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अवतरणिका माहात्म्बमें उक्त है कि यह गीता "स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता"। गीता की भित्ति कवि-कल्पना नहीं है, सचमुच यह ऐतिहासिक घटना मूळक है। जो लोग गीताकी ऐतिहासिकताके विषयमें तर्क वितर्क करते हैं, वह लोग दूरदर्शी नहीं हैं; गीताकी सत्यता देशकाल पत्रादिसे भी विच्छिन्न नहीं है; यह विश्वजनीन अविच्छिन्न ज्ञानप्रवाह स्वरूप है। इस विषयमें कुछ आलोचना की जाती है।
किसी समयमें इस आयभूमि भारतवर्ष में श्रीकृष्ण नामीय स्थूल शरीरधारी एक सर्वशक्तिमान महापुरुष आविर्भूत हुये थे। उन्होंने अपनी असाधारण शक्तिसम्पन्न कृती शिष्य अर्जुनको युद्धक्षेत्रमें ही इस गीताशास्त्रका उपदेश किया था। काई कोई कहते हैं कि, युद्धक्षेत्रमें युद्ध प्रारम्भ होनेके ठीक पूर्व में गीता जैसा वृहत् व्यापारका संघटन होना असम्भव है; कुरुक्षेत्र युद्धके साथ इस गीताका संस्रव कविकल्पना मात्र है। उनको समझाने के लिये इतना ही कहा जा सकता है कि, पहिले तो श्रीकृष्ण स्वयं भगवान सर्वशक्तिमान हैं, उनका कार्य मनुष्य प्रकृतिके अतीत है। दूसरे, गीताका उपदेश करनेके समय में वह योगस्थ हुये थे, अर्जुनको भी योगस्थ किया था। योगस्थ अवस्थामें सूक्ष्म शरीरमें क्रिया होती है। उस समय एक लहमाके भीतर एक युगकी क्रिया भी हो सकती है, जैसे कि स्वप्नावस्थामें हमलोग दो एक मिनट में एक दीर्घकालव्यापी वृहत् व्यापारका सम्भोग कर लेते हैं। इसलिये गीताके साथ कुरुक्षेत्र युद्धके संस्रव सम्बन्धमें सन्देह करनेका कुछ कारण नहीं है। ___ किसीके मनमें ऐसा भी उदय हो सकता है कि, कुरुक्षेत्र युद्धके समयमें भगवानने अर्जुनको आद्यन्त गीताका उपदेश किया, उनके सम्बन्धमें सबही सम्भव है, परन्तु क्या युद्ध करनेमें प्रवृत होकर योग की आलोचनामें प्रवृत्त होना समयोचित है ? इसके उत्तरमें यह कहा