Book Title: Mulsutra Ek Parishilan
Author(s): Devendramuni
Publisher: Tarak Guru Jain Granthalay
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दशवैकालिकसूत्र : एक समीक्षात्मक अध्ययन
२०३
१४५. "जे निग्गंथे तरुणे जुगवं बलवं अप्पायंके थिरसंघयणे से एगं वत्थ धारिज्जा नो वीयं ।”
- आयारचूला ५/२
१४६. “एगयाऽचेलए होई, सचेले आवि एगया । एयं धम्महियं नच्चा, नाणी नो परिदेव ॥"
- उत्तराध्ययन २ / १३
१४७. “उवाइक्कंते खलु हेमंते गिम्हे पडिवन्ने अहापरिजुन्नाई वत्थाइं परिट्ठविज्जा, अदुवा ओमचेले अदुवा एगसाड़े अदुवा अचेले ।" - आचारांग ८/५०-५३
१४८. “पिण्डः शय्या वस्त्रैषणादि, पात्रैषणादि यच्चान्यत् । कल्प्याकल्प्यं सद्धर्मदेहरक्षानिमित्तोक्तम् ॥” १४९. “किचिच्छुद्धं कल्प्यमकल्प्यं, स्यादकल्प्यमपि कल्प्यम् । पिण्डः शय्या वस्त्रं, पातं वा भैषजाद्यं वा ॥” १५०. “अन्नपानरजोहरणपात्रचीवरादीनां
-वही १४५
च
- तत्त्वार्थभाष्य ९/५
उद्गमोत्पादनैषणादोष वर्जनम् - एषणासमितिः।”
१५१. “तिविहे परिग्गहे पं. तं. - कम्मपरिग्गहे, सरीरपरिग्गहे, बाहिरभंडमत्तपरिग्गहे ।" - स्थानांग ३ / ९५
१५२. दशवैकालिक १५३. वही
१५४. वही
१५५. धम्मपद ३६३
१५६. मनुस्मृति ६/४६
१५७. महाभारत, शान्तिपर्व १०९/१५ - १९
१५८. “सच्चप्पवायपुव्वा निज्जूढा होइ वक्कसुद्धी उ ।”
१५९. आचारांग २/१५/१/१८०
१६०. सूत्रकृतांग १/८/१/११६
१६१. धम्मपद ३६०-३६१ १६२. श्रीमद्भगवद्गीता २/६१ १६३. वही २/५९; ६४
१६४. अभिधानराजेन्द्रकोष, खण्ड ३, पृष्ठ ३९५
१६५. स्थानांग २/२
१६६. विशेषावश्यकभाष्य २६६८-२६७१
१६७, भगवतीसूत्र १२/५/२
१६८. दशवैकालिक ८/३७ १६९. वही ८/३८
१७०. योगशास्त्र ४/१०/१८
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- प्रशमरति प्रकरण १३८
धर्मसाधनानामाश्रयस्य
- दशवैकालिकनिर्युक्ति १७
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