Book Title: Pratikraman Vidhi Sangraha
Author(s): Kalyanvijay Gani
Publisher: Mandavala Jain Sangh

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Page 56
________________ प्रतिक्रमण विधि संग्रह तत्थ य चितइ संजम, जोगाण न जेण होइ मे हाणी | तं पडिवज्जामि तवं छम्मासं ता न काउमलं ॥ ६७ ॥ गाइ इगुणत्तीसूणि पिन सहो उ पंच मासमपि । एवं चउतिदुमासं न समत्था एगमासं पि ॥ ६८ ॥ जातं पि तेरसूरणं चउतीसह माइतो दुहाणीए । जाव चउउत्थं तो अंबिलाई जा पोरिसि नमो वा ॥ ६६ ॥ जं सक्कइ तं हिअए, धरित्त पेहए पुति । दाउं वंदरणमसढो, तं चिअ पच्चक्खए विहिणा ॥ ७० ॥ इच्छामों सट्टत्तिभणिअ उव विसिअ पढइ तिन्नि थुई । मिउसद्द ेगं सक्क - त्थयं इन चेइए वदे ॥७१॥ किच्चाsकिच्चं गुरवो, वयंति विणय पडिवत्ति हेउं मा । ऊसासाइअ मुत्तुं तयणा पुच्छाइ पडिसिद्ध ॥७२॥ अह पक्खि चउद्दसि, दिगंमि पुव्वं व तत्थ देवसि । सुत्तंतं पडिक्कमिश्र तो सम्ममिमं कमं कुणइ ||७३ || मुहपोती वंदरणयं संबुद्धा खामणं तहा लोए । वंदण - पसे अक्खामरणाणि वंदणय पुत्तं च ||७४ || 1 सुत्तं अब्भुट्ठाणं, उस्सग्गो पुत्ति वंदरणं तह य पज्जति अक्खा मणयं, तह चउरो त्यो भवंदणयं ॥ ७५ ॥ पुव्व विहिरणे व सव्वं, देवसि वंदनाइ तो कुणइ । सिज्जसुरी उस्सग्गो, अजिय संतिथय पढणे अ ||७६|| एवं चिअ चउमासे, वरिसे अ जहकुमं विही नेप्रो । पक्ख - चउमास- वरिसेसु नवरि नामंमि नाणत्तं ॥७७॥ तह उस्सग्गेसु उज्जोया बारस वीसा स मंगलवत्ता । संबुद्धखामणं ति - परण- सत्त - साहूरण जह संखं ॥७८॥ [४e

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