Book Title: Paia Subhasiya Sangaho
Author(s): Bhavyadarshanvijay
Publisher: Padmavijay Ganivar Jain Granthmala
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________________ પ૬ सरिसवमित्तं सुक्खं जीवा पावंति विसयसंजणिअं / दुक्खं पुण मेरुमहागिरिंदगरुअं चिअ लहंति // 575 // पुरिसा विसयपसत्ता मइरामत्त व्व इत्थ जिअलोए / विहवक्खयमवकित्तिं मरणं पि गणंति नो मूढा // 576 // विसया विसं व विसमा विसया वइसानरु व्व दाहकरा / विसया पिसाय-विसहर-बग्घेहिं समा मरणहेऊ // 577 / / अहवा विसाइणो इह मरणकरा हुंति एगजम्मंमि / विसया उ महापावा अणेगजम्मेसु मारंति // 578 // . हरिणो सद्दे सलहो रूवे भसलो अ गंधविसयंमि / मच्छो रसे गइंदो फासे गिद्धा विणस्सति // 579 / / एकेकंमि विसए लुद्धा निहणं गया इमे मुद्धा / कह पुण पंचसु गिद्धो न मरिस्सइ मयणसरविद्धो // 580 // तह सत्थवाहभन्जा भद्दा भदंमि सद्दविसयंमि / / गिद्धा गिहाउ पडिआ सिणेहनडिआ गया निहणं // 581 // महुरावणिओ रूवे देवीअंगुहृदंसणे गिद्धो / पम्हुट्ठधम्मकम्मो किलिट्ठकम्मो गओ नरयं // 582 // गंधप्पिओ कुमारो कीलंतो नइजलंमि सेच्छाए / ' विसगंधेहि निहगिओ सवक्किमायाइ मायाए // 583 // सोदासनामनिवई पावो माणुस्समंसरझलोलो / इह लोए रज्जाओ भट्ठो अ भवे पणट्ठो अ // 584 // सुकुमालियाइ भत्ता फासिंदिअगिद्धिपरवसो निवई / ' चुको रज्जसुहाओ अडवीइ दुहं बहुं पत्तो // 585 / /

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