Book Title: Bhaktamar Stotra Satikam
Author(s): Mantungasuri, Gunakarsuri
Publisher: Shravak Hiralal Hansraj

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Page 17
________________ 15 नक्ता- मुनीश ! सकलयोगीश ! तथापि तव स्तोत्रकरणासामर्थ्य सत्यपि सोऽहं दीरकंठकंठप्रझोऽपिस्तवारंसही भे विगतशक्तिरपि दीणबलोऽपि, डमरुकमणिन्यायेनोनयत्रापि तवप्रयोगः. तव भगवतो नक्तिवशा | त्सेवाग्रहात तव स्तवं स्तुति कर्तु विधातुं प्रवृत्तः कृतोद्यमो जातः. अत्रोपमान-मृगो हरिण श्रा. स्मवीर्य निजबलमविचार्य अविचिंत्य निजशिशोः स्वीयबालस्य प्रीत्या प्रेम्णा परिपालनार्थ परिरदाणा| य मृगें सिंह किं नान्येति? किं न युघायाभिमुखो व्रजति? थपि तु व्रजत्येव. अनौठत्ये यथा मृगः सिंहागमे नमविक्रमो हास्यास्पदं, तथाहं त्वत्स्तोत्रकरणे इति. यथा मृगो मृगेंद्रानिमुखोबाने. ऽबलोऽपि स्वबालपालनाय व्रजन श्लाघां लभते, केसरिणस्तु मृगेण सह युई लज्जायै, नक्तं च -मृगारिं वा मृगेंडं वा / सिंहं व्यवहरतां जनः // तस्य द्वयमपि वीडा / क्रीडादलितदंतिनः॥१॥ तथा मतिमंदोऽहं त्वद्भक्तिपारवश्यात्स्तवनप्रवृत्तौ कृतयत्नः कृतिनां कीर्तिपात्रं नवितेति वृत्तगर्नार्थः. // 5 // अथ कविरसामर्थेऽपि वाचाटताहेतुमाह // मूलम् ॥-थल्पश्रुतं श्रुतवतां परिहासधाम / त्वद्भक्तिरेव मुखरीकुरुते बलान्मां // यत्को. | किलः किल मधौ मधुरं विरौति / तचारुचूतकलिकानिकरैकहेतुः // 6 // व्याख्या-हे विश्वविश्रु.

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