Book Title: Karmagrantha Part 3
Author(s): Devendrasuri, Shreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
Publisher: Marudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur

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Page 235
________________ जैन कर्मसाहित्य का संक्षिप्त परिचय iwariBansaniamare अन्य नाम कमंप्रकृति कता चित्रमूरि रसोक प्रमाण रबमा काल गा ४५५ संभवतः विक्रम की ५वीं शताब्दि ७०० वि की १२ कों से वृत्ति मलयगिरि नि- १३.१३ श. यशोविजय १३०० वि. १८वीं श पंखसंग्रह नन्द्धषि महतर गा०६६३ म्बोपश वृत्ति वृत्ति मलयगिरि. १८८५८ विशम की १२-१३ हौं । शताब्दि प्राचीन षद कर्मग्रन्थ या ५४७,५५१, ५६७ (अ) कर्म विपाका मर्गषि गा० १६. वृत्ति मानन्दमूरि १२२ वि० १२-१३ वो मतादी ध्याच्या (1) कर्मम्लव मा: ५७ भाग्य मा० २४, भाष्य मा० ३२ संभवत: वि० सं० गोविन्दानायं १ts १२८८ से पूर्व (इ) बन्ध-स्वामित्व (मा० ५०) वृत्ति हरिभद्र सूरि ५६. वि० सं० १९७२ (ई) पडशीति मिनल भगणि मा० ५६ भाष्य मा० ३५ वृति हरिभद्रसुरिः वि की १२वी प्रसाद मलयगिरि २१४० : विक्रम की १२-१३ वीं । मताधि : थति वृति

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