Book Title: Anekant 1987 Book 40 Ank 01 to 04
Author(s): Padmachandra Shastri
Publisher: Veer Seva Mandir Trust

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Page 52
________________ १२, वर्ष ४०, कि०२ अनेकान्त उद्धृत कर देते है, जिन्हें प्रस्तुत मूलाचार वृत्ति मे मिलाया में सा च...." जायते, आत्मनोऽक्रमेण तथाविधपरिणामाजा सकता है । जैसे भावात् । शरीरोपादानात प्रथम'......। २ सासादन-आसादन सम्यक वावराधनम्, सह उपशमनविधि-धवला पृ० १, पृ० २१०-१४ और आसादनेनवर्तते इति सासादनो विनाशितसम्म ग्दर्शनोऽप्राप्त मूला वृ० गा० १५-२०५ (मा० सस्करण २ पृ. ३२०-२२ मिथ्यात्वकर्मोदयजनितपरिणामो मिथ्यात्वाभिमुख: सासादन व ज्ञा० पी० संस्करण, पु० ३८५.८७) । दोनो मे शब्दश: इति भण्यते । पृ० १६३. मिलान कीजिये३ सम्यमिथ्यादष्टि-दृष्टि: श्रद्धा रुचि: इति यावत्, धवला पु० १, पृ० २११---अ व्वकरणे ण एक्क पि समीचीना च मिथ्या च दृष्टिर्यस्यासी राम्यग्मिध्यादृष्टिः। कम्ममुवसमदि किंतु अपुवकर । "पृ० २११-१४ xxx सम्यक्त्व-मिथ्यात्वयोस्दयप्राप्तस्पर्धकानां क्षयात् तक। सतामुदयाभावलक्षणोपशमान्मिथ्यात्वकर्मण. सर्वघातिस्प मूला० वृत्ति १२-२०५-अपूर्वक रणे नकमपि कर्मो. घंकोदयाच्च..."। पृ० १६६ व आगे पृ० १७०. पशाम्यति । कित्वपूर्वक रण...... पृ० ३२०.२२ (मा० ग्र० ४ असंयतसम्यग्दृष्टि -समीचीना दृष्टि: श्रद्धा यस्या तथा ज्ञा० पी० २, पृ० ३८५-८७) तक ! सो सम्यग्दृष्टिः, असयतश्चासौ सम्यग्दृष्टिश्च असयत यहाँ कुछ वाक्य आगे-पीछे भी व्यवहृत हुए है। सम्यग्दृष्टिः । सो वि सम्माइट्ठी तिविहो खइयसम्मा इट्ठी यथावेदयसम्माइट्ठी उवसमसम्माइट्ठी चेदि । "पृ० १७१. ५ संयतासंयत-सयताश्च ते असयताश्च संयता अणताणबधिकोध - माण-माया-लोभ-सम्मत्त - सम्मा मिच्छत्त-मिच्छत्तमिदि एदाओ सत्त पथडीओ असजदससंयताः । xxx न चात्र विरोध: सपमासयमयोरेक म्म! इट्रिप्पडि जाव अप्पनत्तसजदोत्ति ताव एदेसु जो वा द्रव्यवतिनोस्त्रसस्थावरनिबन्धनत्वात्। Xxx अप्रत्याख्यानावरणीयस्य सर्वघातिस्पर्द्धकाना मुदयक्षपात् सता चोप सो वा उसामेदि।xxx दमणतियस्म उदयाभावो उपसमो, तेसि मुवसताण पि ओकड्डुका ड्डण-परपयडिसशमात् प्रत्याख्यानावरणीयोदयादप्रत्याख्यानोत्सत्ते. । पृ० कमाणमत्थित्तादो। धवला पृ० २१०.११ १७३-७५. इसी पद्धति से आगे के प्रमत्तसयतादि गुणस्यानो से अनन्तानुबधि - क्रोध-मान-माया-लोभ-सम्यक्त्वमिथ्यासम्बद्ध सन्दर्भो को भी इन दोनो ग्रन्थों मे मिलाया जा रव सम्य मिथ्यात्वानीत्येता: सप्तप्रकृती: असयतसम्यगमकता है। दृष्टि - स यतासयत-प्रमत्ताप्रमत्तादीना (?) मध्ये कोऽप्येक धवला और मूलाचार वृत्ति मे कुछ अन्य प्रसग भी उपशमयति । Xxx दर्शनमोहत्रिकस्योदयाभाव उपशब्दशः मिलान के योग्य है शमस्तेषामुपशान्तानामप्युत्कर्षापकर्ष - परप्रकृतिसक्रमणापर्याप्ति के छह भेद-धवला पु० १, पृ० २५४-५६ नामस्तित्व यतः इति । मूला० वृत्ति पृ० ३२०-२१, मा० व मूला० वृत्ति १२-१६५, मा० ग्र० संस्करण २, पृ० ग्र० मा० स० २ पृ. ३८५ व ३८६ । ३०९-१० व भा० ज्ञा० पी० सस्करण २, पृ० ३६७-६८. क्षपणविधि-इस प्रसग का भी दोनों ग्रन्थो मे (यहा इन दोनों मस्करणो मे आहारपर्याप्ति से सम्बद्ध शब्दशः मिलन किया जा सकता है--धवला० पु. १, प्रसंग कुछ त्रुटित भी हुआ है । जैसे पृ० २१५-२३ 'सजोगिजिगो होदि' तक और मूला० वृत्ति .... . . 'स्खल रसपर्यायः परिणमनशक्तिराहारपर्याप्ति.।' २ पृ० ३१२-१३ ज्ञ'० पी० स० २, पृ० ३८८.६. 'सयोइसके स्थान मे ऐसा पाठ सम्भव है- .."खल-रसपर्या- गिजिनो भवति' तक । यः परिणमनशक्तेनिमित्तानामाप्तिराहार पर्याप्ति: ।' आगे इन दोनो प्रसंगों की प्ररूपणा करते हुए मूलाचार'सा च ...."जायते शरीरोपादानात प्रथम' इसके स्थान वृत्ति मे अनेक अशुद्धियां हुई हैं।

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