Book Title: Satik Gacchachar Prakirnak Sutram
Author(s): Purvacharya, Danvijya Gani
Publisher: Dayavijay Granthmala

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Page 253
________________ यणस्स रण्णो कहिय, रण्णावि अप्पबहुं चिंतितं, णस्थि अप्णो उवाओ, सरणं वा णत्थि, परं पभावई देवो सरणंति पभावतिदेवो मणंसि कतो, पभावतीदेवरस य कयसंगरस्स आसणकंपो जाओ, तेण ओही पउत्ता, दिट्ठा उदायणस्स रण्णो आवती, ततो सो आगओ तुरंतो, पिणद्धमंबरं जलधरेहिं पुर, अप्पातितो जणवओ पविरलतुसारसीयलेण वायुगा, ततो पच्छा चालणिपरिखित्तपि व जलं जलधरेहि मुक्कं सरसरस्स, तं च जलं देवताकयपुक्खरिणी तिए संठियं, देवयकयं पुक्खरणित्ति अबुहजणेण तिपुक्खरं तित्थं पवत्तियं, ततो उद्दायणो राया गओ उजेणि, रोहिया उजेणी, बहुजणक्खए वट्टमाणे उद्दायणेण पज्जोओ भणिओ, तुझं मज्झ य विरोहो, अम्हे चेव दुअग्गा जुझामो, कि सेसजणवएणं माराविएणंति, अब्भुवगयं पज्जोएण, दुअग्गाणवि द्यसंचारेण संलावो, कह जुज्झामो ? किं रहहिं गएहिं अस्सेहिति ? उद्दायणेण लवियं-जारिसो तुज्झ णलगिरी हत्थी एरिसो मज्झे पत्थि, तहावि तुझ जेण अभिप्पेयं तेण जुज्झामो, पज्जोएण भणिय-गएहि असमाणं जुज्झति कल्लं रहे हि जुज्झामोत्ति, दुवग्गाणवि अवडिय वितियदिणे उद्दायणो रहेण उवडिओ, पज्जोओ णलगिरिणा हत्थिरयणेण, सेसखंधावारो सणद्धपरिवारो, पेच्छगो उदासीणो चिट्टति, उद्दायण भणियं-एस भट्टपडिप्णो हओ,मया संपलगं जुद्धं, आगओ हत्थी उदायणेण चक्कन्भमे छूढो, चउसु वि पायतलेसु विद्धो, सरेहिं पूरिओ पडिओ हत्थी, एवं उद्दायणेण रणे जिणित्ता गहिओ पज्जोओ, भग्गं परवलं, गहिया उज्जेणी, गट्ठा मुवण्णगुलिया, पडिमा पुण देवयाहिटिया संचालिउण सक्किया, पज्जोओ य ललाडे सुणहपाएण अंकिओ, इम च से णामय ललाटे चेव अंकिय, “दासो दासीवतिओ, छेत्तट्ठी जो धरेइ वत्थवो । आणं कोवेमाणो, हंतवो बंधियचो य ॥१॥” कंठा नवर 'छेत्तट्टी क्षेत्रार्थी क्षेत्रस्थितिर्वा हालिकादिः' कोवेमाणो' भंजन उद्दायणो से

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