Book Title: Aupapatikopanga Sutram
Author(s): Jinendrasuri, 
Publisher: Harshpushpamrut Jain Granthmala

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Page 166
________________ औपपाति-8 A अम्मडा कम् । एगाए गंगामट्टियाए ३। अम्मडस्स णं परिव्वायगस्स णो कप्पइ आहाकम्मिर वा उद्देसिए वा मीसजाए इ वा अज्झोअरए इ वा पूइकम्मे स०४० इवा कोयगडे इ वा पामिच्चे इ वा अणिसिटे इ वा अभिहडे इ वा ठइत्तए वा रइए (रइत्तए) वा कतारभते इवा दुविभक्कभत्ते इ वा बद्दलियाभत्ते इ वा गिलाणभत्ते इ वा पाहुणगभत्त इ वा भोनए वा पाइत्तए वा, अम्मडस्स णं परिवायगस्स णो कप्पइ मूलभोयणे वाजाव बीयभोयणे वा भोत्तए वा पायए (पाइत्तए)वा, अमडस्स णं परिव्वायगस्स चउविहे अणत्थदंडे पच्चक्खाए जावजीवाए, तंजहा-अवज्झाणायरिए ॥१५४|| पमायायरिए हिंसप्पयाणे पावकम्मोवएसे, अम्मडस्स कप्पइ मागहए अद्धाढए जलस्स पडिग्गाहित्तए सेऽवि य वहमाणए नो चेव णं अवहमाणए जाव सेऽवि य परिपूए नो चेव णं अपरिपूए सेऽवि य सावज्जेत्तिकाऊंणो चेव णं अणवज्जे सेऽविय जीवा इति कटु णो चेव णं अजीवा, सेऽवि य दिण्णे णो चेव णं अदिण्णे, सेवि य दंत-हत्थ-पाय-चरु-चम-सपवखालणट्टयाए पिबित्तए वा जो चेव णं सिणाइत्तए, अम्मडस्स कप्पइ मागहए य आढए जलस्स पडिग्गाहित्तए सेऽवि य वहमाणे जाव दिन्ने नो चेव ण अविष्णे, सेऽवि य सिणाइत्तए णो चेव ण हत्थपाय-चरुचम-सपक्खालणद्वयाए पिबित्तए वा, अम्मडस्स णो कप्पइ अन्नउत्थिया वा अण्णउत्थियदेवयाणि वा अण्णउत्थियपरिगहियाणि वा चेइयाई वंदित्तए वा णमंसित्तए वा जाव पज्जुवासित्तए वा णण्णत्थ अरिहंते वा अरिहंतचेइयाई वा ४। अम्मडे णं भंते ! परिवायए कालमासे कालं किच्चा कहि गच्छिहिति ? कहि उववजिहिति ?, गोयमा ! | अम्मडे ण परिब्वायए उच्चावहि सीलव्वय-गुणवरमण-पच्चक्खाण-पोसहोववाहि अप्पाणं भावेमाणे बहूई वासाई समणोवासय परियाय पाउणिहिति २ ता मासिंयाए सलेहणाए अप्पाणं झूसित्ता सटैि भत्ताई अणसणाए छेदित्ता आलोइयपडिक्कते समाहिपत्ते कालमासे | कालं किच्चा बंभलोए कप्पे देवत्ताए उववजिहिति, तत्य णं अत्थेगइयाणं देवाणं दस सागरोवमाई ठिई पप्णता, तत्थ णं अम्मडस्सवि देवस्स दस सागरवोमाइं ठिई ५ । से णं भंते ! अम्मडे देवे ताओ देवलोगाओ आउक्खएणं भवक्खएणं ठिइकुखएणं अणंतरं चयं चइत्ता कहिं गच्छिहिति कहिं उबवज्जिहिति ?, गोयमा ! महाविदेहे वासे जाई कुलाई भवंति अड्डाइं दित्ताई वित्ताई विच्छिण्ण-विउल ॥१५४॥

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