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माँ सरस्वती
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श्री सम्यग्ज्ञानोपासना विभाग
महोपाध्याय श्री यशोविजयजी महाराजकृत श्री नवपदकी पूजा में से
अन्नाण संमोह तमोहरस्स, नमो नमो नाण दिवायरस्स पंचप्पयारस्स गारगरस्स, सत्ताण सव्वत्थ पयासगस्स || होये जेहथी ज्ञान शुद्ध बोध, यथावर्ण नासे विचित्रावबोध, तेने जाणिये वस्तु षड्द्रव्यभावा, न हुये वितत्था निजेच्छा स्वभावा । होये पंच मत्यादि सुज्ञानभेदे, गुरुपास्तिथी योग्यता तेह वेदे, वळी ज्ञेय हेय उपादेय रूपे, लहे चित्तमां जेम ध्वांत प्रदीपे ॥ भव्य नमो गुण ज्ञानने, स्वपर प्रकाशक भावेजी । परजाय धर्म अनंतता, भेदाभेद स्वभावेजी || जे मुख्य परिणति सकल ज्ञायक, बोध भाव विलच्छना, मति आदि पंच प्रकार निर्मल, सिद्ध साधन लच्छना, स्याद्वाद संगी तत्त्व रंगी, प्रथम भेदाभेदता,
सविकल्पने अविकल्प वस्तु, सकल संशय छेदता,
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• भक्षाभक्ष न जे विण लहिये, पेय अपेय विचार,
कृत्य अकृत्य न जे विण लहिये, ज्ञान ते सकल आधार रे, भविका सिद्धचक्र पद वंदो. १ • प्रथम ज्ञान ने पछी अहिंसा, श्री सिद्धांते भाख्युं,
ज्ञानने वंदो ज्ञान न निंदो ज्ञानीए शिवसुख चाख्युं रे... भविका २
• सकल क्रियानुं मूल जे श्रद्धा, तेहनुं मूल जे कहिये,
तेह ज्ञान नित नित वंदीजे, ते विण कहो केम रहिये रे... भविका ३ • पंच ज्ञानमांहि जेह सदागम, स्वपर प्रकाशक जेह,
दीपक परे त्रिभुवन उपकारी, वळी जेम रविशशि मेह रे... भविका ४ • लोक उर्ध्व, अधो, तिर्यग, ज्योतिष, वैमानिक ने सिद्ध,
लोकालोक प्रगट सवि जेहथी, तेह ज्ञान मुज शुद्ध रे... भविका ५
• ज्ञानावरणी जे कर्म छे, क्षय उपशम तस थाय रे,
तो हुए एहि ज आतमा, ज्ञान अबोधता जाय रे,
वीर जिनेश्वर उपदिशे, तुमे सांभळजो चित्त लांइ रे,
आतम ध्याने आतमा, रिद्धि मले सवि आयी रे... . महावीर ...