अवार्ड' से सम्मानित खण्ड १७, अंक ३ (अक्टूबर-दिसम्बर, ११)
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वह उपन्यास जहां वितृष्णा उपजाता है वहां विमलदा का यह उपन्यास आगे के लिए सावचेती जगाता है। दरअसल मानव मन के चितरे विमल दा की इस कृति में प्रकारान्तर से बहुत कुछ कह दिया गया है। मानवता, भ्रातृत्व, देश की अखंडता, स्वतंत्रता और सत्ता, स्वार्थ और परहित-सभी पर उन्होंने सटीक टिप्पणियां की हैं । बालमन और वृद्ध का मानसिक संघर्ष यहां पराकाष्ठा पर चित्रित हुआ है। पुस्तक की प्रस्तुति 'राज्यपाल एण्ड सन्स' ने अपने गौरव के अनुकूल की है।
-परमेश्वर सोलंकी ४. ज्ञान किरण-संकलन कर्ता-साध्वी श्री राजीमतीजी । प्रकाशक-प्रज्ञा प्रकाशन, २०५४, हल्दियों का रास्ता, जोहरी बाजार, जयपुर। नवम् संस्करण-- १९९१ । मूल्य रु० १५/- मात्र । पृष्ट ३२४ ।
भगवान् महावीर ने मुक्ति के दो उपाय बताए हैं-विद्या और चारित्र (ज्ञान और आचरण)। ज्ञान प्रकाश करता है तथा सांस्कृतिक परम्पराओं, सत्य की ऊंचाइयों एवम् स्वस्थ मानसिकता तक हमें ले जाता है। ज्ञान की अभ्यास भूमिका चारित्र है जिसके द्वारा मन को शान्ति प्राप्त होती है तथा कुविचार, भय, स्पर्धा, चिन्ता और गलत दिनचर्या से मुक्ति मिलती है।
सन्तों ने, सतियों ने जनता को चरित्रनिष्ठ व सुसंस्कारित बनाने के लिए अनादि काल से प्रयास किए हैं। तेरापंथ धर्मसंघ की विदुषी साध्वी राजीमती ने 'ज्ञान किरण' में जनोपयोगी सामग्री का संकलन करके जिज्ञासु व सन्मार्ग के पथिक साधकों पर महान् उपकार किया है। इसमें दैनिक उपासना, जैन संस्कार, तात्त्विक विचार व स्वाध्याय योग्य रमणीय रचनाओं का सुन्दर समावेश है। मानव के सर्वांगीण विकास के लिए इन्हीं आध्यात्मिक मूल्यों का योगदान अपेक्षित है। भौतिकवादी युग की जटिलताओं से संत्रस्त मानव मन अध्यात्म की डोर से बंधकर जब योग, ध्यान, साधना के क्षेत्र में उतरता है तब उसे आत्मानुभूति होती है तथा जीवन की यथार्थता का बोध होता है।
"ज्ञान किरण" सात भागों में विभाजित है। १ प्रेक्षा ध्यान साधना २ जप साधना ३ श्रावक साधना ४ जैन धर्म परिचय ५ तेरापंथ परिचय ६ स्वध्याय साधना ७ स्तुति साधना। इनमें प्रेक्षा ध्यान और जप साधना, स्वस्थ जीवन के लिए उपयोगी सूत्र, उपयोगी जप मन्त्र, श्रावक कैसा हो ? जैन धर्म तीर्थंकर परम्परा, तेरापन्थ संघ की परम्परा, सम्यकत्व का विवेचन, विशेष पर्व, तपस्या का फल, कर्मफल प्रश्नोत्तरी आदि सामग्री संक्षिप्त एवम् सरल भाषा में दी गई है।
कर्म फल का सिद्धान्त तो एक विशुद्ध वैज्ञानिक सिद्धान्त है। स्तुति साधना विभाग के गीतों का संकलन अत्यन्त मधुर, हृदयस्पर्शी एवम् सरल भाषा में तत्त्व विवेचन करने वाला है। कोई भी गायक सहज आनन्द की अनुभूति किए बिना नहीं रह सकता । इस पुस्तक में श्रावक-प्रतिक्रमण, पंच पद वन्दना एवम् भत्तामर स्तोत्र आदि अर्थ सहित दिए गए हैं। श्रावकों के व्रतों की सूची भी अंकित की गई है । पुस्तक
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की उपयोगिता का अनुमान पूर्व संस्करणों की १९५०० प्रतियों की हाथोंहाथ बिक्री से ही लगाया जा सकता है।
-नेमीचन्द जैन ५. भाग्य चक्र । लेखक-आनंद प्रकाश त्रिपाठी "रत्नेश'। मूल्य १० रूपये। पृष्ठ-१७४ । प्रथम संस्करण । प्रकाशक-आदर्श साहित्य संघ, चूरू।।
जीवन चक्र नाना परिस्थितियों से उलटा सीधा चलता है उसमें मुक्त और भुक्त भाव क्षणों के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता है। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में कुछ ऐसे क्षण आते हैं, जो अविस्मरणीय होते हैं, तब परिस्थितिजन्य घटनायं कल्पना के दरख्त पर चढकर सुखद और मनोरंजक बन जाती हैं।
आज के व्यस्त जीवन में कहानी ही ऐसा साधन है जिसके द्वारा मनोरंजन के साथ-साथ शिक्षा भी आसानी से दी जा सकती है। यह विधा हमारे लिए नई नहीं है। दादी-नानी की कहानी तो अति प्राचीन काल से ही प्रचलित रही हैं। साहित्यक रूप में पंचतंत्र और जातक ग्रंथों में छोटी-छोटी शिक्षाप्रद कहानियां भरी पड़ी हैं।
"भाग्यचक्र" में रत्नेश की २१ कहानियों का संग्रह है, अधिकांश कहानियों में किसी न किसी समस्या को लेकर उसका समाधान प्रस्तुत करने की चेष्टा की गई है। "प्रतिशोध" कहानी समस्या मूलक कहानी है। कहानीकार द्वारा इसमें यह बताने का प्रयास किया गया है कि प्रतिशोध के जहर को प्रतिशोध से समाप्त नहीं किया जा सकता है । कहानी को पढ़कर मुझे सर्वेश्वरदयाल सक्सैना की ये पंक्तियां याद आ रही हैं
जहरीले आदमी से छुटकारे के लिए
फिर तुम क्या करोगे? पहली बात उससे मत डरो
खुद में आत्मविश्वास पैदा करो सबके साथ एक समुद्र बन उभरो, उभरो। 'जेब कतरे से' कहानी सामाजिक यथार्थ का चित्रण करती है। वीरू नामक छात्र परिस्थितियों के वशीभूत होकर अपराधी (जेब कतरा) बन जाता है। उस अपराधी के मन में भी ईमानदारी का भाव भरते हुए पुरुषार्थ की प्रेरणा दी जाती है और अन्त में वह अपनी अपराधी वृत्ति को त्याग देता है। कहानीकार ने सामाजिक समस्याओं और कुरीतियों को गहराई तक कुरेदा है। नारी मन के भावों के चतुर चितेरे 'रत्नेश' की 'मानसी' और 'संयोग' ऐसी ही रचनाएं हैं। 'संयोग' में तो समसामयिक समस्याओं को दर्शाते हुए वर्तमान उद्देश्यविहीन शिक्षा पर भी व्यंग्य किया गया है। - 'जेलर' कहानी का प्रारम्भिक अंश बड़ा ही प्रभावशाली है। आरम्भिक पंक्तियों को पढ़कर प्रसाद की 'आकाशदीप' कहानी स्मरण हो आती है। सुधारवादी लेखक ने साम्प्रदायिक सद्भाव पर भी बल दिया है । बदलते रिश्ते और श्रद्धांजलि इसी तरह की कहानियां हैं।
सर्वांश में 'भाग्यचक्र' कहानीकार की साहित्यिक प्रतिभा का परिचय देती है।
खण्ड १७, अंक ३ (अक्टूबर-दिसम्बर, ६१)
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कथाओं का लघु कलेवर गहनता धारण कर तीव्र प्रहारक रूप में सामने आता है और जहां तहां मानवतावादी रूप भी धारण कर लेता है। निश्चय ही यह कथा साहित्य की अमूल्य निधि बनेगी।
-लाखनसिंह शर्मा ६. "मूल्य मुस्कान का" । कवि-मुनिश्री लोकप्रकाश 'लोकेश' । प्रकाशकआदर्श साहित्य संघ, चूरू । पृ० १२५ । मूल्य १५/- रुपये।
प्रस्तुत कृति "मूल्य मुस्कान का" भाव-प्रधान कविताओं का संग्रह है । संग्रह में कवि की वैयक्तिक अनुभूतियों की झलक है। यों भी कविता कवि की आत्मा का प्रस्वेद तथा उसके मनोभावों की शब्द-बद्ध अभिव्यक्ति ही मानी जाती है । लगता है एक गतिशील एवं स्वस्थ सामाजिक दृष्टि का संकलित आवेश ही इन कविताओं के मध्य विकसित हुआ है । फिर भी कवि 'लोकेश' की कविताओं का मुख्य रंग व्यंग्य है। कवि ने रूढ़ परम्पराओं, मिथ्या मान्यताओं, विषम व कृत्रिम व्यवहारों तथा अनैतिक आचरण को प्रस्तुत कर उन पर सीधा आघात किया है। पर यह आघात असंयत और अमर्यादित नहीं है।
मानवीय दुर्बलताओं के प्रति कवि की दृष्टि सहानुभूति पूर्ण है। मनोरंजन या परिहास व्यंग्य का सहचर है। "यह हो सकता है"- कविता में पितामह और पौत्र का संवाद इसका सुन्दर उदाहरण है। इसी तरह भाषा सर्वत्र सहज व सरल है। उपमाओं में परम्परागत बासीपन नहीं है, फलतः उपमाओं में सार्थकता का समावेश हुआ है । "बूढ़े बरगद के साथ अधखिली कली को ब्याह देना" इसका सुन्दर उदाहरण है।
- कविताओं में दर्शन का स्थान वहीं तक है जहां तक उसका यथार्थ जीवन से संबंध है। सुख-दुःख के परिभाषांकन में कवि ने चेतना के तलघर में, आत्मा के अविराम अनहदनाद को ही सुख माना है। “चाह" कविता में दुःख के दर्शन की सरल अभिव्यक्ति है
अप्राप्त का आकर्षण/प्राप्त का असंतोष कौन नहीं है/दुःखी दुनिया में ?
जीवन का सत्य कवि ने सहज स्वाभाविक ढंग से उजागर कर दिया है । "चिन्ता" नामक कविता इसका अनूठा उदाहरण है
न धुआं उठा/न चिनगारियां छिटकी/न कहीं राख बिखरी/
फिर भी मनुष्य जल गया/चिन्ता-चिता में। कई स्थलों पर कविता गद्य-पद्य की सीमा तिरोहित करने वाले रेखाचित्रों का सा रूप ले लेती है, पर कवि की मंशा कहीं भी तिरोहित नहीं होती। वह जन जीवन की समस्याओं की गहराई में प्रवेश करने की चेष्टा करता है। उसकी पीड़ा है कि धरती से ईमानदारी और इन्सानियत लुप्त हो रही है और मनुष्य टूट रहा है । परन्तु इस पीड़ा में भी आशा और आस्था के बीज अन्तनिहित हैं।
कवि का उद्देश्य पाठक के चिन्तन की दिशा को मोड़ना है और उस दृष्टि से यह संग्रह निश्च य ही सार्थक सिद्ध होगा। क्योंकि इन कविताओं में कवि ने समाजगत दुर्नीतियों पर चोट के रूप में ही अपनी भावना की मुस्कान का मूल्य चुकाने का प्रयास किया है।
-सीताराम दाधीच
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७. मुनिमनोरञ्जानाशीतिः । प्रथम संस्करण, सन् १९८६, मूल्य–३/- रुपये, पृष्ठ संख्या-३६ । लेखक-महाकवि श्री भूरामलजी (आचार्य श्री ज्ञानसागरजी)। हिन्दी भाषान्तरकार--डॉ. पं० पन्नालालजी 'वसन्त' साहित्याचार्य, सागर । प्रकाशकविद्यासागर साहित्य संस्थान, श्री अतिशय क्षेत्र, पनागर, जबलपुर (म. प्र.)।
प्रस्तुत ग्रंथ में मुनियों के मनोरंजनार्थ संस्कृत भाषा निबद्ध इक्यासी पद्य हैं। हिन्दी भाषान्त रकार ने संक्षिप्त परिचय देकर पद्यों का विशद हिन्दी अनुवाद प्रकाशित किया है और अन्तिम दो पृष्ठों पर श्लोकानुक्रमणिका भी दे दी है।
ग्रन्थकार की मंगल-भावना यह थी कि 'मनुजो मानवो भूयाद् भारतः प्रतिभारतः' कि मनुष्य, मनुष्य बनें और भारत सदसद्-विवेक बुद्धि में लीन देश हो। इससे प्रतीत होता है कि वह प्रत्येक श्लोक के साथ विस्तृत भाष्य में मूलाचार आदि ग्रन्थों का नवनीत प्रचुर मात्रा में शामिल करना चाहते थे। इसी दृष्टि से उन्होंने इस कृति को ग्रंथ कहा है। किन्तु संभवतः उनका विचार पूरा नहीं हो सका।
श्लोकों की रचना प्रौढ़ संस्कृत भाषा में की गयी है। संस्कृत न जानने वाले इससे लाभ नहीं उठा सकते थे। इसी कठिनाई को दूर करने के लिए जैन समाज के प्रसिद्ध विद्वान् डॉ० पं० पन्नालालजी 'वसन्त' ने इस कृति का हृदयग्राही हिंदी रूपांतर कर दिया है।
यह ग्रन्थ मुनियों, आर्यिकाओं और जिज्ञासु स्वाध्याय प्रेमियों के लिए बार-बार पढ़ने योग्य है। ऐसी कृति के प्रकाशन के लिए अनुवादक और प्रकाशक दोनों ही अभिनन्दनीय है।
-अमृतलाल शास्त्री ८. प्राच्य भारती प्रकाशन-कहाणय-अट्टगं (प्राकृत गद्य संग्रह), सेतुबन्धमहाकाव्य (प्रथम दो आश्वास) और लीलावई-कहा (छात्रोपयोगी संस्करण) । संपादक ---डॉ० राजाराम जैन, डॉ० चन्द्रदेव राय और डॉ० (श्रीमती) विद्यावती जैन । सन् १९८६ और १६६० । मूल्य क्रमशः १६/- रुपये ; १५/- रुपये और २०/- रुपये ।
डॉ० राजाराम और डॉ० (श्रीमती) विद्यावती जैन मगध विश्वविद्यालय के कॉलेजों में सेवारत हैं। डॉ० चन्द्रदेव भी डॉ. राजाराम विभागाध्यक्ष के साथ संस्कृतप्राकृत विभाग में ही रीडर हैं । तीनों विद्वानों ने मिलकर मगध, अंग-चम्पा एवं मालवा की प्राच्य संस्कृति से संबंधित आठ प्राकृत कथा, सेतुबंध महाकाव्य के दो आश्वास और नौंवी सदी की महाराष्ट्री प्राकृत में लिखी प्रेम कहानी लीलावई-कहा का छात्रोपयोगी संस्करण तैयार किया है और प्राच्य भारती प्रकाशन, महाजन टोली नं० २, आरा [विहार] से श्री रत्नासागर ने उन्हें प्रकाशित किया है।
प्राकृत भाषाओं का अध्ययन अनेकों विश्वविद्यालयों में हो रहा है किन्तु प्रथम तो अद्यतन प्राकृतों का नितांत अभाव है, दूसरे प्राकृत भाषाओं के अधिकारी विद्वानों की कमी ने इसे बहुत दुरूह और मुश्किल बना रखा है। ऐसे में जैन दम्पती और राय बन्धु का यह छात्रोपयोगी प्रकाशन निस्संदेह स्तुत्य और अभिवंदनीय है ।
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कहाण - अट्टगं में आठों कथाएं बहुत रोचक और शिक्षाप्रद हैं और विश्व विद्यालयों के पाठ्यक्रम में रखने योग्य हैं । सेतुबंध महाकाव्य, काव्य की दृष्टि से सर्वोत्कृष्ट है । इसे प्रवरसेन की कृति मानें अथवा कालिदास की ? यह प्रश्न यहां अधिक विवेचनीय नहीं है फिर भी संपादकों ने भूमिका में इस विषयक सटीक टिप्पणी की है और इसे प्रवरसेन की कृति होने के पक्ष में प्रमाण दिए हैं । लीलावई - कहा के लेखक महाकवि कोऊहल हैं और इस कथा ने परवर्ती कवियों को काफी प्रभावित किया है ।
आशा है, प्राच्य भारती प्रकाशन, इसी प्रकार अन्य प्रकाशन भी करती रहेगी । - परमेश्वर सोलंकी
६. प्रवचन - पाथेय, भाग-८ । प्रथम संस्करण, सन् १६८६ । संपादक - मुनि धर्मरूचि । मूल्य - सोलह रूपये । पृष्ठ- २६१ + ११ । प्रकाशक – जैन विश्व भारती, लाडनूं ।
यह प्रवचन -पाथेय आचार्य श्री तुलसी के गंगाशहर - प्रवास, सन् १६७८ में दिये प्रवचनों का संग्रह है । संपादक मुनि धर्मरूचि ने लिखा है- " मैंने साक्षात् देखा है कम्यूनिष्ट एवं नास्तिकों को सहसा आस्तिक बनते हुए । मैंने देखा है, धर्म को रूढ़ि और दकियानूसी विचार समझने वालों द्वारा उसे जीवन की शांति और आनंद के लिए एक अनिवार्य अपेक्षा एवं निर्विकल्प साधन के रूप में स्वीकार किए जाते हुए । देखा है मैंने वर्षों से पीई जाने वाली चिल्मों को फोड़ी जाते हुए, बीड़ी-सिगरेट के बंडलों व पॉकेटों फेंको के जाते हुए। मैंने देखा है, सवर्ण हिन्दुओं द्वारा अस्पृश्यता को मानव जाति का कलंक मान उसे सदा सदा के लिए विदाकर हरिजन भाई को सगे भाई की तरह गले लगाए जाते हुए ।" - उनकी इस साक्षी पर कतिपय पाठक शंकाए उपस्थित कर सकते हैं किन्तु मुनि धर्मरूचि के इस कथन में सचाई है कि - " प्रवचन में मात्र आचार्य श्री के शब्द ही भाषायित नहीं होते, अपितु उनका स्वयं का जीवन बोलता है ।"
-
१४,
प्रस्तुत प्रवचन - पाथेय में एक विशेष बात और भी है । इसमें आचार्य श्री की कृति - "जैन सिद्धान्त दीपिका" के प्रथम दोनों प्रकाशों के कतिपय सूत्रों की रोचक व्याख्या प्रस्तुत हो गई है । प्रथम प्रकाश के सूत्र - ४, ७, ८, १६, १७ आदि और द्वितीय प्रकाश के सूत्र २, ८, २३, ३२, ३३, ३५, ४१, ४२ आदि पर यहां अनेकों प्रवचनों में हृदयग्राही विवेचन हुआ है। वैशिष्ठ्य यह है कि सभी प्रवचन सादा, सरल भाषा में कथोपकथन की तरह लिखे हुए हैं । उनका उत्तम पुरुष में होना संपादन की दूसरी विशेषता है ।
आचार्यश्री के प्रवचनों में जो आकर्षण होता है, संपादक ने उसे ज्यों का त्यों बनाए रखा है, इसलिए जो व्यक्ति आचार्यश्री के प्रवचनों को रूबरू होकर सुनने से वंचित रहते हैं उन्हें इस पाथेय से निःसंदेह लाभ होगा । प्रस्तुति के लिए संस्था के मंत्री श्री श्रीचंद बैंगानी विशेष रूप से साधुवाद के पात्र हैं ।
प्रकाशन - मुद्रण की सुरुचिपूर्ण
- परमेश्वर सोलंकी
तुलसी प्रज्ञा
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'तुलसी प्रज्ञा' - कार्यालय में प्राप्त होने वाली कुछ सहयोगी पत्र-पत्रिकाएं
१. The Jaina Antiquary: श्री जैन जून - दिसम्बर, १९६० प्रकाशक - श्री इन्स्टीट्यूट, आरा (बिहार) वार्षिक शुल्क
सिद्धान्त भास्कर : vol 43 part I&II, देवकुमार जैन ओरियण्टल रिसर्च ५० रुपए । एक प्रति - २५ रुपये ।
२. अर्हत् वचन : vol 3 No. 3 जुलाई १९६१ । वोल्यूम मूल्य १०० रुपये । प्रकाशक, कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, दि० जैन उदासीन आश्रम ट्रस्ट, ५८४, महात्मा गांधी रोड, तुकोगंज, इन्दौर- ४५२००१ ।
३. International Jain Friends : vol I No. 3-4 May- August 1991; Post box 58, B.P. Road, Chinchwad East, Pune-411019
४. श्रमण : वर्ष ४२, अंक - ४-६, अप्रैल-जून, १९६१, प्रकाशक - निदेशक, पार्श्वनाथ विद्याश्रम शोध संस्थान, वाराणसी-५, वार्षिक मूल्य ४० रु० ।
५. तीर्थंकर : वर्ष- २१ अंक ४-५, अगस्त-सितम्बर, १९६१, प्रकाशक- हीराभैया प्रकाशन, ६५, पत्रकार कोलोनी, कनाड़िया मार्ग, इन्दौर - ४५२००१ वार्षिक मूल्य - ३५/रुपये
६. तिथ्ययर : वर्ष - १५ अंक ६, अक्टूबर, १९६१, वार्षिक मूल्य-दस रुपये । प्रकाशकजैन भवन, पी- २५, कलाकार स्ट्रीट, कलकत्ता-७
७. Jain Journal: A Quarterly on Jainology: vol xxv No. 4. publisher: Jain bhawan, p-25, kalakar street, calcutta-7.
८. णाणसायर : अंक- ६, मार्च १६६१, वार्षिक शुल्क ५०/रुपये, प्रकाशक - विद्यासागर पब्लिकेशन, बी- ५ / २६३, यमुना नगर, दिल्ली-५३
६. जैन जगत् : वर्ष ४४ अंक ७, नवम्बर, १९९१, वार्षिक शुल्क- २५/- रुपये, प्रकाशक - कनकमल मुनोत्त, प्रभात प्रिंटिंग वर्क्स, ४२७, गुलटेकड़ी, पूना - ३७. १०. मांगलिक : वर्ष - ४ अंक ५६-६०, अगस्त-सितम्बर, १९६१, वार्षिक शुल्क - ५० रु० प्रकाशक- मुद्रिका, रामजी नी पोल, नाणावट, सूरत - ३
११. Ahimsa Voice : Nineth edition, May, 1991, Annual subsription Rs-20/- publisher - Sharman Sahitya Sansthan, 53, Rishabh Vihar, Delhi-92.
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१२. जैन आहार विज्ञान : पर्वप्रज्ञा : पुष्पांक-५, सन् १९६१, मूल्य-२०/- रुपये,
प्रकाशक-गीता जैन, १२, हीरा भुवन, वी० पी० रोड़, मुलुण्ड (पश्चिम)
बम्बई-४०००८० १३. स्वाध्याय संदेश : वर्ष-७ अंक-१०, अक्टूबर १६६१, मूल्य-२५ रुपये वार्षिक
प्रकाशक-श्री श्वेताम्बर स्थानक जैन स्वाध्यायी संघ गुलाबपुरा-३११०२१
(राज.) १४. जयकल्याणश्री : आत्मोदय की मासिकी । वर्ष-२ अंक ८-१२ : मई-अगस्त
१६६१, वार्षिक शुल्क-५० रुपये । प्रकाशक-मंगलकलश, ३६४, सर्वोदय नगर,
आगरा रोड, अलीगढ़-२०२००१ १५. श्री अमर भारती : वर्ष-२८ अंक-६ । सितम्बर, १९९१ । मूल्य-३० रुपये
वार्षिक । प्रकाशक-वीरायतन, राजगृह-८०३११६ (नालन्दा)। १६ वीतराग विज्ञान : वर्ष-६, अंक-४ । नवम्बर, १६६१ । मूल्य-२० रुपये वार्षिक ।
प्रकाशक -पं० टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, ए-४, बापूनगर, जयपुर-३०२०१५ । १७. वीतरागवाणी : वर्ष-११ अंक-१० । अक्टूबर ६६६१ । मूल्य-त्रैवार्षिक-१०० रुपये
प्रकाशक-वीतरागवाणी प्रकाशन कार्यालय, मुहल्ला सैलसागर, टीकमगढ़
(म० प्र०) १८. दिव्य ध्वनि : आध्यात्मिक मासिक । वर्ष-१५ अंक-७-८, जुलाई-अगस्त, १९६१
मूल्य-त्रिवार्षिक-७५ रुपये । प्रकाशक-श्रीमद् राजचन्द्र आध्यात्मिक साधना केन्द्र,
कोबा-३८२००६ (गांधी नगर)। १६. हिंसा निवारण : नवम्बर-दिसम्बर १६६१ । वार्षिक शुल्क-४० रुपये प्रकाशक
श्री अखिल भारतीय हिंसा निवारण संघ, ३२ मनिष सोसाइटी, नारणपुरा,
अहमदाबाद-३८००१३ । २०. सम्यग्ज्ञान : वर्ष-१८ अंक-५। नवम्बर १६६१ । मूल्य-प्रकाशक-दिगम्बर जैन
त्रिलोक शोधसंस्थान, हस्तिनापुर, मेरठ । २१. अनेकान्त : वर्ष ४४ किरण-३ /जुलाई-सितम्बर १६६१ । मूल्य-६ रुपये वार्षिक ।
प्रकाशक-वीर सेवा मंदिर, २१ दरियागंज, नई दिल्ली-२ । २२. अर्हत् जैन टाइम्स : वर्ष-३ अंक-१/नवम्बर १९६१ । वार्षिक मूल्य-५० रुपये।
प्रकाशक-गोतम ओसवाल, आचार्य सुशील आश्रम, सी-५६६, चेतना मार्ग, डिफेंस
कोलोनी, नई दिल्ली-२४ । २३. जैन आचरण : वर्ष-१ अंक-११-१३/जुलाई-सितम्बर १६६१ मूल्य-५ रुपए।
प्रकाशक-नासिक प्रकाशन स्थल-६८६, बिंदुबाई भुवन, गंगावाड़ी, रविवार पेठ,
नासिक-१। २४. जैन महिलादर्श : वर्ष-६८ अंक-१२/सितम्बर, १९९१ । मूल्य-३५ रुपये वार्षिक ।
प्रकाशक-जैन महिलादर्श, एशबाग, लखनऊ-२२६००४।
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२५. सन्मति संदेश : वर्ष ३६ अंक-१२ । दिसम्बर, १९६१ । मूल्य ३० रुपये वार्षिक । प्रकाशक - प्रकाश हितैषी, ५३५, गांधीनगर, दिल्ली- ११००३१
२६. जिनवाणी : वर्ष - ४८
अंक - ६ / सितम्बर, १९६१ । मूल्य २० रुपये वार्षिक । प्रकाशक - सम्यग्ज्ञान प्रचारक मण्डल, बापू बाजार नं० १८२-१८३, जयपुर३०२००३
२७. स्वाध्याय संगम : वर्ष- ३ अंक - ११ / नवम्बर, १९६१ मूल्य-आजीवन सदस्यता ३०१ रुपये । प्रकाशक - गौतम ललवाणी, पारस जी - १८६, शास्त्रीनगर, जोधपुर राज० - ३४२००३
२८. अहिंसा विहंगम : वर्ष ४ अंक - ११ / नवम्बर १६६१ । मूल्य २५ रुपये वार्षिक । प्रकाशक - राष्ट्रीय अहिंसा प्रतिष्ठान, ४४६, महावीर गली १-सी रोड सरदार पुरा, जोधपुर-३४२००३ ।
२६. मुक्कुडई : वर्ष - १८
अंक - ३ / सितम्बर, १९९१ । मूल्य - ४० प्रकाशक - जैन यूथ फोरम, ३, साउथ बाग रोड़, टी० नगर, ३०. प्रबुद्ध जीवन : वर्ष - २ अंक - ६, अक्टूबर १९९१ । वार्षिक प्रकाशक - श्री मुंबई जैन युवक संघ, ३८५, सरदार वी० पी० रोड, मुंबई
शुल्क - ३० रुपये ।
४००००४ ।
३१. जनप्रियः वर्ष २५ अंक ३६ । दिसम्बर १९६१ । वार्षिक मूल्य ३५ रूपये । प्रकाशक - डॉ० बाहुबलि कुमार, ८ सिविल लाइन, ललितपुर ।
३२. जैन गजट : वर्ष - ६५ अंक ४८ । सितम्बर १९६१ । वार्षिक मूल्य ३५ रूपये । प्रकाशक - नन्दीश्वर फ्लोर मिल्स, ऐश बाग, लखनऊ – २२६००४ ।
रुपये वार्षिक । मद्रास - १७ ।
३३. गुण स्थान : वर्ष ५ अंक ६ । दिसम्बर १९६१ । आजीवन सदस्यता - ३०० रूपये । प्रकाशक - जैन मुनि विमल सन्मति ट्रस्ट, सन्मति नगर – संगरूर | ३४. अणुव्रत भावना; वर्ष ३ अंक ७ । जुलाई १६६१ । मूल्य- - २० रूपये वार्षिक । प्रकाशक —— हरियाणा अणुव्रत समिति, १४१ - W, माडल टाऊन, हिसार । ३५. अणुव्रतम् : वर्ष २३ अंक २ । नवम्बर १९६१ । वार्षिक मूल्य – १० रूपये | प्रकाशक — तमिलनाडू अणुव्रत समिति, २०४, टी० एच० रोड, मद्रास – ५ ।
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कतिपय अन्य पत्रिकाएं
१. राजस्थान से प्रकाशित-शोध प्रत्रिका, उदयपुर, राजस्थानी गंगा-विश्वंभरा
वैचारिकी, बीकानेर; मरू भारती, पिलानी; शिक्षण पत्रिका, अजमेर; नया शिक्षक-शिविरा, बीकानेर; शिक्षा संवाद, जयपुर, मधुमती ---सम्पर्क, उदयपुर।
२. संस्कृत पत्रिकाएं :-विश्व भाषा-सागरिका-श्री पण्डितः, वाराणसी; भारती,
जयपुर।
३. पूना यूनिवर्सिटी-इण्डियन फिलोसोफिकल क्वाटरली, परामर्श (हिन्दी)।
४. एम. एस. यूनिवर्सिटी, बडोदा-जर्नल, ह्य मेनिटी नम्बर, साइंस, टेक्नोलोजी . एण्ड मेडिसिन नम्बर ।
५. त्रैमासिक पत्रिकाएं :--सम्मेलन पत्रिका, प्रयाग; प्राकृत विद्या, उदयपुर ; प्रज्ञा, वाराणसी; सारस्वती सुषमा, वाराणसी; प्राची ज्योति, कुरूक्षेत्र; कर्नाटक यूनिवर्सिटी जर्नल, धारवाड़; रीसर्च जर्नल, इन्दौर; परिषद् पत्रिका, पटना; डक्कन कॉलेज बुलेटिन, पुणे; विश्वेश्वरानंद जर्नल, होशियारपुर; दोस्त, जयपुर।
६. अन्य पत्र-गांधी मार्ग (हिन्दी-अंग्रेजी), नई दिल्ली; गोग्रास, बर्धा; रिलीफ
सोसाइटी, कलकत्ता; संगम, वर्धा; पाथेय कण, जयपुर; रिषभवीर रचना, बंगलोर; श्री समग्र जैन चातुर्मास सूची, बम्बई; तेरापंथ निर्देशिका, नई दिल्ली।
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Tulsi Prajna
QUARTERLY RESEARCH JOURNAL
Vol. XVII
October-December, 1991
(ENGLISH SECTION)
Editor :
Dr. Parmeshwar Solanki
जैन विश्व
चरण
विज्जा
पमीवस्वी
wmally
भारती
ती लाडनू
No. 3
Jain Vishva Bharati Institute, Deemed University, Ladnun-341306
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TULSI-PRAINĀ
X2
Albracht Weber Born: 17, Februr, 1825 Breslau ? Died : 30, November, 1901 Berlin S
Albracht Weber was the first scholar, whose first catalogue of Sanskrit Manuscripts in Berlin was published in 1853. After thirty years of singlehanded work he produced, in 1891, the first volume of his Catalogus Catalogorum, containing an estimated total of 60,000 different titles and author-entries together with the appropriate calalogue references. His third volume appeared twelve years later.
- Editor.
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CONTRIBUTION OF GERMAN SCHOLARS TO PRAKRIT STUDIES WITH SPECIAL REFERENCE
ΤΟ
A. WEBER
Dr. B. K. Khadabadi
The first German scholar who showed special interest in and regard for India and its literature and culture is Herder (1744-1803) the poet, It was he who introduced Kālidāsa's Sākuntalam drama to the great poet Gaite (1749-1832). Such interest and regard developed and spread among German scholars on a large scale within a short period i. e. by the close of the first half of the 19th century A. D. and created in them an impression and conviction that for the interpretation and explanation of the history of mankind, adequate study of Indian culture is inevitable. Then soon subjects like Sanskrit (Vedic), Indology and Comparative Linguistics prominently appeared among the various subjects or courses then provided at German Universities.1
As early as 1818, the first Indology Chair was instituted at the University of Bonn. Such second chair came into existence in 1820 at the University of Berlin. Later, several other Universities in Germany instituted such chairs or created Readers' posts for Indological subjects according to their needs and convenience. Today, on the whole, there is provision for at least one or two branches of Indology chosen from Sanskrit, Prakrit, Pāli, or the Hindu, Buddhist, Jain religion, history, culture, modern Indian languages, literature, philology etc. Moreover, the German Oriental Society (Deutsche Morgenlaendische Gesellschaft) has been doing commendable work in this field. At the beginning German Scholars gave much more importance to the study of Vedic culture, but later on they also studied on historical and scientific lines, the Brāhmaṇas, the Upanisads, Scriptures, Grammar, Purāņas, History etc. and held their eminence among all European countries. In the field of Pali and Buddhism, however, their contribution stands rather second to that of the British and French scholars. But their contribution to Prakrit and Jainological studies, barring the work of just a few French, Italian and British scholars, is the
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highest and unparalleled one, in respect of quality, quantity and variety.
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It will not be wrong if we state that the first phase of Prakrit Research studies commenced with the publication of Hemacandra's Abhidhana Cintamani by Otto Bohtlingk in 1848. After Bohtlingk have shined scholars like Buhler, Weber, Jacobi, Pischel, Hertel, Leumann, Winternitz, Schubring, Alsdorf etc. in the galaxy of German scholars in the vast field of Prakrit studies. Among these scholars, several maintained an ideal teacher-pupil tradition (Gurusisya-paramparā) by dedicating their whole life to such studies. In these days scholars like Klaus Bruhn in Berlin, Gustov Roth in Goettingen and A. Mette in Munchen have sincerely and efficiently continued the work of Prakrit and Jainological studies. A few others, together with some of the Indian scholars Like Tripthi, Pande etc, are doing appreciable work within some of the Departments or Seminars of other German Universities5.
Now coming to A. Weber (Albrecht Weber-1825-1901j, we find that he was one such distinguished German scholar who cultivated Indological and oriental field with all dedication, reaped rich harvest and left it for posterity. He was the first to write a History of Indian Literature and that too mostly depending on manuscripts. He edited on scientific lines the Sukla Yajurveda, the Atharva Veda, Jaina Canonical works like the Bhagavati-sutra etc. He also wrote with authority on Panini. He visited India, travelled extensively by way of study-tours, collected several manuscripts, took with him a few of them, deeply studied them and published them on a systematized pattern.
Among such of his publications prominently luminates Hala's (Sātavāhana's) Prakrit Gāhāsattasai (Gāthāsaptasati) (c. 100 A.D.)Das Saptasatakam des Hāla. When European countries were caught with an impression that India was a lowly and backward country, filled with poor people, marked with recluses, beggars, snakecharmers etc., through the publication of Das Saptasatakam des Hāla, A. Weber showed them that even ancient rural India, (c. 100 A.D.) was well-cultured with people living a busy colourful life bubbling with love-notes of joy, mirth and tender sentiments and, thus, surprised the former followers of Kippling-philosophy: Oh! The east is east, the west is west.
Today happens to be for us a happy day of the year-1981the Centenary year of the maiden publication of the Das Saptasatakam
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des Häla (1881), an important ancient Indian Prākrit anthology of lyrical songs of life and love, given to us by the great German Indologist A. Weber. I, for one, as a part of my tribute to him, would present now a few observations on this anthology and also place before you a novel experiment of translating into English Free verse--Free Quatrain, some gāhās picked up from A. Weber's critically edited text itself8.
Notes And References:
1. (i) For more details vide German Indology, Shakuntala Publishing House, Bombay, 1969, pp. 1-3 (ii) During this period in India there was no planned or regularised provision for
Indological or oriental Studies. However the Central Government, on the recomendation of the Butler Committee that met at Simla in 1911, decided to depute every year two Indian young scholars to the Western Universities to study the functioning and proceedings of the International Congress of Orientalists that had held its first Session in Paris in 1873. Shree P. D. Gune was the first to get such benefit. The last scholar so deputed in 1921 was Shri. P. L. Vaidiya. In 1921 Education became the State subject; and, hence,
this scheme stopped there alone. (iii) Shri P. D. Gune returned from Germany in 1914. At the same time
Shri. S. K. Belavalkar returned from U. S. A. Whatever new Research Methodology and Oriental knowledge they had brought with themselves, was appreciated and actively encouraged by a team of several other scholars and the result was the birth of the Bhandarkar Oriental Research Insritute at. Poona in 1917. Gradually Indology and Oriental studies were put on a new track of teaching, and research. Shri A. N. Upadhye was the first to get his Master's Degree in Prakrit, taught and trained by Dr. R. D. Vaidya and Dr. S.K.
Belavalkar etc. in this very Institute. (iv) For further details in respect of (ii) and (iii) above, Vide the General
President's Address by Dr. P. L. Vaidya, Silver Jubilee Session, A. I, O.
Conference, Calcutta, 1969. (v) Prakrit Studies in Indian Universities were given a tangible shape and push by
about 1930. Dr. A. N. Upadhye, Dr. Hiralal Jain, Pt. Bechardas and Pt. Malvania etc. can be said to be doyens in this regard. Zeitschrift der Deutsche Morgenlaendische Gosellshaft (ZDMG), reputed Journal, is the research organ of this Society. For details of individual work and contribution of these scholars to Prakrit and
Jainological studies, vide the relevant parts of the following - (i) German Scholars on India Vol. 1, Chowkhamba Sanskrit Series, Varanasi,
1973 and Vol. II, Nachiket Publication, New Delhi-1976. Both published by the
Culural Deptt. of the German Embassy, New Delhi. (ii) Ludwig Alsdorf: Kleine Schriften, Glasenapp-Stiftung, Band-10, Wiesbaden. (iii) A Random Selection of Researches in Jainology by Foreigners, Dr. N. M.
Tatia, Tulasi-prajñā, Vol. V, 9-10 (1979-80); and Further Selection of Researches in Jainology by Foreigners, Dr. N. M. Tatia, Tulasi-prajña, Vol, V, 11-12, (1980).
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4. (i) The contribution of German Scholars, it may be noted, is not limited to
Sanskrit, Prakrit, Pali or traditional Indology only; they have contributed to other areas too such as natural sciences, ecological problems etc. concerning
modern Indian conditions. (ii) Among these German scholars, some came to India on study tou rs. Some
others like Buhler and Alsdrof served as professors in Indian Universities. Prof. Alsdorf visited India several times. I had the good for tune of spending 3-4 days with him at the Vikram University, Ujjain, in 1972, on the occasion of the 26th Session of the A.L.O. Conference. I found him to be a great scholar and thorough gentleman. For the complete picture of Prakrit and Jainological studies in Germany today, vide relevant parts of German Indology, by Dieter Schlingloff, Munich,
1982. 6. (i) Das Saptašatakam des Häla, Leipzig 1881. (ii) Several research articles of A. Weber connected with this work have adorned
the pages of the Indian Antiquary and have guided Indian scholars. 11th October, 1981.
.
8.
This part is cast into a separate paper, entitled Gahasattasai and published in Sambodhi, Vol. X. (1982)
PREKSHA INTERNATIONAL
(Bi-monthly bulletin of "Jain International")
HULAS CHAND GOLCHHA Chairman, JAIN INTERNATIONAL Jain Vishva Bharti. Ladnun.-341 306
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LEŚYA-THE ETHICAL ASPECT OF AN
INDIVIDUAL
Dr. G. V. Tagare
The teachers of the path to moksa came to be known as MUNIS as distinguished from rşis. The Munis were a casteless class of people and were known since the Rgvedic times.
These Munis thought that the ethical aspect (character) of an individual (the moral effects of the acts of that individual) is reflected as a particular colour in the soul of that individual.
This paper proposes to trace the development of this concept since ancient times.
-Editor I was intrigued to learn that the late Mrs. Indira Gandhi used to see some coloured halo around people and that she lost this divine gift after her childhood. This reminded me of the LESYĀ concept of Jains which attributes different colours to souis according to the cumulative effect of their Karmans.
But do we have a similar concept among the followers of Brāhmaṇism and Buddhism as these three isms are the aspects or developments of one-viz. Indianism.
An unbiased student of ancient Indian philosophy who reads the original texts of older upanişads, Pali and Ardha-Magadbi canons finds that in ancient India there was probably one corpus of common philosophical concepts which developed different schools of thoughts or isms. Indianism believed in the Law of Causation (Karmavāda) and attributed inequality like sufferings of the pious people and prosperity of the wicked to the acts done by them in some birth. This is the Karmavāda. This theory automatically leads to the hypothesis of some kind of continuum, a persistent, permanent entity different from the body who receives the fruits or effects of the acts done by him in some previous birth. They thought that if the body and the soul were identical, the soul will be no more and the Law of Causation-He who sows must reap accordingly-would be null and void. Even the Buddhists who advocate Anattā have to admit some permanent principle called Väsanā as the continuum leading to the next birth.
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All these isms yearn for some escape from this cycle of birth and to attain Mokşa, Nirvāṇa or Kaivalya froin which stage there is no return to Saṁsāra. For this they prescribe a moral path consisting of ahiṁsā, satya etc. and some kind of Yoga.
Teachers of these schools conveyed words of instruction or advice practically in identical words.
For example Manu explains why elderly people should be respected
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः । चत्वारि सम्प्रवर्द्धन्ते आयुर्विद्यायशो बलम् ॥
-Manu.ll. 121 The Dhammapada repeats practically the same text :
अभिवादनसीलस्स निच्चं वद्धोपचायिनो। चत्तारो धम्मा वड्ढन्ति आयु वण्णो सुखं बलं ॥
-Sahasra Varga. 10 One more example :
The Bhagavad Gitā says: "A person who renounces attachment and dedicates his action to God, is not touched by sin like a lotusleaf (is untouched) by water”.
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा । This simile of a lotus leaf remaining untouched by water through non-attachment appealed to ancient Jains and Buddhists so much that they used it to express non-attachment as the distinguishing characteristic of a Brahmin. States the Dhammapada :
वारि पोक्खर पत्रे व, अरग्गे इव सासपो ।
यो न लिप्पति कामेसु तमहं ब्रूमि ब्राह्मणम् ॥ "Like water on a lotus-leaf, as a mustard seed on the needlepoint, him who does not stick to desires (or pleasures), I call a Brāhmana" (Brahmana Varga. 19) Says the Uttarādhyayana Sutra :
जहा पोम्म जले जायं नोवलिप्पति वारिणा ।
एवं अलित्तं कामेहिं तं वयं बूम माहणो ॥ "Like a lotus (though) born in water, is not touched by water, similarly him who is not attached to (or touched by) desire, we call a brāhmana" A few more similarities are appended.
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WHY THIS CLOSE SIMILARITY?
The reason for this similarity or identity of views is not difficult to trace. It is our age-old tradition to respect persons of meditative nature who renounce pleasures of worldly life and take to ascetic way of life. We call such people MUNIS (Thinkers), the term being derived from man- "To think" to meditate'. The derivation in the technical jargon given (in Sabda Kalpadruma III pp. 748-749) is as follows:
मुनि --- मनुते जानाति यः । मनेरुच्च उणादि ४.१२२ उति इन् + अत उच्च
(One who knows).
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It means "One who observes the vow of silence (Vacam yamaḥ)” in the Amarakośa (2.7.42), while the Medini Kośa gives "Jaina" as its synonym.
In the MUNI concept the vow of silence or control of speech is implied since the Vedic times, but at the time of the Chandogya Upanisad celibacy was identified with it, as it says:
यन् मौनमिति आचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तत् ।
ब्रह्मचर्येण ह्येव आत्मानं अनुविधमनुते —— छांदोग्य उप० ८.५.२
Sankara explains: "Self-realization being the condition precedent of meditation, and celibacy being essential for self-realization, celibacy is equated with it here"
-Chandogya Upa. 8.5.2
अथ मोनमिति आचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तत्, ब्रह्मचर्येणैव साधनेन युक्तः सन् आत्मानं शास्त्राचर्याभ्यां अनुविध – पश्चान्मनुते घ्यायति । अतो मौनशब्दमपि ब्रह्मचर्यमेव ॥
In Pali MUNI is derived from muna-To know." But Pischel in GRAMMATIK Sec. 489, traces Mahārāshtri, ArdhaMagadhi and AP. munai to Vedic muta as in kama-muta "driven by passion". It means he presumes/mun-as an alternative spoken form in Vedic times. The Buddha applied it (Muni) to any person attaining perfection in self-realization. The word came to have some more implications and it occurs frequently in the oldest Buddhist anthology, for example the Muni Sutta in the Sutta Nipāta (1.12). Pali added another implication; "one who knows his own interest as well as that of another person."
aafgċ a qzfga yafa araıfa sfa yfa
In Jainism e.g. in the Acaranga sūtra, Samyaktva came to be regarded as the sine-qua-non of a Muni. The Abhidhāna Rājendra on
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the strength of the Uttaradhyayana Sūtra. 12, adds renunciation from Samsara as implied in the Muni concept :
gafa-gfasatà að farfa sfa gfa: 1
Another derivation is a tall order for ordinary human beings: "Muni is one who knows the past, present and future of the
world".
मनुते मन्यते वा जगतस्त्रिकालावस्थाम् इति मुनिः ।
My main point is to show that the class of people called MUNIS have been commanding respect of all people since the Vedic times and the views expressed by them became the common legacy of all Indians irrespective of their denominations.
One more important point about the MUNIS is that they belonged to the masses and were "Non-seers" of the Vedas. The seers of the Vedic Suktas were Brahmaņas and Ksatriyas and were called rșis as distinguished from Munis. The word rsi is derived from-rs-and is derived (in Sabda Kalpadruma, I. 287) as follows: ऋष्-इगुपधात् कित् (४.११९) इति उणादिसूत्रेण इन् किच्च ।
It means RŞI is one who gets all the Mantras or "SEES" them through his knowledge, the other end of Samsara.
ऋषति प्राप्नोति सर्वान् मन्त्रान् ज्ञानेन पश्यति संसारपारंवा ।
In the Ṛgveda (x. 136.2) Munis are described as those who are wind-girt (Vata-raśanā, a term used in the Bhāgavata XI to sages who saw Vasudeva and enlightened him) and of brownish complexion (due to non-performance of bath).
मुनयो वातरशना पिशङ्गा वसते मला ।
Nudity and non-performance of bath is not limited to Digambar Jains but to other sects like pasupatas (in advanced stage). Munis seem to have been friendly with gods :
मुनिर्देवस्य देवस्य सौकृत्याय सखा हितः । RV.X.136.4
Lord Kṛṣṇa describes the Munis in the foliowing terms: दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु fanate: 1 वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते || Bg. 2.56
"He whose mind is untroubled in the midst of affliction; who has no desire for pleasures; who is free from (Lit. from whom have passed away) passions, fear and rage, he is called a Muni of wellsettled intelligence".
Here one is reminded of the hard penance by Lord Mahavira in
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which he suffered troubles with equanimity as described in the Uvahāņa Ācārānga I. The Mahābhārata, Vana. 12.11 notes one more characteristic of a Muni, as one who camps in his journey at the sun-set i.e. who does not travel by night (Sāyam-gļha). This confirmed by the Sarkha Smộti (7.6) which adds "one who stays in a tenatless house."
Frantiafaa: Faia AT HİLET AT: 1 Sankha smț 7.6 It will be thus found that the order of Munis has many characteristics common to Jain ascetics and was in no way restricted to Brahmin and Buddhist sects. It was a casteless order. Citta and Sambhūta, the folk-artistes of Mātanga caste were driven out of Vārānasi by caste Hindus but they are found as munis in the Uttarādhyayana Sūtra. There Munis were repositories of spiritual wisdom and were the authors of ascetic poetry or the Gāthās found in Sanskrit, Pali and Ardha Māgadhi or Prākrit and Apabhramsa texts. It is those thinkers who proposed the hypothesis that the ethical aspect or the character of the individual i.e, the moral effect of the acts of man is reflected in the soul of the individual just as the colour of an object is reflected in the nearby crystal.
कृष्णादि-द्रव्य-साचिख्यात् (सान्निध्यात्) परिणामो य आत्मनः ।
स्फटिकस्येव तत्रायं लेश्याशब्दः प्रयुज्यते ॥ The first Muni who mooted out the theory of such colours in the soul was Kapil, the teacher of the Sānkhya school. Kapila's designation as Muni is confirmed by Kțşņa in the Bhagavad Gitā ;
fuarai #fqat fa: 1 B.g. X 26 The Guņas-Sattva, Rajas and Tamas are presumed to have colours.
In the Mahābhārata, śānti paryan (ch. 280), there is recorded a traditionally handed down dialogue between the venerable sage Sanat Kumāra and the demon Vţtra. Sanatkumāra explains to Vstra, “Jivas are classified according to their colours :
"Tīvas have six colours-dark or black (Kșsņa), smoky (Dhūmra), red (Rakta), yellow or turmeric (Haridra), and white (Sukla). Jīvas of the dark or black colour are the most unhappy, Smoke-coloured Jivas are a bit more happy than the black-coloured Jivas; bluecoloured Jīvas are mediocre (Madhyam) in happiness; Jīvas of red colour have bearable happiness and misery;yellow-coloured Jivas are happy and the white-coloured are supremely happy."
Vide faanya Flag No. 498 and fatigata in 57/TTECTUAT 97-3
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षड्जीववर्णाः परमं प्रमाणं, कृष्णो धूम्रो नीलमयास्य मध्यम् । रक्तं पुनः सह्यतरं सुखं नु हरिद्रवर्णं सुसुखं च शुक्लम् ॥
In commenting on the above verse, the famous conmentator Nilakantha explains:
-Mbh. Santi 280.30
"When the Guna called Tamas is dominant and Sattva Guna is deficient and Rajo-guna is even (Sama), the colour of the Jiva is black. When the Tamo-guna is predominant, Rajas is deficient and Sattva is even, it leads to the smoky colour of the Jiva. When the Rajo-guna is dominant and Sattva deficient and Tamo-guna is even, the Jiva's colour is blue, When Sattva-guna is even and the Tamas deficient, it is the medium.
( अन्त्ययो वैपरीत्ये मध्यं मध्यमो वर्णः । तच्च रक्तम् ।)
It is tolerable to people generally. When Sattva-guna is predominant, Rajas is deficient and Tamas is even, the Jiva is yellow like turmeric. When the sattva is dominant, Rajas is even and Tamas is deficient, the Jiva is of white colour".
It will be clear from the above that the various colours attributed to the soul are nothing but permutation and combination of the three Gunas-Sattva, Rajas and Tamas. Obviously the scheme is traceable to Kapila. The text of the Mahabharata may not be as old as the 9th Century B.C., but the traditional account is the ancient
one.
The Yoga Sutra of Patañjali confirms the attribution of colours to the Gunas, as in Yoga Sutra IV. 7:
nig41 Hovi aifnafeafaafnazarą |
"The Karman of the Yogins and the minds of others are black, neither black-nor-white, and white according to their moral or spiritual standards".
Thus Patanjali (2nd Cent, B.C) accepts the theory that Gunas have particular colours.
In the course of discussion of colours of soul in Brāhmaṇism, we have drifted upto the Mahābhārata. But chronologically the teacher who developed this theory of the colours of the souls after the age of Kapila is Fūraṇa Kassapa, an elder contemporary of Mahavira and the Buddha. Pāli and Ardha Māgadhi canons mention him as the "founder of a spirtual school" (Titthayara). Buddhist scholars speak of him with reverence. He is reported to have advocated the
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doctrine of Non-causation (Ahetu-vāda). The doctrine attributed to him in the Sūtrakrtānga is as follows:
कुग्वं च कारयं चेव, सव्वं न विज्जइ ।
एवं अकारउ अप्पा ।-सूत्रकृताङ्ग २.२. "The non-action on the part of the soul even if an action is done or caused to be done".
But this view is the same of Naciketas and Bharadvaja of Upanişadic fame.
In the Brahma-jāla Sutta, the Buddha is reported to have said :
Pūraņa Kassapa advocates "Adhicca samuppāda" while he advocates “Paticca Samuppāda”.
As Barua in PRE-BUDDHISTIC INDIAN PHILOSOPHY puts it :
(Pūraņa Kassap's doctrine) "Something comes out of nothing. Nothing comes out of Nothing” We can interpret it to mean that “the caused may come out of the uncaused' (pp. 279-80).
As Pūraņa Kassapa was an important teacher of pre-Buddhist period and we have no record from his works or that of his followers, we have to depend on the Buddhist sources :
Bhikkhu Ānanda is reported to have asked the Buddha :
"Pūraņa Kassapa advocates six classes (Abhijātis) of people each possessing a particular colour viz. Black, blue, red, yellow, white and brilliantly white. Butchers, hunters etc, belong to the black category; mendicants and other advocates of Karman (Karma-vādins and Kriyā-vādins are in blue category, Nirgranthas wearing one piece of cloth are in the red category, White-clothed ones and lay followers of Acelakas (Advocates and practitioners of nudity) in the yellow category, Ājivika Sadhus and sādhvis (Monks and nuns) in the white category, while Nanda Vaccha, Kisa Sankicca and Mankhali Gosāla are in the "Brilliantly white class.” By the way the above shows that Buddhists had high regard for Mankhali Gośala though Jains derogated them as the rival of Mahāvīra.
The concept of Abhijātis finds its counterpart in Brāhmaṇism as shown above. This concept of Abhijātis is useful to understand the concept of Leśyās as advocted by Mahāvīra.
The Buddha believed in and advocated six categories but they are based on two basic colours : Black and white. The categories are as follows:
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TULSI-PRAJÑA, Oct.December, 1991 (1) Black Category (Abhijāti) corresponding to "black" acts. (2) Black one but producing white effects (action etc.) (3) Black one but producing non-black and non-white Dharmas, (4) White Abhijāti bringing about (black) effects. (5) White Abhijāti bringing forth non-black and non-white effect. (6) White Abhijāti bringing forth white Dharmas. Herein the influence of Kapila is discernible.
I think there is no need to explain the Jain concept of Leśyas and their twofold aspects-One affecting the soul (Bhāva Leśyās) and the other its physical counterpart (Dravya Leśyās) which has all the properties of matter like colour, smell, taste etc. Ancient Jains, however, emphasized the colour aspect and enumerated the Leśyas according to their colours such as : Black (Krsna), Grey (Kāpota), Fiery red (Tejas) Yellow, lotus-coloured (padma), White (Sukla) and these Leśyās could be "fired” as Mankhali Gośala did in the case of Mahāvīra. . Though the concept of the Leśyas is as old as Kapila, it was Patañjali and more positively Pūraņa Kassa pa and Mankhali Gośāla-elder contemporaries of Mahāvīra and the Buddha who classified Jivas in six Abhijätis characterised by different colours indicating the spiritual development or otherwise of the Soul.
A comparison of the concept of the colours of the Soul from Kapila to Mahāvīra shows a common belief in the moral effects of an act being reflected in the Soul in the form of different colours. Jains have worked a great deal on this theory and abundant material is available in LEÁYĀ KOŚA.
The credit of developing this theory as well as other basic philosophic concepts underlying Indianism, goes to these ancient Munis who did not care to record their names there by showing their triumph over LOKAIŞAŅĀ. To them I respectfully bow.
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SOME THOUGHTS ON TIRUK KURAL
Dr. B. K. Khadabadi
The Tirukkural, the master-piece and immortal work in Tamil literature by Tiruvalluvar, one of the most valuable gems of the rich ancient Indian culture and literary products, is also acclaimed as a world-classic for its lofty worldly wisdom and ethical values presented in superb catholic spirit. Scholars have essentially marked it as an excellent treatise on the art of living; and the author's reflections, prescriptions, and advices etc. stand far above castes, creeds, climes and times, breathing living freshness all along and attracting not only Tamilians and other Indians, but also great savants, thinkers, humanitarians all over the world-like M. Ariel, G. U. Pope, Mahatma Gandhi, Albert Schweitzer etc. Hence it has been rendered in all major languages of the world and read with all appreciation.
'Kural, is the name of the short metre in Tamil (a couplet with four and three feet respectively), used for the verses in this work Actually Kural-veņbã is the full name of this metre and the term 'Kural' literally means short, small; and tiru, (like Śrī in Sanskrit or Siri in Prakrit) is just an honourific prefix, used in the case of both persons and things. The verses of this classic are expressed in sweet language and in the beautiful Tamil maxim-like or epigrammatic style, memorable and quite wholesome for recitation, reflection and assimilation in one's daily life. They have been commented upon, paraphrased and explained by several scholars and widely translated both in India and abroad.
This didactic poetic work contains in all 1330 couplets, classified topic-wise in groups of 10 each, making thus in all 133 chapters, called Adhikaras, divided in three main parts known as Muppal in the following order:
(i) Aram-Dharma (Ethical Discipline for Householders and Renunciators).
(ii) Porul-Artha (Socio-economic, Political and Administrative Matters).
(iii) Inbam-Kāma (Idealised Love).
Thus, the poet Tiruvalluvar has covered, with remarkable brevity and yet ease, man's all the four Puruşarthas-objectives of Life (the
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last ie., Mokşa-Liberation, Perfection or Final Beautitude being precisely implied in the First part itself).
Owing to lack of exact information about the author and also for want of either precise internal evidence or external references etc., the date of this classic could not be pinpointed; and hence scholars, basing their studies with different angles of vision, have tried to fix different dates for it. We find that generally three dates have been proposed Some scholars hold that it is c. 100 A. D. Some c.300 A. D. and some others c.600 A. D.: (i) Those, like Prof. A. Chakravarti Naynar, associating the author of the Kural with the Jaina Sage Elācārya, and also those others identifying the work with the classic of great antiquity or belonging to the pre-Sangam Age, assign it to c. 100 A. D. (and even a little earlier). (ii) But Prof. Meenaxisundaram places it not earlier than 300 A. D. presenting the following observations; It is difficult to fix the date of the Kural. But one may point out that Tiruvalluvar may not have written the stylized language of Sangam poets, which could not be the language of the common people of the day, and he, in ecletic attitude, must have preferred to write in the natural language of the day. In any case one cannot place the Tirukkural much later than 300 A. D., for it preserves certain aspects of the older language inspite of its acceptance of new developments in the language. (iii) But Prof. S. Vaiyapuri pillai proposes 600 A. D. as the date of the Kural, placing it after the great Tamil grammatic work Tolkāppiyam and advancing the following reasons: Kural is later than Tolkäppiyam. Linguistic considerations too strengthen this conclusion. There is a higher percentage of Sanskrit words in the Kural than in early Sangam Works and in the Tolkäppiyam. New forms of functional words appear in the Kural for the first time in the history of Tamil language.
The author of the Kural is known as Tiruvalluvar (tiru being an honourific prefix). But very little is known about this great and noble poet-philosopher. For want of exact information about him, several anecdotes, folk-tales and traditions have come up about him and around some aspects of his life. He is associated with Madurai region by some and with Mylapore near Madras by others. In some places a vallvar is known as a product of a Brahmin by a Harijan (low-caste) woman. The term valluvar also refers (as found in the Manimekhalai, another Tamil classic) to a low class community and is applied to the king's officers or men, announcing the royal proclamations to the public all round the capital city, sitting on the
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elephant and beating drums. Whatever could be the indicative meaning of the term valluvar, Tiruvalluvar was a great personage of saintly and catholic dignity, with deep insight into human psychology and behaviour, sincerely nourishing humanitarian values, ever breathing goodness and goodwill and zealously catering them to the people at large.
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Thus very little is exactly known about Tiruvalluvar and his life; and besides there prevails some uncertainty about his date. As a result, there has also been, for the last several decades, a controversy among scholars over his religion, faith or sectarian denomination, on which, now, I propose to present some observations. Several scholars have so far put forth their views regarding Tiruvalluvar's religious faith, advancing reasons as per their
convictions: Some say he was a Jain; a few others think he was a Buddhist; some others hold he was a Brahmin (Saivite/Vaiṣṇavite); some keep him above any or all such sectration denominations; and some just mark him as a great ecletic ethico-social reformer addressing mankind at large. As it is neither possible nor practical here to consider in detail the views of all scholars, I would cite one or two in each case representatively: Prof. A. Chakravarti Naynar tried to prove that Tiruvalluvar was a Jain Sage Elācārya, a disciple of Acarya Kundakunda; but Prof. S. Vaiyapuri pillai simply said that he was of Jain faith, The Buddhist work Maṇimekhalai and also some modern scholars state that Tiruvalluvar had the real Buddhistic vision. This could be, perhaps, particularly keeping in view his verses such as on Giving up Desire' (Tirukkural, part-1, Ch.37). Prof. S. Krishna Svami Aiyangar quoting some verses in Kural and connecting them with the Manusmṛti, the Mahābhārata, the Danacandrikā etc., concludes that the author of the Kural was Brahmanical in religion. C. Rajagopalachari, straightway rejecting Tiruvalluvar being claimed as Jain, finds him above all denominations. Prof Meenaxisundarm, after much discussion on this point, concludes that the auther of the kural refuses to be labelled. Prof. T. R. Sesh Aiyanger pointing out the poet-philosopher's particular qualities remarks: Valluvar resemble, that other great ecletic weaver, the medieval reformer, kabir, who spoke neither to any particular sect nor any one form of religion even, but to the whole of mankind.
But I for one, think that whatever could be the various regional and time-honoured meanings of the term Valluvar, Tiruvalluvar must have been from the very beginning an intelligent child and sprouting poetic genius; he must have belonged to same religious
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faith as a growing member of a family and society and gradually may have developed his scholarship and built his wordly wisdom, as nurtured by ecletic attitude and catholic spirit, and then presented these sweet, meaningful, epigrammatic, diadactic couplets to the world, so as to reach straightway the hearts of people at large. And in the course of all these developments, his own ethico-religious equipment and convictions must have played a crucial role, parti. cularly in shaping the design, nature and spirit of the Contents of the Tirukkural. Taking into consideration the earliest impact of Jainism on the Tamil land (c.400 B. C. onwards) and the early period of Tamil language and literature, we should remember that it were the Jainas who did the pioneering work of cultivating the Tamil language and gave it a literary form of refinement so as to reach classical dignity. It were the Jainas who produced works of considerable merit in the various branches of that literature, the gnomic and ethico-didactic works catering humanitarian values. Thus the Jain teachers and scholars happen to be the real apostles of culture and learning in the Tamil country in early days and Tiruvalļuvar was one of them. These points have already emanated from the reseaches of shri T.N. Shivaraj pillai (Chronology of early Tamilians), prof. Chakravarti Naynar, (Jain Literature in Tamil) and prof. S, Vaiyapuri pillai (History of Tamil language and Literature) etc. But taking a critical view af these and some other such points, I would humbly state that the Jaina tradition, which is history in its core, has in this case a grain of truth and not the whole truth, that Kundakundācārya alias Elācārya was the auther of the Tirukkuşaļ. Because Kundakundācārya, though moved over the bulk of the South Indian region, now covered by parts of Karnāțak, Āndhra pradeśa and Tamil Nādu, has not composed any work in any language of these areas, but in prakrit (Jaina Sauraseni) alone. Moreover this great philosopher Ācārya could not have bothered over subjects like Artha and Kāma. Then prof. Chakravarti's view that the Tirukkural was composed by Elācārya, a disciple of kundakundācārya, also has no evidence, internal or external. But we have a good external evidence, for saving that Tiruvalluvar was of Jain faith, in the admittance (though rather reluctantly) of ths Hindu Commentator on the Kural, parimelalagār, and in the citing of the Kural as 'em-oltu'-'our authority” by the Jain commentator Sa mayadivākara. Hence agreeing with prof, S. Vaiyapuri Pillai's view that “Tiruvalluvar was Jain admits of no doubt", but revising it on certain grounds, I would propose my own view in this regard as follows :
Tiruvallvar, in all probability, was a Jaina householder (grhastha
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or Śravaka), who came in close contact with a Jaina Sage holding the position of Elācārya (which is post-Upadhyaya and pre-Acarya rank in the Digambara tradition of teachers), and equipped himself with adequate knowledge of Jainism, and more particularly of the ethical discipline concerning the householder as well as the ascetic. As a fruit of such long term association as well as teachings of such teacher and his own equipment through deep study, together with keen observation round about, came out from his pen Aramdharma, of part I of the Kural, which is almost like a mini Manual of Ethical Discipline for the Householder in the main and the ascetic to some extent, highlighting his greatness, principal qualities, merits and spiritual significance etc. Moreover the impact of Tiruvalluvar's close association with and teachings of the Elācārya on him was so much effective that although a householder, he might have lived almost a saintly life and, hence, people round about the region may have called him too an Elācārya; and this phenomenon gradually seems to have settled down as an anecdote or a tradition in that area. Actually he could have been an erudite Jaina Householder and this fact gave a shape and spirit to part 1 of the Kural. In support of this theory, I would adduce in brief the following reasons and textual evidence: (All my references here are to the Humbuja Edition):
(i) By way of the Jaina mode of invocation at the beginning of the work, the opening couplet of the Tirukkural (I.1.1.) is with reference to Ati-pakavan-Adibhagavan, who could be none but Adinatha, Ādideva or Rṣabhadeva, the first TirthankaraFordmaker, who is Jitendriya-who won victory over the five senses (I. 1.7)
(ii) Further Ch.3 is devoted to highlight the greatness of Jain ascetics or renunciators (1.3.1) who have restrained their five senses, with the goad of resoluteness, and thus made themselves qualified for liberation (1.3.4); mounting the peak of renunciation, they nourish compassion or love for all the livings, tread the righteous path; and they (alone) are the true sages (1.3.9-10).
(iii) In Ch. 4 is presented an epitome of the nature of dharmarighteous conduct: That conduct which everyone ought to practise is dharma-righteous conduct; and that from which everyone ought to abstain is adharma-unrighteous conduct-exactly the Jain way of interpretation of dharma and adharma.
(iv) Ch.5 glorifies the general nature of grhastha-dharma- ethical discipline for householders. Love and righteous conduct are
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fundamental in the householder's life (1.5.5) which is superior to that of those who simply strive for liberation (1.5.7). The layman's life becomes worthless, if his wife, the woman, too does not possess the housholder's qualities (1.6.2).
(v) In Ch.8 the greatness of love, compassion or non-injury, which cannot be measured (1.8.4) is brought out as is done in Jainism. Love is the foundation af dharma-righteous conduct and also the destroyer of adharma—unrighteous conduct (1.8.6)
(vi) On close study and comparison, we find that the following Chapters in part 1 of the Kura! broadly constitute the very five Minor vows (aņu-vratas) prescribed for the householder in Jainism : (1) Ch. 33 (and 26 partly) -ahiṁsā—non-violence, non
injury. (2) Ch. 30 (and 19 partly) -Satya--truth. (3) Ch. 29
-asteya-non-stealing. (4) Chr 15
brahmacarya or svadárasantoşa or paradāra-nivrtticelibacy, being satisfied with one's own wife or abstaining from others'
wives. (5) Ch. 18 (and 37 patly) - Parimita-parigraha, iccha
parimāņa-limited possession of worldly materials or putting
limitation to one's desire. (vii) In some of the Chapters, we find, a few important ethicosocial virtues, prescribed in Jainism for the householder, are explained. The Chapters and the virtues are noted below: Ch. 12 -Samadarśana
-equanimity. Ch 13 Samyama
-Self-restraint. Ch. 16 - Kșamābāva
-forgiving nature, tolerance Sahanaśīlată Ch. 23 - dāna
-charity Ch. 26 ---nirāmişāhāra
-abstinence from non
vegetarian food (viii) The following chapters point out some of the special .qualities of an ideal householder that are enumerated in Jaina treatises on Householder's Code of Conduct : Ch. 9 atithisatkāra-entertaining atithis, ascetics or any deserving
persons (pātra) Ch. 10. madhura bhāṣā--sweet talk
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Ch. 14. sadācāra decorum, decent behaviour. Ch. 20. vyartha-kathana--purposeless talk, Ch. 22. paropakāra -helping others.
(ix) It can be particularly noted that part 1 of the Kural is replete with the great virtues and profound ethical values like ahimsa--non-violence, karuņā--compassion, anāmişāhāra sākāhāram abstinenee from meat-eating or vegetarianism, kşamābhāva-tolerance and forgiving nature etc., for the propagation and practice of which Jainism is wellknown to the world for the last two thousand years and more.
(x) Moreover it can be marked with special interest that the peculiar Jaina Concept of Truth or the “Jaina Interpretation of Truth” (As prof. R. Williams would put it) is presented candidly and accurately by Tiruvalļuvar in the Chapter on Satya-truth :
That indeed is truth, if the words expressing which do not cause any harm or injury to anybody (1.30.1).
If any goodness is to come out from some falsehood, that falsehood (or the words expressing it) also stand in the very rank of truth (1.30.2). This peculiar Jaina meaning and interpretation of truth in these two couplets can be rightly compared with that given by Ācārya Umāsvāmi in his Tattvārtha-sūtra–VII-14 and by his commentator Ācārya Pūjyapāda in his Sarvārtha-siddhi-VIl-14,
Now in this context, a question arises as to how to account for Tiruvalluvar's plan and design of his Kural, with the addition of part II, Porul-Artha (Socio-economic, Political and Administra tive Matters) and part III, Inbaṁ--Kāma (Idealised Love) ? Tiruvalļuvar, as a pious (Jaina) householder, scholar, poet and a keen observer of the society round about him must have thought of the householder's socio- economic responsibilities as well as his duties towards the state-which was of monarchial type with Kingship in those days; and he might have also felt the need of the householder's being equipped with the knowledge of idealised love for a conjugal and happy married life; and hence he may have added these two parts too through commendable exertion, self-study and in the course of such attempt and also as inspired by his ecletic attitude and catholic spirit, he must have drawn upon the various authorities from the Brāhmaṇic sources like the Manu-smrti, Mahābhārata, Arthaśātra, Nitiśāstra, Dānacandrikā, Vātsyāyana etc., and thus made
assic a worthy comprehensive treatise on the art of living for the good of all people.
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There are of course several examples of such attempts in the history of Jaina literature for example, the author of the Kannada Vadḍārädhane, the earliest available Jaina classic in prose (c. 925 A. D.) even though a monk has profusely drawn upon a number of Brahmanical works o fvarious strata to make his classic comprehensive and well-constituted. Then one may ask, can a pious householder (like Valluvar) possess such deep scholarship? Yes, Pandit Āśādbara (1300 A. D.), who composed notable works like the Sāgāra-dharmamṛta-the Nectar of Ethical Discipline for the Householder and the Anagara-dharmamṛta-the Nectar of the Ethical Discipline for the monk, was a householder. Pandit Todarmal (close of 18th cent. and beginning of 19th cent. A.D.), who was a pious householder and who lived almost like a sage, has to his credit learned commentaries on ancient Prakrit and Sanskrit works and also an original work entitled Mokṣamārga-Prakāśaka, which is a proud possession of every personal and public library for the pious-minded in North India.
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To conclude Tiruvalluvar, the author of the Tirukkural, the great Tamil classic, was an erudite Jain householder and poet of exceptional ability. He was a close disciple of a Jaina Sage of the rank of Elācārya and also had developed in himself ecletic attitude and catholic spirit. All these factors have influenced in shaping the plan, design, contents and spirit of his Tirukkural, which is rightly acclaimed as a world classic.
SELECT BIBLIOGRAPHY
Kural, English Translation and Notes, by C. Rajagopalachari, Bharatiya Vidya Bhavan, Bombay, 1968.
Tirukkural, Hindi Translation by Pt. Govind Ray Jain, pub. Kundakunda Bharati, New Delhi, 1988.
Tirukkural, Kannada Translation by Pradhan Gurudatta, Shri siddhantakirti Granthamälä, Jain math, Hombuj, 1989.
Tirukkural (Part I) with original Tamil Text, Kannada Tr. Paraphrase and Notes. by Frof. L. Gundappa, Bangalore, 1960.
Tirukkural (Thirumati Sornamal Endowment Lectures), part I (English), University of Madras, Madras, 1972.
(i) Philosophy of Tiruvalluvar, Lecture by Prof. T. P. Meenaxisundaram.
(ii) The Ethics of the Tirukkural, Lecture by Prof. V. A. Devasena
pathi.
Jain Literature in Tamil, Prof. A. Chakravarti Nayanar, Jain Siddhant Bhavan, Arrah, 1941.
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Vol. XVII, No. 3
Chronology of Early Tamilians, (Lectures) by Shri. T. N. Shivaraj Pillai (as noted by Prof. Chakravarti and prof. Meenaxisundaram). History of Tamil Language and Literature, Prof. S. Vaiyapuri Pillai, New century Book House, Madras, 1956.
Some Contribution of South India to Indian Culture, Prof. S. Krishnasvami Aiyangar, University of Calcutta, Calcutta, 1933. Dravidian India (part 1), Prof. T. R. Sesh Aiyangar. Madras,
1933.
Jaina Yoga, R. Williams, London Oriental Series, Vol. 14, London,
1963.
Tattvärtha-Sutra of Umäsvāmi.
Sarvärtha-siddhi of Pujyapada.
Vaddarädhane: a study, B. K. Khadabadi, Karnatak University, Dharwad, 1979.
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Anagāra-dharmāmṛta of Pt. Ashadhara.
Agara-dharmāmṛta of pt. Ashadhara. Mokṣamārga-Prakāśaka, Āciryakalpa Pt. Todarmal, Jaipur, 1986.
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THE GOMMATESA-THUDI
Gommatesa-thudi is a hymn in Prakrit metrically composed in reverence for Lord Gommatesa. It is of considerable importance because it is composed by Nemicandra Siddānta-cakravarti. Cămuṇḍaraya's spiritual teacher and religious counsellor, who had played a notable role in the historic consecration of the Lord's monolithic colossal image, which has been, since then, as good as the presiding deity of Shravanabelgola, converting the place into still a greater centre of pilgrimage and a fascinating spot of tourism.
-Dr. B. K. Khadabadi
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HOW I BECAME WHAT I AM
Dr. Chilana Mulk Raj
The need for evolution of consciousness is felt not only for social reconstruction and national integration, but more so to halt destructive tendencies which threaten even the human survival. Any step on behalf of conscientious persons to join hands, hearts and heads together will be definitely helpful in promoting widened consciousness. The most fundamental requirement, however, is for every one to undertake self-education activities for raising consciousness. The first step in this direction is to start watching the self.
Proceeding with sincerity on the path, I discover how often my consciousness slips into unconscious and subconscious realms. As I continue watching, mysteries start revealing, 'Who I am' and 'What I am made of". The structure and map of my consciousness reveal many hills and deserts. I also discover many dark and bright spots on its topography and landscape. Travelling further, I learn about the boxes in which I am confined and the blocks which hinder my further growth. If I do not mutilate the problems, nor resort to rationalization, my joy is greater in understanding the reality.
As I proceed further, I identify the filth and silt which have gathered over the years, My joy knows no bounds when I understand how and where the mud came from. The process is unending. the result is beautiful. I know where my consciousness is flowing. I feel I am unique and wonderful, though wrapped. I realize that my own efforts will only help me in further progress. It is also clear that the most essential condition for expanding consciousness is 'authenticity' in all matters of life.
This process helps me to learn myself about myself. It enables me to be alert and aware when I descend into lower consciousness. I recognize three pathways of sensations, images and memories which constitute my psyche. In the process of discovery of my inner landscape, I come across my strong and weak points. Unrolling of the memories manifests how I became what I am. I am willing to acknowledge way I acted the way it happened. I am also to judge myself more impartially. Above all, I am able to discern my uniqueness and respect the uncustomary traits of others.
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THREE MAGADHI SUTRAS FOUND IN THE COMMETARY OF RAGHWVA ON SAKUNTALĀ
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Jagatram Bhattacharyya
(Abhijñāna śākuntalam has attracted innumerable scholars through its versification, beauty of style, thought-content, grammar and from various other angles. Rāghavabhatta (1475-1500 A. D.) has written the commentary named Arthadyotanik on the Act Vi of Abhijñāna Sākuntalam wherein he has quoted sowe sūtars on māgadhi. At first it was a general opinion that the sūtars might be qouted from some standard prakrit grammar but on closer analysis the auther of this article found that they might be taken from some works which are not available today,
-E ) The Text
Ale kumbhilaā, kahehi kahim tue ese manibandha nukkinna námahee láa kilae arguliae samāśādie.
Rāghavabhațța (1) 'äccākṣepe' iti māgadhyām Vararuci sūtreņa sambuddhāvakár
adeśah. (2) 'rasor laśau' iti sūtreņa rephasya lo dantyasya tālavyaḥ, (3) ‘ata etsyāt' iti anena prathamaika vacanasyaikāraḥ. The other grammarians on the same : (i) adirghah sambuddhau-Vr. XI. 16 of Cowell's edition. (ii) ād-vākṣepe
-pu. XII.30 (iii) āksepe ād vā -RT. 2.2.27 (iv) adyā ākṣepe
--MK.XII.28 (v) a amantrye sau veno naḥ-- HC, (4.263), in the case of Sauraseni.
āccākṣepe In order to justify the long ä in kumbhilaā in the vocative, Rāghava Bhatta (RBb) has quoted a sūtra accāksepe in the name of Vararuci (Vr.)_'accāksepe' iti māgadhyām Vararuci sūtrena sambudda Vākārādeśah. The simple meaning of this is that in the sense of con'empt ā is added to the end of a word ending in a-base. For example- kumbhilaka- kumbhīlaā. In our existing editions of Vr.'s prāksta Frakāśa', there is no sūtra like accākṣepe as quoted by R:Bh. But in puruşotta mra
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(pu.), Rāma Tarkavägisa (RT.), and Markandeya (MK), there is a similar type of sutra such as ad-vākṣepe-pu. XII. 30, ākṣepe ād vāRT. 2.2.27, and advā ākṣepe-MK. XII.28. In Vr.'s Prākṛta prakāśā edited by Cowell, the sutra is completely different. Vr. has a-dirghaḥ sambuddhau-XI.16 of Cowell's edition), which simply means that in the vocative singular of the a-base, the final vowel is lengthened, for example he puliśă. In this connection, it could be mentioned that Hemacandra has almost a and not to Magadhi. The sutra is ā āmantrye sau veno naḥ-HC. 4. 263.
There are three problems of this issue (1) Whether a should be added in the Magadhi dialect or not, (2) or should it be added to the Sauraseni only as mentioned by HC. and lastly (3) or could we get ā in other dialects as well?
The eastern prakrit grammarians such as Pu. RT. and MK. have sanctioned ā also for the Magadhi. But for other prakrit dialects their views are not against it. Incidentally we may mention that the word ending in-in may take a, irrespective of any dialects in prakrit. For example-bho kañcukin oh kañcuia. This shows, though the base is different, that a can be added to the other bases as well a amantrye sau veno naḥ (HC. 4.263).
HC. However, has prescribed ā in Sauraseni. This shows that a in the vocative in Magadhi is not the only one where a occurs, it occurs in Sau aseni as well.
From the above discussion, we can say that a in the vocative is not actually a dominant feature of Magadhi, but it can be used in any type of prakrit, two of them (Sauraseni and Magadhi) are already sanctioned by the grammarians. In fact, HC. has a sutra do dīrgho vā (3.38) which sanctions a in the vocative even in the Mahārāștri or prakrit in general iha tva prapte he goamā he goama (vṛtti under HC. 3.38). However as RBh. was trying his best to explain some of the Frakrit peculiarities by citing rules of Frakrit language he has quoted or mentioned the sutra accāksere in crder to justify a in kumbhilaā. Incidentally it may be mentioned that the sutra mentioned by him is not actually found in any of the existing prakrit grammars. It appears therefore, either he has prepared by himself the sutra in the name of Vr. or if it is not made by him, he might have got it from some other Prakrit grammarians whose works have yet not survived.
Rasorlas'au
RBh. has given another sutra 'rasorlaśau' which says r and s will be changed into I and palatal s respectively.
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Tho sūtra as it is printed in the text seems to be alright. This sūtra is analogous to the sūtras of some of the Prakrit grammarians, Though RBh. has not mentioned from where the sūtra has been quoted, we can assume that he has not in this case followed Vr. because Vr. has no sūtra with r becoming I. But HC. has a sūtra rasor lasau (4.288), and other prakrit grammarians such as, pu, RT. and MK. have also similar type of sūtras. But we can assume that RBh. has not quoted from HC. However, the sutra rasor laśau of RBh. is quite grammatical and free from any defect.
ata et syāt Compare other Grammarians on this third sutra : (i) ata idetau luk ca—Vr. XI. 10. (ii) ata et sau pumsi māgadhyām--HC. 4.287. (iii) sau-pumsye lataḥ- Tv. 3. 2. 30. (iv) ataḥ sa (sā) vo de tau-pu. XIV.2 (v) adanta soride tau pumsi-pu. XII. 25. (vi) nesiti (editau) sau ca-pu. XV, 4. (vii) luk ca cchando vaşāt-pu. XIII.26 (viii) atastvi detāviha pumsi sau dvau na esi diśțhi ycchi vi e na esen
RT.2.25. (ix) sau pumsya de dit au-MK. XII. 26.
RBh. has quoted this sūtra “ata et syāt” which regulates the ending of nominative singular of a-base. In Māgadhi nominative singular of a-base becomes e, in this respect prakrit grammarians differ quite a lot. The Western prakrit grammarians such as HC., TV, and others say that in Māgadhi, nominative singular of a-base will take only e. The eastern prakrit grammarians such as Vr. pu. RT. and MK. say that the nominative singular of ā-base in Māgadhţ has three suffixes ei, and no suffix at all.
On ale pischel (23) remarks :
'It is attested by prthvidhara, in stenzler, p. V. and Godabole, p. 493. In the printed edition he speaks, but the MSS throughout indicate Māgadhi as in 161, 9 they have ale ale, in 161, 16 mäledha, in 165, 25 ale and in DH in Godabole p. 4499 too there occurs mâleda. In the introductory scene there is 32, 10=484 12 ed. Godabole H. āvutte. Wrongly analysed by BLOCH, Vr. and HC. p. 3. cf. 42.'
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TESHUB OR RESHUB : THE ARHAT
V. G. Nair
According to literary evidence available from the Jain and Buddhist scriptures, the Vaiśyās during the time of Lord Mahavira had extensive traderelations not only with many parts of India but also with many foreign countries. These seths were mostly Jains.
Trade and commerce had been the traditional profession of Jains hailing from Gujrāt, Rājasthan, Saurastra, Mewad and other parts of Northern and central India from hoary antiquity to this day. In the same way, southern India consisting of the Andhras, Kalingas, Cheras pandyās and Cholas carried on overseas trade with many foreign countries.
The Tamils were great founders of Kingdoms in Malāyā, Burmā and Indo-china. Dr. Mazumdar has declared the. Greater India beyond the seas is the creation of south Indians. In Africā, Burmā, Malāyā, Ceylon, zanzibār, Ugandā, Mauratius and many other lands of South East Asia, the achivements of Indian labourers, religious missionaries, architects and artisans are unparralelled in the history of mankind.
In the 6th century BC, there were some notable commercial ates in Magadha, Kāsi, Kosala, and south India. They were
ated for their extensive overseas trade and fabulous wealth. Trading vessels of Rome, Greece, China, Japan, Indonesia, Korea, Egypt and Far Eastern countries arrived at the seaports of Kerala, Tamilnadu Āndhra, Bengal, Kalinga and Mahārastra bringing valuable merchandise from Assian and European countries in exchange for Indian products like pearls, pepper, precious stones, ivory, silk, spices, timber, muslin coottn frabrics, indigo and aromatics.
All these were precious commodities and novelties in Rome, Greece and many Asian countries. The pearls of South India fetched fabulous price in Rome where aristocratic ladies found them indispensable for making ornaments.
The income to India from Rome alone amounted to millions of gold coins almost every year. According to the Natural History of pliny, Julius Caesar presented Servilia, the mother of Brutus, with a
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Vol. XVII, No. 3 pearl for which he paid fifty thousand four hundred and fortyseven pounds. The famous pearl ear-rings of Cleopatra were in value one hundred and sixty one thousand four hundred and fifty eight pounds. These precious pearls were imported from south Indian regions ruled by the Pandian kings of Madurai,
Many centuries before the arrival of Marco Polo and Vascode Gama to the seaports of Cochin, South India had trade relations with Asian and European countries. Indian religion or cultural wealth and wisdom especially the Arhat dharma and the Vedic and Buddhist religions flowed freely across the seas in many parts of the world.
The Jatakas, the Buddhist and Jain religions, literature have described the exploits of those early enterprising seafaring traders of India who crossed the wide seas in boats battling against rising waves and storms carrying their merchandise to Malāyā, Burmā, Sumātra, Jāvā, Indonesia, Egypt and China. Foreign trade settlements and trade emporiums existed in some of the seaports of India and similarly Indians has also their emporiums in the countries beyond the seas.
The Romens had trade settlements in South India, Notable among them was in the celebrated city of Muziris, modern Cranganove ruled by Cheran Senkuttu van of the Silappadikaram fame. The Romans had a temple at Cranganove dedecated to Apollo. Similarly Indian settlers in foreign countries had also houses of worship and their relics are found today in many parts of the world.
The capital city of ancient Chaldea was called 'Ur', a Tamil name. It was built about seven thousands years before Christ. In the ruins of Ur excavated by archaeologists was found the famous timber logs from Kerala. All these facts go to prove that India had trade and cultural relations with overseas countries from the days of hoary antiquity and that the Rishabha-cult of Arhat-dharma was the predominating religious faith of the people in many parts of Asia and Europe.
Some cities and towns were named after Rishabha. In Syria, there is a province called Amurru. In that province is a city named after Rishabha. It is mentioned in the inscription of the Marriking Zimerelin (1730-1600 B.C.). In Soviet Armenia is a town called Teshabani near Kermer Blur. The Babylonian city of Isbekzur is a corrupt form of Rishabhapur. These facts go to prove that Rishabha was worshipped in those countries from hoary antiquity.
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Reshef: The god of phoenicians was regarded as apollo by the Greeks. A bronze statuette of Reshef of the 12 th century B. C. was discovered at Alasia near Enkomi in Cyprus. Dr. Glaude F. A. Schaeffer, Director of French centre of Scientific Research, Paris has indentified this statuette as that of Apollo of Cyprus, the pheenician God Reshef. An ancient Greek statue of Apollo resembles the image of Rishabha. The statue of Apollo of the Greeks possessed all the features of Rishabha image. Rishabha is worshipped in India in the name of surya-murthi or God of Enlightenment, Sun God. Reshef or Apollo of the Greeks is also worshipped as Sun God. There was close relation between Greek and Indian savants in the prehistoric times. The phoenictans worshipped Reshef as the deity of agriculture. Rishabha was the originator of the science of agriculture. The chaldean Teshud or Reshubh represented Rishabha. The images of Teshub have been discovered at Malatia, Boghaz Keui, in the Zinerli sculputure, in the ancient monument at Isbekjur. Teshub is the chief deity of the Hittite Pantheon. He stands on a bull and has the three-pronged thunderbolt as his distinctive weapon. prof. R.C. Raychudhuri has identified Teshub with shiva. In ancient times Rishabha was worshipped in India as siva. The Jains recognise Lord Jina as Siva who bears the Ratna Traya interpreted as Trisula which is not a weapon, but only the symbol of the three gems of Jain sm. Teshub's consort Ma stood on a lioness or panther. Chakreshawari is the yakshi of Rishabha. Her vahanam is a lion. The ancient symbol of Rishabha is Ratna traya, the symbol of Siva wrongly taken subsequently in the form of Trisula. Several other images of Teshef or Reshef were discovered in many parts of mediterranian countries. All these images resemble the image of Rishabha found in many parts of India. Excavations in soviet Armenia at Kasmir-blur, near Erivan, on the site of the ancient city urartion of Teshabani have brought to light some figures including a bronge statuette of Tesheb. It bore distinct Indian features of Rishabha. It wore a decorated crown and held a hammer in its left hand while in the right hand it held a miniature of the Indian plough. The ancient Jaina kings bore a crown with drawings of Jaina deities. The fifth line of the Hathigumpha inscription has referred to this decorated crown, It is mentioned in the Mahapuranam that Emperor Bharata caused to be made the drawings or figures of Rishabha on bells and also in his bell like crown. Among the relics discovered at the site of Teshabani is a decoreted bronze helmet which bore the dedication of king Argishtis
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(780-760 B. C.) it presented decorative scenes of Jaina stupas and chaitya. This town of Teshabani was founded by king Ruas (680. 645 B. C.). The names of Ruas and Argishtis reflect same resemblance to Indian names. Rusaha (the name of Rishabha in Apabhramsa prakrit) and Arhatas which is derived from the root Argha. Silivis Ferri refers to India as the land from where many of these motifs came and the discoveries at Kasmir Blur confirm his findings.
00
जैन विश्व भारती, लाडनूं [राज०]
आमग-साहित्य धारकों से एक निवेदन
XXDXXSEXXEXBXX
अनुभव हुआ है कि संस्था द्वारा प्रकाशित आगम-साहित्य के अध्ययन के प्रति श्रावक-समाज की रुचि अपेक्षाकृत कम है या फिर यह विषय सहज ग्राह्य नहीं है। ऐसी स्थिति में पाठकों के लिए रुचिकर योग, कथा एवं जीवन विज्ञान साहित्य उपलब्ध कराने की एक योजना प्रसारित की गई है। इसके अन्तर्गत आपके पास जो आगम-साहित्य हैं उनके बदले में आप मूल्यानुसार योग साहित्य या अन्य साहित्य संस्था से प्राप्त कर सकते हैं।
भीचंदगानी
मंत्री
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Book-Review
1. Title : Bibliography of Prakrit and Jain Research, Editor : Dr. Kapoor Chand Jain, Publisher ; Shri Kailash Chand Jain memorial Trust, Khata uli-251 201 (U. P.) Second Edition. 1991, price : Rs. 60/- pages : 130+33,
Jainism is an important tradition of Indian culture. It has voluminous literature, in Prakrit, Sanskrit, Apabhramsa and Hindi etc. South Indian languages too are profusely full of Jain leterature. This rich legacy was totally Neglected in the later mediaval period of Indian History. But later on in 19th century some western scholars showed interest in jain canons as well as non-canonical literature. And they found before themselves a litrature that has grown to an enormous extent over several millinnia. Consequently various research work based on comparative study and sophisticated catalogues were published.
The beginning of the twentieth century saw a remarkable development in jainology. The works of old masters were printed, translations were done of the originals and commentaries thereupon and new commentaries were written. Research activities in Jainology become popular and a large number of research papers were presented as theses for doctorate and have been awarded degrees.
However there was, till now, no bibliography and almost no preliminary study that could eventually be combined to form a practical hand-book for the use of research. Dr. Kapoor chand scholars. Jain is the pioneer, who delved deep, in this fied of Jaina-logical research and prepared a Bibliography of prakrit and Jain Researches. This Bibliography contains the name of the author, the subject, under whose direction the thesis was prepared, whether published or unpublished and the name of the publisher etc. The author has taken special pains to contact all the 34 research centres on Indology in India and compile such a valuable information on Jainology for the first time. It gives the bibliography of 588 theses of Indian Universities and 36 disertations approved by the foreign Universities.
The list of 588 theses is preceded by (i) List of Universities where
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Vol. XVII. No. 3 research work is done, (ii) List of senior scholars who have supervised. (iii) List of Research centres (iv) List of journals interested in the research work and this is followed by jainological Research abroad and Research works in progress also.
Furthermore the author has given a list of 95 topics suggested by Acharya Gopilal Amar which may be taken up for research in Jainology. In this way indeed the work of course deserves hearty congratulations. It is an incentive for the quest of knowledge and of enormous importance to scholars in the field.
2. Gommatesa–Thudi of Acharya Nemichandra Siddhanta Cakravarti. Critically Edited by Dr. B. K. Khadabadi and published by Sri Kundkund Bharti, New Delhi, 1990, price : Rs. 20.00 pages 65+24.
Gommațesa—thudi-Hymn of Gommațesa by Acharya Nemichandra Siddhanta--cakravarti first came to light in 1979 on the eve of the 1000th anniversary of the image of Bahubali.
It was in 1975 that Ācarya Sri Vidyānandji had brought out to light its first five verses, and then in 1979 its full text with Hindi translation and a few explanatory notes. Later this hymn rose to great popularity both among scholars and general votaries of Bhagwan Bahubali and created a great stir in all sections of Jains and non-Jains alike,
It is really very gratifying to not that an eminent Prakrit scholar and Jainologist like Dr. B. K. Khadabadi has prepared a critical edition of this hymn. He has made every effort to make this critical edition a success by providing scholarly introduction, critical text, translation, references, notes and appendics ctc. His scientific discussion about the title, authorship, date, language, metre and other connected matters pertaining to the hymn is quite through and revealing.
Dr. Khadabadi himself felt and reconciled the need of an English edition of this melodious hymn and was drawn to this desidertum. He undertook and completed it alongwith his own english poetic composition on Lord Gommatesvara entitled Obeisance in the octave form.
Publication is neat and clean and it looks complete in all aspects. It is also encouraging that the Kundakunda bharti, New Delhi has published this important edition. We hope this would be widely welcomed by the English knowing people both in India and abroad.
-Parmeshwar Solanki
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TULSI-PRAJNA, Oct.-December, 1991 3. Mookmāti mahākāvya : Kāvyaśāstriya Nikașa (*HTET HET T4 : 74 Test fao), Author prof. Sheel chandra Jain, publisher : Digambara Jain Samai, Chindwara (M.P.), price Rs. 107year 1991.
This book is like a touchstone to test the Mookmāti Mahakāvya, an epic by Jain Acharya Vidyasagarji maharaj who has thought it suitable to select an unimportant thing like "sand" as the subject matter of his epic and brought to light the compassionate feelings and underlying desire of the 'sand' for emancipation. The author has evaluated the epic on the basis of five grounds :-namely Establishing the human values of life (2) Setting the ideals of life of the age, (3) Cooperation in cultural upliftment, (4) Advanced philosophical thoughts, and (5) Capability to produce life-giving energy.
We have amply seen that the author has done justice to test this compendium of monasticiam which provides a direction to the other philosophies of the world though Jain philosophy to which Vidyasagarji maharaj is devoted and dedicated heart and soul.
The core tenets of Jainism -- the real is that which is free from orisination, cessation and permanece”, are discussed in detail by the author Prof. Jain who has highlighted the śramaņa culture (which stands for non-attachment) leading one from bhoga to yoga, from the self to the supreme self, and from Saitāna to the human beings.
The learned critic has of course narrated all in an excessively emotional mood, all what was not necessary to keep himself impartial. But on the whole the evaluator has succeeded in making the message of the epic intellisible to scholars.
However Prof. Jain deserves all appreciation for bringing about such evaluation about really great epic by Vidyasayaji maharaj.
--Ram swaroop soni
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लेखक
the contributors
१. श्री गोपाल शर्मा, प्राध्यापक, आर्टस् एवं कॉमर्स कॉलेज, कपडगंज केलवानी मंडल, कपडवंज ( जिला - खेरा) गुजरात - ३८७६२०.
२. डॉ० भागचन्द जैन 'भास्कर', अध्यक्ष, पालि एवं प्राकृत विभाग, नागपुर यूनिवर्सिटी, रेजीडेन्सियल न्यू एक्सटेंसन एरिया, सदर, नागपुर -४४० ००१.
३. डॉ० सुषमा सिंघवी, निदेशक, रीजनल सेन्टर, कोटा ओपन यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी केम्पस, उदयपुर - ३१३००१.
४. डॉ० जगन्नाथ जोशी, संस्कृत विभाग, कुंमाऊ विश्वविद्यालय, नैनीताल एवं डॉ० (श्रीमती) कमला पन्त, मोती सदन, तल्ली ताल, नैनीताल ।
४. डॉ० के. आर. चन्द्र, अध्यक्ष, प्राकृत-पालि - विभाग, भाषा विभाग, गुजरात - विश्व - विद्यालय, अहमदाबाद - ६
६. श्री सीताराम दाधीच, प्रिन्सिपल, ब्राह्मी विद्यापीठ, पारमार्थिक संस्था, लाडनूं. लाडनूं
७. श्री अमृतलाल शास्त्री, व्याख्याता, ब्राह्मी विद्यापीठ,
८. डॉ० रामप्रसाद मिश्र, १४ सहयोग अपार्टमेंट्स, मयूर विहार, दिल्ली - ६१.
६. श्री नेमीचन्द जैन, प्रवक्ता, भौतिक शास्त्र, बांगड़ महा विद्यालय, डीडवाणा (नागौर) ।
१०. श्री लाखन सिंह शर्मा, प्राध्यापक (हिन्दी) श्री जे० वी० सी० हायर सेकेण्डरी स्कूल, लाडनूं ।
११. पं० चन्द्रकांत बाली, एनडी २३, पीतमपुरा, दिल्ली - ३४.
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16. Mr. Jagat Ram Bhattacharyya, Lecturer, Prakrit Dept., JVBI, Ladnun.
17. Dr. B. K. Khadabadi, Aradhana, Kolekar Street Sankeshwar591313.
18. Dr. G. V. Tagare, A-4, Paranjape Housing scheme, Madhavanagar Road, Sangli-416 416
19. Mr. V. G. Nair, Adeeswara Bhawanam, Polal Red Hills, Tamilnadu.
13
20. Dr. Chilana Mulk Raj, Professor of Education, N.C.E.R.T., New Delhi.
21. Shri Ram Swaroop Soni, Research Officer, JVBI, Ladnun.
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पत्राक्ष:
१. 'मेरा तेरापन्थ से काफी सम्बन्ध रहा है। मेरा गांव गंगापुर (भीलवाड़ा) है।
मेरे मोहल्ले में ही आचार्य श्री तुलसीजी को आचार्य पद दिया गया था। मैं उस समय ५ वर्ष का था। मैंने सारी घटना देखी हैं। इसके बाद भी आचार्यश्री के कई बार गंगापुर, राजनगर, जयपुर आदि स्थानों पर दर्शन किए हैं।' ___ 'पत्रिका में आपके आ जाने से इसका कलेवर भी अच्छा हुआ है । आशा है कि पत्रिका आगे और अधिक उन्तति करेगी।'
श्री रामवल्लम सोमानी, जयपुर २. 'तुलसी-प्रज्ञा का जुलाई-सितम्बर अंक मिला। संपादकीय बहुत अच्छा लगा।
खारवेल के समूचे लेख का सम्पादित पाठ प्रकाशित करें तो और भी अच्छा होगा । इस लेख को लेकर मौर्यसंवत्, नंदसंवत्, पुष्पमित्र और खारवेल की समकालीनता, आन्ध्रवंश के राजा शातकर्णी से खारखेल की समकालीनता आदि तरह-तरह की कल्पनाएं की गयी हैं । सही पाठ से बहुत-सी बातें स्वतः निर्णीत हो जाएंगी।' ___ 'मेरी समझ में 'बहसतिमित' पुष्यमित्र नहीं है । कैम्ब्रिज हिस्ट्री का अन्धानुकरण करके बहुत से इतिहासकार महावीर को बुद्ध का जूनियर कन्टेम्प्रेरी बताते हैं, उनका निर्वाण भी बुद्ध के बाद कहते हैं । यह सब उनकी नासमझी है । इस संबंध में आपने जो तथ्य रखे हैं, वे सर्वथा मान्य हैं।'
श्री उपेन्द्रनाथ राय, मटेली (पं. बंगाल) ३. 'मैं भक्तवर ईसरदासजी कृत 'हरि रस' को पूर्ण प्रामाणिक पाठ सहित सम्पादित
करने में लगा हूं।......जैन विश्व भारती जैसी अन्तर-राष्ट्रीय ख्याति की संस्था में आप जैसे विद्वान् का होना मणिकाञ्चन योग है । आज हमारे प्राचीन सत्साहित्य को छापने वाले कोई नहीं दिखाई देते, जिस साहित्य पर हमें गर्व है
और विदेशियों तक ने जिसे खूब सराहा है । 'तुलसी प्रज्ञा' का अंक अत्यन्त महत्त्व पूर्ण सामग्री से भरपूर है । पूरा पढ़कर सम्मति भेजूंगा । आपको सुष्ठ सम्पादन हेतु बधाई ।'
डॉ. शक्तिवान कविया, जोधपुर ४. 'तुलसी-प्रज्ञा' का नया अंक प्राप्त हुआ। इसके लिए हार्दिक धन्यवाद । स्पष्ट ही
आपके सम्पादकत्व में इस अनुसंधान-पत्रिका में विशेष निखार आया है, जो सराहनीय है।'
'प्रस्तुत अंक में प्रकाशित सामग्री पठनीय है और मैंने इसे बड़े चाव से पढ़ा है। श्री विश्वनाथ मिश्र, डॉ० के० आर० चन्द्र तथा डॉ० प्रेमसुमन जैन के लेख मुझे विशेष पसंद आए हैं।'
ग मनोहर शर्मा, अध्यक्ष हिन्दी विश्व भारती, बीकानेर
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5. 'Thank you very much for sending me the July-September. 91
issue of Tulsi prajna. I have gone through the English section of articles included in it. I am delighted to read such valuable and thought-provoking writing by men of eminence'.
'I am learning Hindi now, gradually I may be able to read and understand Hindi articles in it. The Journal, I am convinced, is useful to all those interested in knowing the ancient glory of Indian thought, Let this Journal flourish for long and serve the cause of humanity, under the aiges of Acharya shree Tulsi.
(Prof) H. R. Dase Gowda;
___Bangalore. ६. 'पहली बार 'तुलसी प्रज्ञा' देखने को मिला । इतिहास, दर्शन एवं अध्यात्म ज्ञान
की कुंजी-सा यह मालूम हुआ । मेरा काफी ज्ञानवर्धन हुआ। आपके इस अंक से ज्ञात हुआ कि गत अंक में भगवान् महावीर के काल के बारे में कोई शोधपूर्ण लेख आपने प्रकाशित किया था। हमने सितम्बर ६१ के 'अहिंसा विहंगम' में भगवान् कृष्ण की ५१५६ वी जन्म तिथि पर जन्माष्टमी अभिनंदन किया था। विदेशी एवं विशेषकर ब्रिटिश साहित्यकारों एवं इतिहासविदों ने अपनी हीन भावना को छिपाने हेतु भारतीय संस्कृति के इन स्तम्भों के जीवनकाल को ईसा के समय के बाद बताना चाहा था पर यह संभव नहीं होने से ईसा के कुछ सौ वर्ष पूर्व ही बताने का दुराग्रह करते रहे हैं एवं हमारे भारतीय मानसिक गुलाम इस पर अन्वेषण एवं शोध करने की बजाय उनकी हां में हां मिलाने जैसे सरल रास्ते पर चलते रहे हैं । आप के इस अनुसंधान-त्रैमासिकी हेतु मेरा साधुवाद एवं धन्यवाद ।
भंडारी मदनराज, महासचिव, राष्ट्रीय अहिंसा प्रतिष्ठान, जोधपुर ७. 'आपके कुशल संपादकत्व में 'तुलसी प्रज्ञा' अभी सुन्दर निकल रहा है। इस
अंक के लेख शोर्ट हैं लेकिन बहोत रोचक और ज्ञानप्रद हैं । ऐसा ही होना चाहिए। क्योंकि यह एक रीसर्च जर्नल होते हुए भी हम जैसों के लिए यह पठनीय पत्रिका है। साथ में आप जो बुक रीव्यू देते हैं वह तो बहोत अच्छा है।'
एस० के० शाह, सांगली ८. 'तुलसी प्रज्ञा' का अंक देखने को मिला। पत्रिका का स्वरूप आपके संपादकत्व में और भी निखर गया है । आपको हार्दिक बधाई ।'
(श्री) हजारीमल बांठिया, पंचाल शोध संस्थान, कानपुर ।
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________________ Registration Nos. Postal Department : NUR-08 Registrar of Newspapers for India : 28340/75 TULSI-PRAJNA Oct.-Dec., 1991 Vol. XVII, No. 3 प्रकाशक-मुद्रक : रामस्वरूप गर्ग द्वारा जैन विश्व भारती, लाडनं-३४१३०६ के लिये जैन विश्व भारती प्रेस, लाडनूं में मुद्रित /