Book Title: Paramarsh Jain Darshan Visheshank
Author(s):
Publisher: Savitribai Fule Pune Vishva Vidyalay
View full book text
________________
१२०
२.
४.
५.
६.
७.
८.
बालेश्वर प्रसाद यादव
अनन्तधर्मात्मकं वस्तु। अनन्तधर्मात्मकमेव तत्त्वम् । - अन्ययोगव्यच्छेदिका, पृ. २२, उद्धृत शर्मा, चन्द्रधर, भारतीय दर्शन : आलोचन और अनुशीलन, मोतीलाल बनारसीदास पब्लिशर्स प्रा. लि., दिल्ली, १९९१, पृ. ३२ आचार्य महाप्रज्ञ, अनेकान्त : फिलॉसफी ऑफ को एक्जिस्टेंस, जैन विश्वभारती, लाडनूँ, २०१०, पृ. २१
-
गुणपर्यायवद् द्रव्यम्, तत्त्वार्थसूत्र, ५.३७ उत्पादव्ययध्रौव्यसंयुक्तं सत्, यथोपरि, ५.२९.
सदेव सत् स्यात्सदिति त्रिधार्थो मीयेत दुर्नीतिनयप्रमाणैः। अन्ययोगव्यच्छेदिका,
२८
अनेकान्तात्मकार्थकथनं स्याद्वादः । - लघीयस्त्रयटीका, ६२ स्यादित्यव्ययमनेकान्तद्योतकं ततः स्याद्वादोऽनेकान्तवादः । स्याद्वादमंजरी,
५
मेहता, मोहन लाल, जैन धर्म-दर्शन: एक समीक्षात्मक परिचय, सेठ - मूथा छगनमल मेमोरियल फाउण्डेशन, बेंगलोर, १९९९, पृ. ३५९.
१०. तत्त्वार्थसूत्र से उद्धृत, देखें आचार्य महाप्रज्ञ, (अनु.) रघुनाथन, सुधामाही, अनेकान्त : द थर्ड आई, जैन विश्व भारती यूनिवर्सिटी, लाडनूँ, २००९, पृ०
२३.
मेहता, मोहन लाल, पूर्वोद्धृत, पृ. ३५३. उत्तराध्ययनसूत्र, १९.२५
११.
१२.
१३. सूत्रकृतांग, १.११.३३.
१४. मेहता, मोहन लाल, पृ. ५०५. १५. तत्रैव ।
१६. 'दिनकर', रामधारी सिंह (२०१२), संस्कृति के चार अध्याय, इलाहाबाद लोक भारती प्रकाशन, पृ. ११५.

Page Navigation
1 ... 124 125 126 127 128 129 130 131 132 133 134 135 136 137 138 139 140 141 142 143 144 145 146 147 148 149 150 151 152 153 154 155 156 157 158 159 160 161 162 163 164 165 166 167 168 169 170 171 172