Book Title: Aupapatikopanga Sutram
Author(s): Jinendrasuri,
Publisher: Harshpushpamrut Jain Granthmala
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इतोऽधिकृतवाचना-'मंगलजयसहकयालोए' मङ्गलाय जयशब्द: कृतो जनेनालोके-दर्शने यस्य स तथा, 'अणेगगणनायगे'त्यादि पूर्ववत् २ ।
तए णं तस्स कूणियस्स रण्णो भंभसारपुत्तस्स आभिसिक्क हत्थिरयणं दुरूढस्स समाणस्स तप्पढमयाए इभे अट्ठट्ठमंगलया पुरओ अहाणुपुत्वीए & संपढ़िआ, तंजहा-सोवत्थिय-सिरिवच्छ-णंदिआवत-वद्धमाणकभद्दासण-कलस-मच्छ-दप्पणा, तयाऽणंतरं च ण पुण्णकलसभिगारं दिव्वा य
छत्तपडागा सचामरा सणरइअ-आलोअ-दरिसणिज्जा वाउद्ध्य-विजयवेजयंतीय उस्सिआ गगणतल-मणुलिहंती पुरओ अहाणुपुवीए संपटुिआ, तयाऽणंतरं च णं वेरुलिय-भिसंत-विमलदंड पलंब-कोरंट-मल्लदामोवसेाभियं चंदमडलणिभं समूसिअविमलं आयवत्तपवरं सोहासणं वर-मणिरयण-पादपोढं सपाउआजोय-समाउत्तं बहुकिंकर (दासीदास-किकर)-कम्मकर-परिस-पायत्तपरिक्खित्तं पुरओ अहाणुपुवीए संपट्ठियं ३ । तयाऽणंतरं च ण बहवे लट्ठिग्गाहा(असिलट्ठिग्गाहा) कुंतग्गाहा चावग्गाहा चामरग्गाहा पासग्गाहा पोत्थयग्गाहा फलकग्गाहा पीढग्गाहा वीणग्गाहा कूयग्गाहा हडप्फग्गाहा पुरओ अहाणुपुव्वीए संपटुिआ । तयाऽणंतरं च णं बहवे इंडिणो मुंडिणो सिहंडिणो जडिणो पिछिणो हासकरा डमरकरा चाटुकरावादकरा कंदप्पकरा दबकरा कोककुइआ किट्टिकरा वायंता गायंता हसंता णच्चंता भासंता सावेंता रक्खंता राविता आलोअं च करेमाणा जय २ सई पउंजमाणा पुरओ अहाणुपुवीए संपट्ठिआ (असिलट्ठिकुंतचावे चामरपासे य फलगपोत्थे य । वीणाकूयग्गाहे तत्तो य हडप्फगाहे य ॥१॥ दंडी मुंडी सिहंडी पिच्छी जडिगो य हासकिड्डा य दबकारा चडुकारा कंदप्पियकुककुईगा य गाहा ।।२।। गायंता वायंता नच्चंता तह हसंत हासिता । साता रावेता आलोय जयं पउंजंता ॥३॥) ४ ।
'पुण्णकलसभिंगारति जलपरिपूणों घटभृङ्गारावित्यर्थः । "दिव्या य छत्तपडागा' दिव्येव दिव्या-शोभना सा च छत्रेण सह पताका छत्रपताका, 'सचामर'त्ति चामरयुक्ता, 'वंसणरइयआलोयदरिसणिज्जा' दर्शने-राज्ञो दृष्टिमार्गे रचिता-विहिता दर्शनरचिता दर्शने वा सति
॥१११॥

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