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श्रीवर्द्धमानाय नमः।
भाग १४।
जैनहितैषी।
अंक ४-५।
माघ, फाल्गुन १९७६। जनवरी, फरवरी १९२० ।
विषय-सूची। eGo
पृष्ठ संख्या। १ वनवासियों और चैत्यवासियोंके सम्प्रदाय २ गन्धहस्ति महाभाष्यकी खोज ...
१०८ ३ऐतिहासिक जैन व्यक्तियाँ .......
१२८ ४ विचित्र ब्याह (कविता)
१२२ ५ दृष्पाप्य और अलभ्य जैनग्रन्थ ... ... ... १२७ ६ धनिक-सम्बोधन (कविता) ... ... ... १३० ७ सिद्धसेन दिवाकर और स्वामी समन्तभद्र ... १३१ ८ जैनधर्म अनीश्वरवादी है
१३५ ९ लिखितका मुद्रितसे मीलान ... ... ... १० विविध प्रसंग (१ प्राचीन पुस्तकोंका मूल्य,
२ ईश्वरके विषयमें बोलशेविकोंकी राय, ३ धर्मप्रचारके सम्बन्धर्म गाँधीजकेि विचार,४ बीस करोड़का दान, ५पारसी जातिकी दानशीलता, ६ एक और बड़ा भारी दान, ७ जैनोंकी दानशीलता, ८ परवारजातिकी दुरवस्था, ९ माणि
चन्द-ग्रन्थमाला, १० सेठीजीका छुटकारा) १४१ ११ होलीकी बची खुची गुलाल ... ...
१४८ १२ त्रुवल्लुव नायनार त्रुकुरल
१३९
१५०
१५-३-१९२० । सम्पादक, बाबू जुगलकिशोर मुख्तार।
मुंबई वैभव प्रेस.
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( २ )
४ समयसार । आचार्य अमृतचन्द्रकृत आत्मख्याति टीका, तात्पर्यवृत्ति और भाषाटीकासहित । निर्णयसागरका छपा हुआ । मूल्य ४ ॥ )
५ तीस चौवीसीपाठ । कविवर वृन्दावनजी कृत । मू० २)
६ जैन सिद्धान्तप्रवेशिका | स्वर्गीय पं० गोपालदासजी कृत । मू० 17 )
मैनेजर, जैनग्रन्थरत्नाकर कार्यालय, हीराबाग, पो० गिरगाँव, बम्बई ।
प्रार्थनायें ।
१ जैनहितैषी किसी स्वार्थबुद्धिसे प्रेरित होकर निजी · लाभके लिए नहीं निकाला जाता है। इसके लिए जो - समय, शक्ति और धनका व्यय किया जाता है वह केवल निष्पक्ष और ऊँचे विचारोंके प्रचारके लिए । अतः इसकी उन्नतिमें हमारे प्रत्येक पाठकको सहायता -देनी चाहिए ।
२ जिन महाशयों को इसका कोई लेख अच्छा · मालूम हो उन्हें चाहिए कि उस लेखको वे जितने मित्रोंको पढ़कर सुना सकें अवश्य सुना दिया करें ।
३ यदि कोई लेख अच्छा न मालूम हो अथवा विरुद्ध मालूम हो तो केवल उसीके कारण लेखक या सम्पादकसे द्वेषभाव धारण न करनेके लिए सविनय निवेदन है ।
४ लेख भेजने के लिए सभी सम्प्रदायके लेखकों को आमंत्रण है । -सम्पादक ।
नियमावली |
१ जैनहितैषी का वार्षिक मूल्य २) दो रुपया पेशगी है ।
२ ग्राहक वर्ष आरंभसे किये जाते हैं और बीचमें ७ वें अंकसे । आधे वर्षका मूल्य १ | ) ३ प्रत्येक अंकका मूल्य तीन आने ।
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४ लेख, बदले के पत्र, समालोचनार्थ पुस्तकें आदि 'बाबू जुगलकिशोरजी मुख्तार, सरसावा ( सहारनपुर ) ” के पास भेजना चाहिए । सिर्फ प्रबन्ध और मूल्य आदि सम्बन्धी पत्रव्यवहार इस पतेसे किया जायः-
मैनेजर, जैनग्रन्थरत्नाकर कार्यालय,
हीराबाग, पो० गिरगाँव, बम्बई ।
नये जैन ग्रन्थ |
१ उत्तरपुराण । आचार्य गुणभद्रकृत मूल और पं० लालारामजीकृत भाषानुवादसहित । मू० १० )
२ पैलोक्यसार । मूल और पं० टोडरमलजीकृत भागावचनिका सहित । मू० ५ )
३ क्रियाकोश | पं० दौलतरामजीकृत छन्दो. बद्ध ग्रन्थ । मू० २|| )
आवश्यक सूचनायें ।
१ बम्बई के प्रेसों में कंपोजीटरोंका अकाल पड़ रहा है । इस लिए अब यहाँ छपाईका कोई भी काम समय पर नहीं हो सकता | बड़ी मुश्किलसे यह डबल अंक तैयार कराया जा सका है । आगे के अंक भी समय पर निकल सकेंगे या नहीं, इसमें सन्देह है ।
२ हितैषीके सम्पादक बाबू जुगलकिशोरजी बीचमें बहुत ही बीमार हो गये थे, इस कारण भी कुछ किलम्ब हो गया है । बाबू साहबका स्वास्थ्य अब सुधर रहा है। बढ़ी हुई कमजोरीके दूर होने में अभी समय लगेगा ।
३ छपाईमें अधिक विलम्ब होते देख इस युग्म अंकमें एक फार्म या आठ पेज कम छपाये जा सके हैं। आगे यह कमी पूरी कर दी जायगी।
४ कामकी ज्यादतीके कारण यह अंक भी वी० पी० से नहीं भेजा जा सका । ग्राहक महाशयों से सवि
प्रार्थना है कि वे म० आ० से दो रुपया भेजकर हमारे ऊपर कृपा करें, जिससे हमें वी० पी० भेजनेकी दिक्कतसे छुट्टी मिले। हमारी कठिनाइयों पर ग्राहकों को ध्यान देना चाहिए ।
५ जिन महाशयोंके पास शुरूसे अंक भेजे जा रहे हैं, उन्हें हम इस वर्षका ग्राहक समझ रहे हैं, म० •आ• न आने पर आगेका अंक उन सबके पास वी० पी० से भेजा जायगा । अब भी जो सज्जन ग्राहक न रहना चाहते हों वे हमें एक कार्डसे सूचना दे देवें, अथवा मिले हुए पाँचों अंक वापस कर देवें ।
-प्रकाशक ।
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हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः ।।
चौदहवाँ भाग।
अंक ४
जैनहितैषी।
माघ २४४६ जनवरी १९२०
।
न हो पक्षपाती बतावे सुमार्ग, डरे ना किसीसे कहे सत्यवाणी। बने है विनोदी भले आशयोंसे, सभी जैनियोंका हितैषी हितैषी ॥
वनवासियों और चैत्यवासियोंके सम्प्रदाय ।
अर्थात् ...
तेरहपन्थ और बीसपन्थ । पण्डितैभ्रष्टचारित्रैर्बठरैश्च तपोधनैः।
प्रकृति देश और कालकी बदली हुई परिस्थितिशासनं जिनचन्द्रस्य निर्मलं मलिनीकृतम् ॥ यों और आवश्यकताओंके अनुसार मूल आचार
संसारमें जितने धर्म या सम्प्रदाय हैं, उनमें विचारोंमें थोड़ा बहुत परिवर्तन कर लेनेमें हानि स्थापित होनेके समयसे लेकर अब तक, अनेक नहीं समझती । बस इन्हीं दोनों प्रकृतियोंकी पन्थ, शाखा, उपशाखारूप भेद हो गये हैं खींच-तान और रगड़-झगड़से एक नया सम्प्रदाय और नये नये होते जाते हैं। ऐसा एक भी धर्म या पन्थ खड़ा हो जाता है और उसके झण्डेके
" नीचे दुसरी प्रकृतिके हजारों मनुष्य आकर नहीं है जिसमें एकाधिक भेद या पन्थ न हों। -
उसकी जड़ जमा देते हैं। ये भेद या पन्थ अनेक कारणोंसे होते हैं। पर आगे चलकर यह नया पन्थ भी अविउनमें सबसे मुख्य कारण देश-कालकी परिस्थि
भक्त नहीं रहने पाता । सौ दो सौ वर्षों में फिर तियाँ हैं। प्रत्येक धर्मके उपासकोंमें दो प्रकारकी नई परिस्थितियों और आवश्यकताओंके कारण प्रकृतियाँ पाई जाती हैं । एक प्रकृति तो ऐसी उसमें भी और एक नया भेद जन्म ले लेता है। होती है जो अपने धर्मके विचारों या आचारोंके इस तरह बराबर नये नये सम्प्रदाय और पन्य विषयमें जरा भी टससे मस नहीं होना चाहती- जन्म लेते रहते हैं और मूल धर्मको अनेक उन्हींको जोरके साथ पकड़े रहती है और दूसरी भागोंमें विभक्त करनेका श्रेय प्राप्त किया करते हैं।
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जैनहितैषी -
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इस भेदवृद्धिके साथ साथ धर्मके मूल सिद्धा न्तोंका भी कम क्रमसे रूपान्तर होता रहता है । पहली और दूसरी, दोनों ही प्रकृतिके लोग, आपसकी खींच-तान में उनको अपने अपने पक्ष के अनुसार बनानेमें लगे रहते हैं और इस कारण उनमें कुछ न कुछ विकृति आये बिना नहीं रहती । पुराना साहित्य जीर्ण शीर्ण दुर्लभ या अलभ्य होता रहता है, उसके स्थान में नया साहित्य बनता रहता है और नया पुरानेका अनुधावन करनेवाला होने पर भी कुछ न कुछ विकृत अवश्य होता जाता है । इस तरह जब हजारों वर्ष बीत जाते हैं, तब कुछ विद्वान् ऐसे भी होते हैं, जो इस विकृत रूपको संशोधित करनेकी आवश्यकता समझते हैं और धर्मकी मूल प्रकृतिका अध्ययन करके तथा प्राचीन ग्रन्थोंको प्राप्त करके उनके सहारे धर्मके उसी प्राचीन स्वरूपको फिरसे प्रकट करनेका प्रयत्न करते हैं; परन्तु उसे सर्वसाधारण गतानुगतिक नहीं मानते और इस कारण जो लोग उन्हें मानने लगते हैं उनका फिर एक जुदा सम्प्रदाय बन जाता है । इस तरह के प्रयत्न बार बार हुआ करते हैं और प्रत्येक बार वे सिवाय इसके कि एक नये सम्प्रदायकी नीव डाल जावें, सबको अपना अनुयायी नहीं बना सकते ।
इस प्रकारके प्रयत्नोंसे सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि प्रायः प्रत्येक धर्म के अनुयायी अपने धर्म के मूल और प्राचीन सिद्धान्तों से बहुत दूर नहीं भटकने पाते उनके करीब करीब ही बने रहते हैं । फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि इस प्रकारके प्रयत्नोंसे उत्पन्न हुआ कोई सम्प्रदाय अपने धर्मके मूल स्वरूपको जैसेके तैसे रूपमें पा जाता हो । बीचका हजारों वर्षोंका लम्बा समय, मूल धर्मप्रवर्तकों की आज्ञाओं या उपदेशोंकी वास्तविक रूपमें और यथेष्ट संख्या में अप्राप्ति, मूल उपदेशोंकी भाषामें अर्थभेद होने
[ भाग १४
की संभावना, और प्रयत्नकर्ताओंका भ्रान्तिप्रमादपूर्ण ज्ञान आदि अनेक कारण ऐसे हैं जो मूलस्वरूपको प्राप्त करनेमें बड़े भारी बाधक हैं ।
बहुतसे पन्थों या भेदोंकी सृष्टि धर्मगुरुओं के आपसके रागद्वेषसे और क्रोध, मान, माया, लोभ आदि कषायोंसे भी हुआ करती है । बहुतसे पन्थों का इतिहास देखनेसे मालूम होता है कि वे बहुत जरा जरासे मतभेद के कारण जुदा जुदा हो गये हैं । यदि उनके प्रवर्तक 'समझौते' की ओर जरा मी झुकते तो जुदा होने की आवश्यकता ही न पड़ती । पर कषाय-क्षेत्रोंतक ' समझौते' की पहुँच नहीं ।
बहुत से पन्थों का जन्म अपने समय के किसी प्रभावशाली धर्मके आक्रमणसे अपने धर्मको डगमगाते देख, उसमें उस धर्म के अनुकूल परिवर्तन और संशोधन आदि करनेके कारण भी हुआ है । कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हें अपने बुद्धि-वैभव से अपने धर्ममें अनेक दोष मालूम होते हैं और वे उसे छोड़कर अन्य धर्म ग्रहण करने की अपेक्षा उसको ही संस्कृत करना अच्छा समझते हैं और इस तरह उनका वह संस्कार किया हुआ धर्म एक नये पंथमें परिणत हो जाता है ।
इस तरह अनेक कारणोंसे विविध पन्थों और सम्प्रदायों की उत्पत्ति हुआ करती है और धर्मोकी 'बेल' बढ़ती रहती है ।
बहुत से पन्थ क्षणजन्मा भी होते हैं । उत्पन्न हुए, कुछ बढ़े, और फलने-फूलने के पहले ही मुरझाकर नष्ट हो गये । ऐसे पन्थोंके नाम तक लोग भूल जाते हैं। किसी किसी प्राचीन पुस्तकके पत्र अवश्य ही उनकी स्मृति बनाये रखते हैं। न जाने ऐसे कितने सम्प्रदाय अवतक इस पृथ्वीपर जन्म लेकर नामशेष हो चुके हैं ।
संसारमें साम्य और मैत्रीभावके परम प्रचारक जैनधर्म में भी अब तक अनेक सम्प्रदाय और पन्थोंकी सृष्टि हो चुकी है, जिनमें से बहु
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वनवासियों और चैत्यवासियों के सम्प्रदाय ।
अङ्क ४ ]
तोंका अस्तित्व तो अब तक बना हुआ है और बहुतसे काल के गाल में समा चुके हैं।
जैनधर्म अब से लगभग दो हजार वर्ष पहले दिगम्बर और श्वेताम्बर इन दो मुख्य शाखाओंमें विभक्त हो चुका है और ये दोनों ही शाखायें अपनी अनेकानेक प्रशाखाओंको लिये हुए अभी तक अपने अस्तित्वकी रक्षा कर रही हैं ।
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ये दोनों शाखायें जिन अनेक पन्थों और गण गच्छ आदिमें विभक्त हैं उनके उल्लेख की - यहाँ आवश्यकता नहीं मालूम होती । हम इस लेखमें केवल ऐसे दो पन्थभेदोंकी चर्चा करना चाहते हैं जो दोनों ही शाखाओंमें बहुत समय से चले आ रहे और जिनका हम मठवासी और वनवासी नामोंसे उल्लेख करेंगे ।
श्वेताम्बरोंमें इस समय जो ' जति ' या 'श्री पूज्य ' कहलाते हैं वे मठवासी या चैत्यवासी पन्थ के हैं और जो 'संवेगी ' या ' मुनि' कहलाते हैं वे वनवासी या वसतिकावासी साधुओंके पन्थके हैं ।
इसी तरह दिगम्बरोंके 'भट्टारक ' मठवासी पथके हैं और दिगम्बर' मुनि' जिनका प्रायः अभाव हो चुका है वनवासी पन्थके हैं । वनवासी पन्थके उपासक अपनेको ‘तेरह - पन्थी' और भट्टारकोंके उपासक अपनको 'बीस पन्थी' कहते हैं । ये तेरह - पन्थ और बीसपन्थ नाम चाहे जिस कारणसे पड़े हों; परन्तु इसमें सन्देह नहीं कि ये पुराने वनवासी और मठवासी भेदोंके ही नामान्तर हैं ।
दिगम्बर और श्वेताम्बर, दोनों ही शाखाओं"के साधु अपने को ' निर्ग्रन्थ ' साधु कहते हैं । यद्यपि श्वेताम्बर धर्म साधुओं को वस्त्र पहन नेकी आज्ञा दी गई है; परन्तु दिगम्बरों के समान उनके भी आचारशास्त्रोंमें कहा है कि साधुओंको बस्ती से बाहर उद्यानों या वसतिकाओं में रहना चाहिए, अनुद्दिष्ट भोजन करना चाहिए, 'धर्मोपकरणोंको छोड़कर सब प्रकार के परिग्रहों से
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दूर रहना चाहिए, और शान्तिभावसे ध्यान, अध्ययन, उपदेश आदि करते हुए जीवन बिताना चाहिए ।
शुरू शुरू में दोनों ही शाखाओंके साधुओंमें चरित्रकी यह दृढता पाई जाती थी; परन्तु ज्यों ज्यों समय बीतता गया और दूर दूरतक इनका प्रचार होता गया त्यों त्यों चरित्र शिथिल होता गया और दोनों ही शाखाओं में इस प्रकारके शिथिलचरित्र साधुओंका प्राबल्य बढ़ता गया और इसके फलस्वरूप दोनों शाखाओं में एक एक नये पन्थकी जड़ जमती गई ।
श्वेताम्बर ग्रन्थोंमें इस शिथिलाचारी पन्थके सम्बन्धमें अनेक उल्लेख मिलते हैं जिनसे इसका टूटा फूटा इतिहास तैयार किया जा सकता है।
की भूमिकासे मालूम होता है कि वीरनिर्वाण श्रीजिनवल्लभसूरि संघपट्टक नामक ग्रन्थ-संवत् ८५० के लगभग कुछ श्वेताम्बर साधु-ओंने उग्र विहार छोड़कर चैत्यवासका या मन्दिरोंमें रहनेका प्रारंभ कर दिया था। धीरे धीरे इन लोगों की संख्या बढ़ती गई और कोई १५० वर्षोंमें ये लोग बहुत प्रबल हो गये । इसी समय इन्होंने ' निगम ' नामके कुछ ग्रन्थ रचे और उनके विषय में यह प्रसिद्ध किया कि ये ' दृष्टिवाद' नामक बारहवें अंगके खण्ड या अंश हैं । इन ग्रन्थोंमें यह प्रतिपादन किया. गया है कि वर्तमान कालके साधुओं को चैत्योंमें रहना उचित है और उन्हें पुस्तकादिके लिए यथायोग्य आवश्यक द्रव्य भी संग्रह करके. रखना चाहिए। इसके बाद ये वसतिकावासियोंकी निन्दा करने लगे और अपनी शक्ति बढ़ाने लगे । श्रावकों में विशेष बुद्धि नहीं थी, वे इस समय जैसे भोले भक्त हैं पहले भी वैसे ही थे; इस कारण वे उक्त शिथिलाचारियोंको ही अपना परम गुरु समझने लगे। धीरे
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१०० जैनहितैषी
[भाग १४० धीरे ‘निग्रन्थ मार्ग ' विरलप्राय हो गया । अत्रोत्सत्रिजनक्रमो न च न च स्नात्रं रजन्या सदा, प्राचीन ग्रन्थोंपर हडताल फेर दी गई और साधूनां ममताश्रयो न च न च स्त्रीणां प्रवेशो निशि
जाते हो। जाति-ज्ञातिकदाग्रहो न च न च श्राद्धेषु ताम्बूलमि(१)-.. __ मामला आगे बढा । विक्रम संवत २०२में त्याज्ञात्रयमनिश्रिते विधिकृते श्रीवीरचैत्यालये ॥१॥ जिस समय चापोत्कट (चावड़ा ) वंशी राजा अर्थात् यहाँ पर सूत्रविरुद्ध चलनेवालोंको वनराजने 'अणहिलपुर-पाटण' बसाया, उस अर्थात् चैत्यवासियोंको आनेकी मनाई है, कभी समय उनके गुरु शीलगुणसूरिने-जो कि चैत्य- रात्रिको स्नात्र (अभिषेक ?) न किया वासी थे-उनसे यह आज्ञा जारी करा दी कि इस जायगा, साधु न ठहर सकेंगे, रात्रिको स्त्रियाँ नगरमें चैत्यवासी साधुओंको छोड़कर दूसरे प्रवेश न कर सकेंगी, और जातिपाँतिके लड़ाई वसतिवासी साधुओंको आनेकी मनाई है । इस झगड़े यहाँ न होंगे। आज्ञाको रद्द करानेके लिए वि० सं० १०८४ में एक और श्लोकका अभिप्राय यह है कि यहाँ जिनेश्वरसूरि और बुद्धिसागरसूरि नामके दो किसीको भी वन्दनादिका निषेध नहीं है, शास्त्रावसतिकावासी आचार्योंने राजा दुर्लभदेवकी ज्ञाको माननेवाले इसके अधिकारी हैं और इस सभामें चैत्यवासी साधुओंके साथ शास्त्रार्थ मन्दिरकी देख-रेख, आमद-खर्च और रक्षाका किया और उसमें उन्हें अच्छी तरह पराजित प्रबन्ध तीन चतुर श्रावक करेंगे। किया। इसके बाद पाटणमें वसतिवासियोंका इन श्लोकोंमें चैत्यवासी साधुओंके द्वारा आवागमन शुरू हो गया।
मन्दिरों में होनेवाले शिथिलाचारोंकी स्पष्ट झलक ___ मारवाड़में चैत्यवासियोंकी शक्ति बहुत बढ़ पाई जाती है। गई थी। उसे तोड़नेके लिए सबसे अधिक
जिनवल्लभसूरिका यह प्रयत्न बहुत ही प्रयत्न उक्त जिनेश्वरसूरिके शिष्य जिनवल्लभ
अच्छा था; परन्तु फिर भी वह चैत्यवासियोंको सरिने किया। इन्होंने संघपट्टक नामका एक
असह्य हुआ । वे पाँच सौ लढवाजोंको साथ छोटासा ग्रन्थ-जिसमें केवल ४० पद्य है-बना- लेकर चित्तौड पर चढ़ आये ! परन्तु तत्कालीन कर बड़ा काम किया । इस ग्रन्थमें चैत्यवासि
राणा साहबने उन्हें इस अपकृत्यसे रोक दिया। योंके शिथिलाचारका और उनकी सूत्रविरुद्ध
। परन्तु इस धमकीसे और उछलकूदसे जिनप्रवृत्तिका बड़ा ही मार्मिक और स्पष्ट चित्र खींचा
बल्लभसूरि डरे नहीं, उन्होंने अपना प्रचार कार्य गया है। चित्तौड़के श्रावकोंने आपके उपदेशसे प्रतिबुद्ध .
और भी जोरोंके साथ शुरू किया और उसमें
र उन्हें बहुत कुछ सफलता भी मिली। होकर महावीर भगवानका एक मन्दिर बनवाकर उसके गर्भगृहके द्वारके एक स्तंभपर ' संघ
जिनवल्लभसूरिके बाद जिनदत्तसूरि और
जिनपतिसरिने भी इसी दिशामें अपना प्रयत्न पट्टक ' के ४० पद्य और दूसरे स्तंभपर 'धर्मशिक्षा' के ४४ पद्य खुदवा दिये, जो
जारी रक्खा । जिनपतिसूरिने 'संघपट्टक' पर आजतक उनकी कीर्तिको प्रकाशितकर रहे एक तीन हजार श्लोक प्रमाण टीकाकी रचना की
आर उसका खूब प्रचार किया। हैं। इस मन्दिरके छज्जे पर भी कुछ श्लोक खुदे हुए हैं जिनमेंसे एक यहाँपर उद्धृत किया १ संघपट्टक मूल, संस्कृतच्छाया और गुजराती जाता है:
टीकासहित छप चुका है।
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'अङ्क ४] वनवासियों और चैत्यवासियोंके सम्प्रदाय।
जिनपतिसूरिके नेमिचन्द्र भंडारी नामके उनसे कुछ पीछे, हमारे यहाँ भी इसका प्रवेश विद्वान् गृहस्थशिष्यने 'षष्ठिशतक' नामका प्राकृत हो गया होगा। ग्रन्थ की रचना की, जिसकी कि टीका स्वर्गीय विक्रमकी आठवीं शताब्दिके बादके कुछ पं० भागचन्द्रजी 'उपदेशसिद्धान्त-रत्नमाला' ग्रन्थों में इस प्रकारके उल्लेख मिलते हैं जिनमें के नामसे लिख गये हैं। इस ग्रन्थमें भी चैत्य- इस बातका आभास मिलता है कि उस समय वासियोंके आचरणका खण्डन किया गया है। दिगम्बर मुनियोंके चरित्र में शिथिलता आ गई इसके बाद जिनपतिसूरिके शिष्य जिनदत्तसूरिने थी, वे ग्रामोंमें या ग्रामोंके समीप रहने लगे थे भी एक ग्रन्थकी रचना की और उसमें चैत्यवा- और पूर्वकालके मुनियोंके साथ उनकी समता सियोंके मन्दिरोंको सर्वथा अनायतन सिद्ध नहीं हो सकती थे, वे उनकी छाया मात्र समझे कर दिया।
जाने लगे थे। इधर गुजरातमें भी मुनिचन्द्रसूरि और भगवद्गुणभद्राचार्य विक्रम संवत् ८५५ के मुनिसुन्दरसूरि आदि आचार्योंने चैत्यवासियोंके लगभग अपने आत्मानुशासनमें लिखते हैं:विरुद्ध आन्दोलन शुरू करके उन्हें हतप्रभ इतस्ततश्च त्र्यस्यन्तो विभावयी यथा मृगाः।। कर दिया।
वनाद्विशन्त्युपग्राम कलौ कष्टं तपस्विनः ।। ___ इस तरह वि० संवत् १०८४ के लगभग जो अर्थात-जिस तरह रातको मृगमण वनमें विधिबद्ध आन्दोलन शुरू किया गया था वह इधर उधरसे त्रास पाकर गाँवके पास आ रहते १५ वीं शताब्दिके अन्त में जाकर सफल हुआ। हैं उसी प्रकार खेद है कि कलिकालमें तपस्वी
यही श्वेताम्बरशाखाके चैत्यवासियों और मुनि भी ग्रामोंकी सीमामें आ घुसते हैं। वनवासियोंका इतिहास है।
___एक और श्लोकमें वे कहते हैं कि मुनियोंमें ___ अब हमें दिगम्बर सम्प्रदायकी ओर आना
साधुचरित्र या सदाचारी उत्कृष्ट मणियोंके समान "चाहिए । यद्यपि हमारे यहाँ इस विषयका कोई
बहुत ही थोड़े रह गये हैं । —“ तपस्तेषु श्रीमलिखित इतिहास नहीं है; फिर भी हमारा वि
न्मणय इव जाताः प्रविरलाः ।" श्वास है कि यदि हम अपने उपलब्ध साहि- विक्रम संवत् १०१६ में यशस्तिलक काव्यत्यका तुलनात्मक दृष्टि से अध्ययन करेंगे और के कर्ता पण्डित सोमदेव कहते हैं:प्राचीन तथा नवीन ग्रन्थोंकी बारीकीसे छानबीन काले कलौ चले चित्ते देहे चान्नादिकीटके । करेंगे तो हमें भी अपने मुनिमार्गकी शिथिल- एतच्चित्रं यदद्यापि जिनरूपधरा नराः ।। ताका एक क्रमबद्ध इतिहास तैयार करनेमें पुनश्चअवश्य सफलता होगी।
यथा पूज्यं जिनेन्द्राणां रूपं लेपादिनिर्मितम् । दिगम्बर शाखाके साधुओंमें उक्त शिथि- तथा पूर्वमुनिच्छाया पूज्या सम्प्रतिसंयताः ।। लाचारकी प्रवृत्ति कबसे हुई और वह प्रवृत्ति अर्थात्-कलिकाल, चलचित्त और देहके एक संघके रूपमें किस समय परिणत हुई, इसका अन्नका कीड़ा बन जानेपर भी, यह आश्चर्य है निश्चित उत्तर देना कठिन है; परंतु ऐसा जान जो इस समय भी जिनरूप ( नमरूप ) धारण "पड़ता है कि श्वेताम्बरों में चैत्यवासियोंका जोर करनेवाले मुनियोंका अस्तित्व है ।। अढ चुकने पर, संभव है कि उन्हींकी देखादेखी, जिस तरह तीर्थकरोंकी लेपादिसे बनाई हुई
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जैनहितैषी
[भाग १४
प्रतिमायें पूज्य होती हैं उसी तरह पूर्वकालके णभस्मोद्भूलनादिरूपाम् । किं विशिष्टाः सन्तः, अहं. मुनियोंकी. छायारूप ये वर्तमानके मुनि भी यवोऽहंकारिणः । किं कृत्वा, अपोद्य अपवादविषयाँ पूज्य हैं।
कृत्वा निषिद्धयेत्यर्थः। काम्, मुद्राम् । किंविशिष्टाम् ,
आईती जैनीमाचेलक्यादिलिङ्गलक्षणाम् । पुनः किंविगुणभद्रस्वामीसे कोई डेड़सौ वर्ष बादके ये
शिष्टाम् , त्रिजगतावन्द्यां जगत्रयनमस्याम् । पुनरपि कि वचन हैं । इतने समयमें शिथिलता और भी विशिष्टाम् . सांव्यवहारिकी समीचीनप्रवत्तिनिवत्तिप्रयोअधिक बढ़ गई होगी और वह इन वचनोंमें भी जनाम् । पक्षे, टंकादिनाणकाकृतिं समीचीनामपोच खूब स्पष्टतासे झलकती है।
मिथ्यारूपां क्षुद्रा व्यवहरन्तीति व्याख्येयं। अन्ये पुनर्दव्यपरन्तु इन वचनोंसे यह निश्चय नहीं होता जिनलिङ्गधारिणो मुनिमानिनोऽवशिनोऽजितेन्द्रियाः कि उक्त शिथिलचरित्र मनियोंका चैत्यवासी सन्तस्तां तथाभूतामाईती मुद्रा बहिःशरीरे न मनसि श्रिताः श्वेताम्बरोंके समान कोई पृथक दल ही बन गया प्रपन्ना आविशन्ति संक्रामति विचेष्टयन्तीत्यर्थः । कम्,
लोकं धर्मकामं जनम् । किंवत्, भूतवद्हैस्तुल्यम् । . था। बहुत सम्भव है कि उस समय तक शक्ति
अपरे पुनद्रव्यजिनलिङ्गधारिणो मठपतयो म्लेच्छन्ति हीनता, अज्ञानता और देशकी बिगड़ी हुइ म्लेच्छा इवाचरन्ति । लोकशास्त्रविरुद्धमाचार चरन्तीपरिस्थितियों के कारण ही वे अपने चरित्रमें शिथिल त्यर्थः । कया. तच्छायया आहेतगतप्रतिरूपेण । तथा हो गये हों, परन्तु उस शिथिलताको अच्छा च पठन्तिन समझते हों--उसका प्रतिपादन न करते हों। पण्डितैभ्रष्टचारित्रैठरैश्च तपोधनैः ।
किन्तु यह अवस्था बहुत समय तक नहीं शासनं जिनचन्द्रस्य निर्मलं मलिनीकृतम् ।। रही होगी। ऐसे शिथिलचरित्रोंकी संख्याका भोः सम्यक्त्वाराधक त्यज मुञ्चत्वम् । कम् , त्रिधा विस्तार होनेपर सौ दो सौ वर्षों में ही उनका दल परिचयं मनसानुमोदनं वाचा कीर्तनम् कायेन संसर्ग च। बन गया होगा और उसके कुछ प्रमाण हमें कैः सह, तकैः कुत्सितैस्तैस्त्रितयैः । किं विशिष्टैः, पुंदेविक्रमकी तेरहवीं शताब्दिके ग्रन्थों में मिलते हैं। हमहिः पुरुषाकारमिथ्यात्वैः । तदुक्तम्उनसे यह निश्चयपर्वक कहा जा सकता है कि कापथे पथि दुःखानां कापथस्थेप्यसम्मतिः । तेरहवीं शताब्दिके पहले ग्यारहवीं या बारहवीं ।
असम्पक्तिरनुत्कीर्तिरमूढादृष्टिरुच्यते ॥ शताब्दिमें तो अवश्य ही हमारे यहाँ चैत्यवासी बाह्या अप्याहुःसाधुओंकी संस्था स्थापित हो गई थी। पाखण्डिनो विकर्मस्थान् वैडालव्रतिकान् शठान् ।
पण्डितप्रवर आशाधरने अपने अनगार हेतुकान् बकवृत्तींश्च वाड्यात्रेणापि नार्चयेत् ॥" धर्मामृतके दूसरे अध्यायमें इन चैत्यवासी दिग- .
उक्त अवतरणमें सम्यक्त्वके आराधकको: वर साधुओंका जिक्र किया है।
तीन प्रकारके मिथ्यातियों के साथ मन बनन
कायसे परिचय नः स्खनेका उपदेश दिया है। यथाः --
पहले प्रकारके मिथ्याती जैनधर्मसे विपरीत " मुद्रा सांव्यवहारिकी त्रिजगतीवन्द्यामपोद्याहती,
____मुद्राके धारण करनेवाले तापसा आदि हैं, दूसरे वामां केचिदहंयवो व्यवहरन्त्यन्ये बहिस्तां श्रिताः। लोकं भूतवदाविशन्त्यवशिनस्तच्छायया चापरे,
- प्रकारके मिथ्याती वे द्रव्यजिनलिङ्गधारी हैं, म्लेच्छन्तीह तकैस्त्रिधा परिचयं पुदेवमोहस्त्यज ॥९६॥ जो अपनेको मुनि कहते हैं और बाहरसे
टीका । इहक्षेत्रे सम्प्रति काले केचित्तापसादयो आहती मुद्रा अर्थात् दिगम्बर मुद्राको भी धारण व्यवहरन्ति प्रवृत्तिनिवृत्तिविषयां कुर्वन्ति । कां, मुद्रां करते हैं; परन्तु अन्तर्रममें अवशी हैं-इन्द्रियोंको व्रतचिह्नम् । किं विशिष्टाम् , वामां विपरीतां जटाधार- नहीं जीतते हैं, और तीसरे प्रकारके मिथ्याती
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अङ्क ४]
वनवासियों और चैत्यवासियोंके सम्प्रदाय ।
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मठोंके स्वामी द्रव्यजिनलिङ्गधारी अर्थात् मठा- स्त्रियोंसे चरणप्रक्षालन कराते थे, सचित्र पुष्प, धीश दिगम्बर मुनि हैं।
____ पत्र, घी, दूध, जल, केसर आदिसे चरणोंका ___ इनके विषयमें ग्रन्थकर्ता कहते हैं कि वे पूजन, स्नपन और लेपन कराते थे, सोने म्लेच्छोंके समान लोक और शास्त्रसे विरुद्ध चाँदी आदिसे चरण पुजवाते थे, सदैव एक आचरण करनेवाले हैं । 'तच्छायया आर्हतगति- स्थानमें रहते थे, शीतकालमें अँगीठीका सहारा प्रतिरूपेण' पद देकर वे इस बातको भी स्पष्ट लेते थे, पयालके बिछौनेपर सोते थे और कर देते हैं कि वे वस्त्रधारी भट्टारक नहीं, किन्तु तैलकी मालिश कराते थे, तरह तरहकी ओषअर्हन्त भगवानके समान दिगम्बर मुद्रा धारण धियाँ पास रखते थे, ज्योतिष, वैद्यक, मंत्रवाद, करनेवाले हैं।
धातुवाद आदिके प्रयोग करते थे, पालकियों ____टीकामें जो पहला श्लोक उद्धृत किया गया पर चढ़ते थे, कपड़ेके जूते पहनते थे, पीतल है, वह बड़े ही महत्त्वका है । उसका अभिप्राय ताँबा आदि धातुओंके कमण्डलु रखते थे, यह है कि जिनभगवानके निर्मल शासनको चटाई और लज्जा निवारण करनेके लिए वस्त्र भ्रष्टचरित्र पण्डितों और वठर मुनियोंने मलीन रखते थे जो कभी कभी पहना जाता था और कर दिया है। इसके भीतर वह 'आह' छुपी हुई जिसे धोबीसे धुलाते तथा रँगाते भी थे। पुस्तकहै जो जिनधर्मके सच्चे स्वरूपको समझनेवालोंके पुस्तिका-कपरिका-स्थपनिका-पुस्तकपट्ट-योगपट्टहृदयोंमें उसकी दुर्दशा देखकर उठा करती है। आसनपट्ट-तृणपटी आदि और भी अनेक प्रका___ अनगारधर्मामृतकी टीका विक्रम संवत् रकी चीजें रखते थे । १३०० में लिखी गई है और उन्होंने जो श्लोक इस प्रकारके आचरणोंको लक्ष्य करके ही उद्धृत किया है वह उनसे भी पहलेके किसी. शायद पं० आशाधरने उन्हें म्लेच्छोंके समान विद्वानकी रचना है। इससे यह बात निश्चय- आचरण करनेवाला लिखा है। शतपदीकी रचना पूर्वक कही जा सकती है कि विक्रम संवत भी अनगारधर्मामृतसे केवल ६ वर्ष पहले १३०० के बहुत पहले मठपतियोंकी संस्था हुई थी। स्थापित हो चुकी थी और वह इतनी विस्तृत श्रुतसागरसरि नामके एक भट्टारक विक्रमकी हो गई थी, कि उसके कारण जैनधर्म मलिन सोलहवीं शताब्दिमें हो गये हैं। उन्होंने षट्हो गया था।
- पाहुड़की संस्कृत टीकामें लिखा है कि-"कलौ विक्रम संवत् १२९४ में श्रीमहेन्द्रसूरि नामके किल म्लेच्छादयो नग्नं दृष्ट्वा उपद्रवं यतीनां एक श्वेताम्बराचार्यने 'शतपदी' नामका एक कुर्वन्ति, तेन मण्डपदुर्गे श्रीवसन्तकीर्तिना स्वाग्रन्थ लिखा है, उसमें 'दिगम्बर-मत-विचार ' मिना चर्यादिबेलायां तट्टीसादरादिकेन शरीरनामका एक अध्याय है । उसमें दिगम्बर सम्प्र- माच्छाद्य चर्यादिकं कृत्वा पुनस्तन्मुञ्चति इत्युदायके तत्कालीन साधुओंको लक्ष्य करके जो पदेशः कृतः संयमिनां, इत्यपवादवेषः । ” कुछ लिखा है उससे भी पण्डित आशाधरके अर्थात् “ कलिकालमें म्लेच्छ ( मुसलमान ) वचनोंकी पुष्टि होती है । महेन्द्रसूरिके कथना- आदि यतियोंको नग्न देखकर उपद्रव करते हैं, नुसार उस समयके दिगम्बर साधु मठोंमें मन्दि- इस कारण मण्डपदुर्ग (मांडू ) में श्रीवसन्तरोंमें रहते थे, आर्यिकायें भी वहाँ रहती थीं, * देखो, जैनहितैषी भाग७, अंक ९ में शतपदीके वे कभी कभी उनसे भोजन भी बनवा लेते थे, विस्तत अवतरण और उनका अनुवाद ।
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कीर्ति स्वामीने ऐसा उपदेश दिया कि संयमी - मुनियोंको चर्या आदिके समय ( आहारको जाते वक्त ) चटाई, टाट आदिसे शरीरको ढक लेना चाहिए और फिर चटाई आदि छोड़ देना चाहिए । यह अपवाद वेष है * । चित्तौरकी गद्दी के भट्टारकोंकी नामावली में वसन्तकीर्तिका नाम आता है । वे संवत् १२६४ में हुए हैं और संभवतः श्रुतसागरने इन्हीं वसन्तकीर्तिको अपवाद वेषका प्रचारक बतलाया है । इससे भी पं० आशाधरके इस कथन की पुष्टि होती है कि उस समय १३ वीं शताब्दिमें, अष्टचास्त्रि द्रव्यजिनालिङ्गधारी मुनि थे और उन्होंने जिनशासनको "मलिन कर डाला था
।
* देखो, जैनहितैषी भाग १३, अंक ८, पृष्ठ ३६८ ।
x इन्हीं श्रुतसागरसूरिने अपनी तत्त्वार्थसूत्र की टीकामें इस बातको स्वीकार किया है कि द्रव्यलिंगी साधु शीतकालमें कंबलादिक ले लेते हैं और दूसरे समय में त्याग देते हैं:
जैनहितैषी -
" लिङ्गं द्विभेदं द्रव्यभावलिंगभेदात् । तत्र भावलिङ्गिनः पञ्चप्रकारा अपि निर्ग्रन्था भवन्ति । द्रव्य लिङ्गिनः असमर्था महर्षयः शतिकालादौ कम्बलादिकं गृहीत्वा न प्रक्षालयन्ते न सीव्यन्ति न प्रयत्नादिकं कुर्वन्ति अपरकाले परिहरतीति भगवत्याराधना प्रोक्ताभिप्रायेण कुशीलापेक्षया वक्तव्यम् । " ( " संयम श्रुतप्रतिसेवनादि ' सूत्रकी टीका । )
परमात्मप्रकाशकी टीकामें उसके टीकाकार ब्रह्मदेव भी शक्ति के अभाव में साधुको तृणमय प्रावरणादिक अर्थात् घासका उत्तरीय वस्त्र आदिको रखनेकी, परन्तु उस पर ममत्व न रखनेकी, इजाजत देते हैं:“परमोपेक्षा संयमाभावे तु वीतरागशुद्धात्मानुभूतिभावसंयमरक्षणार्थ विशिष्टसंहननादिशक्त्यभावे सति यद्यपि तपःपर्यायशरीरसहकारिभूतमन्नपान
संयमशौचज्ञानोपकरणतृणमयप्रावरणादिकं गृह्णाति तथापि ममत्वं न करोति ॥
किमपि
( परमात्मप्रकाशटीका, गाथा २१६, पृष्ठ २३२ ) ये ब्रह्मदेवजी भी १६ वीं शताब्दिके लगभग
हुए हैं ।
[ भाग १४
यह बात विशेष ध्यान देने योग्य है कि पं० आशाधरने शिथिलाचारी मुनियोंको चैत्यवासी या मठवासी न लिख कर 'मठपति ' लिखा है और उनके आचरणको ' लोकशास्त्रविरुद्ध बतलाया है । इससे यह स्पष्ट होता है कि वे वनोंको छोड़कर मठों में केवल रहते ही नहीं थे किन्तु भट्टारकों के समान मठोंका आधिपत्य भी किरते थे । शतपदीके आक्षेपोंसे भी यही ध्वनित होता है ।
अनगारधर्मामृतटीका वि० सं० १३०० में समाप्त हुई है और शतपदी १२९४ में । शतपदी यद्यपि १२९४ में बनी है; परन्तु वह धर्मघोषसूरिकृत प्राकृत शतपदीका संस्कृत अनुवाद है जो कि सं० १२६३ की बनी हुई है । अर्थात् १२६३ से भी पहले दिगम्बर मुनियोंके आचरण उस तरहके हो गये थे जिस तरहके कि शतपदीके आक्षेपोंसे मालूम होते हैं । चित्तौरके भट्टारक वसन्तकीर्तिका भी यही समय है ।
इस तरह के शिथिलाचारोंकी प्रवृत्ति एकदम नहीं हो जाती, उनके प्रचलित होने में और मान्य होनेमें सैकड़ों वर्ष लगते हैं । हम यह मान लें कि इस प्रवृत्तिके प्रचलित होने में सवा सौ डेड़ सौ वर्ष लगे होंगे तो कहना होगा कि विक्रमकी बारहवीं शताब्दि के प्रारंभ में बहुत से दिगम्बर मुनि मठवासी हो गये होंगे और इस रूप में उनकी मानता भी होने लगी होगी ।
इन मठपतियोंकी अवस्थाके पहले दिगम्बर मुनि एक अवस्थामेंसे और भी गुजर चुके होंगे, अर्थात् मठोंके स्वामी बनने के पहले केवल मठों या मन्दिरोंमें रहते होंगे । उस समय वे पूर्ण नग्नावस्था में रहते होंगे, परिग्रह भी उनके पास थोड़ा होगा; परन्तु वनों में उनसे न रहा जाता होगा और उग्र चर्याका भी उनसे पालन न होता होगा । इसी अवस्थाके प्रारंभकी झलक हमें
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अङ्क ४]
वनवासियों और चैत्यवासियोंके सम्प्रदाय। . आत्मानुशासनकी संवत् ८५५ की उस उक्तिसे बीसपन्थ नामसे उक्त मार्ग क्यों प्रसिद्ध किये मिलती है जिसमें उन्होंने मुनियोंकी उपमा गये और इन नामोंका मूल क्या है । इस विनडरपोक मृगोंसे दी है और उसके आगेकी यमें जो कई प्रवाद और किंवदन्तिया प्रसिद्ध हैं, अवस्थाकी झलक सं० १०१६ के यशस्ति- हमारी समझके अनुसार उनमें कोई तथ्य लककी उस उक्तिसे मिलती है जिसमें उन्होंने नहीं है और उनसे इनकी असलियत पर कुछ उस समयके मुनियोंको पूर्वकालके मुनियोंकी भी प्रकाश नहीं पड़ता है। छाया बतलाया है।
हमारे खयालमें ये दोनों नाम बहुत प्राचीन अर्थात् मौटे हिसाबसे यह कहा जा सकता नहीं है, डेड़ सौ दो सौ वर्षसे पहलेके साहित्यमें है कि विक्रमकी ग्यारहवीं शताब्दिमें दिगम्बर इनका उल्लेख नहीं मिलता। बहुत संभव है कि मनि मन्दिर-मठवासी हो गये थे और बारहवीं श्वेताम्बर शाखाके 'तेरापन्थी' (ढूंढक) शताब्दिमें उन्होंने मठपति बननेका प्रारंभ कर सम्प्रदायके साथ समानता करते हुए व लाम दिया था।
इन्हें 'तेरापन्थी' कहने लगे हों जो भट्टारकोंपरन्तु इससे दृढतापूर्वक यह नहीं कहा जा को अपना गुरु मानते थे तथा इनसे द्वेष रखते सकता कि बारहवीं या तेरहवीं शताब्दिके बाद थे और धीरे धीरे उनका दिया हुआ यह कच्चा शुद्धाचारी दिगम्बर मुनियोंका अभाव ही हो ‘टाइटिल पक्का हो गया हो; साथ ही वे स्वयं गया था, अथवा सारा जैन जनसमुदाय शिथि- इनसे बड़े ‘बीसपन्थी' कहलाने लगे हों। लाचारियोंका ही शासन मानने लगा था । यद्यपि तीनसौ चारसो वर्षके पिछले भाषाके ग्रन्थों कालके प्रभावसे तथा देशकी राजनीतिके और और भट्टारकोंके बनाये हुए संस्कृत ग्रंथोंकी सामाजिक परिस्थितियोंके परिवर्तनके कारण जाँच करनेसे तेरह और बीसपन्थके इतिहासकी दिगम्बर मुनियोंकी विरलता भगवद्णभद्रके अनेक बातोंका पता लग सकता है। समयसे ही लक्षित होने लगी थी और तेरहवीं यह निश्चय है कि जिस समय मठवासिशताब्दिके लगभग तो वह और भी बढ़ गई योंका मार्ग प्रारंभ हुआ होगा, उसी समय उनके होगी; परन्तु शुद्ध शास्त्रोक्त आचारोंके पालने- विरोधी भी खड़े हो गये होंगे, परन्तु ऐसा मालूम वाले मुनि भी यत्र तत्र अवश्य दिखलाई देते होता है कि उन विरोधियोंके दलबद्ध होनेमें होंगे और उनके उपासकोंकी भी कमी न और अपना स्वतंत्र पंथ बना लेनेमें बहुत समय रहा होगी।
लग गया होगा । आश्चर्य नहीं, जो इस दलके जैसा कि पहले कहा जा चुका है, इन इतने शक्तिशाली होने में कि वह शिथिलाचामठवासी और मठपतियोंका जो मार्ग प्रचलित रियोंका निर्भय होकर विरोध करे, २००-३०० हुआ था, वही आगे चलकर 'बीसपन्थ' कहलाया वर्ष भी लग गये हों।
और जिन लोगोंने उसे नहीं माना, तथा जो अभी तक कोई ऐसा प्रमाण नहीं मिला वनवासी साधुओंको ही पूज्य या गुरु मानते है. जिससे एक जदे दल या पन्थके रूपमें इस रहे, उनका मार्ग 'तेरहपन्थ' के नामसे भट्टारक-विरोधी मार्गका अस्तित्व विक्रमकी प्रकट किया जाने लगा।
__सत्रहवीं शताब्दिके पहले माना जाय। संभव ___ इस बातकी खोज और छानबीन होनेकी है कि खोज करनेसे इसके पहले भी इसके - बहुत बड़ी आवश्यकता है कि तेरहपन्थ और अस्तित्वका पता चल जाय, परन्तु अभी तक तो
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जेनहितैषी
[ भाग १४ हमारा विश्वास है कि इस दलके मुख्य प्रवर्तक अह तम्मिहु कालगए कुँअरपालेण तम्मयं धरियं । समयसार नाटक आदि ग्रन्थोंके सप्रसिद्ध लेखक जाउँतो बहुमण्णो गुरुव्व तेसिं स सव्वेसिं ॥ १९ ॥ और कवि प० बनारसीदासजी थे।
अर्थात्-काल बीतने पर कुंवरपालने उस श्वेताम्बराचार्य महोपाध्याय मेघविजय- मतको धारण किया और तब वह सबका गुरुके गणिने वि० संवत् १७०० के लगभग आग- समान बहुमान्य हो गया। रेमं रहकर 'युक्तिप्रबोध' नामका एक प्राकत बनारसीविलासमें कॅवरपालकी वहुतसी ग्रन्थ स्वोपज्ञ संस्कृतटीकासहित बनाया था। रचनाओंका संग्रह है । ये बनारसीदासजीके यह ग्रन्थ प. बनारसीदासके मतका खण्डन मित्रोंमेंसे थे। मेघविजयजीके कथनसे मालूम करनेके ही उद्देश्यसे बनाया गया है-'वोच्छं होता है कि बनारसीदासका उत्तराधिकारित्व सुयणहितत्थं बाणारसियस्स मयभयं।' इन्हींको प्राप्त हुआ था। आश्चर्य नहीं, जो इसमें जगह जगह इस मतको 'बाणारसीय' या कँवरपाल मेघविजयजीके समयमें वर्तमान हों। 'बनारसीदासका मत कहकर उल्लेख किया पं० बनारसीदासजीकी मृत्यु सं० १६९८ के है। इससे मालूम होता है मेघविजयजीके समय बाद किसी समय हुई है। तक यह तेरहपंथके नामसे प्रसिद्ध नहीं हआ था। पं० बखतरायने अपने बुद्धिविलास नामक बाणारसीयमतका स्वरूप प्रकट करते हुए
ग्रन्थमें लिखा है कि तेरहपंथकी उत्पत्ति वि० युक्तिप्रबोधके कर्ता लिखते हैं:
सं० १६८३ में हुई । यह और मेघविजयजीका तम्मा दिगंवराणं एए भट्टारगा वि ना पुजा।
बतलाया हुआ समय लगभग एक ही है । अतिलतुसमित्तो जेसिं परिग्गहो णेव ते गुरुणो ॥१६॥
र्थात् पं० बखतरामजीका बतलाया हुआ समय अर्थात्-इस मतके अनुसार दिगम्बरोंके भट्टार
भी पं० बनारसीदासजीको ही तेरहपन्थका कोंको भी नहीं पूजना चाहिए। जिनके तिलतु
प्रवर्तक माननेके लिए बाध्य करता है । घमात्र भी परिग्रह हो वे गरु नहीं हो सकते।
___ आगरेमें इस पन्थका उदय हुआ था, इसी जिणपडिमाणं भूसण-मल्लारुहणाइ अंगपरियरणं।
कारण आगरा और उसके समीपके जयपुर वाणारसिओ वारइ दिगम्बरस्सागमाणाए ॥१७॥
आदि नगरोंमें ही इसका विशेष प्रचार हुआ और
प्रायः इन्हीं दोनों नगरोंके विद्वानोंकी रचनाअर्थात्-जिन प्रतिमाओंको भूषण पहनाना, ओंसे यह पन्थ देशव्यापी हुआ है । इसके मालार्य आरोहण करना, केसर लगाना आदि सिवाय तेरहपन्थका अभीतक ऐसा कोई ग्रन्थ बोतोंका बाणारसीमतवालाने निषेध किया। नहीं मिला है जो सं० १६८० के पहलेका सिरिविक्कमनरनाहागएहि सोलससएहि वासेहिं। : हो। इससे भी मालूम होता है कि बनारसीदास असि उत्तरेहिं जायं बाणारसिअस्स मयमेयं ॥ १८॥ ही इसके मुख्य प्रवर्तक थे और उन्हींके ' बाणा___ अर्थात-विक्रम संवत १६८० में यह बना- रसीय मत' को पीछेसे किसी समय यह तेरहरसीदासका मत उत्पन्न हुआ।
- पंथ नाम प्राप्त हो गया है। १५. बनारसीदासजी अपने समयके बड़े भारी पं० बनारसीदासजीके मुख्य प्रवर्तक होनेपर सधारको हाराह भी उनके पहलेके दिगम्बरी विद्वानों में मठवासिकिया था, उन्हें हम एक स्वतंत्र लेखमें प्रकट करेंगे।- योंके विरुद्ध विचार रहे होंगे। यह संभव है कि
-लेखक । उन्होंने इस दिशामें थोड़ा बहुत प्रयत्न भी किया .
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वनवासियों और चैत्यवासियोंके सम्प्रदाय ।
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हो-आश्चर्य नहीं जो खोज करनेसे बनारसी- बिलकुल ही न रखना, या मोरपंखोंके बदले दासजीके पहलेके ग्रन्थों में इन विचारोंका गायके पंछके बालोंकी पिच्छी रखना, खडे होनेके उल्लेख भी मिल जाय; परन्तु जान पड़ता है कि बदले बैठकर भोजन करना, अथवा सूखे चनोंउन्हें विशेष सफलता नहीं मिली और पं० बना- को प्रासुक मानना, ये सब बातें इतनी संगीन 'रसीदासजीके एक प्रतिभाशाली विद्वान् होनेके नहीं थीं कि इनके कारण ये सब 'जैनाभास' कारण वे ही इस मतके प्रवर्तक होनेका श्रेय करार दिये जाते । पुन्नाटसंघी या द्रविड़संघी प्राप्त कर सके।
जिनसेनाचार्यके हरिवंशपुराणको हम निरन्तर तेरहपन्थ और बीसपन्थकी मानताओंमें पढ़ते हैं, माथुरसंघी अमितगति आचार्यके जितने भी भेद हैं या बतलाये जाते हैं, उन श्रावकाचार, धर्मपरीक्षा, सुभाषितरत्नसन्दोह सबका मूल, मठवासियों या भट्टारकोंके शिथि- आदि कई ग्रन्थोंका हमारे यहाँ खासा प्रचार लाचारके सिवाय और कुछ भी नहीं है । यह है, काष्ठसंघके भी प्रद्युम्नचरित आदि कई ग्रन्थ विषय बिलकुल निर्विवाद है । अतः यह बात हमारे यहाँ पढ़े जाते हैं । परन्तु इनसे यह नहीं दृढ़तापूर्वक कही जा सकती है कि पुराने मठ- मालम होता कि इनमें दिगम्बरसम्प्र वासियोंके मार्गका ही नाम बीसपन्थ और जैनाभासत्वका प्रचार किया गया है । तब इनके उनके विरोधी वनवासियों या शुद्धाम्नायियोंके प्रवर्तकोंको देवसेनसूरिने महा पापी, मिथ्याती मार्गका नाम तेरहपन्थ है।
क्यों बतलाया है ? यद्यपि अभी निश्चयपूर्वक नहीं कहा हमारा अनुमान है कि इनके साथमें मूलसंघजा सकता परन्तु ऐसा मालूम होता है कि का वही नाता था जो तेरहपन्थका बीसपूर्वोक्त ग्यारहवीं बारहवीं शताब्दिके भी पहले पन्थके साथ है । अर्थात् ये सब उस समयके दिगम्बर शाखामें मठवासियोंके ढंगके और शिथिलाचारी थे और मूलसंघ शुद्धाम्नायी भी कई बार कई पन्थ जन्म ले चुके हैं, 'मूलसंघ' का 'मूल' शब्द हमारे उक्त जिनके शिथिलाचारका निषेध उक्त शताब्दियोंसे अनुमानको और भी अधिक पुष्ट करता भी पहलेके ग्रन्थोंमें पाया जाता है। है । यह शब्द बतलाता है कि मूलसंधी अपनेको __ ऐसे कई पन्थोंकी उत्पत्ति आदिका विवरण भगवान् महावीरके मूलमार्गका अनुसरण करनेवि० सं० ९९० में लिखे हुए 'दर्शनसार ' में वाला समझते थे और काष्ठासंघी आदिको मिलता है । ये पन्थ चार हैं-१ यापनीय, शिथिलाचारी। २ काष्ठासंघ. ३ माथुरसंघ, और द्रविड़संघ । पेसा जान पड़ता है कि इन मंघोंके माश इनमेंसे यापनीयसंघ तो दिगम्बर और श्वेताम्बर मूलसंघका सिद्धान्त-भेद तो विशेष नहीं था, दोनों शाखाओंका एक मिश्रित मार्ग था; परन्तु जैसा कि तेरहपंथियोंका बीसपंथियोंके साथ शेष तीन शुद्ध दिगम्बरी थे । फिर भी वे नहीं है, परन्तु इन संघोंके साधुओंमें शिथिला‘जैनाभास' बतलाये गये हैं। -
चार बढ़ गया होगा, अर्थात् ये लोग मठवासी __इन तीनों संघोंका जो स्वरूप दर्शनसारमें और परिग्रहधारी आदि हो गये होंगे और इसी दिया है उससे और इनके उपलब्ध ग्रन्थोंसे तो लिए ये जैनाभास करार दिये गये थे। . यह बात समझमें ही नहीं आती है कि ये देवसेनसूरिने द्राविडसंघके उत्पादक वज्रसब जैनाभास क्यों बतलाये गये । पिच्छी नन्दिके विषयमें लिखा है कि
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जैनहितैषी
[ भाग १४ कच्छं खेत्तं वसहिं वाणिज्ज कारिऊण जीवंतो। हमारा विश्वास है . कि खोज करनेसे इस हंतो सीयलनीरे पावं पउरं स संचेदि ॥ २७ ॥ तरहके और भी अनेक प्रमाण मिल सकेंगे
अर्थात् उसने कछार, खेत, वसतिका और जिससे द्रविड़ संघ आदिके मुनियोंका मठवासी वाणिज्य आदि करके जीवननिर्वाह करते हुए होना अच्छी तरह सिद्ध हो सकेगा।
और शीतलजलमें स्नान करते हुए प्रचुर पापका . यदि यह बात प्रमाणित की जासकी कि पूर्वोक्त संग्रह किया। .
तीनों संघोंके आचार्य चैत्यवासी या मठवासी इससे भी यही झलकता है कि द्रविडसंघी थे, तो फिर यह निश्चय हो जायगा कि दिगम्बर साधु वसतियों या मठोंमें रहते होंगे और उन शाखामें भी शिथिलचारी संघोंका प्रारंभ लगभग मठोंको दानमें मिली हुई जमीनसे धन संग्रह उसी समय या उससे कुछ पीछे हो गया होगा करके मठोंका प्रबन्ध आदि करते होंगे। जिस समय कि श्वेताम्बरोंमें चैत्यवासियोंका हरिवंश-पुराणके कर्ता जिनसेन भी द्रविड़- मठवासी पर्वोक्त काष्ठासंघ द्रविड़संघ माथुरसंघ
_ हुआ था और तब हमें सबसे पहले मठपति या संघी थे। उन्होंने अपना यह ग्रन्थ बर्द्धमान- अ
, आदिके साधुओंको मानना होगा। पुरके 'नन्नराज-वसति' नामक पार्श्व-जिनालयमें रह कर लिखा था । इससे भी मालम होता है जिन मूलसंधियोंने उक्त सब संघोंको ‘जैनाकि इस संघके साध मन्दिरोंमें रहने लगे थे। भास' कहकर अलग कर दिया था, और जो मल वादिराजसरि भी द्रविडसंघके थे । उनके गुरु
निर्यन्थाचारके पालनमें जरा भी त्रुटि होना पसन्द मतिसागरकी आज्ञानुसार जो एक दानपत्र लिखा नहीं करते थे, समय बदलने पर उन्हीं मलसंघियोंगया था, उससे भी मालूम होता है कि इस ।
के चरित्रकी भी मजबूत दीवारें शिथिलाचारने संघके मुनि भूमि आदिका प्रबन्ध करते थे। ताई
तोड़ डाली और उसने उनमें भी बड़ी शानके पार्श्वनाथचरितमें वादिराजसरिने अपने गरुको साथ प्रवेश किया जिसके फल हम वर्तमान ‘सिंहपुरैकमुख्य' लिखा है और न्यायविनि- भट्टारकोंके रूपमें देख रहे हैं ! श्चयालंकारमें स्वयं अपनेको भी ‘सिंहपुरेश्वर' मूलसंघके चरित्रकी रक्षा करनेवाले तेरहअर्थात् सिंहपुरका स्वामी बतलाया है। पन्थमें यदि इस समय मुनिमार्ग जारी होता, तो
एपिग्राफिका कर्नाटिकाकी दूसरी जिल्ट में जो एक बार फिर भी वह दिन आता, जब इस १४८ वाँ शिलालेख छपा है, उससे मालूम हाता
पन्थके साधु भी शिथिलाचारके शिकार हो है कि गंगवंशी सत्यवाक् कोङ्गणिवर्माके सम
जाते और मूल जैनधर्मके भक्तोंको उनके विरोयमें एक पुरुषने श्रीकुमारसेन भट्टारकको जिने
- धमें एक नये पन्थको जन्म देना पड़ता ! प्रवृन्द्रभवन के लिए एक ग्राम दिया है । यह शिला
त्तिपूर्ण संसारकी यही प्रकृति है; निवृत्तिमार्गकेलेख नवीं शताब्दिका लिखा हुआ है । संभवतः
पथिकोंके आगे प्रलोभनोंका जाल बिछाये बिना
उससे नहीं रहा जाता। ये कुमारसेन भट्टारक द्रविडसंघके या काष्ठासंघके होंगे।
फाल्गुन वदी १०॥
सं० १९७६वि० ।। -नाथूराम प्रेमी। १ देखो, जैनसिद्धान्तभास्कर भाग १ किरण
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और
समता।
अङ्क ४] गन्धहस्ति महाभाष्यकी खोज।
१०९ गंधहस्तिमहाभाष्यकी खोज पत्रों द्वारा यह प्रकट हुआ था कि पूना लायब्रे
रीकी किसी सूची परसे आस्ट्रिया देशके एक
नगरकी लायब्रेरीमें उक्त ग्रंथके अस्तित्वका पता , आप्तमीमांसा ( देवागम) की चलता है । साथ ही, उसकी कापी करनेके लिये
दो एक विद्वानोंको वहाँ भेजने और खर्चके लिये स्वतंत्रता।
कुछ चंदा एकत्र करनेका प्रस्ताव भी उपस्थित कहा जाता है कि भगवान श्रीसमन्तभद्रा- किया गया था । हम नहीं कह सकते कि ग्रंथके चार्यने तत्त्वार्थसत्र पर 'गंधहस्ति महाभाष्य' अस्तित्वका यह समाचार कहाँ तक सत्य है नामके एक महान ग्रंथकी रचना की थी, और इस बातका यथोचित निर्णय करनेके लिये जिसकी श्लोकसंख्याका परिमाण ८४ हजार अभी तक क्या क्या प्रयत्न किया गया है। है । यह ग्रंथ भारतके किसी भी प्रसिद्ध भंडा- परंतु इतना जरूर कहेंगे कि बहुतसे भंडारोंकी रमें नहीं पाया जाता । विद्वानोंकी इच्छा इस सूचियाँ अनेक स्थानों पर भ्रमपूर्ण पाई जाती ग्रंथराजको देखनेके लिये बड़ी ही प्रबल है। हैं । पूना लायब्रेरीकी ही सूची में सिद्धसेन दिवाबम्बईके सुप्रसिद्ध सेठ श्रीमान् माणिकचंद करके नामसे 'वादिगजगंधहस्तिन' नामके हीराचंदजी जे० पी० ने इस ग्रंथरत्नका दर्शन एक महान ग्रंथका उल्लेख मिलता है जो यथार्थ मात्र करानेवालेके वास्ते ५००) रुपयेका नकद नहीं है । वहाँ इस नामका कोई ग्रंथ नहीं ।
भी निकाला था । परंतु खेद है कि यह नाम किसी दूसरे ही ग्रंथके स्थान पर गलकोई भी उनकी इस इच्छाको पूरा नहीं कर तीसे दर्ज हो गया है। ऐसी हालतमें केवल सका और वे अपनी इस महती इच्छाको हृदयमें सूचीके आधार पर आस्ट्रिया जैसे सदूरदेशकी रक्खे हुए ही इस संसारसे कूच कर गये। यात्राके लिये कुछ विद्वानोंका निकलना और निःसन्देह जैनाचार्यों में स्वामी समन्तभद्रका भारी खर्च उठाना युक्तियुक्त प्रतीत नहीं होता। आसन बहुत ही ऊँचा है। वे एक बड़े ही अपूर्व बेहतर तरीका, इसके लिये, यह हो सकता है
और अद्वितीय प्रतिभाशाली आचार्य हो गये कि वहाँके किसी प्रसिद्ध फोटोग्राफरके द्वारा उक्त हैं । उनका शासन महावीर भगवानके शास- ग्रंथके आयतके १०-२० पत्रोंका फोटो पहले नके तुल्य समझा जाता है और उनकी मँगाया जाय और उन परसे यदि यह निर्णय आप्तमीमांसादिक कृतियोंको देखकर बड़े बड़े हो जाय कि वास्तवमें यह ग्रंथ वही महा भाष्य वादी विद्वान् चकित होते हैं। ऐसी हालतमें ग्रंथ है तो फिर उसके शेष पत्रोंका भी फोटो आचार्य महाराजकी इस महती कृतिके लिये आदि मँगा लिया जाय । अस्तु; ग्रंथके वहाँ निसका मंगलाचरण ही आप्तमीमांसा (देवा- अस्तित्व विषयमें अभी तक हमार। कोई विश्वास गम) कहा जाता है, यदि विद्वान लोग नहीं है । आस्ट्रियाके एक प्रसिद्ध नगरकी उत्कंठित और लालायित हों तो इसमें कुछ भी, प्रसिद्ध लायब्रेरीमें उक्त ग्रंथ मौजूद हो और आश्चर्य और अस्वाभाविकता नहीं है । और यही हर्मन जैकोबी जैसे खोजी विद्वानोंको उसका कारण है कि अभी तक इस ग्रंथरत्नकी खोजका पता तक न लगे, यह बात कुछ समझमें नहीं प्रयत्न जारी है और अब विदेशोंमें भी उसकी आती । हमें इस ग्रंथके विषयमें यह बात भी तलाश की जा रही है । हालमें कुछ समाचार- बहुत खटकती है कि 'आप्तमीमांसा' अर्थात्
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'११० जनहितैषी
[भाग १४ 'देवागम' शास्त्रको, जो कुल ११४ श्लोक- भाष्य है, ३ उसकी श्लोकसंख्या ८४ हजार परिमाण है, इसका मंगलाचरण बतलाया है और देवागम' स्तोत्र उसका आदिम मंगजाता है । देवागम भारतके प्रायः सभी प्रसिद्ध लाचरण है; इन सब बातोंकी उपलब्धि कहाँसे भंडारों में पाया जाता है। उस पर अनेक टीका. होती है-कौनसे प्राचीन आचार्यके किर टिप्पण और भाष्य भी उपलब्ध हैं । अकलंक- इन सब बातोंका पता चलता है ? यह देवकी 'अष्टशती' और विद्यानंद स्वामीकी दूसरी बात है कि आजकलके अच्छे अच्छे 'अष्टसहस्री' उसीके भाष्य और महाभाष्य विद्वान-न सिर्फ जैनविद्वान् बल्कि सतीशचंद्र हैं । जिस ग्रंथका मंगलाचरण ही इतने महत्त्वको विद्याभूषण, भारती जैसे अजैन विद्वान् भीलिये हुए हो वह शेष संपूर्ण ग्रंथ कितना मह- अपने अपने ग्रंथों तथा लेखोंमें इन सब बातोंका त्वशाली होगा और विद्वानोंने उसका कितना उल्लेख करते हुए देखे जाते हैं । परंतु ये अधिक संग्रह किया होगा, इसके बतलानेकी जरू- सब उल्लेख एक दूसरेकी देखादेखी हैं, परीक्षासे रत नहीं है । विज्ञ पाठक सहजहीमें इसका अनु- उनका कोई सम्बन्ध नहीं और न वे जाँच तोल मान कर सकते हैं । परंतु तो भी ऐसे महान ग्रंथका कर लिखे गये हैं । इसी प्रकारके कुछ उल्लेख भारतके किसी भंडारमें अस्तित्व न होना, उसके पिछले भाषापंडितोंके भी पाये जाते है। इन सब शेष अंशोंपर टीका-टिप्पणका मिलना तो दूर आधुनिक उल्लेखोंसे इस विषयका कोई ठीक रहा उनके नामोंकी कहीं चर्चातक न होना, निर्णय नहीं हो सकता। और न हम उन्हें ऐसी यह सब कुछ कम आश्चर्यमें डालनेवाली बातें हालतमें विना किसी हेतुके प्रमाणकोटिमें रख नहीं हैं । और इनपरसे तरह तरहके विकल्प सकते हैं। हमारी रायमें इन सब बातोंके निर्णउत्पन्न होते हैं । यह खयाल पैदा होता है यार्थ--विकल्पोंके समाधानार्थ-अंतरंग खोकि क्या समन्तभद्रने गंधहस्तिमहाभाष्य' जकी बहुत बड़ी जरूरत है । हमें सबसे पहलेनामका कोई ग्रन्थ बनाया ही नहीं और उनकी विदेशोंमें जानेसे भी पहले-अपने घरके साहिआप्तमीमांसा ( देवागम ) एक स्वतंत्र ग्रंथ है ? त्यको गहरा टटोलना होगा; तब कहीं हम यथार्थ यदि बनाया तो क्या वह पूरा न हो सका और निर्णय पर पहुँच सकेंगे। अस्तु । आप्तमीमांसा तक ही बनकर रह गया ? यदि . इस विषयमें हमने आजतक जो कुछ खोज की पूरा हो गया था तो क्या फिर बन कर समाप्त है और उसके द्वारा हमें जो कुछ मालूम हो होते ही किसी कारण विशेषसे वह नष्ट हो गया ? सका है उसे हम अपने पाठकोंके विचारार्थ यदि नष्ट नहीं हुआ तो क्या फिर प्रचलित और यथार्थ निर्णयकी सहायतार्थ नीचे प्रकट सिद्धान्तोंके विरुद्ध उसमें कुछ ऐसी बातें थी करते हैं:जिनके कारण बादके आचार्यों खासकर भट्टार• १-उमास्वातिके तत्त्वार्थपूत्रपर सर्वार्थ- ;
कोंको उसे लुप्त करनेकी जरूरत पड़ी अथवा सिद्धि, राजवार्तिक, श्लोकवार्तिक और श्रुत• बादको उसके नष्ट होजानेका कोई दूसरा ही सागरी नामकी जो टीकाएँ उपलब्ध हैं उनमें,
कारण है ? इन सब विकल्पोंको छोड़कर अभी जहाँ तक हमारे देखनेमें आया कहीं भी 'गंधतक हमें यह भी मालूम नहीं हुआ कि १ समन्त- हस्ति महाभाष्य' का नामोल्लेख नहीं है और न
भद्रने ‘गंधहस्तिमहाभाष्य' नामका कोई ग्रंथ इसी बातका कोई उल्लेख पाया जाता है कि • बनाया है, २ वह उमास्वातिके तत्त्वार्थसूत्रका समन्तभद्रने उक्त तत्त्वार्थसूत्रपर कोई भाष्य
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अङ्क ४]
गन्धहास्ति महाभाष्यकी खोज।
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लिखा है। समन्तभद्रका अस्तित्वकाल इन सब दूसरे सिद्धान्त ग्रन्थ ( कषाय प्राभृत ) पर टीका टीकाओंके बननेसे पहले माना जाता है । यदि लिखना चाहते थे परंतु उनके एक सधर्मी साधुइन टीकाओंके रचयिता पूज्यपाद, अकलंकदेव, ने द्रव्यादिशुद्धिकर प्रयत्नोंके अभावसे उन्हें वैसा विद्यानन्द और श्रुतसागरके समयोंमें समन्तभ- करनेसे रोक दिया । बहुत संभव है कि इसके 'द्रका उसी सूत्रपर ऐसा कोई महत्त्वशाली भाष्य बाद उनके द्वारा कोई बड़ा ग्रंथ न लिखा विद्यमान होता तो उक्त टीकाकार किसी न किसी गया हो। रूपमें इस बातको सूचित जरूर करते, ४-श्रवणबेल्गुलके जितने शिलालेखोंमें ऐसा हृदय कहता है । परंतु उनके टीकाग्रंथोंसे समंतभद्रका नाम आया है उनमेंसे किसी भी ऐसी कोई सूचना नहीं पाई जाती । प्रत्युत, आचार्य महोदयके नामके साथ 'गंधहस्ति महाश्रुतसागर सूरिने अपने अध्ययन-विषयक अथवा भाष्य' का उल्लेख नहीं है। और न यही लिखा टीकाके आधार-विषयक जिन प्रधान ग्रन्थोंका मिलता है कि उन्होंने तत्त्वार्थसूत्र पर कोई उल्लेख अपनी टीकाकी संधियोंमें किया है टीका लिखी है । हाँ, उनके शिष्य शिवकोटि उनमें साफ तौरसे श्लोकवार्तिक और सर्वार्थ- आचार्यके सम्बंधमें इतना कथन जरूर पाया सिद्धिका ही नाम पाया जाता है, गंधहस्ति जाता है कि उन्होंने तत्त्वार्थसूत्रको अलंकृत महाभाष्यका नहीं । यदि ऐसा महान ग्रंथ किया, अर्थात् उसपर टीका लिखी । (देखो उन्हें उपलब्ध होता तो कोई वजह नहीं थी कि शि० लेख नं० १०५) वे उसका भी साथमें नामोल्लेख न करते । ५-ब्रह्मनेमिदत्तने आराधना कथाकोशमें - २---- आप्तमीमांसा ( देवागम ) पर, जिसे समन्तभद्रकी एक कथा दी है परंतु उसमें उनके गंधहस्तिमहाभाष्यका मंगलाचरण कहा जाता किसी भी गंधहस्तिमहाभाष्यके नामकी कोई है; इस समय तीन संस्कृत टीकाएँ उपलब्ध हैं। उपलब्धि नहीं होती। एक 'वसुनन्दिवृत्ति,' दूसरी, ‘अष्टशती' ६–संस्कृत प्राकृतके और भी बहुतसे उप
और तीसरी ' अष्टसहस्री' । इनमेंसे किसी भी लब्ध ग्रंथ जो देखनेमें आये और जिनमें किसी टीकामें गंधहस्ति महाभाष्यका कोई नाम नहीं न किसी रूपसे समन्तभद्रका स्मरण किया गया है, और न यही कहीं सूचित किया है कि यह है उनमें भी हमें स्पष्टरूपसे कहीं गंधहस्ति महाआप्तमीमांसा ग्रंथ गंधहस्ति महाभाष्यका मंगला- भाष्यका नाम नहीं मिला । और दूसरे अनेक चरण अथवा उसका प्राथमिक अंश है। किसी विद्वानोंसे जो इस विषयमं दोफ्त किया गया तो दूसरे ग्रंथका एक अंश होनेकी हालतमें यही उत्तर मिला कि गंधहस्ति महाभाष्यका ऐसी सूचनाका किया जाना बहुत कुछ नाम किसी प्राचीन ग्रंथमें हमारे देखने में नहीं स्वाभाविक था।
आया, अथवा हमें कुछ याद नहीं है। .३–श्रीइन्द्रनन्दि आचार्यके बनाये हुए .७-ग्रंथके नाममें 'महाभाष्य' शब्दसे " श्रुतावतार' ग्रंथमें भी समन्तभद्र के साथ, जहाँ यह सूचित होता है कि इस ग्रंथसे पहले भी कर्मप्राभूतपर उनकी ४८ हजार श्लोकपरिमाण तत्त्वार्थसूत्रपर कोई भाष्य विद्यमान था जिसकी 'एक सुंदर संस्कृतटीकाका उल्लेख किया गया अपेक्षा इसे 'महाभाष्य' संज्ञा दी गई है। है. वहाँ, गंधहस्ति महाभाष्यका कोई नाम नहीं परंतु दिगम्बर साहित्यसे इस बातका कहीं कोई है। बल्कि इतना प्रकट किया गया है कि वे पता नहीं चलता कि समन्तभद्रसे पहले भी
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तत्त्वार्थसूत्र पर कोई भाष्य विद्यमान था । रही श्वेताम्बर साहित्यकी बात, सो श्वेताम्बर भाई इस बातको मानते ही हैं कि उनका मौजूदा 'तत्त्वा श्रधिगम भाष्य ' स्वयं उमास्वातिका बनाया हुआ है। परंतु उनकी इस मान्यताको स्वीकार करने के लिये अभी हम तय्यार नहीं हैं। उनका वह ग्रंथ अभी विवादग्रस्त है । उसके विषय में हमें बहुत कुछ कहने सुनने की जरूरत है । इस पर यदि यह कहा जाय कि बादको बने हुए भाष्यों की अपेक्षा बहुत बड़ा होनेके कारण उसे पीछेसे महाभाष्य संज्ञा दी गई है तो यह मानना पड़ेगा कि उसका असली नाम ' गंधहस्ति भाष्य ' अथवा ' गंधहस्ति ' ऐसा कुछ था । ८ - ऊपर जिन ग्रंथादिकों का उल्लेख किया गया हैं उनमें कहीं यह भी जिकर नहीं है कि समन्तभद्रने ८४ हजार श्लोकपरिमाणका कोई ग्रंथ रचा है और इस लिये गंधहस्ति महाभाष्यका जो परिमाण ८४ हजार कहा जाता है. उसकी इस संख्याकी भी किसी प्राचीन साहित्य से उपलब्धि नहीं होती ।
जैनहितैषी -
.
९ - जब उमास्वातिके तत्त्वार्थसूत्रपर ८४ हजार श्लोकपरिमाण एक महत्त्वशाली भाष्य पहलेसे मौजूद था तब यह बात समझमें नहीं आती कि सर्वार्थसिद्धि, राजवार्तिक और श्लोक - वार्तिक के बननेकी ज़रूरत ही क्यों पैदा हुई । यदि यह कहा जाय कि ये ग्रंथ गंधहस्ति महाभाष्यका सार लेकर संक्षेपरुचिवाले शिष्योंके वास्ते बनाये गये हैं तो यह बात भी कुछ बनती हुई मालूम नहीं होती; क्यों कि ऐसी हालत में श्री पूज्यपाद, अकलंकदेव और विद्यानंद स्वामी अपने अपने ग्रंथों में इस प्रकारका कोई उल्लेख जरूर करते जैसा कि आम तौर पर दूसरे आचार्योंने किया है, जिन्होंने अपने ग्रंथों को दूसरे ग्रंथोंके आधारपर अथवा उनका सार लेकर बनाया है । परंतु चूँ कि इनमें ऐसा
[ भाग १४
कोई उल्लेख नहीं है, इस लिये ये सर्वार्थसिद्धि आदि ग्रंथ गंधहस्तिमहाभाष्यके आधार पर अथवा उसका सार लेकर बनाये गये हैं ऐसा माननेको जी नहीं चाहता । इसके सिवाय अकलंकदेव और विद्यानंद के भाष्य वार्तिक के ढंग से लिखे गये हैं । वे ' वार्तिक ' कहलाते भी हैं। और वार्तिकों में उक्त, अनुक्त, दुरुक्त, तीनों प्रकार के अर्थोंकी विचारणा और अभिव्यक्ति हुआ करती है, जिससे उनका परिमाण पहले भाष्योंसे प्रायः कुछ बढ़ जाता है । जैसे कि सर्वार्थसिद्धि से राजवार्तिकका और राजवार्तिक से श्लोकवार्तिकका परिमाण बढ़ा हुआ है । ऐसी हालत में यदि समन्तभद्रका ८४ हजार श्लोक. संख्यावाला भाष्य पहलेसे मौजूद था तो अकलंकदेव और विद्यानंदके वार्तिकों का परिमाण: उससे जरूर कुछ बढ़ जाना चाहिये था । परंतु बढ़ना दूर रहा, वह उलटा उससे कई गुणा घट रहा है । दोनों वार्तिकों की श्लोकसंख्या का परिमाण क्रमशः १६ और २० हजारसे अधिक नहीं, ऐसी हालत में कमसे कम अकलंकदेव और विद्यानंदके समय में गंधहस्ति महाभाष्यका अस्तित्व स्वीकार करनेके लिये तो और भी हृदय तय्यार नहीं होता ।
१० - जिस आप्तमीमांसा ( देवागम स्तोत्र ) को गंधहस्ति सहाभाष्यका मंगलाचरण बतलाया जाता है उसकी अन्तिम कारिका इस प्रकार है
इतीयमाप्तमीमांसा विहिता हितमिच्छतां । सम्यग्मिथ्योपदेशार्थविशेषप्रतिपत्तये ॥
यह कारिका जिस ढंग और जिस शैलीसे लिखी गई है और इसमें जो कुछ कथन किया: गया है उससे आप्तमीमांसाके एक बिलकुल : स्वतंत्र ग्रन्थ होनेकी बहुत ज्यादह संभावना पाई जाती है। इस कारिका को देते हुए व सुनन्दी आचार्य अपनी टीकामें इसे 'शास्त्रार्थोपसंहारकारिका' लिखते हैं, साथ ही इस कारिकाकी
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अङ्क ४]
गन्धहस्ति महाभाष्यकी खोज ।
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टीकाके अन्तमें ग्रंथकर्ता भी समंतभद्रका नाम १२-श्रीशुभचंद्राचार्यविरचित पांडवपुरा‘कृतकृत्यः नियूंढतत्त्वप्रतिज्ञः' इत्यादि विशे- णका एक पद्य इस प्रकार है:षणों के साथ देते हैं, जिससे मालूम होता है कि "समन्तभद्रो भद्रार्थो भातु भारतभूषणः । इस कारिकाके साथ ग्रन्थकी समाप्ति हो गई, देवागमेन येनात्र व्यक्तो देवागमः कृतः " ॥ १५॥ ग्रंथके अन्तर्गत किसी खास विषयकी नहीं। - इस पद्यके द्वारा ग्रंथकर्ती महाशय, स्वामी विद्यानंदस्वामी, अष्टसहस्रीमें, इस कारिकाके समन्तभद्रका 'भारतभषण' आदि विशेषणोंके द्वारा 'प्रारब्धनिर्वहण'-(प्रारंभ किये हुए साथ स्मरण करते हुए, प्रकट करते हैं कि कार्यकी परिसमाप्ति) आदिको सूचित करते उन्होंने अपने देवागम (शास्त्र) के द्वाराहुए टीकामें लिखते हैं
( गंधहस्तिमहाभाष्य अथवा तत्त्वार्थसूत्रकी " इति देवागमाख्ये स्वोक्तपरिच्छेदे शास्त्रे....
टीकाके द्वारा नहीं) जिनेंद्रदेवके आगम (जैना.. अत्र शास्त्रपरिसमाप्तौ"......
गम) को संसारमें व्यक्त कर दिया है। इससे - इन शब्दोंसे भी प्रायः यही ध्वनित होता है
देवागमकी स्वतंत्रता और भी स्पष्ट शब्दोंमें कि देवागमशास्त्र जो कि आप्तमीमांसाके शुरूमें
उद्घोषित होती है और यह पाया जाता है कि 'देवागम' शब्द होनेसे उसीका दूसरा नाम है,
संसारमें समन्तभद्रकी विशेष प्रसिद्धका कारण एक स्वतंत्र ग्रंथ है और उसकी समाप्ति इस
भी उनका ‘देवागम' ग्रंथ ही हुआ है। यदि कारिकाके साथ ही हो जाती है। अतः वह किसी
यह देवागम कोई पृथक् ग्रंथ न होकर गंधहस्ति दूसरे ग्रंथका आदिम अंश अथवा मंगलाचरण
महाभाष्यका ही एक अंश-उसका केवल मालूम नहीं होता।
मंगलाचरण-होता तो कोई वजह नहीं थी कि ११-अकलंकदेव अपनी अष्टशतीके आरं
उसे महान ग्रंथका कहीं नामोल्लेख न करके भमें लिखते हैं
उसके केवल एक छोटेसे अंशका ही उल्लेख "येनाचार्यसमन्तभद्रयतिना तस्मै नमः संततं । कृत्वा वित्रियतेस्तवो भगवता देवागमस्तस्कृतिः ॥२२॥
किया जाता। उस संपूर्ण ग्रंथके द्वारा तो और वसुनन्दी आचार्य अपनी देवागमवृत्तिके मा
भी अधिकताके साथ जैनागम व्यक्त हुआ होगा अन्तमें सूचित करते हैं "श्रीसमंतभद्राचार्यस्य... फिर उसका नाम क्यों नहीं ? और क्यों देवागमाख्यायाः कृते सक्षेपभूतं विवरणं कृतं...." आम तौरपर देवामम अथवा आप्तमीमांसाका ही कर्णाटकदेशस्थ हुमचा जि० शिमोगाके
नामोल्लेख पाया जाता है ? . जरूर इसमें कुछ
रहस्य है और वह कमसे कम देवागमकी स्वतंएक शिलालेखमें निम्न आशयका उल्लेख* मिलता है:
त्रताका समर्थक जान पड़ता है। " अकलंकने समंतभद्रके देवागमपर भाष्य लिखा। १३-श्रीविद्यानंदस्वामीने "युक्त्यनुशासन' आप्तमीमांसा ग्रंथको समझाकर बतलानेवाले विद्या. ग्रंथकी टीका लिखते हुए सबसे पहले उसकी नंदिको नमोस्तु।" .
. उत्थानिकारूपसे यह वाक्य दिया है-- . इन सब अवतरणोंसे भी प्रायः यही पाया। जाता है कि समन्तभद्रका 'देवागम' उनकी
__ "श्रीसमन्तभद्रस्वामिभिराप्तमीमांसामामन्ययागव्य
वच्छेदात् व्यवस्थापितेन भगवता श्रीमताहतान्त्यतीएक पृथक् कृति अथवा स्वतंत्र ग्रंथ है। .
थैकरपरमदेवेन माँ परक्ष्यि किं चिकीर्षवो भवन्त . * देखो जैनाहितैषी भाग ९, अंक ९, पृष्ट ४४५। इति ते पृष्ठा इव प्राहुः । "
३-४
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| भाग १४
ऐसी हालत में 'देवागम' को भी युक्त्यनुशासन के सदृश गंधहस्तिमहाभाष्यका कोई अंग न मान कर एक स्वतंत्र ग्रंथ कहना चाहिये । १४ - श्रीधर्म भूषणयतिविरचित ८ न्यायदीपिका' में, सर्वज्ञकी सिद्धि करते हुए, आप्तमीमांसाका एक पद्य निम्न प्रकारसे उद्धृत किया हुआ मिलता है:
निनीषवः स्मो वयमद्य वीरं
तदुक्तं स्वामिभिर्महाभाष्यस्यादावाप्तमीमांसाप्रस्तावे - सूक्ष्मान्तरितदूरार्था.... ........ | "
विशीर्णदोषाशय पाशबन्धं ॥ १ ॥ अद्यास्मिन् काले परीक्षावसानसमये । " विद्यानंदाचार्य के इस संपूर्ण कथन से मालूम होता है कि स्वामि समन्तभद्रने आप्तमीमांसा ( देवागम ) के अनन्तर ही उक्त ग्रंथद्वारा अर्हन्तदेवकी परीक्षा के बाद ही - 'युक्त्यनुशासन ' ग्रंथ की रचना की है । यदि ' देवागम' को गंधहस्तिमहाभाष्यका एक अंग और उसका आदिम भाग माना जाय तो युक्त्यनुशासनको भी उक्त महाभाष्यका तदनन्तर अंग कहना होगा। परंतु ऐसा नहीं कहा जाता । युक्त्यनुशासन समन्तभद्रका, महावीर भगवानकी स्तुतिको लिये -हुए हितान्वेषणका उपाय प्रतिपादक एक स्वतंत्र ग्रंथ माना जाता है । नीचेके कुछ पयों और उनकी कथनशैली से भी प्रायः ऐसा ही आशय ध्वनित होता है:--
इससे मालूम होता है कि स्वामी समन्तभद्रप्रणीत ' महाभाष्य ' की आदिमें आप्तमीमांसा नामका एक प्रस्ताव है । और सिर्फ यही एक उल्लेख है जो अभी तक हमें इस विषय में प्राप्त हो सका है और जिससे प्रचलित प्रवादको कुछ आश्वासन मिलता है । यद्यपि इस उल्लेखमें ' गंधहस्ति महाभाष्य ' ऐसा स्पष्ट नाम नहीं है, न इस ' महाभाष्य ' को उमास्वातिके तत्त्वार्थसूत्रका भाष्य प्रकट किया है, न यह ही सूचित किया है कि उसकी ग्रंथसंख्या ८४ हजार श्लोक परिमाण है, और इसलिये संभव है कि यह महाभाष्य समन्तभद्रका उपर्युल्लिखित, ४८ हजार श्लोक संख्याको लिये हुए, 'कर्मप्राभृत' सिद्धान्तवाला भाष्य हो अथवा कोई
।
"नरागान्नः स्तोत्रं भवति भवपाशच्छिदिमुनौ, न चान्येषु द्वेषादपगुणकथाभ्यासखलता । किमुन्यायान्यायप्रकृतगुणदोषज्ञमनसां हितान्वेषोपायस्तव गुणकथासंगगदितः " ॥ ६४ ॥ दूसरा ही भाष्य हो । और उसमें आचार्य महो
- युक्त्यनुशासन । " श्रीमद्वीर जिनेश्वराम लगुणस्तोत्रं परीक्षेक्षणैः साक्षात्स्वामिसमंतभद्रगुरुभिस्तत्त्वं समीक्ष्याखिलं । प्रोक्तं युक्त्यनुशासनं विजयिभिः स्याद्वादमार्गानुगैविद्यानंदबुधैरलंकृतमिदं श्रीसत्यवाक्याधिपैः ॥”
दयने आवश्यकतानुसार, अपने आप्तमीमांसा ग्रंथको भी बतौर एक प्रस्तावके शामिल कर दिया हो, तो भी धर्मभूषण के इस उल्लेखसे प्रकृत गंधहस्ति महाभाष्यका आशय जरूर निकाला जा सकता है। परंतु जब हम इस उल्लेखको ऊपर दिये हुए संपूर्ण अनुसंधानोंकी रोशनी में पढ़ते हैं और साथ ही, इस बातको ध्यान में रखते हैं कि धर्मभूषणजी विक्रमकी १५ वीं शताब्दी के विद्वान हैं, तो ऐसा मालूम होता है कि यह उल्लेख उस वक्तके प्रचलित प्रवाद,
टी. विद्यानन्दस्वामी ।
इसके बाद मूल ग्रंथका प्रथम पद्य उद्धृत किया है जो इस प्रकार है:
८
जैनहितैषी -
की
महत्या भुवि वर्द्धमानं त्वां वर्द्धमानं स्तुतिगोचरत्वं
"
'जीवसिद्धिविधायीह कृतयुक्त्यनुशासनं । वचः समन्तभद्रस्य वीरस्येव विजृंभते ॥ "
हरिवंशे जिनसेनः ।
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अङ्क ४]
गन्धहस्ति महाभाष्यकी खोज। लोकोक्ति अथवा दंतकथाओंके आधर पर ही दकी धुनमें अर्थका अनर्थ भी हो जाता है, किया गया है । वास्तविक तथ्यसे इसका प्रायः जिसका एक उदाहरण हम अपने पाठकों के कोई सम्बंध नहीं। और न यह मानने अथवा सामने नीचे रखते हैंकहनेका कोई कारण है कि धर्मभूषणजीने उक्त न्यायदीपिकामें एक स्थानपर ये वाक्य गंधहस्तिमहाभाष्यको स्वयं देखकर ही ऐसा दिये हैं:उल्लेख किया है। यदि ऐसा होता तो खास तद्विपरीतलक्षणो हि संशयः । यद्राजवार्तिकम्
लेख " अनेकार्थानिश्चिता पर्युदासात्मकः संशयः, तद्विपरीराजवार्तिकादि ग्रंथोंके स्थानों में अथवा उनके तोऽवग्रहः " इति । भाष्यं च " संशयो हिं निर्णय.
विरोधी नत्ववग्रहः" इति । साथ जरूर पाया जाता। परंतु ऐसा नहीं है,
पं. खूबचंदजीने, न्यायदीपिकापर लिखी न्यायदीपिकामें दूसरी जगह भी आप्तमीमांसा
हुई अपनी भाषाटीकामें, इन वाक्योंका अनुवाद का ही उल्लेख किया गया है। वहाँ ऊपरके सदृश महाभाष्यादि शब्दोंका प्रयोग भी नहीं है,
देते हुर, 'भाष्य' शब्दसे 'गंधहस्तिमहा
भाष्य' का अर्थ सूचित किया है- अर्थात्, बलिक बहुत सीधे सादे शब्दोंमें 'तदुक्तमाप्तमी
सर्वसाधारण पर यह प्रकट किया है कि 'संशयो हि मांसायां स्वामिसमंतभद्राचार्यः ' ऐसा कहा
निर्णयविरोधी नत्वग्रहः' यह वाक्य गंधहस्तिगया है। धर्मभूषणजीके समयसे अबतक ऐसा
महाभाष्यका एक वाक्य है । टीकाके संशोधनकोई महान विप्लव भी उपस्थित नहीं हुआ कि
कर्ता पं० वंशीधरजी शास्त्रीने भी उनकी जिससे गंधहस्ति महाभाष्य जैसे ग्रंथका एकदम
इस बातको पास कर दिया है-अर्थात्, लोप होना मान लिया जाय । और यदि ऐसा
पुस्तकपर अपने द्वारा संशोधन किये जानेकी मान भी लिया जाय तो उनसे पहले प्राचीन
मुहर लगाकर इस बातकी रजिस्टरी कर दी है साहित्यमें उसके उल्लेख न होनेका कारण क्या
कि उक्त वाक्य गंधहस्तिमहाभाष्यका ही वाक्य है, इसका संतोषजनक उत्तर कुछ भी मालम:
"लूम है। परंतु वास्तवमें ऐसा नहीं है । यह वाक्य महीं होता, और इस लिये हमारी रायमें धर्म
राजवार्तिक भाष्यका वाक्य है । राजवार्तिकमें भूषणजीका उपर्युक्त उल्लेख प्रचलित प्रवाद पर । अवग्रहहावायधारणा' इस सत्रपर जो १० ही अवलम्बित है । प्रचलित प्रवाद पर अक्सर वाँ वार्तिक दिया है उसीके भाष्यका यह एक उल्लेख हुआ करते हैं और वे बहुतसे ग्रंथोंमें पाये
वाक्य है - । इस वाक्यसे पहले जो वाक्य, जाते हैं । आजकल भी, जब कि गंधहस्ति
'यद्राजवार्तिकं' शब्दोंके साथ,न्यायदीपिकाकी 'महाभाष्यका कहीं पता नहीं और यह भी ऊपरकी पंक्तियोंमें उद्धृत पाया जाता है वह निश्चय नहीं कि किसी समय उसका अस्तित्व उक्त सूत्रका ९ वाँ वार्तिक है । दूसरे शब्दोंमें भी था या कि नहीं, बहुतसे अच्छे अच्छे यों समझना चाहिये कि ग्रंथकर्ताने पहले राजविद्वान् अपने लेखों तथा ग्रंथोंमें गंधहस्ति महा- वार्तिक भाष्यका एक वार्तिक और फिर एक वार्तिभाष्यका उल्लेख परिचत अथवा निश्चित ग्रंथके कका भाष्यांश उद्धृत किया था, जिसको हमारे तौर पर करते हैं, उसे तत्वार्थसत्रकी टीका दोनों पंडित महाशयोंने नहीं समझा और = बतलाते हैं और उसके श्लोकोंकी संख्याका परि- समझनेकी कोशिश की। उनके सामने मूल ग्रंथमें माण तक देते हैं । यह सब प्रचलित प्रवादका - देखो राजवार्तिक, सनातनग्रंथमाला कलकत्तेका ही नतीजा है । कभी कभी इस प्रचलित प्रवा- उपा हुआ।
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जैनहितैषी
[भाग १४
'गंधहस्ति महाभाष्य ' ऐसा कोई नाम नहीं था भट्टाकलंकदेवने, अपने कर्णाटक शब्दानुशासन
और यह हम बखूबी जानते हैं कि उन्होंने गंध- में, इस चूडामणिटीकाको 'तत्त्वार्थ महाशास्त्रकी हस्ति महाभाध्यका कभी दर्शन तक नहीं किया, व्याख्या' ('तत्त्वार्थमहाशास्त्रव्याख्यानस्य' जो उस परसे जाँच करके ही ऐसे अर्थका किया चुडामण्यभिधानस्य महाशास्त्रस्य...उपलभ्यमाजाना किसी प्रकारसे संभव समझ लिया जाता, नत्वात्।) लिखा है, जिसका आशय यह होता तो भी उन्होंने 'भाष्य ' का अर्थ 'गंधहस्ति- है कि कर्मप्राभृतादि ग्रंथ भी तत्त्वार्थशास्त्र कहमहाभाष्य' करके एक विद्वानके वाक्यको दूसरे लाते हैं और इसलिये कर्मप्राभूत पर लिखी हुई विद्वानका बतला दिया। यह प्रचलित प्रवादकी समंतभद्रकी उक्त टीका भी तत्त्वार्थमहाशास्त्रकी धुन नहीं तो और क्या है ? इसी तरह एक टीका कहलाती होगी । चूँकि उमास्वातिका दूसरी जगह भी ' तद्भाष्यं ' पदका अर्थ- तत्त्वार्थसूत्र भी तत्त्वार्थशास्त्र' अथवा 'तत्त्वार्थ" ऐसा ही गंधहस्ति महाभाष्यमें भी कहा है-” महाशास्त्र' कहलाता है, इसलिये संभव है कि
इस नामसाम्यकी वजहसे 'कर्मप्राभत' के किया गया है । इस उदाहरणसे पाठक स्वयं ,
टीकाकार श्रीसमंतभद्रस्वामी किसी समय समझ सकते हैं कि प्रचलित प्रवादकी धुनमें
उमास्वातिके तत्त्वार्थसत्रके टीकाकार समझ कितना अर्थका अनर्थ हा जाया करता है आर लिये गये हों और इसी गलतीके कारण पीछेसे उसके द्वारा उत्तरोत्तर संसारमें कितना भ्रम तथा ..
अनेक प्रकारकी कल्पनाएँ उत्पन्न हो कर उनका भाव फैल जाना संभव है। शास्त्रोंमें प्रच- वर्तमानरूप बन गया हो । यह भी संभव है, लित प्रवादोंसे अभिभूत ऐसे ही कुछ महाश• कि प्रबल और प्रखर तार्किक विद्वान् होनेके योंकी कपासे अथवा अनेक दन्तकथाओंके किसी कारण ' गंधहस्ति' यह समंतभद्रका उपनाम न किसी रूपमें लिपिबद्ध हो जानेके कारण अथवा विरुद रहा हो और उसके कारण ही ही बहुतसे ऐतिहासिक तत्त्व आजकल चक्करमें उनकी उक्त सिद्धांतटीकाका नाम गंधहस्तिमहापड़े हुए हैं । और इस लिये प्रायः उन सबकी भाष्य प्रसिद्ध हो गया हो अथवा उनके शिष्य जाँच अनेक मार्गों और अनेक पहलुओंसे होनी शिवकोटिने जो तत्त्वार्थसूत्रकी टीका लिखी है चाहिये । हरएक बातकी असलियतको खोज- उसी परसे इस विषयमें उनके नामकी प्रसिद्धि निकालनेके लिये गहरे अनुसंधानकी जरूरत है। हो गई हो । कुछ भी हो, यथार्थ वस्तुस्थितिको
खोज निकालनेकी बहुत बड़ी जरूरत है, जिसके तभी कुछ यथार्थ निर्णय हो सकता है।
लिये विद्वानोंको प्रयत्न करना चाहिये । अस्तु । १५-ऊपर श्रुतावतारके आधार पर यह गंधहस्तिमहामाण्य और आप्तमीमांसाके सम्ब
धमें हम अपने इन अनुसंधानों और विचाप्रकट किया गया है कि समंतभद्रने ‘कर्मप्राभूत'
रोंको विद्वानोंके सामने रखते हुए उनसे अत्यंत सिद्धान्त पर ४८ हजार श्लोक परिमाण एक
नम्रताके साथ निवेदन करते हैं कि वे इन पर सन्दर संस्कृतटीका लिखी थी । यह टीका
" बडी शांतिके साथ गहरा विचार करनेकी कृपा चडामणि' नामकी एक कनडी टीकाके बाद, प्रायः उसे देखकर, लिखी गई है। चूडामणिकी
* यहाँ ग्रंथका परिमाण ९६ हजार श्लोक दिया
है जिसकी बाबत राइस साहबने, अपनी 'इंस्क्रिपशंसश्लोकसंख्याका परिमाण ८४ हजार दिया है एट श्रवणबेलगोल' नामक पुस्तकमें, लिखा है कि. और वह उस कर्मप्राभृत तथा साथ ही, कषाय- इसमें १२ हजार श्लोक ग्रंथके संक्षिप्तसार अथवा प्राभृत नामके दोनों सिद्धान्तों पर लिखी गई थी। सूचीके शामिल हैं।
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गन्धहस्ति महाभाष्य की खोज ।
अङ्क ४ ]
करें और उसके बाद हमें अपने विचारोंसे सुचित करके कृतार्थ बनाएँ । यदि हमारा कोई अनुसंधान अथवा विचार उन्हें ठीक प्रतीत न हो तो हमें युक्तिपूर्वक उससे सूचित किया जाय । साथ ही, जिन विद्वानोंको किसी प्राचीन साहित्यसे गंधहस्तिमहाभाष्यके नामादिक चारों बातों में से किसी भी बातकी कुछ उपलब्धि हुई हो, वे हम पर उसके प्रकट करनेकी उदारता दिखलाएँ, जिससे हम अपने विचारोंमें यथोचित फेरफार करनेके लिये समर्थ हो सकें, अथवा उसकी सहायता से किसी दूसरे नवीन अनुसंधानको प्रस्तुत कर सकें । आशा है, जैनहितैषी के विज्ञ पाठक हमारे इस समुचित निवेदन पर ध्यान देनेकी अवश्य कृपा करेंगे, और इस तरह एक ऐतिहासिक तत्त्वके निर्णय करनेमें सहोयो गिताका परिचय देंगे।
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भी अनुपलब्ध ग्रंथों में था जिसका नाम सुनकर ही उन्होंने उसे अपनी सूची में दाखिल किया था । उसके सम्बंध में यह कहीं प्रकट नहीं किया गया कि वह अमुक लायब्रेरी में मौजूद है । पंडितजीने इस सूची में गंधहस्तिमहाभाष्यका नाम देख कर ही, बिना कुछ सोचे समझे, आस्ट्रिया देशके एक नगरकी लायब्रेरीमें उसके अस्तित्वका निश्चय कर दिया और उसे सर्व साधारण पर प्रकट कर दिया ! यह कितनी भूलकी बात है ! हमें अपने पंडितजीकी इस कार्रवाई पर बहुत खेद होता है जिसके कारण समाजको व्यर्थ ही एक प्रकारके चक्कर में पड़ने और चंदा एकत्र करने कराने आदिका कष्ट उठाना पड़ा । आशा है पंडितजी, जिनका नाम यहाँ देने की हम कोई जरूरत नहीं समझते, आगामी से ऐसी मौटी भूल न करनेका ध्यान रक्खेंगे ।
सरसावा, ता० १९-१-२०
अन्तमें हम अपने पाठकों पर इतना और प्रकट किये देते हैं कि इस लेखका कुछ भाग लिखे जाने के बाद हमें अपने मित्र श्रीयुत मुनि जिनविजयजी आदि के द्वारा यह मालुम करके बहुत अफसोस हुआ कि दक्कन कालिज पूना लायब्रेरीकी किसी सूचीके आधार पर एक पंडित महाशयने, समाज के पत्रोंमें, जो इस प्रकारका समाचार प्रकाशित कराया था कि, गंधहस्ति महाभाष्य आस्ट्रिया देशके अमुक नगरकी लायब्रेरी में मौजूद है और इसलिये वहाँ जाकर उसकी कापी लानेके लिये कुछ विद्वानोंकी योजना होनी चाहिये, वह बिलकुल उनका भ्रम और बेसमझीका परिणाम था। उन्हें सूची देखना ही नहीं आया । सूचीमें, जो किसी रिपो के अन्तर्गत है, आस्ट्रिया के विद्वान डाक्टर बूल्हरने कुछ ऐसे प्रसिद्ध जैनग्रंथोंके नाम उनके कतीओंके नाम सहित प्रकट किये थे जो उपलब्ध हैं, तथा जो उपलब्ध नहीं हैं किन्तु उनके नाम सुने जाते हैं । समंतभद्रका ' गंधहस्तिमहाभाष्य..
किसी नियम या सिद्धान्त के तौर पर विधवाविवाह कोई अच्छी चीज़ नहीं है । और न यह बात पसंद किये जाने के योग्य है कि उसे ख्वामख्वाह उत्तेजन दिया जाय । बन सके तो खुशी से पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन होना चाहिये परंतु जो लोग ( स्त्री या पुरुष ) पूर्ण ब्रह्मचर्य पालन करनेके लिये असमर्थ हैं, गुप्त व्यभिचार करते हैं और इस तरह भ्रूणहत्या, बालहत्यादि अनेक दुष्कर्मों तथा पापोंको जन्म देते हैं उन - की अपेक्षा वे लोग अच्छे जरूर हैं जो इन पापों से बचने के लिये पुनर्विवाह करके बैठ जाते हैं और सुखपूर्वक अपनी गृहस्थी चलाते हैं । ऐसे लोगोंकी इस प्रवृत्ति में व्यर्थकी रुकावटें पैदा करना भी अच्छा नहीं है ।
—खंडविचार |
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जैनहितैषी
[ भाग १४
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म्बरजैन ग्रन्थकर्ता और उनके ग्रंथ ' नामक
सूचीमें ' श्रीचंद्र'के नामके साथ १ श्रावकाचारअर्थात्-- जैनाचार्य, दूसरे जैन विद्वान्, उनके
रत्नकरंड ( प्राकृत श्लोक ४४००), २ सम्यक्त्व
रत्नकरंड ( प्राकृत ), ३ पद्मपुराणकी पंजिकापोषक, प्रधान श्रावक और
टीका,४ श्रावकाचार ( सप्तव्यसननिरोधात्मक) जैन राजादिक।
और ५ पंचकल्याणकपूजा, ये ग्रंथ और दिये
हैं। हम नहीं कह सकते कि ये सब ग्रंथ उक्त ७ श्रीचन्द्र, श्रीनन्दी और सागरसेन। श्रीचंद्रमनिके बनाये हुए हैं अथवा किसी दूसरे
‘श्रीचंद' नामके मुनिने धाराधीश महा- श्रीचंद्रके । ग्रंथोंके देखने पर इस बातका निश्चय राजा भोजके समय में “पुराणसार' नामका एक हो सकता है । जिन विद्वानोंको उक्त पांचों ग्रंथामसे संस्कृत ग्रंथ बनाया है, जिसकी श्लोकसंख्या किसी ग्रंथके देखने का अवसर मिला हो उन्हें 'दिगम्बर जैनग्रंथकर्ता और उनके ग्रंथ' नामक यथार्थ बातसे सचित करना चाहिये । उक्त सूचीके अनुसार २१०० है । इस ग्रंथकी प्रशस्ति सूची में एक स्थानपर फुटनोटद्वारा, यह भी और रचना संवत् इस प्रकार है:-
सूचित किया गया है कि 'एक श्रीचंद्राचार्य "धारायां पुरि भोजदेवनृपते राज्ये जयात्युच्चकैः वि. स. १२४१ में हुए हैं। मालूम नहीं वे श्रीमत्सागरसेनतो यतिपतेज्ञात्वा पुराणं महत् । श्रीचंद्र कौनसे आचार्यके शिष्य थे और उनके मुक्त्यर्थं भवभीतिभीतजगतां श्रीनन्दिशिष्यो बुधो
इस नाम तथा समयकी उपलब्धि कहाँसे कुर्वे चारुपुराणसारममलं श्रीचन्द्रनामा मुनिः ॥१॥
हुई है । आशा है, सूचीके लेखक महाशय श्रीविक्रमादित्यसंवत्सरे यज्ञशन्य ( सप्तत्य ? ) धिकव- इसका स्पष्टीकरण करनेकी कृपा करंग ! र्षसहस्र पुराणसाराभिधानः समाप्तः।"
इससे मालम होता है कि श्रीचंद्रमनि 'श्री- सागरसेन मुनिके विषयमें अभी तक हमें कोई नन्दी के शिष्य थे और उन्होंने मागसेन, विशेष हाल मालूम नहीं हुआ । सिर्फ उक्त नामके यतिपतिसे महापुराणको पढ़कर अथवा .
___ सूचीमें उन्हें । सैद्धान्तिक ' लिखा है और समझकर अपना यह ग्रंथ, उसके संक्षेपरूपमें उनके बनाये हुए ग्रन्थोंमें 'लघु त्रिलोकसार' लिखा है और संभवतः इसे धारानगरी में ही बना- नामके एक प्राकृत ग्रंथका उल्लेख किया कर समाप्त किया है। समाप्तिका संवत् जो ऊपर है
है । वे किनके शिष्य थे, किनके गुरु थे दिया है वह लेखकाशुद्धिके कारण कुछ अस्पष्ट और उन्होंने क्या क्या कार्य किये हैं, उनका यह मालूम होता है। संभव है कि यह 'सप्तत्यधिक- सब इतिहास अभी अंधेरेमें है, जिसकी वर्षसहस्रे' ऐसा पाठ हो जिसका अर्थ १०७० विद्वानोंको खोज लगानी चाहिये । श्रीचंद्रक संवत् होता है। परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि गुरु श्रीनन्दीके विषयमें भी अभीतक हमें यह ग्रंथ विक्रमकी ११ वीं शताब्दीका बना कुछ विशेष हाल मालूम नहीं हो सका। इनका हुआ है और इस लिये उक्त तीनों विद्वानोंका इतिहास भी अंधकाराछन्न है। हाँ, वसुनन्दी अस्तित्वसमय भी विक्रमकी ११ वीं शताब्दी 'श्रावकाचारके देखनेसे इतना जरूर मालूम होता समझना चाहिये। श्रीचंद्राचार्यने और कौन है कि वसुनन्दीकी गुरुपरम्परामें एक 'श्रीनन्दी' कौनसे ग्रंथोंकी रचना की है, इसका अभी तक नामके आचार्य भी हो गये हैं, जिनके शिष्य हमें कोई ठीक निश्चय नहीं हुआ। हाँ, 'दिग- ‘नयनन्दी' और प्रशिष्य नेमिचंद्र' थे। इन
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अङ्क ४]
ऐतिहासिक जैनव्यक्तियाँ। श्रीनंदीकी प्रशंसामें उक्त श्रावकाचारमें ये वाक्य इनसे मालूम होता है कि टीकाकारका नाम दिये हैं
'श्रीनंदिगुरु' है। यदि इस पदमें 'श्री' को " आसी ससमयपरसमयविदू सिरिकुंदकुंदसंताणे। विशेषण मान लिया जाय तो वह 'नंदिगुरु' भव्वयणकुमयवणसिसिरयरो सिरिणंदिणामेण ॥ और 'गुरु' को विशेषण मान लेनेसे 'श्रीनकित्ती जस्सेंदुसुम्भा सयलभुवणमझे जहेत्थं भमित्ता, न्दी' रह जाता है । हमारी रायमें असिल णिचं सा सज्जणाणं हिययवयणसोए णिवासं करेइ ॥ नाम श्रीनन्दी मालम होता है और 'गुरु' जो सिद्धतंबुरासिं सुणयतरणिमासेज लीलावतिण्णो,
,, यह वंशपरंपराकी कोई उपाधि जान पड़ती वण्णेउं को समत्थो सयलगुणगणं सेवियंतो वि लोए॥" ___ इनसे मालूम होता है कि ये 'श्रीनन्दी'
", है । कुछ भी सही, ये श्रनिंदिगुरु श्रीचंद्रके गुरु बड़े ही विद्वान् और एक अच्छे प्रतिष्ठित आ- श्रीनन्दी अथवा नयनंदीके गुरु श्रीनन्दीसे भिन्न चार्य हुए हैं। इनका समय भी विक्रमकी हैं, या उन्हींमेंसे कोई एक हैं, ये बातें विद्वानोंके प्रायः ११ वीं शताब्दी पाया जाता है। बहुत नि प्रायः कामाची पाया जाता है। बरन निर्णय करनेके योग्य हैं। आशा है, हमारे विद्वान संभव है कि ये श्रीनंदी और उक्त श्रीचंद्रके भाई इन आचार्याका विशेष इतिहास खोज गुरु श्रीनंदी दोनों एक ही व्यक्ति हों । इसके निकालनेकी कोशिश करेंगे। सिवाय एक — श्रीनन्दी' प्रायश्चित्तंसमुच्चयके ८ कुमारनन्दी और कुमारसेन । टीकाकार भी हैं। ये 'श्रीनंदि गुरु ' भी कहलाते जैनसमाजमें 'कमारनन्दी' नामके एक हैं। उपर्युल्लिखित सूची में इन्हें सिर्फ 'नन्दिगुरु' ही लिखा है । अस्तु; इस विषयमें, प्राय
बहुत बड़े विद्वान् आचार्य हो गये हैं। प्रमाणश्चित्त समुच्चयकी टीकाके प्रशस्तिसंज्ञक अन्तिम
परीक्षा, पत्रपरीक्षा, श्लोकवार्तिक और वाक्य इस प्रकार है !
न्यायदीपिका आदि ग्रंथों में उनके वाक्योंका " यः श्रीगुरूपदेशेन प्रायश्चित्तस्य संग्रहः ।
उल्लेख पाया जाता है। उनके वाक्य तथा दासेन श्रीगुरोर्टब्धो भव्याशयविशुद्धये ॥१॥
चाभ्यधायि कुमारनन्दिभट्टारकैः, ' ' तदुक्तं तस्थषा नूदिता वृत्तिः श्रीनंदिगुरुणा हि सा । कुमारनन्दिभट्टारकैः,' इत्यादिक उल्लेखवाविरुद्धं यदभूदत्र तत्क्षाम्यतु सरस्वती ॥२॥ क्योंके साथ उद्धृत पाये जाते हैं । इन उल्लेखप्रवरगुरुगिरीन्द्रप्रोद्गता वृत्तिरेषा,
वाक्योंमें आचार्य महोदयके नामके साथ सकलमलकलंकक्षालिनी सज्जनानां ।
- 'भट्टारक' शब्दका प्रयोग देखकर किसीको यह सुरसरिदिव शश्वत्सेव्यमाना द्विजेंद्रैः
न समझ लेना चाहिये कि वे आजकलके गद्दीप्रभवतु जननूना यावदाचंन्द्रतारम् ॥ ३ ॥"
नशीन भट्टारकों जैसे भट्टारक होंगे। ऐसा नहीं १ अर्थात्-श्रीकुंदकुंदकी आम्नायमें ' श्री.
• है । उस समय ' भट्टारक' शब्द प्रायः एक नन्दी' नामका आचार्य स्वमत और परमतका जान
बहुत बड़े प्रतिष्ठित पूज्य और माननीय विद्वानेवाला तथा भक्तजनरूपी कुमुदवनको प्रफुल्लित कर
नके लिये प्रयुक्त होता था । कुमारनन्दीके नेके लिये चंद्रमाके समान हुआ । जिसकी चंद्रमाके
नामके साथ यह महत्त्वसचक शब्द लगा रहनेस समान निर्मल कीर्ति सर्व जगत्में भले प्रकार फैलकर सजन पुरुषोंके हृदय, वचन और कानोंमें सदा निवास
उनका एक बहुत बड़ा प्रतिष्ठित विद्वान् होना करती थी और जो उत्तम नयरूपी नौकामें बैठकर पाया जाता है। जिसे विद्यानंदस्वामी जैसे एक सिद्धान्तसमुद्रको लीलामासे पार कर गया था उस उद्भट विद्वान् “भट्टारक' शब्दके साथ याद श्रीनन्दीके सकलगुणगणका वर्णन करनेके लिये लोकमें करें वह कितना प्रभावशाली विद्वान् होगा, इसे कौन समर्थ हो सकता है ?
पाठक स्वयं समझ सकते हैं। अस्त: कमार
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जैनहितैषी
[भाग १४
नंदी एक बड़े भारी नैय्यायिक विद्वान थे, श्रवणबेल्गोलके 'मल्लिषेणप्रशस्ति' नामक वादन्यायमें उनकी योग्यता बहुत बढ़ी चढ़ी थी। शिलालेखमें * पाया जाता है, तो भी विद्यानंद विद्यानंदस्वामीने उन्हें 'वादन्यायविचक्षण' स्वामीने जिन कुमारसेनकी उक्तियोंसे अष्टसहलिखा है; यथाः
स्रीकी अंगवृद्धि होना लिखा है वे जहाँतक हम 'कुमारनन्दिनचाहुदिन्यायविचक्षणाः।" समझते हैं, कुमारनन्दी भट्टारकके सिवाय दूसरे
-लोकवार्तिक । कोई नहीं हैं। क्योंकि विद्यानंदने अपने ग्रंथोंमें आपने 'वादन्याय' नामका एक महत्त्वपूर्ण अनेक स्थानोंपर कुमारनंदि भट्टारककी उक्तियों को ग्रंथ भी रचा है जिसके कुछ पद्योंको हमने, स्पष्ट तौरसे उद्धृत किया है, प्रत्युत इसके कुमारउक्त ग्रंथका परिचय देते हुए, इसी अंक. सेनकी उक्तियोंका इस प्रकारका कोई उद्धरण अन्यत्र उद्धृत किया है। नहीं मालूम, आपने और उल्लेख उनके ग्रंथों में हमारे देखनेमें नहीं और कौन कौनसे ग्रंथोंकी रचना की है । 'दिग- आया। यदि विद्यानंदस्वामीकी दृष्टि में कुमारम्बरजैनग्रंथकती और उनके ग्रंथ,' नामकी सेनका कोई ऐसा महत्त्वपूर्ण ग्रंथ होता जिसका सची में आपके नामके साथ सिर्फ दो ग्रंथोंका अधिकांश भाग अष्टसहस्रीका अंग तक बननेकी उल्लेख पाया जाता है; एक 'न्यायविजय' योग्यता रखता था तो कोई वजह नहीं थी कि और दूसरा 'भूपालचतुर्विंशतिका स्तवन ।' ,
, वह उसका उल्लेख अपने दूसरे किसी ग्रंथमें न इनमें न्यायविजय संभवतः वही 'वादन्याय'
. करते । हमारे खयालमें ऐसा मालूम होता है कि नामका ग्रंथ मालूम होता है जिसका ऊपर जिकर किया गया है । या तो यह उसीका नामान्तर
विद्यानंद स्वामीने कुमारनंदि भट्टारकके वादहै और या सूचीमें कुछ गलतीके साथ दर्ज न्यायादि ग्रंथोंसे बहुत कुछ अंश विना किसी हुआ है और यदि यह बिलकुल एक अलग नामादिकके उद्धृत करके उसे अष्टसहस्रीका ग्रंथ है तो बड़ी खुशीकी बात है, तब इसकी भी एक अविभक्त अंग बनाया है और अन्तमें अष्टखोज होनी चाहिये । दूसरा ग्रंथ भूपाल कविका सहस्रीके उक्त विशेषणके द्वारा उसे सूचित कर बनाया हुआ है । वह सूचीम कुमारनन्दीके दिया है । संभव है कि इस विशेषण पदम लेखसाथ बिलकुल भूलसे दर्ज किया गया जान कोंकी भलसे 'कुमारनंद्योक्ति' के स्थानमें पड़ता है । श्रीविद्यानंदस्वामीने अपने ' अष्ट. (कुमारसेनोक्ति' लिखा गया हो अथवा यह सहस्री' ग्रंथके अन्तमें 'कुमारसेनोक्ति- भी हो सकता है कि 'कुमारसेन ' कुमारनन्दि वर्धमानार्था' यह अष्टसहस्रीका एक विशेषण ,
" का ही नामान्तर हो । यदि कुमारनन्दिका 'वाद दिया है, जिसका यह अर्थ होता है कि अष्ट.
न्यायादि' नामका कोई महान ग्रंथ उपलब्ध सहस्री कुमारसेनकी उक्तियोंसे वृद्धिको प्राप्त हुई है। अर्थात्, अष्टसहस्रीमें कमारसेनकी उक्ति हो जाय तो उसपरसे अष्टसहस्रीका मीलान योंका प्रचुरताके साथ संग्रह किया गया है करनेपर इस विषयका बहुत कुछ निर्णय हो और इससे उसके शरीरकी बहुत कुछ वृद्धि सकता है। अस्तु । अब हमें यह जामनेकी जरूहुई है । यद्यपि कुमारसेन नामके मुनिका एक उल्लेख जिनसेनने हरिवंशपुराणमें x और दूसरा
*उदेत्य सम्यग्दिशि दक्षिणस्यां कुमारसेनोमुनिरस्तमाप। x अकूपारं यशो लोके प्रभाचन्दोदयोज्वलम् ।
तत्रैव चित्रंजगदेकभानोस्तिष्ठत्यसौ तस्य तथा प्रकाशः ।। गुरोः कुमारसेनस्य विचरत्यजितात्मकम् ॥ ३८ ॥ -हरिवंशपुराण ।
-शिलालेख नं. ५४ ।
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ऐतिहासिक जैनव्यक्तियाँ ।
अङ्क ४ ]
रत है कि ये कुमारनन्दी आचार्य कब हुए हैं, कहाँपर उनका निवास था, वे किनके शिष्य और उनके कौन कौन शिष्य हुए हैं। साथ ही यह भी मालूम करने की जरूरत है कि उन्होंने और क्या क्या विशेष कार्य किये हैं । इन सव बातोंके संबंध में अभी हम विशद रूपसे कुछ भी नहीं कह सकते । ये सब बातें गहरे अंधकार में छिपी हुई हैं । हाँ, आचार्य महोदय के अस्तित्व समयकी बाबत इतना जरूर कह सकते हैं कि वे विद्यानंद स्वामीसे पहलेके, अर्थात् विक्रमकी प्रायः ८ वीं शताब्दी से पहले के, विद्वान् हैं । कितने पहले इसका अभीतक कोई निश्चय नहीं । पंचास्तिकायके टीकाकार श्रीजयसेनसूरिने अपनी उक्त टीकाके शुरू में कुंदकुंदाचार्यको श्रीकुमारनंदीका शिष्य प्रकट किया
है । यथा:
" अथ श्रीकुमारनन्दि सिद्धान्तिदेव शिष्यैः... श्री. मत्कुंदकुंदाचार्यदेवैः पद्मनन्द्याद्यपराभिधेयैः...विरचिते पंचास्तिकायप्राभृतशास्त्रे ...... ।
"
इससे कुमारनंदीका समय विक्रमकी प्रायः दूसरी तीसरी शताब्दी तक पहुँच जाता है । परंतु जयसेनसूरिके इस कथनका समर्थन दूसरे किसी भी प्रमाणसे नहीं होता । स्वयं प्रवचनसार और समयसार नामके प्राभृतों की टीकाओं में भी उन्होंने ऐसा सूचित नहीं किया । उनके भी रचयिता वही कुंदकुंदाचार्य थे । फिर पंचास्ति - कायकी टीकामें ही यह विशेषता क्यों ? कुछ समझ नहीं आता । श्रवणबेलगोलके शिलालेखोंमें भी, जहाँ अनेक स्थानों पर कुंदकुंदका नाम आया है वहाँ कहीं भी उन्हें कुमारनंदीका शिष्य प्रकट नहीं किया । बल्कि उनका नाम आमतौर पर भद्रबाहु और चंद्रगुप्तके बाद दिया है । और भी किसी ग्रंथ में उक्त प्रकारका उल्लेख नहीं पाया जाता । बल्कि बोधपाहुड़में स्वयं कुन्दकुंदाचार्य के निम्न वाक्योंसे कुछ ऐसा ध्वनित
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होता है कि वे भद्रबाहुके शिष्य थे या उनसे कोई निकट सम्बंध रखते थे:
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सद्दवियारो हुओ भासामुत्तेसु जं जिणे कहिये । सो तह कहियं णायं सीसेण य भद्दबाहुस्स ॥ ६१ ॥ वारस अंगवियाणं चउदस पुत्रंगविउलविच्छरणं । सुयणाणि मद्दवाहू गमयगुरू भयवओ जयउ ॥ ६२॥ ऐसी हालत में जयसेनसूरिका, कुन्दकुन्द के गुरुविषयमें, उपर्युक्त कथन स्वीकार करने के लिये हृदय तय्यार नहीं होता । आशा है कुमारनंदीके इतिहासविषयमें हमारे विद्वान् भाई कुछ विशेष अनुसंधान करने की कृपा करेंगे । ( क्रमशः । )
संसारमें प्रायः दंभ पुजता है । दंभी मनुष्योंकी बहुधा पृछ होती है और वे आम तौर पर योग्य व्यक्ति समझे जाते हैं । प्रत्युत इसको जो लोग सरल स्वभावी, निष्कपट व्यवहार करनेवाले और सत्यवक्ता होते हैं उनपर प्रायः अनेक प्रकारकी विपत्तियाँ आया करती हैं और उन्हें तरह तरहके कष्ट सहन करने होते हैं । ऐसे लोगों के उदाहरण भी पृथ्वी भरके प्रायः सभी देशोंके इतिहासोंमें पाये जाते हैं । परंतु यह देखकर सच्चे धर्मात्माओं और सत्य प्रेमियोंको अपने कर्तव्य पथसे विचलित नहीं होना चाहिये । उन्हें इस बात से कोई प्रेम नहीं रखना चाहिये कि लोग हमारी पूछ करें अथवा हमारा यशोगान करें और न इस बात की कोई परवाह ही करनी चाहिये कि दूसरे लोग हमारे विषय में क्या कहते हैं । उन्हें आपत्तियोंसे न डरकर और अपनी मान बड़ाईकी दलदल में न फँसकर बराबर सत्य के मैदान में डटे रहना चाहिये । एक दिन आयगा जब उनके सत्यकी परीक्षा हो जायगी और संसार उन्हें ऊँचे आसनपर बिठलायगा ।
—खंडविचार ।
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१२२ जैनहितैषी
[भाग १४ ®DOGeeeeeeeeeeeeeeeeDEODODDED
विचित्र ब्याह । - [भाग १३ अंक १२ से आगे।] (ले०, पं. रामचरित उपाध्याय ।)
अष्टम सर्ग। सौ रुपये फिर रूपचन्दने लिये सुशीलासे आके, ___ वह भी लगा तयारी करने सुता-ब्याहकी घर जाके । वहाँ सुशीलाने भी सुतके सुखद ब्याहको ठान दिया, ___ अपने सम्बन्धी स्वजनोंको पत्र भेज आह्वान किया ॥ १ ॥ विविध भाँतिकी देख तयारी, हरिसेवक क्यों चुप रहता!
क्यों न हनिकारक कामोंको तज देनेको वह कहता । बोला मासे ब्याह करो मा, मेरा हर्षसमेत सही,
किन्तु नाँच या आतशवाजीका है कुछ भी काम नहीं ॥ २ ॥ आतशवानी छोड़ द्रव्यमें सचमुच भाग लगाना है ।
माता ! बुधसमाजके आगे बुद्धि-हीन कहलाना है। इसी लिए आतशवाजीका लेना नहीं कभी तम नाम,
यदि रुपये हों तो फिर उनसे करना जगउपकारक काम ॥३॥ इसी प्रकार नाँचका भी तुम, नाम न लेना भूल कभी, ___ जान बूझ कर जननि ! धर्म पर, नहीं डालना धूल कभी। वेश्याओंको धन देनेसे हो जाता है बड़ा अनर्थ,
सोच समझ कर करो ब्याहको, तुम रुपये फेंको मत व्यर्थ ॥ ४ ॥ दुराचारियोंको यदि धन दे, दुराचार तो बढ़ता है,
खलके साथीके सिर पर भी पाप दौड़कर चढ़ता है । पापी धन पा क्योंकि और भी घोर पापको करता है,
वह जगके अपवादोंसे फिर मनमें तनिक न डरता है ॥ ५ ॥ पापीके सुख देख दुखी जन पाप सीखने लगते हैं,
प्रथम पनप कर यदपि अन्तमें, स्वयं झीखने लगते हैं । क्योंकि एककी देखादेखी दूजा भी करता है काम ___ इसी लिए ही बुरे कर्मके सज्जन कभी न लेते नाम ॥ ६ ॥ प्रायः वेश्यायें करती हैं मद्य मांसका सेवन भी,
और दुराचारी होते हैं प्रायः उनके परिजन भी ।
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अङ्क ४ ]
विचित्र व्याह ।
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फिर उनको धन दे कर अघको मनों मोल ले लेना है, या हत्याभागी अपनेको स्वयं सिद्ध कर देना है ॥ ७ ॥ वेश्याओंके हावभावसे चित्त विकृत हो जाता है,
उनके सम्मेलनसे नरका पुण्य-पुत्र खो जाता है । इस कारण कुछ काम नहीं है वेश्याओंका कभी कहीं,
अघ-सीढ़ी पर चढ़कर कोई, छू सकता है स्वर्ग नहीं ॥ ८ ॥ शुभ विवाह के समय सुहागिन स्त्रियाँ बुलाई जाती हैं,
ज्ञातिबन्धुकी विधवायें भी वहाँ न आने पाती हैं । फिर रण्डाओं को नचवाना उसी व्याह में भला नहीं,
जान बूझकर सिर पर लाना कभी चाहिए वला नहीं ॥ ९ ॥ हरिसेवक ! पर बात तुम्हारी, ठीक नहीं है क्यों मानूँ !
जो होता है कार्य सदासे उसको अनुचित क्यों जानूँ ? जो न सहारा गायक पावें गानशास्त्र तो उठ जावे,
नृत्य गान हो नहीं जहाँ पर वह क्यों उत्सव कहलावे ॥ १० ॥ ऐसा कौन देश है जिसमें नृत्यगानका है न प्रचार,
भारतहीने सबसे पहले किया नृत्यका आविष्कार । क्या कारण बोलो, हम क्यों फिर नृत्य गानसे घृणा करें ? अत्युत्तम विद्या की हत्या करनेसे कैसे न डरें ? ॥ ११ ॥ हाँ, आतशबाजी सचमुच ही बड़े अनर्थोंकी है मूल,
उसके लिए द्रव्यको स्वाहा, कर देना नितान्त है भूल । तेरे ब्याहसमय में उसको कभी नहीं छुटने दूँगी,
अपने हाथों अपनी आँखें, कभी नहीं फुटने दूँगी ॥ १२ ॥ गानवाद्यका और नृत्यका रखना है यदि इष्ट तुम्हें,
तो क्या गायक नहीं मिलेंगे सच्चरित्र या शिष्ट तुम्हें । किसी भाँति पर वेश्याओंका नाच कराना ठीक नहीं,
बुरे कर्म करके इस जगमें नाम कमाना ठीक नहीं ॥ १३ ॥ बुरे कर्म जो होते होवें उन्हें छोड़ देना है नीति,
अच्छे भी यदि नये कर्म हों तो क्या उनमें करे न प्रीति ? शास्त्र - विहित जो साधुकर्म है उसे सनातन कहते हैं,
चाहे कुछ हो निन्यकार्यसे सुजन दूर ही रहते हैं ॥ १४ ॥ यदि जननी ! तुमको करना है समयोचित सुमङ्गलाचार, तो गुरु-गुणि-विज्ञका करिए, तन, मन, धनसे शिष्टाचार |
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जैनहितैषी
[ भाग १४ tee9ee9e9e9e6ee99E 9999 666
जो सुपात्रको अर्पण होवे कहलाता है दान वही, ___करता है जो काम समझकर, पाता है सम्मान वही ॥१५॥ कहा सुशीलाने वैसा ही होगा, कहते हो जैसा, ___ अच्छे मन्त्र ग्रहण करनेमें, बेटा ! मीन मेष कैसा ? मुनि-पद्धतिसे ब्याह तुम्हारा-होगा, होगा नाँच नहीं,
चाहे स्तुति हो, या निन्दा हो, किन्तु साँचको आँच नहीं ॥ १६ ॥ सुन माताके वचन मनोहर हरिसेवक अति मग्न हुआ,
उसके आज्ञापालनमें वह, तन, मनसे संलग्न हुआ। इसी बीचमें रूपचन्द फिर. आकर बोला बडे सप्रेम. __ कहिए बाबू हरिसेवकजी, है तो सब कुछ कुशल क्षेम ? ॥ १७॥ . कुशल प्रश्न के बाद तुरत ही उसने कहा लाजको छोड़, __दौड़ा मैं आता हूँ भैया, अपने सभी काजको छोड़। सौरुपये फिर मुझे दीजिए अब चलता है काम नहीं, ___धिग जीवन है उस मानवका, जिसके पल्ले दाम नहीं ॥१८॥ तुरत सुशीलाने लाकरके रुपयोंको दे दिया उसे । ___राम राम कह किसी व्योंतसे, विदा वहाँसे किया उसे, फूले अंग न समाया वह भी, रुपयोंको पाकरके मूढ़,
उसमें ज्ञान रहे फिर कैसे, जिस पर हुआ लोभ आरूढ़॥ १९॥ रूपचन्दके हट जाने पर भाईबन्द लगे आने,
प्रेम-युक्तिसे सब बरातको लगे मनोहर सजवाने। बाजे बजने लगे मोदप्रद सुन्दरियोंने गान किया, __ चहल पहल मच गई द्वारपर, सबने सबका मान किया ॥२०॥ हरिसेवकके विशद शीश पर, मौर बड़ी छवि देता था, __मनो चन्द्रमा मुकुट दिये है, सबके मन हर लेता था। कहीं सुशीलाके पग भू पर, उछल उछल कर पड़ते थे
वन्दीजन मङ्गल-पद्योंको, कहीं उच्चस्वर पढ़ते थे ॥ २१ ॥ हुआ शुभाचार समाप्त रीतिसे,
बड़े समुत्साह .सुनीति प्रीतिसे । समा वहाँका स्थिर हो सका नहीं,
सहर्ष बारात चली तुरन्त ही ।। २२॥
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अङ्क ४] विचित्र व्याह।
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नवाँ सर्ग । रूपचन्द है मग्न बड़ा, सुता-ब्याहमें लग्न बड़ा। कब आवेगी घर बारात, उसके मुँहमें थी यह बात ॥१॥ दोसौ अब मिल जावेंगे, व्योम-कमल खिल जावेंगे । इसी ध्यानमें व्यस्त रहा, नहीं पापसे त्रस्त रहा ॥ २॥ लक्ष्मीकी मा रोती थी, दृग-जलसे तन धोती थी। उसे चैनका नाम नहीं, तनिक कहीं विश्राम नहीं ॥ ३ ॥ कन्या बिकती है मेरी, क्या है दुर्मतिने घेरी। सोच रही थी पड़ी पड़ी, चिन्ता उरमें रही बड़ी ॥ ४ ॥ लक्ष्मीको तो ज्ञान न था, क्या होता है ध्यान न था। रहती थी सखियोंके संग, गान वाद्य सुन भरी उमंग ॥ ५ ॥ इसी बीचमें फैली बात, देखो वह आई बारात । हाथी घोड़े हैं जैसे, कभी न देखे थे वैसे ॥६॥ घरवालांकी अगवानी, वरवालाने भी मानी । तुरत सभी शुभ समय विचार, रूपचन्दके पहुँचे द्वार ॥ ७ ॥ हुई द्वार-पूजा सानन्द, किये गये सब बाजे बन्द । जनवासे बैठी बारात, दिन डूबा, हो आई रात ८॥ रूपचन्द भी गया वहीं, हरिसेवकसे बात कही। दो सो लौकर तुरत भगा, पूरा उसका भाग्य जगा ॥ ९ ॥ स्त्रीको रूपये देता था, मनो पाप-फल लेता था। पर लोलुप वह हुई नहीं, जाकर बैठी अलम कहीं ॥ १०॥ मण्डपमें अब वर आया, वधुओंने मंगल गाया । सबमें छाया नव उत्साह, क्रमसे होने लगा विवाह ॥ ११॥ रूपचन्दको व्यापा पाप, चढ़ बैठा तृष्णाका ताप । कैसे रुपये और मिलें, सिकता-थलमें कमल खिलें ॥ १२ ॥ शुरू हुई ज्यों सप्तपदी, रूपचन्दसे हुई बदी । पेट पकड़ वह गिरा कराह, भरने लगा आह पर आह ॥१३॥ मेरे उरमें पीड़ा है, पर न किसीको व्रीडा है, कर दो मुझको अलग कहीं, जी सकता हूँ हाय नहीं ॥ १४ ॥ मेरे दुखको शीघ्र हरो, दवा-दानकी युक्ति करो। समयोचित है काम यही, जी सकता हूँ हाय नहीं ॥ १५॥
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१२६ जैनहितैषी
[भाग १४ @eeeeeeeeeeeeeeeeeeeee009909000
मेरा क्या संयोग हुआ, मुझे भयंकर रोग हुआ । हा ! बे-ब्याही सुता रही, जी सकता हूँ हाय नहीं ॥ १६ ॥ व्याह-कर्मको उठा धरो, मेरे अन्तिम कर्म करो। कर पर जमता नहीं दही, जी सकता हूँ हाय नहीं ॥ १७ ॥ क्या सबसे बतलाऊँगा, कैसे मुख दिखलाऊँगा । क्यों कट जाती नहीं मही, जी सकता हूँ हाय नहीं ॥ १८ ॥ वर मन ही मन दंग हुआ, ब्याह-मनोरथ भंग हुआ। रूपचन्दकी देख दशा, हेतु समझ, वह खूब हँसा ॥ १९ ॥ जब कारणका बोध हुआ, सबके मनमें क्रोध हुआ। सबके आसन डोल उठे, सभी वेगसे बोल उठे ॥ २० ॥ रूपचन्द ! नखरे छोड़ो, नहीं धर्मसे मुख मोड़ो। उठो, सुताका करो विवाह, निन्दित है अधर्मकी चाह ॥ २१ ॥ जाति-च्युत हो जाओगे, जी कर मृतक कहाओगे । कभी पाप क्या फला कहीं ? कर्म-भोग क्या टला कहीं ? ।। २२ ॥ पाँचों सौ रुपये लाओ, धर्म-दण्डसे बच जाओ। हरिसेवकको देवो फेर, रूपचन्द ! अब करो न देर ॥ २३ ॥ चाहे जातिच्युत करिए, चाहे मम सरवस हरिए । कैसे रुपये, कैसा ब्याह, आह आह मरता हूँ आह ॥ २४ ॥ उसकी स्त्रीने रुपये सब, फेंक दिये आँगनमें तब । रूपचन्द लख उठ बैठा, बहुत मनी मनमें ऐंठा ॥ २५ ॥ रुपया सबकी सम्मतिसे, और न्यायकी सम्मतिसे ।, हरिसेवकको दिया गया, कर्म-धर्मका किया गया ॥ २६ ॥ रूपचन्द तब त्रस्त हुआ, कुछ कुछ धर्म-ग्रस्त हुआ । धीरे बोला, बोलो मंत्र, कन्या + निपटे षड्यंत्र ॥ २७ ॥ राम राम कह काम हुआ, रूपचन्द बदनाम हुआ। हरिसेवकका व्याह हुआ, सबमें शुभ उत्साह हुआ ॥ २८ ॥ वर जोड़ी कन्या वरकी, सुखद रहे अपने घरकी। सबने यह आशीस दिया, जनवासे प्रस्थान किया ॥ २९ ॥ मिट नहीं सकता विधिका लिखा,
पर इसे सुनता जन कौन है ? । श्रवण-हीन मनो जग होगया, थकित हो अथवा वह मौन है ॥ ३० ॥
समाप्त। geeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeeee
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अङ्क ४] दुष्पाप्य और अलभ्य जैनग्रंथ ।
१९७ दुष्प्राप्य और अलभ्य जैनग्रंथ। देखने पर भी हमें उनमें इसके अस्तित्वका पता
नहीं चला । यह ग्रंथ दक्षिणदेशके किसी ११ राद्धान्त ।
भंडारमें जरूर होगा । अतः विद्वानोंको इस श्रीचामुंडराय ( रणरंगसिंह ), अपने 'चारि- ग्रंथरत्नकी उधर शीघ्र खोज करनी चाहिये। वसार' नामक ग्रंथके अन्तमें, एक पद्य इस
१२ सिद्धान्तसार । प्रकारसे देते हैं:--
श्रीजयशेखरसूरिविरचित : पदर्शनसमुच्चय' "तत्त्वार्थराद्धान्तमहापुराणे
नामक एक श्वेताम्बर ग्रंथके निम्न वाक्योंसे ध्वाचारशास्त्रषु च विस्तरोक्तम् ।
मालूम होता है कि 'सिद्धान्तसार ' नामका आख्यात्समासादनुयोगवेदी
भी कोई दि० जैनग्रंथ है चारित्रसारं रणरंगसिंहः ॥”
और वह बड़ा
ही कर्कश तर्कग्रंथ है। इस पद्यसे मालूम हाता है कि राद्धान्त स्याद्वादविद्याविद्योतात्प्रायः साधर्मिका अमी। नामका भी कोई जैनग्रंथ है जिसे ११ वीं परमष्टसहस्री या न्यायकैरवचंद्रमाः ॥ २८ ॥ शताब्दीके विद्वान् चामुंडरायने अवलोकन किया सिद्धान्तसार इत्याद्यास्तकाः परमकर्कशाः । था, और न सिर्फ अवलोकन ही किया था तेषां जयश्रीदानाय प्रगल्भंते पदे पदे ॥ २९ ॥ बल्कि उन्होंने चारित्रविषयक उसका कछ सार मालूम नहीं यह ग्रंथ भी कौनसे आचार्यका भी खींचकर अपने उक्त ग्रंथमें रक्खा है । यह बनाया हुआ है और कब बना है। हाँ, इतना ग्रंथ किस भाषामें रचा गया है, इस बातका जरूर है कि यह ग्रंथ राजशेखरसूरिके अस्तित्वयद्यपि ऊपरके पद्यसे कोई पता नहीं चलता तो समयसे, अर्थात् वि० संवत् १४०५ से पहलैका भी श्रीवीरनन्दीके 'आचारसार ' ग्रंथमें इसका बना हुआ है । राजशेखरके अतिरिक्त और 'एक पद्य 'उक्तं च राद्धान्ते' इस वाक्यके किस किस विद्वानने इस ग्रंथका उल्लेख किया है साथ उदधत पाया जाता है, जिससे ग्रंथका और आजकल कहाँ कहाँके भंडारोंमें यह ग्रंथ भाषासम्बंधी विषय बहुत कुछ स्पष्ट हो जाता पाया जाता है, ये सब बातें विद्वानोंके खोज है । वह पय इस प्रकार है:
करने योग्य हैं। ' सिद्धान्तसार ' नामके और स्वयं ह्यहिंसा स्वयमेव हिंसनं
भी कुछ ग्रंथ जान पड़ते हैं, जिनमें एक ग्रंथ न तत्पराधीनमिह द्वयं भवेत् ।
जिनचन्दसूरिका बनाया हुआ है, जिसका मंगप्रमादहीनोऽत्र भवत्यहिंसकः
लाचरण इस प्रकार है:प्रमादयुक्तस्तु सदैव हिंसकः ॥
जीवगुणठाण सण्णा पज्जति पाणमग्गणाणवुणे। . इससे मालूम होता है कि ग्रंथकी भाषा सिद्धान्तसारमिणमो भणामि सिद्धे णमंसित्ता ॥१॥ स्कत है. वह एक सिद्धान्तप्रतिपादक ग्रंथ यह ग्रंथ प्राकृत भाषाका है और इसकी है और उसकी प्रतिपादनशैली उसके महत्त्व- गाथाओंकी कुल संख्या ७७ है, ऐसा हमें सेठ शाली होनेका प्रमाण दे रही है । मालूम नहीं, माणिकचंदजी जे०पी०बम्बईके ' 'प्रशस्तिसंग्रह' यह ग्रंथ कौनसे आचार्यका बनाया हुआ है, नामके रजिस्टरसे मालूम हुआ है। ऊपर उद्कब बना है, कितने श्लोकपरिमाण इसकी धृतकी हुई इसकी मंगलाचरण और प्रतिज्ञासंख्या है और इस समय यह किस जगहके विषयक गाथासे जान पड़ता है कि यह नर्क. भंडारमें मौजूद है। अनेक भंडारोंकी सूचियाँ ग्रंथ नहीं है और इस लिए यह उस 'सिद्धान्त
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जैनहितैषी
[ भाग १४ सार' ग्रंथसे भिन्न जान पड़ता है जिसका उल्लेख जाता है कि यह ग्रंथ जिनचंद्रके उक्त प्राकृत राजशेखरसूरिने अपने ग्रंथमें किया है। इस ग्रंथसे भिन्न है । परंतु सकलकीर्तिके 'सिद्धाग्रंथके कर्ता कौनसे जिनचंद्रसूर हैं और उन्होंने न्तसारदीपक' और नरेंद्रसेनके 'सिद्धान्तसारकब इस ग्रंथको बनाया है, यह भी अभी तक संग्रह ' से भी भिन्न है या कि नहीं, ऐसा कुछ . हमको मालूम नहीं हुआ । एक जिनचंद्र श्री- भी मालूम नहीं होता । संभव है कि यह इन कुंदकुंदाचार्यक्ते समकालीन कहे जाते हैं। यदि दोनों से ही कोई ग्रंथ हो और सूचीमें भूलसे यह उन्हींका ग्रंथ है तो विशेष महत्त्वका और केवल 'सिद्धान्तसार ' ऐसा नाम लिखा गया अच्छा प्राचीन ग्रंथ होगा और इसे शीघ्र हो, अथवा यह भी संभव है कि यह वही तर्कमाणिकचंद-ग्रंथमाला द्वारा प्रकाशित कर देना ग्रंथ हो जिसका राजशेखर सूरिने उल्लेख किया चाहिये । आरा सिद्धान्तभवनकी सूची में इस है। अतः भवनके मंत्री साहबको इसका भी नामके तीन ग्रन्थोंका उल्लेख पाया जाता है। निर्णय प्रकट करना चाहिये। हमें अफसोस है एकको 'जिनेंद्रदेवाचार्य' का बनाया हुआ कि सिद्धान्तभवनकी सूची इतनी असावधानी लिखा है और उसकी श्लोकसंख्या ८० दी है, और लापरवाहीसे तय्यार की गई मालूम होती ग्रंथकी भाषा आदिका साथमें कोई उल्लेख नहीं। है कि उस पर एकदम कोई विश्वास नहीं किया संभव है कि यह ग्रंथ वही जिनचंद्रसूरिका जा सकता और इस लिये हमको बारबार मंत्री बनाया हुआ प्राकृत ग्रंथ हो जिसके मंगलाचरण- साहबको तकलीफ देनेकी जरूरत पड़ती है । का ऊपर उल्लेख किया गया है और उसके हमने हितैषीके पहले अंकों में भी उनसे कुछ ग्रंथकर्ताका नाम सूचीमें देते हुए कुछ भूल हुई दर्याफ्त किया था जिसके उत्तरका कष्ट उठानेहो । इसका निर्णय सिद्धान्तभवनके मंत्री साह- की अभी तक उन्होंने कोई कृपा नहीं की। हम बको प्रगट करना चाहिये । दूसरा ग्रंथ भट्टारक आशा करते हैं कि मंत्री साहबं अब अवश्य सकलकीर्तिका बनाया हुआ प्रकट किया है। अपने पदके कर्तव्य पर आरूढ़ होंगे और उनकी परंतु तब उसका नाम 'सिद्धान्तसार' न सूचीपरसे जो जो भ्रम उत्पन्न होते हैं उन्हें पूर्ण होकर सिद्धान्तसारदीपक' होना चाहिये। उद्योगके साथ दूर करनेकी चेष्टा करेंगे। अथवा क्योंकि सकलकीर्तिके ग्रंथका प्रायः यही नाम यों कहिये कि समाजको अपना साहित्यविषयक है । ऐसे ही एक 'सिद्धान्तसारसंग्रह' नामका इतिहास तय्यार करने और जैनग्रंथोंका उद्धार ग्रंथ ' नरेन्द्रसेन ' आचार्यका बनाया हुआ है, करनेके लिये भवनसे जो कुछ सहायता मिल परंतु हमें खालिस ‘सिद्धान्तसार' नाम सकती है उसके देनेके लिये वे तय्यार रहेंगे। देखना है । अस्तु; इस नामके तीसरे ग्रंथपर, भवनमें, अधिक नहीं तो दो तीन सालके लिये, उक्त सूचीमें, ग्रंथकर्ताका कोई नाम ही नहीं एक ऐसे कनड़ी जाननेवाले विद्वानकी मुस्तकिल दिया जिससे कुछ निश्चय किया जाता। सिर्फ तौरसे रखनेकी जरूरत है जो कनड़ी लिपि इतना सूचित किया है कि ग्रंथकी भाषा संस्कृत, अथवा कनड़ी भाषाके ग्रंथोंपरसे, उन्हें देखकर पत्रसंख्या १४३ और लिपि कनड़ी है । और आवश्यक सूचनाएँ दे सके और फुर्सतके वक्तमें साथ ही यह प्रगट किया है कि वह कागज पर बराबर उनका संग्रह करता रहे । साथ ही एक लिखा हुआ है । इससे इतना तो मालूम हो दो ऐसे लेखकोंके भी रक्खे जानेकी जरूरत है.
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अङ्क ५]
दुष्प्राप्य और अलभ्य जैनग्रंथ।
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जो कनड़ी आदि लिपियों परसे देवनागरी यदि कोई महाशय इस पर पारितोषिक निकालें अक्षरोंमें ग्रंथोंकी कापियाँ किया करें और तो और भी अच्छा है । विद्यानंद स्वामीके जिनके द्वारा बाहरसे आई हुई ग्रंथोंकी माँगको द्वारा उपर्युक्त उल्लेखके होनेसे यह ग्रंथ विक्रबराबर पूरा किया जाय । ऐसा करने पर ही भवन मकी ९ वीं शताब्दीसे पहलेका बना हुआ है,इसके समाजके लिये कुछ विशेष उपयोगी हो सकेगा और कहनेमें हमें कोई संकोच नहीं होता । परंतु कितने
की अपनी ओर पहलेका बना हुआ है, यह बात अभी विचाराआकर्षित कर सकेगा। अन्यथा, वह भी समा- धान ह । श्लोकवार्तिकसे पहले बने हुए किसी
ग्रंथमें यदि हमारे किसी विद्वान् महाशयको इस जके दूसरे अनेक अंधकाराच्छन्न भंड
ग्रंथका नामोल्लेख देखनेमें आया हो तो वे कृपा होगा और उनसे अधिक उसे कोई महत्त्व नहीं दिया जाय । आशा है, भवनके मंत्रीसाहब कर हमें उससे सूचित कर अनुगृहीत करें। हमारी इस समयोचित सूचना पर अवश्य ध्यान
१४ वादन्याय । देनेकी कृपा करेंगे।
श्रीविद्यानंदस्वामीके 'पत्रपरीक्षा ' नामक १३ जल्पनिर्णय । ग्रंथसे मालूम होता है कि 'वांदन्याय ' नामका
भी कोई जैन ग्रंथ है और वह श्रीकुमारनन्दि श्लोकवार्तिकमें विद्यानंद स्वामीके एक
, आचार्यका बनाया हुआ है। पत्रपरीक्षामें इस उल्लेखसे पाया जाता है कि 'जल्पनिर्णय' . नामका भी कोई जैनग्रंथ है, जिसे 'श्रीदत्त' .
, ग्रंथके तीन पद्य निम्न प्रकारसे उद्धृत किये
गये हैं:- “तथैव हि कुमारनंदिभट्टारकै. नामके एक महान विद्वानाचार्यने बनाया था।
रपि स्व-वादन्याये निगदितत्वात्तदाहवह उल्लेख इस प्रकार है:
प्रतिपाद्यानुरोधेन प्रयोगेषु पुनर्यथा । " पूर्वाचार्योऽपि भगवानमुमेव द्विविधं जल्पमावेदित
प्रतिक्षा प्रोच्यते तज्झैस्तथोदाहरणादिकम् ॥ १॥ वानित्याह
. न चैवं साधनस्यैकलक्षणत्वं विरुध्यते। द्विप्रकारं जगौ जल्पं तत्त्वप्रातिभगोचरम् ।।
हेतुलक्षणतापायादन्यांशस्य तथोदितं ॥२॥ त्रिषष्ठेर्वा दिनां जेता श्रीदत्तो जल्पनिर्णये ॥" ..
अन्यथानुपपत्येकलक्षणं लिंगमंग्यते । यह ग्रंथ बिलकुल अश्रुतपूर्व जान पड़ता है- प्रयोगपरिपाटी तु प्रतिपाद्यानुरोधतः॥"३H. किसी भी प्रसिद्ध भंडारकी सूची में हमारे देखने इन पद्योंसे पाया जाता है कि 'वादन्याय' अथवा सुनने में नहीं आया । विद्यानंद जैसे नामका ग्रंथ एक बड़ा ही महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है। प्रतिभाशाली विद्वान इस ग्रंथके कर्ताको ‘पूर्वा- यह ग्रंथ भी नवीं शताब्दीसे पहलेका बनाहआ चार्य' और 'भगवान् ' शब्दोंके साथ स्मरण है। परंतु कितने पहलेका, यह, अभी निश्चित करते हैं और साथ ही उन्हें ६३ वादियोंको नहीं हुआ और न यही मालुम हो सका है कि जीतनेवाला प्रकट करते हैं, इससे प्रकृत ग्रंथ ग्रंथ किस जगहके भंडारमें मौजूद है। अभी कितना प्रभावशाली और महत्त्वको लिये हुए तक किसी भी भंडारकी सूचीमें हमें इस ग्रंथका होगा, इसका सहज ही अनुमान हो सकता नाम नहीं मिला। अफसोस ! हम जैनियों के है । नहीं मालूम यह न्यायविषयक ग्रंथ कबका प्रमादसे कैसे कैसे ग्रंथरत्न लुप्तप्राय हो रहे हैं, बना हुआ है और इस वक्त कहाँके भंडारमें जिनके अन्वेषणका समाजकी, ओरसे कुछ भी आसन जमाये हुए है । हमारे भाईयोंको अपने प्रयत्न जारी नहीं है, फिर भी हम लोग, अपने भंडारोंमें इसकी तलाश करनी चाहिये। अपनेको जिनवाणी-भक्त . समझते हैं, यह
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जैनहितैषी
[भाग १४
धनिक-सम्बोधन ।
कितनी लज्जा और शरमकी बात है। हमारे भाईयोंको ऐसे ऐसे ग्रंथरत्नोंकी तलाश और उनके उद्धारमें लग जाना चाहिये। जहाँ अन्य
___भारतके धनिको ! किस धुनमें सैकड़ों गृहकार्य करते हैं वहाँ ऐसे धर्मकार्यों
पड़े हुए हो तुम बेकार ? में भी कुछ थोड़ा बहुत योग जरूर देना चाहिये,
अपने हितकी खबर नहीं, इसे भी अपने जीवनका एक लक्ष्य बनाना चाहिये।
.. या नहीं समझते जग-व्यवहार ? आशा है हमारे भाई इस ग्रंथको भी अपने
___ अंधकार कितना स्वदेशमें भंडारोंमें जरूर टटोलेंगे। उन्हें अपने अपने भंडा- ____ छाया देखो आँख उघार, रोंकी परिश्रम करके एक एक अच्छी विस्तृत सूची बिलबिलाट करते हैं कितने, तय्यार कर लेनी चाहिये जिससे फिर बार बार सहते निशदिन कष्ट अपार ! किसी भी ग्रंथका पता लगानेके लिये उन्हें सारे
(२) भंडार टटोलना न पड़ा करें । जिन भाई- कितने वस्त्रहीन फिरते हैं, योंको सूचीके लिये बाकायदा अच्छे क्षुत्पीडित हैं कितने हाय ! फार्मोंकी जरूरत हो वे हमसे मँगा सकते धर्म-कर्म सब बेच दिया है हैं । हमारी रायमें इस ग्रंथ पर भी कितनोंने होकर असहाय !! तलाशके लिये परितोषिक नियत होने की जो भारत था गुरु देशोंका, जरूरत है।
महामान्य, सत्कर्म-प्रधान, १५ महाविद्योद्धार ( श्रीकल्प
गौरवहीन हुआ वह, बनकर
पराधीन, सहता अपमान । कौस्तुभ )। ' महाविद्योद्धार' अथवा 'श्रीकल्पकौस्तुभ' क्या यह दशा देख भारतकी, नामका यह ग्रन्थ मैसूर राज्यकी ओरियंटल तुम्हें न आता सोच-विचार ? लायब्रेरीमें मौजूद है और उसकी हस्तलिखित देखा करो इसी विध क्या तुम संस्कृत ग्रंथोंकी सूचीके द्वितीयभाग नं. . पड़े पड़े दुख-पारावार ! ७२९ पर दर्ज है। इसकी पत्रसंख्या १९ दी धनिक हुए जिसके धनसे क्या है और इसे आन्ध्राक्षरों ( तेलगू ) में लिखा । योग्य न पूछो उसकी बात ! हुआ प्रकट किया है। परंतु अभी तक यह
गोद पले जिसकी क्या उसपर मालूम नहीं हुआ कि यह ग्रंथ कौनसे आचार्यका
देखोगे होते उत्पात !! बनाया हुआ है, कब बना है और इसका
. (४) विषय क्या है । नाम परसे यह कोई अच्छा
भारतवर्ष तुम्हारा तुम हो और अश्रुतपूर्व ग्रंथ मालूम होता है । आशा है
भारतके सत्पुत्र उदार,
फिर क्यों देश-विपत्ति न हरते है कि मैसूरके कोई विद्वान भाई, उक्त लायबेरीसे
___ करते इसका बेड़ा पार ? इस ग्रंथको निकलवाकर, इसके सम्बंधमें हमें
पश्चिमके धनिकोंको देखो कुछ विशेष हालातसे सूचित करनेकी कृपा करेंगे ___ करते हैं वे क्या दिनरात, और दूसरे भाई भी अपने अपने यहाँके भंडारोंमें और करो जापानदेशके इसकी खोज लगाएँगे। (क्रमशः)
धनिकों पर कुछ दृष्टि-निपात ॥
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अङ्क ५]
सिद्धसेन दिवाकर और स्वामी समन्तभद्र ।
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शिक्षाका विस्तार करो यों
रहे न अनपढ़ कोई शेष, सब पढ़ लिखकर चतुर बनें औ' • समझें हित-अनहित सविशेष ॥
लेकर उनसे सबक स्वधनका __ करो देश-उन्नति-हित त्याम, दो प्रोत्साहन उन्हें जिन्हें है
देशोन्नतिसे कुछ अनुराग। शिल्पकला-विज्ञान सीखने
युवकोंको भेजो परदेश, -कला-कारखाने खुलवाकर, .. मेटो सब जनताके क्लेश ॥
करें देश-उत्थान सभी मिल, __फिर स्वराज्य मिलना क्या दूर ? पैदा हों 'युग-वीर' देशमें, ___ तब क्यों रहे दशा दुख पूर ? प्रबल उठे उन्नति-तरंग तब,
देखें सब भारत-उत्कर्ष, धुल जावे सब दोष-कालिमा,
सुखपूर्वक दिन कटें सहर्ष ॥
कार्यकुशल विद्वानोंसे रख
प्रेम, समझ उनका व्यवहार, उनके द्वारा करो देशमें
बहु उपयोगी कार्य-प्रसार । भारत-हित संस्थाएँ खोलो .
ग्राम ग्राममें कर सुविचार, करो सुलभ साधन वे जिनसे उन्नत हो अपना व्यापार ॥
(७) चक्करमें विलासप्रियताके
फँस, मत भूलो अपना देश, प्रचुर विदेशी व्यवहारोंसे
करो न अपना देश विदेश, लोकदिखावेके कामों में होन'
न दो निज शक्ति-विनाश, न्यर्थव्ययोंको छोड़, लगो तुम
भारतका करने सुविकाश ॥ -
(८) वैर विरोध, पक्षपातादिक, .
ईर्षा, घृणा, सकल दुखकार रह न सकें मारतमें ऐसा यत्न
करो तुम बन समुदार ।
सिद्धसेन दिवाकर और स्वामी
समन्तभद्र। [ लेखक, श्रीयुत मुनि जिनविजयजी।]
(२) : सिद्धसेन दिवाकरका एक सिद्धांत जैनागमोंके रूढ-अभिप्रायसे बहुत ही मिन्न है और वह जैन-( श्वेताम्बर ) साहित्यमें बहुत प्रसिद्ध और बहु-विवेचित है । यह सिद्धांत केवलज्ञान और केवलदर्शनके स्वरूपसे सम्बन्ध रखता है। इसका पूरा परिचय करानेके लिए यह स्थान उपयुक्त नहीं है, फिर भी हम यहाँ संक्षेपसे सूचनमात्र कर देना चाहते हैं। ... श्वेताम्बर संप्रदायमें जो सिद्धान्त ग्रंथ-सूत्रग्रन्थ विद्यमान हैं उनमें, लिखा है कि केवली (सर्वज्ञ ) को केवलज्ञान और केवलदर्शन ये दोनों युगपत् अर्थात् एक साथ नहीं होते परंतु क्रमशः–एक बार केवलज्ञान और एक
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जैनहितैषी
[भाग १४.
बार केवलदर्शन, इस प्रकार बारी बारीसे होते की बृहव्याख्या × लिखनेवाले दिवाकरजीहीहैं । अर्थात् एक क्षण ( जैन पारिभाषिक शब्द के नामधारी सिद्धसेन गणिने भी 'एकादीनि समय ) में केवलज्ञान रहता है और दूसरे भाज्यानि युगपदेकस्मिन्नाचतुर्दाः।१-३१।' क्षणमें केवलदर्शन । इसी तरह प्रतिक्षण क्रमशः सूत्रकी व्याख्यामें, दिवाकरजीके विचारभेद पर केवलज्ञान और केवलदर्शनस्वरूप केवलीका अनेक वाग्बाण चलाये हैं । उनके कुछ उपयोग परिवर्तित हुआ करता है । सिद्धसेन वाक्य देखिएसुरिको यह विचार सम्मत नहीं है । वे इस “ यद्यपि केचित् पण्डितम्मन्याः सूत्राण्यन्यथाविचारमें युक्तिसंगतता नहीं समझते । तर्क और कारमर्थमाचक्षते तर्कबलानुविद्धबुद्धयो वारंवारेयुक्तिसे वे इस मान्यताको अयुक्त सिद्ध करते णोपयोगो नास्ति, तत्तु न प्रमाणयामः । यत हैं। उनके विचारसे केवलीको केवलज्ञान और आम्नाये भूयांसि सूत्राणि वारंवारेणोपयोग प्रतिपा'केवलदर्शन दोनों युगपत्-एक ही साथ होना दयन्ति ।” युक्तिसंगत है । और वास्तवमें, अन्तमें वे फिर ये जिनभद्रगणि क्षमाश्रमण और सिद्धसेनइन दोनोंमें परस्पर कोई भेद ही नहीं मानते- गणि आदि दिवाकरजीके विचार भेदमें केवल दोनोंको एक ही बतलाते हैं । इस विचारका आगम-प्रामाण्यकी दलीलके सिवा और कुछ उन्होंने अपने सम्मतिप्रकरण' में खूब ऊहा- नहीं कह सके। युक्तिसे वे भी दिवाकरजीके पोह किया है । सिद्धसेनजीके इस विचार- विचारके कायल होते थे, परंतु अन्तमें यही भेदके कारण, उस समयके सिद्धान्तग्रन्थपाठी कहकर छूट जाते थे कि युक्ति और तर्कसे और आगमभक्तिप्रवण आचार्यगण उनको चाहे जो सिद्ध होता हो परंतु आगमलिखित
उल्लेखोंके विरुद्ध विचारको हम कभी आदर 'तम्मन्य । आदि कटाक्षपूर्ण विशेषणोंसे
नहीं दे सकते। 'स्वमनीषिका सिद्धान्तविरोअलंकृत करके, उनके प्रति अपना सामान्य धिनी न प्रमाणम्, इत्यभ्युपेयते ।' 'न चान्यथा अनादर-भाव प्रकट किया करते थे। सिद्धसेनके जिनवचनं कर्त शक्यते सविदषापीति।' बाद सिद्धान्तग्रन्थपाठी आचार्यों में जिनभद्रगणि मालूम पड़ता है, इस प्रकारकी तर्कप्रियताके क्षमाश्रमण नामके एक बहुत समर्थ प्रतिभावान् कारण ही पिछले जैनसाहित्यमें दिवाकरजी आचार्य हुए हैं। इन्होंने जैनसूत्रोंके विस्खलित 'तार्किक' नामसे प्रसिद्ध रहे हैं। रहस्यको संकलित करनेके लिये विशेषावश्यक बहुतसे पाठक यह नहीं जानते होंगे कि भाष्य । * नामक महान ग्रन्थकी रचना की है। श्वेताम्बर आचार्योंके इस विशिष्ट मतभेदके इस भाष्यमें क्षमाश्रमणजीने दिवाकरजीके, उक्त
बारेमें दिगम्बर आचार्योंका क्या मत है ।
उनके लिए हम यहाँ पर यह कह देना चाहते विचार-भेदका खूब ही खण्डन किया है और दिवाकरजीको आगमविरुद्धभाषी बतलाकर उनके
___x श्वेताम्बर संप्रदायमें तत्त्वार्थसूत्र पर यही एक सिद्धान्तको अमान्य ठहराया है । तत्त्वार्थसूत्र
प्रसिद्ध और प्रौढ टीका है । यह टीका भाष्यके
ऊपर लिखी गई है। ऐतिहासिक दृष्टिसे, तत्त्वार्थस्त्र* यह भाष्य, मलधारी आचार्य हेमचंद्रविरचित की दिगम्बर-श्वेताम्बरकी अन्य सब टीकाओंसे इस बृहव्याख्याके साथ काशीकी 'यशोविजय-ग्रंथमाला में टीकाका महत्त्व अधिक है। आगे हम इस विषयमें कुछ मुद्रित हुआ है।
. विस्तारके साथ लिखनकी इच्छा रखते हैं। -लेखक ।
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अङ्क ५]
सिद्धसेन दिवाकर और स्वामी समन्तभद्र ।
कि दिगम्बराचार्योंको दिवाकरजीहीका मत मान्य समझकर, उनका अवलोकन नहीं करते-इस है । दिगम्बर ग्रन्थोंमें सर्वत्र ही केवलज्ञानीको लिये यदि श्रमणगण अनुमति दें तो मैं उन्हें ज्ञान और दर्शन दोनों युगपत् लिखे हुए हैं। संस्कृत भाषामें परिवर्तित कर देना चाहता उनमें श्वेताम्बर आगमोंके अनुसार जुगवं दो हूँ।" यह सुनते ही श्रमण-संघ एकदम चौंक णत्थि उवओगा' अर्थात् एक साथ दो उपयोग उठा और 'मिच्छामि दुक्कडं' का उच्चारण नहीं होते-यह विचार कहीं देखनेमें नहीं करता हुआ, इनसे कहने लगा कि, “ महाराज ! आता। इतना ही नहीं, बल्कि तत्त्वार्थराज- इस अकर्तव्य विचारको अपने हृदयमें स्थान वार्तिकमें भट्ट अकलंकदवने 'केवलिश्रुतसङ्घ- देकर आपने तीर्थकर, गणधर और जिन-प्रवचधर्मदेवावर्णवादो दर्शनमोहस्य ।' ६-१३ । इस नकी महती 'आशातना' ( अवज्ञा ) की सूत्रकी व्याख्यामें
है । ऐसा कलुषित विचार करनेके और श्रमण 'पिण्डाभ्यवहारजीविनः, केवलदशानिर्हरणाः, अला
संघके सामने ऐसे उद्गार निकालनेके कारण, अपात्रपरिग्रहाः, कालभेदवृत्तज्ञानदर्शनाः, केवलिन
जैनशास्त्रानुसार आप 'संघबाह्य ' के भूर्दण्डकी इत्यादिवचनं केवलिष्ववर्णवादः।'
शिक्षा पानेके अधिकारी हुए हैं।" दिवाकरजी ऐसा लिख कर केवलीको कवलाहार माननेके
संघके इस कथनको सुनकर चकित हो गये;
और मेरे एक सरल विचारसे भी संघको इतनी समान इस ‘क्रमोपयोगवाद' को भी, केवलज्ञानीके अवर्णवाद-स्वरूप बतलाकर दर्शनमोह
अप्रीति हुई, इस लिये बहुत ही दुखी हुए। कर्मके बन्धका कारण बतलाया है ! अकलंक
संघसे तुरन्त उन्होंने क्षमा-प्रार्थना की और देवके इस कथनके विरुद्ध श्वेताम्बर विदान जो कुछ प्रायश्चित्त दिया जाने योग्य हो उसे सिद्धसेन गणिने भी इसी सूत्रकी व्याख्यामें- देनेकी विज्ञप्ति की। कहा जाता है कि संघने
उन्हें शास्त्रानुसार बारह वर्षतक ' बहिष्कृत ' दिगम्बरवाद्विगतत्रपाः, क्रमोपयोगभाजः, रूपमें रहनेका पाराश्चित' नामक प्रायश्चित्त ससबसरणभूमावप्कायभूम्यारम्भानुमोदिनः सर्वोपायनिपुणा अप्यतिदुष्करतुरपचरमार्गोपदेशिनः; इत्याद्य
दिया, जिसे दिवाकरजीने सादर स्वीकार कर बर्णोद्भासनम्।'
संघाज्ञाका पालन किया । प्रायश्चित्तकी मर्यादा
... पूर्ण हो जाने पर संघने उनको फिर अपनेमें इस प्रकार लिख कर केवलज्ञानीको क्रमशः
शामिल कर लिया । इस किम्बदन्तीमें ज्ञान दर्शन होनेवाले मत (विचार ) में युक्ति- , रहितता मानने या प्रतिपादन करनेवालोंके
हमारी समझमें कुछ न कुछ ऐतिहासिक सत्य
अवश्य है । ऊपर जो हमने थोड़ासा इनके विचारको दर्शन मोहकर्मके बन्धका कारण बम
बस- विचार-स्वातंत्र्य और स्पष्ट-भाषित्वका परि-. लाया है।
----- चय दिया है, उससे यह जाना जा सकता है सिद्धसेनसूरिके विषयमें एक यह भी किम्व- कि, यदि जैनागमोंके सम्बन्धमें इन्होंने ऐसी दन्ती प्रचलित है कि, इन्होंने एक बार श्रमण- कोई बात श्रमण-संघके सामने प्रदर्शित की संघके सामने यह विचार प्रदर्शित किया था कि, हो, अथवा कृतिरूपसे उपस्थित कर दी हो कि " जैनागम प्राकृत भाषामें है, इस लिये जिससे पुराणप्रिय और आगमप्रवण श्रमणविद्वानोंका उनके प्रति विशेष आदर नहीं वर्गको असंतोष हुआ हो, तो, कोई आश्चर्यकी होबा-विदग्धगण उन्हें ग्रामीण भाषाके ग्रन्थ बात नहीं है ।
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जैनहितैषी -
[ भाग १४
तत्कालीन श्रमण संघ में अथवा कुछ काल प्रौढ टीको बनाकर, शान्त्याचार्य और-तक पीछे भी आगमाभ्यासी सैद्धान्तिकों में सिद्ध- जिनेश्वरसूरिने न्यायावतार ' के सटीक सेनसूरिके प्रति अनादरभाव अल्परूपमें भले वार्तिक रचकर, सिद्धसेनसूरिके जैनतर्कही जागृत रहा हो; परंतु, परवादियोंके किये शास्त्रविषयक सूत्रधारत्वका सगौरव समर्थन जानेवाले प्रचण्ड आक्रमणोंसे, जैनशासनकी किया है । प्रचण्डतार्किक वादी देवसूरिने उन्हें रक्षा करनेके लिये प्रमाण और नयवादके प्रबल अपना मार्गदर्शक बतलाया हैं; और आचार्य युक्तिपूर्ण सिद्धान्तों की स्थापनारूप जिस दुर्गम- हेमचंद्रने उनकी कृतियों के सामने अपनी विद्वदुर्ग मूलको वे दृढ बना गये हैं उसके कारण न्मनोरञ्जक कृतियोंको भी ' अशिक्षितालापउनके अनुगामी और पश्चाद्वर्ती सब ही समर्थ कला बतलाया है । जैन विद्वानों ने उनका बड़े गौरव के साथ स्मरण किया है । सुप्रसिद्ध तार्किक आचार्य मल्लवादीने सम्मति - प्रकरण की टीको लिखकर उनके प्रति अपनी उत्तम भक्ति प्रकट की है । जैनधर्मके अनन्यसाधारण तत्त्वज्ञ हरिभद्रसूरिने तो उन्हें साक्षात् अंत केवली ' लिखकर उनका अनुपम आदर किया है । तत्पश्चात् महात्मा सिद्धर्षिनें न्यायावतार ' की व्याख्याँ लिखकर, तर्कपञ्चानन अभयदेवसूरिने ' सम्मतिप्रकरण' की २५ हजार श्लोक-परिमित विस्तृत और
( अपूर्ण । )
८
८
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१ यह टीका अब कहीं उपलब्ध नहीं है । ४-५ सौ वर्ष पहले की बनाई हुई एक ग्रन्थसूचिका हमारे पास है उसमें इस टीकाका नाम लिखा हुआ है ।
२ देखो, • पञ्चवस्तु ' ग्रन्थकी निम्न लिखित
गाथायें
• भण्णइ एतेण (i) अम्हाण- कम्मवाय (यो ) नो इहो । प्पो सहाववाओ सुअकेवलिणा ज ( ओ ) भणिअं ॥ आयरियसिद्धसेणेण सम्मईए पइडिअ जसेण । दूसमणिसा-दिवागर- कप्पत्तणओ तदक्खेण ॥ — डेक्कनकालेजसंगृहीत हस्तलिखित पुस्तक पृ० १३१।
३ यह व्याख्या पाटणकी 'हेमचंद्राचार्यजैन सभा' की ओरसे छपकर प्रकाशित हुई है । इस व्याख्या के ऊपर राजशेखरसूरिका बनाया हुआ संक्षिप्त टिप्पणक भी है।
८
१ इस टीकाका थोड़ासा प्रारंभिक भाग काशीकी यशोविजय ‘जैनग्रंथमालामें प्रकाशित हुआ है । संपूर्ण ग्रंथ अभीतक नहीं छपा ।
२-३ जिनेश्वरसूरिके वार्तिकका नाम ' प्रमालक्षण : है और वह केवल न्यायावतार सूत्रके आदिम लोकका विस्तार स्वरूप है । इस ग्रन्थके विषयमें विशेष जानने के लिये देखो जैन हितैषी भाग १३ अंक९ - १० में मुद्रित हमारा 'प्रमालक्षण ' शीर्षक लेख | यह ग्रंथ अहमदाबादके सेठ मनसुखभाई भगुभाईने छपवाकर प्रकट किया है। शान्त्याचार्यका वार्तिक भी जिनेश्वरसूरि के वार्तिककी तरह न्यायावतारके प्रथम श्लोकहीकी व्याख्याहै। इसका नाम ' प्रमाणप्रमेयकलिका ' है । यह काशी के ' पंडित ' पत्रमें पं० विठ्ठलशास्त्री द्वारा संशोधित होकर प्रकाशित हुआ है; परंतु बहुत ही अशुद्ध छपा है ।
४
देखो, ' स्याद्वादरत्नाकर' के प्रारंभ में निम्नलिखित श्लोक
श्री सिद्धसेन - हरिभद्रमुखाः प्रसिद्धा
सूरयो मयि भवन्तु कृतप्रसादाः । येषां विमृश्य सततं विविधान् निबन्धान्— शास्त्रं चिकीर्षति तनुप्रतिभोऽपि मादृक् ॥
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अङ्क ५] जैनधर्म अनीश्वरवादी है।
१३५ जैनधर्म अनीश्वरवादी है। हैं कि जैनधर्म नास्तिक नहीं है-वह परम आ
स्तिक है। कुछ समय पहले तो इस विषयकी संसारमें सबसे अधिक संख्या ईश्वरवादिः चर्चा और भी जोरों पर थी। परन्तु हमारी योंकी है। वर्तमान दृष्ट संसारके लगभग ढाई समझमें यदि लोग 'नास्तिक' कहनेसे ईश्वरको अरब मनुष्योंमें ऐसे ही लोग अधिक हैं जो इस न माननेवाला ही समझते हैं, अथवा 'नास्तिको सृष्टिका कर्ता हर्ता विधाता एक अदृश्य शक्ति- वेदनिन्दकः ' इस वाक्यके अनुसार वेदाका विशेषको मानते हैं और वही ईश्वर, खुदा, या न माननेवाले ' नास्तिक ' पदवाच्य हैं, तो गाड आदि नामोंसे अभिहित होता है। हिन्दू, नास्तिक' कहनेसे हमें चिढ़नेकी आवश्यकता ईराणी, यहूदी, ईसाई आदि सभी धर्म ईश्वरके नहीं है, वरन् इसे उसी प्रकार अपना गौरव उपासक हैं और इन्हींके अनुयायियोंकी संख्या में
बढ़ानेवाला समझना चाहिए जिस तरह हम अपने सबसे अधिक है। जीते-जागते बचे-खुचे धर्मों में
नाम अन्य ‘स्याद्वाद' आदि मुख्य सिद्धान्तोंको जैन और बौद्ध ये दो ही धर्म ऐसे हैं जो वास्तव में समझते हैं। अनीश्वरवादी हैं, अर्थात् किसी ईश्वरविशेषके
बहुतसे जैनधर्मानुयायियोंको 'नास्तिक' के अस्तित्वको स्वीकार नहीं करते हैं। और इस समान 'अनीश्वरवादी' बनना भी नापसन्द हैं। भारतवर्षमें तो केवल जैनधर्म ही अनीश्वरवादकी वे इस कला (1) के टीकेको भी अपने मस्तकमें थोड़ी बहुत रक्षा कर रहा है। बौद्धधर्म यहाँ नहीं लगाये रखना चाहते । इस टीकेको पोंछ बहुत थोड़ा-नाममात्रको है; जो कुछ है यहाँसे डालनेका-कमसे कम फीका कर डालनेकाबाहर चीन, जापान, श्याम आदि देशमि है। प्रयत्न हम अभी ही नहीं, बहुत समयसे कर रहे
जैन और बौद्ध धर्म इस अनीश्वरवादके हैं। इस प्रयत्नमें थोड़ी बहुत सफलता भी हुई कारण 'नास्तिक' भी कहलाते हैं । यद्यपि है। सर्वसाधारण लोग यह समझने लगे हैं कि बहुतसे विद्वानोंके मतसे जो लोग परलोकको जैनी भी ईश्वरको मानते हैं और अपने मन्दिरोंमें नहीं मानते हैं, या आत्माके अस्तित्वको नहीं हमारे ही समान उसकी मूर्तियाँ भी स्थापित करमानते हैं, वे ही 'नास्तिक' कहे जाने चाहिएँ के पूजते हैं, सिर्फ इतना अन्तर है कि वे अपने
और इस दृष्टिसे जैनधर्म इस नास्तिकतासे मुक्त ईश्वरको महावीर, पार्श्वनाथ, नमिनाथ जिनदेव हो जाता है, परन्तु नास्तिकताका प्रचलित आदि नामोंसे पुकारते हैं। परन्तु वास्तवमें जैनधर्म अर्थ ईश्वरका न मानना ही है । सर्वसाधारण अनीश्वरवादी है और यह उसकी अस्थिमज्जागत लोग इस शब्दको इसी अर्थमें व्यवहृत करते हैं, प्रकृति है । वह न छुपायेसे छुप सकती है और इस कारण यह कहना असंगत नहीं कि जैनधर्म न बदलनेसे बदली जा सकती है। जब तक अनीश्वरवादी भी है और नास्तिक भी है। जैनधर्म और जैनविज्ञानका आमूल परिवर्तन .. परन्तु आजकलके जैनधर्मानुयायी अपनेको न कर दिया जाय, तब तक उसमेंसे अनीश्वरवाद 'नास्तिक ' नहीं कहलाना चाहते। इसे वे पृथक् नहीं किया जा सकता। एक अपमानजनक शब्द समझते हैं और जिन्होंने संसारके विविध धर्मोंके इतिहासका इस कारण उनके व्याख्यानों और लेखोंमें इस अध्ययन किया है वे जानते हैं कि प्रत्येक धर्म विषयका अकसर प्रतिवाद देखा जाता है। वे पर उसके पड़ौसी धर्मोका, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष बड़ी बड़ी युक्तियाँ देकर सिद्ध किया करते किसी न किसी रूपमें, कुछ न कुछ प्रभाव
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जैनहितैषी -
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अवश्य पड़ा करता है और जिस धर्मके अनुयायियोंकी संख्या कम हो जाती है अथवा जिसका प्रचार कम हो जाता है, उस पर तो दूसरे बलवान और देशव्यापक धर्मोका प्रभाव बहुत ही अधिक पड़ता है । बिना उनके प्रभावोंसे प्रभावान्वित हुए वह रह ही नहीं सकता । जिस समय बौद्ध और जैनधर्मका प्रभाव देशव्यापी हो रहा था, उनके अहिंसामूलक उपदेशोंके प्रति जनसाधारणका बहुत ही अधिक झुकाव हो रहा था, उस समय हिन्दूधर्म पर इन दोनों ही ध'मौका बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा था और उसका फल यह हुआ था कि हिन्दूधर्ममें से 'वैदिक हिंसा' की विधियाँ निकाल दी गई या परिवर्तित कर दी गई और दूसरी सैकड़ों बातों में संशोधन परिवर्तन किया गया । इस विषयमें किसी किसी विद्वानकी तो यहाँ तक सम्मति है कि वर्तमान हिन्दूधर्म प्राचीन हिन्दूधर्मका मूल स्वरूप नहीं किन्तु संस्कृत ( संस्कार किया हुआ ) स्वरूप है और उसके अंग प्रत्यंगोंमें बौद्ध-जैनधर्मो के प्रभावके चिह्न ं सुस्पष्टरूपसे दृष्टिगोचर होते हैं । इसी प्रकार जब जैनधर्मका ह्रास हुआ, और हिन्दूधर्मका प्रभाव फिर बढ़ा, तब स्वयं उसे हिन्दूधर्म के प्रभावसे प्रभावान्वित होना पड़ा । २० - २५ करोड़ हिन्दुओंके बीचमें १०-१५ लाख जैनधर्मानुयायी रहें और उन पर उनका प्रभाव न पड़े, यह संभव नहीं । जैनधर्मने जिस प्रकार हिन्दूधर्मको कुछ दिया था, उसी प्रकार उससे कुछ लिया भी ।
हिन्दूधर्मसे या ब्राह्मणधर्मसे हमने क्या क्या लिया है, इसका विवेचन किसी अन्य लेखमें किया जा सकेगा; यहाँ केवल अनीश्वर वादका प्रसंग है, अतएव इसके सम्बन्ध में इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि हिन्दूधर्मके प्रभावसे हमने अपने अनीश्वरवाद पर ऐसा मुलम्मा चढ़ा दिया है, कि वह साधारणदृष्टिसे देखनेवालोंको
[ भाग १४
ईश्वरवाद जैसा ही प्रतीत होता है । केवल विशेषज्ञ ही यह जान सकते हैं कि जैनधर्म में वस्तुतः ईश्वरके लिए कोई स्थान नहीं है ।
ईश्वर शब्दके वास्तविक अर्थ हैं - ऐश्वर्यशाली, वैभवशाली, शक्तिशाली, स्वामी, अधिकारी, कर्तृत्ववान् आदि । इहलोकमें जो दर्जा स्वतंत्र सम्राट या महाराजका है, वही परलोकमें ईश्वर या परमेश्वरका है । परन्तु जैनधर्म इहलोक या परलोकमें इस प्रकार के किसी सत्ताधीशको माननेसे सर्वथा इंकार करता है । उसका ईश्वर किसी साम्राज्यका स्वेच्छाचारी शासक तो क्या होगा, किसी रिपब्लिक ( प्रजातंत्र देश ) का प्रेसीडे - ण्ट भी नहीं है, यहाँतक कि रूसकी सोवियट - सरकारका प्रधान भी नहीं है । वह एक ईश्वरको भी तो नहीं मानता है । उसके यहाँ यदि ईश्वर वह एक नहीं, लाखों करोड़ों असंख्य अनन्तकी संख्या में है । अर्थात् जैनमतानुसार इतने ईश्वर हैं कि उनकी गिनती नहीं हो सकती और आगे भी वे बराबर इसी अनन्त संख्या में अनन्त कालतक होते रहेंगे । क्योंकि जैन सिद्धान्त के अनुसार प्रत्येक आत्मा अपनी अपनी स्वतंत्र सत्ताको लिए हुए मुक्त हो सकता है । आजतक ऐसे अनन्त आत्मक् हैं और आगे भी होंगे । ये मुक्त जीव ही जैनधर्मके ईश्वर हैं । इन्हीं में से कुछ मुक्तात्माओंको - जिन्होंने मुक्त होनेके पहले संसारको मुक्तिका मार्ग बतलाया था — जैनधर्म तीर्थकर मानता है ।
जैनधर्मके ये मुक्तात्मा या ईश्वर संसार से कोई सम्बन्ध नहीं रखते । न सृष्टिसंचालन कार्यमें उनका कोई हाथ है, न वे किसीका भला बुरा कर सकते हैं, न किसी पर कभी प्रसन्न होते हैं और न अप्रसन्न, न उनके पास कोई ऐसी सांसारिक वस्तु है जिस हम ऐश्वर्य, वैभव या
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अङ्क ५]
जैनधर्म अनीश्वरवादी है।
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अधिकारके नामसे पुकार सकें। न वे किसीका असली तत्त्वोंसे वे प्रायः अनभिज्ञ रहते हैं। न्याय करते हैं, और न किसीके अपराधोंकी तत्त्वोंके सभझने समझानेका भार बहुश्रुत धर्मजाँच । जैनसिद्धान्तके अनुसार सृष्टि स्वयं- गुरुओंपर ही प्रायः न्यस्त रहता है । वे स्वयं तो सिद्ध है, जीव अपने अपने कर्मोंके अनुसार स्वयं धर्मकी ऊपरी बातोंको-क्रियाकाण्ड आदिही सुखदुःख पाते हैं, ऐसी दशामें मुक्तात्मा- को ही धर्म समझते और मानते हैं । ऐसी ईश्वरोंको इन सब झंझटोंमें पड़नेकी जरूरत दशामें यह संभव नहीं कि जैनधर्मके सर्वभी नहीं है।
साधारण उपासक-वे उपासक कि जिनके ___ गरज यह कि जैनधर्ममें माने हुए मुक्तात्मा- आसपास उनसे सैकड़ों गुणें ईश्वरको मानने ओंका उस ईश्वरत्वसे कोई सम्बन्ध नहीं है जिसे पूजनेवाले अजैन रहते थे-बिना ईश्वरके रह कि सर्वसाधारण लोग संसारके कर्ता हर्ता वि- जाते। जैनधर्ममें चाहे ईश्वर हो या न हो, पर धाता ईश्वरमें कल्पना किया करते हैं । उस उनका काम ईश्वरके बिना कैसे चलता ? अत ईश्वरत्वका तो उल्टा जैनधर्मके तर्क-ग्रन्थोंमें एवं उनके लिए अनीश्वरवादी होते हुए भी खूब जोरोंके साथ खण्डन किया गया है और जैनधर्मने ईश्वरवादको उतना स्थान दे दिया इस तरहकी प्रबल युक्तियोंके साथ किया गया जितना कि मूलसिद्धान्तोंकी रक्षा करते हुए है कि उसे पढ़कर बड़ेसे बड़े ईश्वरवादियोंकी दिया जा सकता था। भी श्रद्धा डगमगाने लगती है । उक्त ग्रन्थोंके इसमें सन्देह नहीं कि जैनधर्ममें मूर्तिपूजा अध्ययनसे यह बात अच्छी तरह समझमें आ बहुत प्राचीन समयसे प्रचलित है; परन्तु वह जाती है कि जैनधर्म वास्तवमें अनीश्वरवादी इस रूपमें नहीं थी जिसमें कि इस समय दिखही है-वह ईश्वरवादी नहीं कहा जा सकता। लाई देती है । मूर्तियोंका पंचामृत अभिषेक, __ इस ईश्वरके न माननेका जैनधर्मके मूल उनका आह्वान, स्थापन, सनिधीकरण, अष्ट सिद्धान्तोंसे इतना घनिष्ट और अविच्छिन्न द्रव्यसे पूजन, विसर्जन, अरहंतसिद्ध अरहंत सम्बन्ध है कि यदि यह निकाल दिया जाय, सिद्धका जाप, मूर्तियोंकी प्रतिष्ठाके विधि विधान, और दूसरे धर्मोके समान एक सृष्टिकर्ता ईश्वर आदि क्रियाओं पर. हिन्दूधर्मके क्रियामान लिया जाय, तो जैन-विज्ञानकी सारी काण्डका और ईश्वरवादका रंग चढ़ा हुआ ही इमारत धराशायी हो जाय । ऐसी दशामें दिखलाई देता है । हमारे स्तोत्रों और स्तवनों जैनधर्ममेंसे 'अनीश्वरवाद ! का सर्वथा अलग पर तो कहीं कहीं यह रंग इतना गहरा है किया जाना तो असंभव था, अधिकसे कि वे नाममात्रके परिवर्तनसे ईश्वरवादियोंके अधिक उसका गहरा रंग कुछ फीका किया स्तोत्रोंकी पंक्तिमें निर्भय होकर रक्से जा जा सकता था और अन्य ईश्वरवादियोंके सकते हैं। पिछले जैमसाहित्यमें तो कहीं कहीं 'प्रभावने यही किया । हमने अपने मूल अनी- भक्तिगंगा ऐसी तेजीसे बही है कि उसके प्रबाश्वरवादको सिद्धान्त ग्रन्थों में तो सुरक्षित हमें बेचारे अनीश्वरवादके अस्तित्वकी कल्पना रक्खा, परन्तु उसके बाहरीरूपमें यथासाध्य भी नहीं होती। एक जैनकवि कहते हैं:परिवर्तन कर डाला।
" स्वामी जैसे बने तैसे तारो, ___एक बात और है । सर्वसाधारण लोग गहरी मेरी करनी कछु न विचारो।" सैद्धान्तिक बातोंको नहीं समझते । धर्मके यह ईश्वरबाद नहीं तो और क्या है ?
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जैनहितैषी
[भाग १४
पौराणिक लेखकोंने इस विषयकी ओर और सबसे बड़ी विशेषता तथा महत्ता है । गतानुगभी अधिक ध्यान दिया है । उन्होंने अपनी तिकताके प्रबाहमें न बहकर, युक्ति और प्रमाकवि-सुलभ कल्पनाओंसे जैनधर्मके उपासकोंके णोंसे असिद्ध ईश्वरको माननेसे स्पष्ट इंकार कर लिए प्रायः वे सभी मानतायें सुलभ कर देनेका देना, कोई साधारण बात नहीं है । हमें अपने प्रयत्न किया है जो अन्य ईश्वरवादियोंमें प्रचलित इस अनीश्वरवाद या नास्तिकत्वको छुपानेकी हैं । वे कहते हैं कि भगवान ऋषभदेव सृष्टि- आवश्यकता नहीं है । बल्कि अब तो इसके कर्ता ब्रह्मा है, क्योंकि उन्होंने चौथे कालकी प्रकाशित और प्रचार करनेके लिए बहुत ही आदिमें जीवनानर्वाहकी शिक्षा दी थी, उन्होंने अनुकूल समय आ गया है। ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वर्णोको उत्पन्न किया था.
___संसारमेंसे ईश्वरके अवतार, अंश या उनके उनके मुखसे चतुरनुयोग रूप चार वेद उत्पन्न । हुए, वे सृष्टिके रक्षक थे, इसलिए विष्णु कहलाये,
प्रतिनिधिस्वरूप राजाओंकी सत्ता उठ रही है।
उनके स्वेच्छाचारी शासनका बहुत कुछ अन्त विष्णुके समान उनके भी सहस्र नाम हैं, वे कल्याणके करनेवाले हैं अतएव शंकर भी हैं।
। हो चुका है और हो रहा है । अब यह कोई इस प्रकारकी और भी सैकड़ों बातें हैं।
नहीं मानता कि राजा लोगोंको ईश्वरके घरसे
किसी पर शासन करनेका या अत्याचार और जैनधर्मके वर्तमान अनुयायियोंपर तो करनेका परवाना मिला हुआ है । अब ईश्वरवादका रंग बे तरह चढ़ा हुआ है। उनमें तो यही सिद्धान्त जगद्विजयी हो रहा है कि १०० में से लगभग ९५ मनुष्य ऐसे होंगे जो प्रत्येक जाति स्वराज्य प्राप्त करनेकी अधिकाऔरोंके समान जिन भगवानको ही सुख दुःख रिणी है और प्रत्येक मनुष्य अपने घरका राजा देनेवाले समझते हैं, उन्हींका नाम जपा करते है। इसी तरह अब इस सिद्धान्तके विश्वविजयी हैं, उन्हींकी सौगन्ध खाते हैं, और कहते हैं होनेका समय आ रहा है कि ससारमें गतानुकि हमारा अमुक काम सिद्ध हो जायगा, तो गतिकतासे, बिना किसी युक्तिप्रमाणके मान हम भगवानका अमुक उत्सव करेंगे, शिखरजी लिये गये ईश्वरका वास्तविक अस्तित्व नहीं है। गिरनारजीकी यात्रा करेंगे, अथवा मन्दिर बनवा मनुष्य सब तरहसे स्वतंत्र है। अपने सुख देंगे । गरज यह कि ये लोग पूरे ईश्वरवादी दुःखोंका वह आप ही कर्ता है और उनसे मुक्त बन रहे हैं । अन्तर केवल यही है कि इनके होनेकी शक्ति वह स्वयं ही रखता है । इस भगवान् श्रीकृष्ण, रामचन्द्र, शिव आदि न समय संसारमें इस तरहकी भावनायें जोरोंपर हैं होकर ऋषभदेव, पार्श्वनाथ आदि हैं । यह सब और अनेक सोशियालिस्टों तथा बोल्शेविकोंने हमारे पड़ौसके धर्मोंका प्रभाव नहीं तो और तो स्पष्टतः घोषणा कर दी है कि जब तक क्या है ?
ईश्वरके विश्वासका लोप नहीं होता तब तक गरज किया औ र संसारसे गुलामी या दासता नहीं उठ सकती। 'ईश्वरवाद' की छाया दिखलाई देती है, वह ।
1 जैनधर्मके अनुयायियोंको भी इस बड़े भारी स्वयं उसकी वस्तु नहीं है; किन्तु दसरोंके प्रभा- आन्दोलनके भागीदार बनकर अपने पुराने
सिद्धान्तकी गरिमा प्रकट करना चाहिए । वसे उत्पन्न हुई है । वास्तवमें जैनधर्म अनीश्वर- । वादी है और धर्मोंके इतिहासमें यही उसकी
-अनीश्वरवादी।
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अङ्क ५]
लिखितका मुद्रितसे मीलान । लिखितका मद्रितसे मीलान । ५-लिखित प्रतिमें 'इच्चाइगुणा' नामकी गाथा श्रीमान सेठ माणिकचंद हीराचदजी जे० पी०
नं० ५० के बाद यह वाक्य दिया हैबम्बईके पुस्तकालयमें वसुनन्दि-उपासकाध्ययन
___ " अतो गाथाषटू भावसंग्रहग्रंथात् ।" (वसनन्दिश्रावकाचार) की एक परानी इस्त.. इससे मालूम होता है कि अगली छह लिखित प्रति है जो अपनी आकतिसे लगभग गाथाए 'भावसग्रह' ग्रथस उद्धृत का हुई है। तीनसौ वर्षकी लिखी हुई मालूम होती है। इस
कौनसे भावसंग्रहसे उदधृत की गई हैं यह पुस्तप्रतिका हमने बसनन्दि श्रावकाचारकी उस कानुपलब्धिके कारण अभी तक मालूम नहीं मुद्रित प्रतिके साथ जो मीलान किया जिसे हो सका । परंतु मुद्रित प्रतिमें यह वाक्य न बाबू सरजभानजी वकील देववंदने, एक दूसरी होनेसे वे गाथाएँ अभी तक वसुनन्दी आचार्यमराठी अनुवादवाली मुद्रित प्रतिपरसे, संवत् की ही समझी जाती हैं। १९६६ में छपाकर प्रकाशित किया था तो ६-लिखित प्रतिमें 'रयणप्पसक्कर' इत्यादि दोनोंमें परस्पर कुछ महत्त्वको लिये हुए भेद गाथानं० १७२ के बाद निम्न गाथा अधिक पाया गया, जिसे हम पाठकोंके अवलोकनार्थ दी हैनीचे प्रकट करते हैं:
" पढमाए पुढवीए वाससहस्साई दहजहण्णाऊ । १-मुद्रित प्रतिमें 'अइथलथलथूलं' समयम्मि वणिया सायारोवमं होइ उकिसं ॥१७३॥" नामकी १८ वीं माथा अधिक है। लिखितम ७-मदित प्रतिकी गाथा नं० २०४ से पहले इसका अस्तित्व नहीं।
'इय जो ' ये शब्द लिखित प्रतिमें अधिक हैं २-मुद्रित प्रतिकी २२ वीं गाथाका पूर्वार्ध
[पूवाध और इनको मिलाकर पढ़नेसे छपी हुई प्रतिकी लिखितप्रतिमें कुछ भिन्न दिया है। दोनों इस
इस गाथा ठीक हो जाती है । प्रकार हैं:'गोणसमयस्स एए कारणभूया जिणेहिं णिहिट्टा-'२१॥ ८-छपी हुई प्रतिकी गाथा नं० २३७ के
-लिखित। 'आवस्ससच्छाइ' पदके स्थानमें लिखित 'एदे कारणभूदा निच्छपरूवा जिणेहिं णिदिवा ॥ २२॥' प्रतिमें 'आगमसच्छाइ ' पद दिया है । और
-मुद्रित। नम्बर गाथाका गलतीसे वही रक्खा है । हस्तलिखितप्रतिमें 'ताणपवेसो...... .-मटित प्रतिमें गाथा नं० ३६७ के बाद ('णाणपवेसो' गाथा नं० ३८) इत्यादि गाथा , i० ३७ के बाद 'उक्तं च' रूपसे यह गाथा. परिमें नहीं है
" जो नीचेकी आधी गाथा दी है वह लिखित दी है जो छपी हुई प्रतिमें नहीं है'अण्णाणं पविसंता दिता ओगासमस्यमस्सोर्सि। * काऊण अह एवं तराणि रइयरणगेसु चत्तारि।" मिलताविय निचं सगसगभावं णवि चयंति ॥३८॥' १०-मुदित प्रतिमें गाथा नं० ३७३ का
४-छपी हुई प्रतिकी ‘संवेओ णिव्वेओ' पूर्वार्ध नहीं दिया । लिखितमें उसका पूर्वार्ध वह इत्यादि-गाथा नं० ४९ का उत्तरार्ध लिखितप्र- दिया है जो ऊपर नं. ९ में गाथा नं० ३६७ तिसे एकदम विभिन्न है, यथा-
के बाद अधिक बतलाया है । मालूम होता है मु०-वच्छल्लं अणुकंपा अढगुणा हुँति सम्मत्ते ॥ कि यह छापेमें कम्पोजको विभाजित करनेवा--. लि०-पूयां अ वस्यजननं अरुहाईणं पयत्तेण ॥ लोंकी भूल हुई है । अन्यथा उसका हिन्दी १ स्तुति, ऐसा टिप्पणीमें दिया है।
अनुवाद यथास्थान दिया गया है ।
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१४० जैनहितैषी
[भाग १४ ११-मुदित प्रतिमें ' सम्मत्तणाणदंसण...'' सशोधन किया गया है, बड़ी सावधान के साथ नामकी गाथा नं. ५३७ से आगे जो 'मोह- शुद्ध और साफ छापना चाहिये । और जहाँक्खयेण...' तथा 'सुहमंच णाणकम्मं ' नामकी तक बन सके प्रस्तावना, विषयसूची, श्लोकानुक्रदो गाथाएँ दी हैं वे लिखित प्रतिमें नहीं हैं। मणिका. और परिशिष्ट आदिके द्वारा उनके ___ इस संपूर्ण प्रदर्शनसे हमारा अभिप्राय यह संस्करणोंको उपयोगी बनानेका अच्छा यत्न प्रकट करनेका नहीं है कि अमुक लेखक अथवा करना चाहिये । * आशाहै कि जैनग्रंथोंके संपाप्रकाशकने जानबूझकर कोई भूल की है और दक और प्रकाशक महाशय हमारी इस समन यथार्थ अयथार्थका निर्णय करना ही इस योचित सूचनापर अवश्य ध्यान देंगे और इस लेखका कोई उद्देश्य है । बल्कि इसके द्वारा हम बातकी पर्वाह नहीं करेंगे कि ऐसा करनेमें हमें सिर्फ यह जतलाना चाहते हैं कि जैनग्रन्थोंके कुछ विशेष अर्थव्यय और समयव्यय करना प्रकाशित करनेमें जितनी सावधानीसे काम लेना होगा, वह तो करना ही चाहिये । चाहिये उतनी सावधानीसे वह नहीं लिया जाता और न उनके प्रकाशयोग्य संस्करणोंके तय्यार करनेमें उतना परिश्रम किया जाता है जितना विना मूल्य । कि किया जाना चाहिये । बहुधा चलता काम देखनमें आता है जिसके हमारे पास अनेक
हमारे यहांसे नो पुस्तकें विना मूल्य भेजी उदाहरण मौजूद हैं । राजवार्तिक जैसे महान
जाती थीं उनमेंसे 'अनित्य भावना' और
१ विवाहका उद्देश्य 'ये दो पस्तकें समाप्त हो ग्रंथ भी जिनके बारबार छपनेकी जल्दी कोई आशा नहीं की जा सकती, बहुत कुछ अशुद्ध
गई हैं । हम चाहते थे कि बम्बईसे इनकी छपे हैं । ग्रंथोंके अशद्ध छपनेकी हालत में कभी कुछ भार कापियाँ मँगाकर भेजनेका काम बराकभी यथार्थ वस्तुस्थितिके मालूम करने अथवा
" बर जारी रखें परंतु प्रेमीजीके पत्रसे मालूम किसी ऐतिहासिक तत्त्वकी खोज लगाने में हुआ कि बहाँ उनके कार्यालयमें इनकी कोई भी बहुत बड़ी असुविधा उत्पन्न होती है। कापी नहीं रही । अतः अब हमारे भाइयोंको दूसरी एक बड़ी हानि यह भी है कि छपे इनके लिये पत्र भेजनेका कष्ट नहीं उठाना ग्रंथोंके अधिक प्रचारसे जब कालांतरमें चाहिए । हाँ, 'मेरी भावना' नामकी पुस्तक हस्तलिखित ग्रंथों अथवा उनकी प्राचीन प्रति- बराबर विना मूल्य भेजी जाती है । जिन्हें याँका लोप जायगा तब उस समय अशादियों. अपने तथा अपने इष्टमित्रादिकोंके लिये उसकी को ठीक करने अथवा यथार्थ वस्तस्थितिको दो दो चार चार कापियोंकी जरूरत हो वे निर्णय करनेका साधन ही एक प्रकारसे नहीं डाक खचेके लिये आध आनेका टिकट भेजकर रहेगा और उससे अनेक वाधाएँ उपस्थित होगी। हमसे मॅगा सकते हैं। अतः जैन ग्रंथोंको, अनेक प्राचीन प्रतियोंपरसे
-संपादक। मीलान करके, उन प्रतियोंमें जिन जिन बार्ताका *वसुनन्दिश्रावकाचारका प्रकृत संस्करण इन परस्पर भेद हो उसे फुट नोटों द्वारा सूचित सब बातोंसे शून्य है और इसलिये उसका एक करके और यह दिखलाकर कि कहाँ कहाँकी आच्छा उपयोगी नवीन संस्करण छपनेकी जरूरत है। कौनकौनसी प्रतिपरसे ग्रंथका संपादन और
संपादक।
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अङ्क ५]
विविध प्रसङ्ग ।
विविध प्रसङ्ग ।
( लेखक - श्रीयुत नाथूराम प्रेमी । ) १ प्राचीन पुस्तकों का मूल्य ।
प्राचीनता के हम सबसे बड़े भक्त हैं । उसके पीछे हम सदा ही पागल बने रहते हैं । जो कुछ ज्ञान-विज्ञान, विद्या - बुद्धि, धर्म-कर्म, शौर्यवीर्य था, सो सब प्राचीनकालमें था । हमारी समझमें प्राचीनता ही सर्वश्रेष्ठताकी कसौटी है । परंतु उस परमोत्कृष्ट प्राचीनताकी इस मौखिम महिमा - या बातूनी पूजा-अर्चाके सिवाय हम और क्या सेवा प्रतिष्ठा करते हैं, यह समझमें ही नहीं आता । पहले प्राचीन ग्रन्थों या शास्त्रोंको ही ले लीजिए । कहिए, हम लोग उनकी क्या इज्जत करते हैं? वे भण्डारोंमें पड़े पड़े सड़ रहे हैं, दीमक और चूहे सेवा हैं और परिणमनशील काल उन्हें धीरे धीरे अपने विशाल उदरदेशमें डालकर नाम शेष कर रहा है। यही हमारी प्राचीन भक्ति और प्राचीनताकी पूजा है ! अब जरा उधर पाश्चात्य देशोंकी ओर देखिए । हमारी समझमें वे कोरे वर्तमान और भविष्यत्के पुजारी हैं, उनकी समझमें ज्ञान-विज्ञान आदि की उन्नति प्राचीनकालकी अपेक्षा इस समय और इस समयकी अपेक्षा आगामी कालमें अधिकाधिक होनेवाली है । प्राचीनता उनकी दृष्टिमें एक कौतुककी, प्रदर्शिनी में रखने की और संसारकी उन्नतिका एक क्रमबद्ध इतिहास तैयार करने की सामग्रीकी अपेक्षा और कोई विशेष महत्त्व नहीं रखती; फिर भी प्राचीन चीजोंको वे कितना बहुमूल्य समझते हैं, यह जानकर आश्चर्य होता है । एक समाचार पत्र ( The Literary Digest ) से मालूम हुआ कि अभी एक बहुत ही मामूली नाटककी एक प्रतिको एक
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अमेरिकन धनने ३०००० रुपया देकर खरीद किया है । इस पुस्तककी विशेषता यह है कि अँगरेजीमें यह सबसे पहले छपा हुआ नाटक है ! मुद्रित साहित्य के इतिहास में यह एक बहुमूल्य 'चीज' होगी और इसके पास रखनेका सम्मान उक्त अमेरिकनको मिलेगा । ( Book of Hours) नामकी एक मध्ययुगकी पुस्तक १९८०० पौण्डमें बेची गई है ! प्रसिद्ध यूनानी पण्डित अरस्तू ( अरिस्टाटल ) की एक सम्पूर्ण ग्रन्थावली जो सन् १४८३ में रची गई थी २९०० पौण्डमें बिकी है । इस पुस्तकके कवर पेजपर अरस्तूका एक सुन्दर चित्र है । सन् १३३६ से १३४२ के बीच में लिखी हुई नावेरकी रानी द्वितीय 'जेनीका जीवनकाल' नामक एक और पुस्तक ११८०० पौण्डमें बिकी है । इसमें छोटे छोटे ७५ चित्र हैं । दिग्विजयी बादशाह तैमूरलंगके पौत्रको भेटमें देने के लिए सन् १४१० में समरकन्द में जो पुस्तक लिखी गई थी, वह कारोंके कई उत्तमोत्तम चित्र हैं । प्राचीन चित्रों के ५००० पौण्डमें विकी है। उसमें ईराणके चित्रसंग्रह करने का भी यूरोपके धनियोंको बड़ा मारी शौक । अभी कुछ ही महिने पहले सर चित्र वेस्ट मिनिस्टर के ड्यूकने ५२००० पौण्डमें जोशुआ रेनाल्डका चित्रित किया हुआ एक खरीदा है !
I
क्या हमारे समाज के धनी भी अपनी प्राचीनतापूजक प्रकृतिको कभी इस रूप में सार्थक करेंगे ? क्या प्राचीन विद्वानों और आचार्यों के जीर्णशीर्ण ग्रन्थोंको संग्रह करनेकी ओर भी कभी उनका हृदय आकर्षित होगा ? इस समय यदि वे चाहें तो लाख पचास हजार रुपयों में ही हजारों दुर्लभ्य ग्रन्थोंका संग्रह कर सकते हैं और अपने पूर्वजोंकी अगणित कृतियोको सदा के लिए नष्ट होने से बचा सकते हैं ।
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जैनहितैषी
[भाग १४
२ ईश्वरके विषयमें बोलशे- अधिकारी कुटुम्बका मुखिया या राजा हुकूमत विकोंकी राय।
करता था वह सबसे अधिक बुद्धिमान, बलवान्
और धनवान होता था, इस लिए ईश्वर समाचारपत्रोंके पाठक रूसकी जारशाही भी सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान और लक्ष्मीपति माना सत्ताको उलट-पलट देनेवाले बोलशेविकोंको गया। कमसे कम रूसी भाषामें तो ईश्वर जानते होंगे। इस समय संसारके साम्यवादि- (Bog) शब्दकी उत्पत्ति उसी मूलसे हुई है योंमें यही अग्रगण्य हैं । ऊँच नीच, धनी जिससे धनिक ( Bogate ) की। ईश्वर में विश्वास निर्धनी. राजा प्रजा, आदिकी सामाजिक करना गलामी में विश्वास करना है। ईश्वरकी विषमताओंको मिटादेनेवाले इनके सिद्धान्त स्तुति 'प्रभु' कहकर की जाती है। प्रभु किसे जगत्प्रसिद्ध हो चुके हैं, परन्तु इनके धार्मिक कहते हैं ? जो स्वामी है और गुलाम नहीं । विचारोंसे बहुत ही कम लोग परिचित हैं । हम निस्सन्देह हम ईश्वरप्रार्थनामें कहते भी हैं कि यहाँपर उनके केवल ईश्वरसम्बन्धी विचा- 'हे ईश्वर हम तेरे दास हैं।' इसके अतिरिक्त रोको उद्धत करते हैं, जो एक प्रसिद्ध बोल्शे- सर्वजित, अखिलेश, इत्यादि विशेषण भी इसी विकके लिखे हुए हैं। वह कहता है-" मनुष्य बातके द्योतक हैं कि सबल विजयी धनियोंकी जिन बातोंको बिलकुल नहीं जानता उनके प्रभुतासे ही ईश्वरकी प्रभुताकी कल्पना उत्पन्न जाननेका प्रयत्न अपनी खूब जानी हुई बातों- हुई है ।" बोल्शेविकोंके इन विचारोंसे मालूम से ही करता है । कूपमण्डूककी तरह वह समुद्र- होता है कि वे ईश्वरको नहीं मानते और की विशालताका माप कुएँके व्याससे ही करता ईश्वरको साम्यवादके सिद्धान्तोंका घातक है। मनुष्य समझता है कि अन्य चीजें भी समझते हैं। वैसी ही होंगी जैसी कि वे चीजें जिन्हें वह हमारा अनुमान है कि भारतके जैन बौद्ध रात दिन देखता सुनता रहता है । कहते हैं आदि धर्म भी यहाँके प्राचीन साम्यवादी हैं; कि एक लड़कीका पालनपोषण एक ऐसे स्थानपर उन्होंने भी पर्ण साम्य स्थापित करनेके लिए हुआ था जहाँ मुर्गियोंका व्यवसाय होता था। सष्टिकी रचना. रक्षा और प्रलय करनेवाले वहाँ उसे रातदिन अंडोसे ही कान पड़ता था। किसी ईश्वरके अस्तित्वको स्वीकार नहीं किया
अतः अंडे सदैव उसकी आँखोंके सामने है। जिस तरह उन्होंने सामाजिक विषमताज.नाचा करते थे । एक बार जब उसने तारोंसे नित अत्याचारोंको दूर करने के लिए ऊँच-नीच भरा हुआ आकाश देखा तब वह कहने लगी द्विज-शूद्र आदि भेदोंका विरोध किया थाकि समस्त आसमानमें अंडे फैल हुए हैं। इसी ब्राह्मणोंकी प्रबल सत्ताको क्षीण किया था, प्रकार जब मनुष्योंने देखा कि संसारमें कुछ उसी तरह धार्मिक गुलामीसे मुक्त करनेके लिए मनष्योंका काम भाज्ञा देना है और कुछका अनीश्वरवादका भी प्रचार किया था । कछ आज्ञा पालन करना, तब उन्होंने सोचा कि ऐसे भी प्रमाण मिले हैं जिससे मालूम होता कदाचित् समस्त संसारका संगठन भी इसी प्रकार है कि इन धर्मोंने उस समय राजाओं या शासहुआ है। कोई शक्ति ऐसी भी अवश्य होगी जो कोंके अनियंत्रित शासनको नष्ट करनेका भी सारे संसार पर हुकूमत करती है । इसी शक्तिकी प्रयत्न किया था और इसके लिए उस समय कई कल्पनासे ईश्वरकी उन्नति हुई । संसारमें जो प्रजातंत्र स्थापित हुए थे जिन्हें कि 'गणतंत्र'
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अङ्क ५]
विविध प्रसङ्ग।
कहते थे । कुछ विद्वानोंने पता लगाया है उन्हींसे इसे ग्रहण किया है । इसीसे उनमें असकि स्वयं भगवान महावीरके पिता एक गणतंत्रके हिष्णुताका प्रवेश हुआ है। ठाकुर या प्रेसीडेण्ट थे ।
___ सर ओयफेड लायलने अपनी एक पुस्तकमें ऐसा जान पडता है कि सोशियालिज्म या लिखा है कि धर्मका फैलाव ऐसे चुपचाप ढंगसे बोल्शेविज्म आदि सिद्धान्त पुराने जैन बौद्ध होना चाहिए जिसे लोग जान भी न पावें । आदि सिद्धान्तोंके ही वर्तमान देशकालानुरूप
दूसरे सम्प्रदायोंके समान आर्यसमाजने भी अवतार हैं-उन्हींके रूपान्तर हैं।
हालमें एक सम्प्रदग्यका रूप धारण कर लिया है।
यदि कोई पूछे कि जिसे लोग जान भी न सकें ३ धर्मप्रचारके सम्बन्धमें ऐसे चपचाप धर्मप्रचार कैसे हो सकता है ?
गाँधीजीके विचार। तो इसका उत्तर प्रकृतिसे मिलेगा। अहमदाबाद-आर्यसमाजके वार्षिक महोत्स- प्रकृतिकी लीला देखिए । एक वृक्षके विषयमें वमें ता० १२ जनवरीको महात्मा गाँधीने एक विचार कीजिए। क्या आप देख सकते है कि छोटासा परन्तु महत्त्वपूर्ण व्याख्यान दिया था। वह किस प्रकार बढ़ता है ? आप अपने शरीर के उसमें आर्यसमाजके सम्बन्धमें कई बातें बड़े अवयवांका विकास बिना किसी प्रकारकी उछल मार्केकी कही थीं। नीचे उनका सारांश दिया
कूदके भी अनुभव कर सकते हैं। इसी तरह जाता है:--
धर्मका विकास भी अनुभव किया जा सकता है।
शुद्ध धर्ममें असहिष्णुताको स्थान नहीं है । ___“ आर्यसमाजके आधुनिक आन्दोलनमें मुझे ।
नम मुझ उसमें जो गुण हैं वे दूसरोंमें नहीं हैं। हिंसा दो बडी भारी त्रुटियाँ खास तौरसे मालूम हुई और मारकाटसे हिन्दू धर्म निराला है-सुरक्षित हैं । एक तो असहिष्णुता जिसे अंगरेजीमें
जाम है। दूसरे धर्म ऐसे नहीं रहे । यह धर्मद्वेषसे 'इनटोलरेशन' कहते हैं। मैं यह नहीं कहता ,
। जुदा है। हिन्दूधर्ममें भी समशेरें चली हैं और कि यह दोष केवल आर्यसमाजमें ही है, परन्तु . इतना तो सच है कि वर्तमान पवन-प्रवाहम की उपयोगिताकी हद हो गई है। आर्यसमाज सबसे अधिक बहा जा रहा है। आर्यसमाजकी दूसरी कमी जिह्वापर
जिस धर्मप्रचारमें असहिष्णुताका प्रभाव है, अधिकार न रखना है। आजकल तलवारवह सच्चा धर्मप्रचार नहीं है और वह बहुत की अपेक्षा जीभका उपयोग विशेष होता समय तक टिक भी नहीं सकता । जिस गतिसे है और वह ऐसा होता है कि तलवारके घावसे सर्वसाधारण प्रजाको किसी प्रकारकी हानि होती भी अधिक कसकता है। यह बात मैंने समाजके हो, उस गतिको रोकना ही धर्मका कार्य हैमैं उपदेशोंमें अनेक बार देखी है कि समाजी नहीं जानता कि असहिष्णुतासे कभी किसीको भाई जीभ पर काबू नहीं रखते। यह बात सबलाभ हुआ है । असहिष्णुतापूर्ण धर्मप्रचार मिश- को समझ लेनी चाहिए कि हम सत्यको कभी नरियोंका अनुकरण होकर मिशनरी-स्वरूपमें अस्वीकार नहीं कर सकते। • बदल जाता है और धर्मका कार्य केवल 'प्रचार ऋषिमुनियोंके स्वभावका विचार कीजिए करना' हो जाता है । प्रचारका यह ढंग मुसल- और उनके स्वभावका अध्ययन कीजिए। आमानों और क्रिश्चियनोंमें . है और आर्यसमाजने पको मालूम होगा कि वे केवल शान्तिसे,
लड़ाई-झगड़े
ह
र
चली हैं और
तो सच है कि वर्तमान पवन
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१४४ जैनहितैषी
[भाग १४ दृढ़तासे और सात्विक भावसे उपदेश देश देते इसमें आश्चर्य ही क्या है । वहाँके लोगोंको थे। कभी कभी वे कटुवचन भी सुनाते थे, विद्याबुद्धिमें, कला कौशल्यमें, व्यवसाय वाणिपरन्तु उनमें भी प्रियता और सत्यता रहती थी। ज्यमें और सभ्यता शिष्टतामें संसारके शिरोभसमाजी भाइयोंको क्रिश्चियनोंकी प्रचारपद्धति षण बनना ही चाहिए। “किं किं न साधयतिछोड़ देना चाहिए । वह अनुकरणीय नहीं है।" कल्पलतेव विद्या." ___ महात्मा गाँधीके उक्त विचारोंसे हमारे जैन- ५ पारसी जातिकी दानशीलता । धर्मप्रचारक पण्डितगण भी बहुत कुछ लाभ उठा भारतवर्षमें पारसियोंकी जनसंख्या एक सकते हैं । समाजके समान हमारे यहाँ भी लाखसे कुछ ही अधिक है; परन्तु वह बड़ी ही धनअसहिष्णुता और कटु तिक्त वाक्यप्रहार; ये सम्पन्न जाति है, साथही बड़ी ही दानशीला भी है। दोनों दोष बढ़े हुए हैं । इनसे धर्मप्रचार तो समयोपयोगी सार्वजनिक कार्यों में उसके बराबर नहीं होता, उलटा धर्मद्वेष बढ़ता है । धर्मप्र- दान इस देशकी किसी भी जातिके धनियोंने चारकी वही पद्धति सर्वश्रेष्ठ है; जिसे प्राचीन नहीं किया है। कुछ समय पहले इस जातिके समयके धर्मोपदेष्टा काममें लाते थे और एक धनी मि० एन० एम्. वाडियाने समस्त जिसके विषयमें गाँधीजी इशारा करते हैं। भारतवासियोंके कल्याणार्थ अनेक हितकर कार्योंके शास्त्रार्थोसे और तीक्ष्ण वाग्वाणोंसे लोग चप हो लिए एक करोड़ पचास लाख रुपयेका दान सकते हैं, हार मान सकते हैं: परन्त इससे किया था। इतना बड़ा दान इस देशमें वर्तमान वे विजयी विद्वानके धर्मको स्वीकार नहीं समयमें और किसीने भी नहीं किया है। इस कर सकते और न उन्हें उस धर्मसे प्रेम दान-द्रष्यसे अनेक शुभकार्य हो रहे हैं । इसी ही हो सकता है । क्योंकि प्रेमका विशेष सम्बन्ध वाडिया वंशकी एक जेरबाई नाम्नी महिलाने हृदयसे है, केवल बुद्धिसे नहीं । अतः उसके अभी हाल ही पचास लाख रुपयोंका एकमुश्त उत्पन्न करनेके लिए आघातसे नहीं किन्तु आ- दान किया है। यह धन पारसी जातिके दरिद्र कर्षणसे काम लेना चाहिए ।
और मध्यमश्रेणीके लोगोंकी सहायतामें खर्च
किया जायगा । निस्सन्देह स्त्रीजातिके लिए यह ४ बीस करोड़का महान् दान। दान बड़े ही गौरवकी बात है । विख्यात धनी
अमेरिकाके लोग जैसे धनी हैं वैसे दानी भी हैं। सर जमसेदजीताताने कुछ वर्ष पहले वैज्ञानिक - ज्ञान और विज्ञानकी उन्नतिके लिए अमेरिकाके शिक्षाके लिए जो तीस लाख रुपयेका दान धनियोंने जितने बड़े बड़े दान किये हैं, संसार- किया था और जिससे बंगलोरमें एक विशाल के किसी भी देशमें वैसे दान नहीं किये गये। विज्ञान-शिक्षालय खुला हुआ है, उसे पाठक करोड़ों रुपयोंका एकमुश्त दान करनेवाले वहाँ भूले न होंगे। तातावंशने पटनाके प्राचीन खंडसैकड़ों धनी हो गये हैं और इस समय भी हैं। हर खोदनेके लिए, पूने के भाण्डारकर इन्स्टिट्यूअभी हाल ही वहाँके सुप्रसिद्ध धनकुवेर मि० टमें एक भवन बनवा देनेके लिए, तथा और राकफेलरने विद्या-शिक्षाके लिए एक साथ बीस भी अनेक उपयोगी कामोंमें अनेक दान किये करोड़ रुपयोंका दान किया है। जिस देशमें हैं । बम्बईका जमसेदजी जीजीभाई नामका इतने बड़े बड़े दान होते हैं, वहाँ यदि ज्ञान- विशाल हास्पिटल, जे० जे० आर्ट स्कूल, आदि विज्ञानकी असमान्य उन्नति दिखलाई दे, तो और भी अनेक संस्थायें पारसियोंकी दानशील
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अंडू५] विविध प्रसङ्ग।
१४५ ताका परिचय दे रही हैं । पारसियोंकी इस ८-१० वर्ष पहले वे एक ऐसी ही प्रतिष्ठा और दानशीलता और सार्वजनिक सेवावृत्तिने ही उन्हें भी करा चुके थे। उस बार वे 'सिंघई' बने थे इस देशकी एक गण्य मान्य जाति बना अबकी बार जैनधर्मके शुभचिन्तकोंने उन्हें - रक्खा है।
'सवाई सिंघई'केपदसे विभूषित कर दिया ।
- इसके बाद दो रथ प्रतिष्ठायें एक ही साथ जबल६ एक और बड़ा भारी दान ।
पुरमें हुई और वे और भी अधिक ठाठसे हुई । कलकत्तेके सुप्रसिद्ध वकील सर रासविहारी इनमें भी हमारी समझमें ५०-६० हजारसे कम घोषका नाम जैनहितैषीके पाठक अवश्य जानते रुपयोंका श्राद्ध न हुआ होगा । इनके बाद होंगे । उन्होंने कुछ वर्ष पहले कलकत्ता-विश्व- तीसरी रथप्रतिष्ठा अकलतरा जि० विलासपुरमें विद्यालयको एक वैज्ञानिक कालेज खोलनके हई। संभव है। इसमें उतना रुपया खर्च न लिए दस लाख रुपये की रकम प्रदान की थी। हआ होगा। क्यों कि उस ओर जैनोंकी संख्या उक्त कालेज खल चका है और उससे देशका कम है और रथों में सबसे अधिक खर्च भोजनबड़ा भारी उपकार हो रहा है। अब आपने उक्त प्रसाद'में ही लगता है। तो भी इस महँगाईविश्वविद्यालयको ही ग्यारह लाख रुपये देनेका के जमानेमें २०-२५ हजारसे क्या कम खर्च
और भी संकल्प किया है । इससे फलित-रसाय- हआ होगा। गरज यह कि पिछले एक ही महीनकी शिक्षा देने और शिल्पवस्तुयें बनाना नेमें अकेली परवार जतिके जैनोंने लगभग सिखानेकी व्यवस्था की जायगी। उपयोगिताकी सवालाख रुपयेका दान कर डाला । बतलाइप, दृष्टिसे यह दान बहुत ही महत्त्वका है । इससे यह दानशीलता क्या मामूली है ? हमारी जैन देशका बहुत कल्याण होगा । फलित-विज्ञानकी जाति इस प्रकारके दान करने में निरन्तर तत्पर शिक्षाकी इस समय देशको बड़ी भारी आवश्य- रहती है। प्रतिवर्ष सैकड़ों नये नये मन्दिर बनकता है । यदि देशमें इस शिक्षाका प्रचार होता, वाना, पचासों वेदीप्रतिष्ठायें और बीसों रथतो युद्धकालमें हमारे देशके व्यवसायी इस प्रतिष्ठायें या विम्बप्रतिष्ठायें करना इसी दानतरह हाथ पर हाथ रक्खे हुए न बैठे रहते । शीला जातिका काम है । और नहीं तो इन ७ जैनोंकी दानशीलता ।।
सब कामोंमें वह प्रतिवर्ष अधिक नहीं तो ६-७
लाख रुपये अवश्य खर्च कर देती होगी । बतयह तो हुई मिथ्यातियोंके दानकी बातें, लाइए, और कौन जाति इस विषयमें उनकी अब आइए. पाठक, आपको जैनोंकी दानशीलता- बराबरी कर सकती है । के कुछ समाचार सुनावें । पिछले महीनेमें ...
८परवार जातिकी दुरवस्था । हमारे यहाँ रथप्रतिष्ठाओंकी खूब धूम रही। एक रथप्रतिष्ठा सागर जिलेके ' हरदी' अब जरा दूसरी ओरकी अवस्था देखिए । नामक ग्राममें हुई थी । उसमें लगभग २० जिस परवार जातिके धनिकोंने एक महीने में लाख हजार भाई एकत्र हुए थे । जो लोग वहाँ गये सवा लाख रुपये खर्च कर डाला है, उसकी थे, उनका अनुमान है कि इस रथमें पचास दुरवस्था सुनकर हृदय काँप उठता है ? हजार रुपयोंसे कम खर्च न हुआ होगा । जिन कुछ समय पहले एक जैनसंस्थाके उपदेशक धनी महाशबने यह प्रतिष्ठा कराई थी, कोई महाशय बुन्देलखण्ड और बघेलखण्डकी ओर
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१४६
जैनहितैषी
[भाग १४
दौरा करके आये थे। उनके द्वारा मालुम हुआ अपने उपदेशोंका रुख बदलना चाहिए। जब तक कि उक्त प्रान्तोंकी रियासतोंमें परवार जातिके वे इनका सर्वथा निषेध न करेंगे, और डंकेकी लोगोंकी दुरवस्थाका वर्णन नहीं हो सकता। वे चोट इनका विरोध करके दूसरे उपयोगी काबेचारे पढ़ेगे लिखेंगे तो कहाँसे, (पढाने लिखा- भोंमें दान करनेका प्रतिपादन न करेंगे, तब .
तक ये गतानुगतिक भेड़िया धसान लोग माननेके वहाँ साधारण सुभीते भी नहीं है,) पेट
नेके नहीं। उनमें इतनी सूक्ष्म बुद्धि नहीं कि भर भोजन पाना भी उनके भाग्यमें नहीं हैं। वे आपके शभास्रवोंके तारतम्यको समझ सकें। न वहाँ कोई व्यापारका क्षेत्र है और न उनके जब तक उनके सामने यह कहा जाता रहेगा पास पूँजी ही है कि उससे वे कोई रोजगार कर कि " यद्यपि ये भी पुण्यबन्धके कारण हैं, सकें । बंजी और मेहनत मजदूरी करके ही वे स्वर्गमोक्षके दाता हैं, " तबतक वे इसके आ. किसी तरह अपना जीवन धारण कर रहे हैं । गेकी यह बात समझनेवाले नहीं कि “परन्त उनकी दुर्दशा देखकर पत्थर भी पसीज उठता इस समय विद्याकी बहुत बड़ी आवश्यकता है, है। अन्यत्रके परवारोंमें भी इतनी नहीं, तो अतएव इसीके प्रचारके लिए दान करना चा. भी कम निर्धनता नहीं है । कुछ शहरों और हिए।" वे 'यद्यपि' और 'परन्तु ' से जकड़ी खास खास स्थानोंको छोड़कर इस जातिका हई बातोंको नहीं समझते । उनसे तो साफ साफ अधिकांश ग्रामोंमें रहता है और वह निर्धनताके कहा जाना चाहिए । समुद्रमें ही डूबा हुआ है। इसी कारण इसमें । शिक्षितों-विशेष करके उच्च श्रेणीके शिक्षितों-की ९माणिकचन्द दि० जैन-ग्रन्थमाला। संख्या बहुत ही कम-प्रायः नहींके ही बराबरहै । यह अवस्था देखकर प्रश्न उठता है कि
यह जानकर पाठक प्रसन्न होंगे कि अब क्या इस जातिके धनियोंके-इन रथप्रतिष्ठा- माणिकचन्द्र-ग्रन्थमालाके कामके लिए एक ओंमें लाखों रुपये खर्च कर डालनेवालों के स्थायी विद्वान्, पं० पन्नालालजी सोनीकी हृदय नहीं है? दयामय धर्मके उपासक होकर नियुक्ति कर ली गई है, इस लिए अब ग्रन्थभी क्या ये उक्त गरीबोंपर दया करना अपना प्रकाशनका कार्य पहलेकी अपेक्षा अधिकतासे
होने लगेगा और संशोधन तथा सम्पादनके कर्तव्य नहीं समझते ? इतनी विवेक बुद्धि इनमें ,
कार्यमें भी विशेष उन्नति होगी। ग्रन्थमालाकी कब जाग्रत होगी जब ये अपने भाइयों की,
प्रबन्धकारिणी कमेटीने नीचे लिखे आठ नवीन निर्धनों और अनाथोंकी सहायता करना अपना पहला धर्म समझेंगे ! इन सब बातोंपर विचार ग्रन्थाको प्रकाशित करनेकी अनुमति दे दी है:करते हुए उन पण्डितों और जातिके पंचों पर बड़ी ही १ न्यायकुमुदचन्द्रोदय । ( संस्कृत ) । विरक्ति उत्पन्न होती है जो इन अविवेकियों को, आचार्य प्रभाचन्द्रकृत । इस समयके लिए सर्वथा निरर्थक, इन रथप्रति- २ न्यायविनिश्चयालकार । (संस्कृत) छाओं जैसे कामोंमें धन खर्च करने के लिए आचार्य वादिराजकृत । उत्साहित तथा प्रेरित किया करते हैं और उन्हें सिंघई, सवाई सिंघई आदिकी पदवियोंसे सम्मा- ३ त्रैलोक्यप्रज्ञाप्त । प्राकृत । यतिवृषनित करते हैं । अब उपदेशकों और पण्डितोंको भाचार्यकृत ।
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अङ्क ५]
विविध प्रसङ्ग।
१४७
४ षटपाहुड़ । श्रीकुन्दकुन्दाचार्यकृत मूल लिए जितनी सहायता मिल सके उतनी अपेप्राकृत और श्रुतसागरसूरिकृत संस्कृतटीका । क्षित है। धर्मात्माओं और दानियों का लक्ष्य , ५ मूलाचार । आचार्य वट्टकेरकृत मूल इसकी ओर निरन्तर रहना चाहिए। प्राकृत और आचार्य वसुनन्दिकृत संस्कृत १० सेठीजीका छुटकारा । आचारवृत्ति । ६ भाव-संग्रह । श्रीदेवसेनसूरिकृत प्राकृत .
___ समाचारपत्रोंके पाठक यह समाचार कभीके और पं० वामदेवकृत संस्कृत भावसंग्रह।
__ पढ़ चुके होंगे कि आखिर सरकारने सुप्रसिद्ध
पं० अर्जुनलालजी सेठी बी० ए० को छोड़ ७ नीतिवाक्यामृत । पं० सोमदेवकृत मूल
दिया और बिना किसी शर्तके छोड़ दिया। और एक अज्ञातनामा विद्वानकृत संस्कृतटीका ।
अर्थात् जैसा कि पहले सुना गया था कि वे ८ रत्नकरण्डश्रावका चार। मूल और जयपुर न जा सकेंगे, व्याख्यान न दे सकेंगे, प्रभाचन्द्र भट्टारककृत टीकासहित । शिक्षकका काम न कर सकेंगे, आदि शतॊपर
इनमेंसे कई ग्रन्थोंकी कापियाँ हो रही हैं। छोड़े जानेवाले हैं, सो बात अब न रही । अब बनी मानीपाचीन निजी
वे अपनी इच्छानुसार चाहे जो कार्य कर सकेंगे श्यकता है । प्रत्येक ग्रन्थकी जब तक कई की और चाहे जहाँ जा सकेंगे। किसी ताहकी कैद प्रतियाँ न हों तबतक संशोधन और सम्पादन उनके लिए न रहेगी । सम्राट्की राजकीय घोषअच्छा नहीं हो सकता । इस लिए पाठकोंसे "
" णाके अनुसार उन्हें यह मुक्ति मिली है, अतएव प्रार्थना है कि वे इनमें से जो जो ग्रन्थ जहाँ इस तरहकी आशा की भी गई थी कि अब वे जहाँ हो, उनको भेजने और भिजवाने की कला बिना किसी शर्तके ही छोड़े जावेंगे । सरकारकरें । ग्रन्थ सब सावधानीसे रक्खे जावेंगे और के इस कार्यके लिए हम उसे किसी प्रकारका काम हो जानेपर सुरक्षित लौटा दिये जायेंगे। धन्यवाद नहीं दे सकते। क्योंकि उसने राजउनके आने जानेका खर्च भी संस्थासे दिया
कीय घोषणाके उपलक्ष्यमें केवल अपनी एक जायगा।
भूलका संशोधन भर किया है । सेठीजीके साथ
बिना किसी अपराधके वह जो अन्याय कर इन ग्रन्थोंके अतिरिक्त और भी कहीं कोई रही थी, उस अन्यायको ही उसने इस अवसर पर प्रकाशित करने योग्य ग्रन्थ हों तो पाठकोंको इतने समयके बाद, दूर किया है। यह बात
उनकी सूचना भी हमें देते रहना चाहिए। दूसरी है कि हममेंसे बहुतसे लोग अपने एक । ग्रन्थमालाके लिए जो दस हजारका नया नर
. निरापराधी भाईको, ५-६ वर्ष के लम्बे वियोचन्दा लिखा गया है, उसमें से अभी पाँच हजा- गक बाद पाकर, आर उसस प्रसन्न होकर, सररके लगभग ही वसल हआ है। जिन महाश- कारकी इस भूलसंशाधनको भी मोहवश उसकी योंके यहाँसे अभी तक चन्दा नहीं आया है कृपा समझ लेवें। उन्हें अब शीघ्र ही भेज देना चाहिए।
___ सेठीजी बहुत समयके बाद, अगणित कष्ट ग्रन्थमालाका काम इतना बड़ा है और इतने सहन करके, हमसे मिले हैं । हम उनका हृदयसे ग्रन्थ प्रकाशित करनेके लिए पड़े हुए हैं कि इसके स्वागत करते हैं और उन्हें विश्वास दिलाते हैं
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Annanana
अ
जैनहितैषी
[भाग १४ कि जैनसमाजकी जो कुछ अवस्था है, उसके होलीकी बची-खुची गुलाल । अनुसार उसने उनके लिए, जो कुछ वह कर सकता था, किया है। यह बात दूसरी है कि नये सम्पादकजी, इतनी बडी होली हो ली, उसकी शक्ति बहुत थोडी है, उसकी आवाज पर तुमने एक बार भी अपने इस बड़े बूढ़े .
नी बहुत बलन्द नहीं है, राजनीतिक क्षेत्रमें उसकी शा
शास्त्रीको याद नहीं किया । तुम्हारे ये ढंग पैठ भी बहत ही कम है। फिर भी उसने जो कछ अच्छे नहीं। और नहीं तो कमसे कम तीजकिया है उसका मूल्य है। वह अपने किये पर त्योहारको तो अपने गुरुजनोंकी पछताछ कर संतुष्ट नहीं है, यदि वह इससे अधिक कर
लिया करो । दूसरी शिकायत मुझे तुम्हारी
ल सकता, तो अपना सौभाग्य समझता, जो कुछ
तबीयतके बारेमें है। इस तरहकी रूक्ष और वह नहीं कर सका है उसके लिए उसे दुःख भी नीरस तबीयत लेकर सम्पादकी की जा है । परन्तु यह निश्चय है कि उसने इस कार्यमें सकती है, यह मुझे आज ही मालूम हुआ । अपनी शक्तिको छपाया नहीं है। आपके लिए बिना भंग छाने और प्रेमकी तीन अलापे. समउसके हृदय में वडा मान है। समाजके बने झमें ही नहीं आता कि तुम्हारी कलम कैसे चला बच्चेकी जीभ पर आपका नाम है। हजारों करती है । यहाँ तो जब तक भंग भगवतीकी युवक आपको हृदयसे चाहते हैं और उनका आराधना नहीं कर लेता, लिखनेकी तो कौन विश्वास है कि आपको पाकर जैनसमाज - कहे, अच्छी तरह बोल भी नहीं सकता हूँ। उन्नतिके मार्गमें फिर तेजीसे कदम बढ़ायगा।
का और भैया, यदि तुम्हारे पत्रमें महीने भरमें दो
चार भी हँसी मजाककी चुलबुली बातें न रहेंगी - देशको आपसे बड़ी बड़ी आशायें हैं। अब तो उसे पढ़ेगा ही कौन ? लोग ऐसे मूर्ख नहीं आप वह काम कर सकेंगे, जिसके करनेकी हो गये हैं जो गाँठके पैसे खर्च करके तुम्हारी शक्ति इस समय जैनसमाजकी किसी भी व्य- ये पुराने जमानेकी मगज चाट जानेवाली बातें क्तिमें नहीं है। आपने छःवर्षतक कठिन तपस्या पढ़ने के लिए पत्र खरीदें । मेरा तो तुम्हारे पत्रके की है। अब उसकी सिद्धिका समय है। आपका हैडिंग देखकर ही सिर भिन्ना उठता है । यदि नाम इस समय देशव्यापा है। आपके द्वारा सतजुग होता तो इस समय मैं तुम्हें शाप दिये जनसमाज सामाजिक, धार्मिक, और राजनी- विना नहीं छोड़ता । यदि तुम्हें इस बड़े बूढ़ेके तिक आदि सभी क्षेत्रोंमें आशातीत प्रगति कर अनुभवोंसे लाभ उठाना है तो सुनो, इस पागलसकता है।
पनको छोड़ दो और कुछ मतलबकी बातें राजकीय घोषणाके अनुसार महात्मा भगवा- लिखनेका अभ्यास करो । कोरे इतिहासके नदीनजी भी छोड़ दिये गये हैं। हम अपने इस पीछे पड़कर अपना और दूसरोंका मस्तक । बन्धुका भी सादर स्वागत करते हैं।
खाली करनेकी आदत छोड़ दो।
लो, इस समय मैं गहरी छानकर आया हूँ। इस समयकी एक एक बात लाख लाख रुपयेकी होगी। यदि चाहो तो नोट करते जाओ, मौका मिलनेपर प्रकाशित कर देना।
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अङ्क५]
होलीकी बची-खुची गुलाल ।
हाँ लिख चलो । पंचमकालमें सच्ची बात पूड़ियाँ खानेवालोंको जातिसे खारिज नहीं कर कहना पाप है । उसे कोई सुनना भी नहीं दिया । न जाने कहाँसे बीचमें ही एक त्यागी चाहता । “ मिले जुले पंचोंमें रहिए, प्राण जायँ महाशय आ कूदे, और उन्होंने पूड़ियोंके साँची ना कहिए।" जबसे इस शरीरने खरी प्रस्तावको भिक्षामें मांग लिया ! मुझे उनकी सुनाना शुरू किया है तबसे इसे कोई ‘टका पूड़ी-प्रियता पर बड़ी दया आई । बेचारे त्यागी सेर' भी नहीं पूछता । " खरो कहैया दाढ़ी
हो गये; फिर भी पूड़ी-मोहको न त्याग सके । जार । " यह बिलकुल सच है। मेरे 'शास्त्री'
इस पूडी-प्रस्तावके प्रधान पृष्ठपोषक जबलहोनेके विषयमें किसीको तिलतुष मात्र भी सन्देह ।
पुरवाले थे। वे लोग हलवाईके यहाँके खारे सेव नहीं है। फिर भी सिवनीकी 'शास्त्रीयपरि- खाना तो जायज समझते हैं, पर पूड़ियाँ खाना षत् ' का मेरे पास निमंत्रणपत्र भी नहीं आया । नाजायज ! इस पर कोई सुधारक पूछ बैठा यद्यपि मुझे बुलानेमें आर्थिक दृष्टिसे उन्हें कोई कि जब बेसनके खारे सेव खाये जाते हैं हानि नहीं थी, क्योंकि मैं उनपर 'टावलिंग' तब आटेकी पूड़ी खाने में क्या बुराई है? मुझे खर्चका बिल नहीं भेजता । परन्तु शास्त्रीय बड़ा अफसोस हुआ कि जबलपुरियोंसे इसका दृष्टिसे मेरी खरी बातें उनके सारे गडको गोबर कोई माकूल जवाब देते न बना । यदि उनका बना देतीं । मैं शास्त्री लोगोंसे यह कहे बिना शास्त्रीय बुद्धिसे जरा भी परिचय होता तो कभी न रहता कि “तम लोग अव्वल दर्जेके कह देते कि जब चना और गेहूँ दो ज़दा ज़दा आलसी निष्कर्मा और बुद्ध हो, तुमसे प्या अन्न हैं तब उनके खानेके विचारमें भेद होना होने जानेवाला है। क्यों व्यर्थ ही उछल उछल स्वाभाविक है । ब्राह्मणके हाथके स्पर्शसे चनेमें कर बडबडाते हो?" इससे बेचारोंको चल्लू भर
एक ऐसा रासायनिक असर आ जाता है कि पानीमें डूब मरना पडता । मैंने यदि परिषतको उससे उसमें वह दोष नहीं रहता। यदि दोनों सुशोभित किया होता, तो जिस समय पं०
अन्नोंको एक सा मानोगे, तो फिर पुरुषोंके समान बंशीधरजी शास्त्रीको 'जैनसिद्धान्त ' का स्त्रियोंको भी दूसरा ब्याह करना जायज मानना सम्पादकत्व भेट किया जा रहा था उस समय पड़ेगा । क्योंकि स्त्री भी तो मनुष्य ही है! कहता कि 'जैनसिद्धान्त' मासिकके बदले वार्षिक निकाला जाय । क्योंकि जब पं० खूब- मालूम नहीं, अभीकी जबलपुरकी परवारचन्दजी वर्ष भरमें सत्यवादीके दो तीन अंक ही सभामें पूड़ियोंका प्रश्न क्यों नहीं उठाया गया । मुश्किलसे निकाल पाते हैं, तब उनके बड़े भाई पं० पेट-पूजाके प्रश्नको हल किये बिना दूसरे कामोंमें बंशीधरजी निश्चय वर्षमें ही एक निकाल सकेंगे हाथ डालनेके लिए बढ़ना निरी मूर्खता है।
और इसीमें उनकी वयोज्येष्ठताकी शोभा है। " मासिक साप्ताहिक पत्र निकालना मजूरोंका काम है, सुधारकोंका जादू सभापति महाशय पर चल है, शास्त्रियोंका नहीं।
गया । आश्चर्य नहीं जो इन चलते पुर्जीने पूड़ि
योंके प्रश्नको दबा देनेकी रिश्वत लेकर ही उन्हें पारसालकी परवार-महासभामें परवार भाई फिरसे सभापति बनाना स्वीकार किया हो । पूड़ियाँके लिए लड़ मरे थे । इस नये युगकी रामटेकमें ऐसे तो लक्षण दिखते थे कि न सिंघईजी वह सबसे पहली सभा थी जिसमें पेट-पूजाके फिर कभी सभापति बननेका नाम लेंगे और सम्बन्धमें इतनी गहरी छनी । सभापति महा- न लोग उन्हें सभापति बनावेग हो । शयने बहुत गम खाई, जो ब्राह्मणोंके हाथकी
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जैनहितैषी -
[ भाग १४
परवार-महासभाने एक प्रस्ताव वृद्धविवाह के ( त्रुवल्लुव नायनार त्रुकुरल ।
( लेखक - स्वर्गीय बाबू दयाचन्दजी गोयलीय बी० ए० । )
रोकने के लिए पास किया है । प्राय समी जातीय सभाओं में यह प्रस्ताव किया जाता है और उन पर बड़े बड़े जोरोंके व्याख्यान दिये हैं । कुँओंमें ऐसी भाँग पड़ गई है कि कोई भी मस्तकको जरा ठिकाने लाकर यह नहीं सोचता कि इन प्रस्तावोंसे बूढ़े लोग ब्याह के मोहको कैसे छोड़ देंगे ? यदि श्रीगढ़वड़ानन्द शास्त्रीकी ही यह इच्छा हो कि मुझे इस बुढ़ापेमें भी नई दुलहियाके नखरे देखना है, तो उसे रोकनेवाले तुम कौन ? यदि बिरादरी दण्ड देगी तो बन्दा समझेगा कि नई दुलहिया के बापको जब दो हजार दिये हैं, तब बिरादरी भी हजार पाँच सौपानेकी हकदार है। दोकी जगह तीन हजार लगे । और बुढ़ापेमें ब्याह कोई कंगाल तो करता नहीं है, जो बिरादरीके दण्डकी परवाह करे । धनी और मुखिया ही इसके अधिकारी हैं । ऐसे कई जातीय सभाओंके सभापतियोंके ही नाम गिनाये जा सकते हैं जिन्होंने स्वयं इस प्रस्तावको पास किया है और फिर स्त्रीके मरते ही नया ब्याह कर डाला । वृद्ध विवाह रोकनेका यदि कोई उपाय है तो यही कि लड़कियाँ ब्याहके समय तक इतनी सज्ञान बना दी जायँ, वे अपने हित अहितको इतना समझने लगें कि बूढ़ोंसे ब्याह होने
[ जैनहितैषीमें तामिल भाषा के सुप्रसिद्ध महाकवि 3 कुरल का कई वल्लुवर और उनके अमरकाव्य बार उल्लेख किया जा चुका है । यह विक्रम संवत् १०० के लगभग रचा गया था । इसके कर्ताका धर्म क्या था, इस विषय में मतभेद है; परन्तु अधिकांश विद्वानोंने यही निर्णय किया है कि वल्लुवर जैनधर्मके अनुयायी थे । तामिल भाषाभाषियों में इस काव्यका अत्यन्त आदर है । उसके पाठको ब्राह्मण और ब्राह्मणेतर सभी गीताके पाठके समान पुनीत मानते हैं । इसकी पूजा तक की जाती है। मद्रास यूनीवर्सिटी का यह एक पाठ्य ग्रन्थ है । यूरोपकी अंगरेकई भाषाओं में इसके अनुवाद हो चुके हैं । जीमें भी इसके दो तीन अनुवाद हैं । कोई तीन चार वर्ष पहले हमारी इच्छा हुई कि इस अपूर्व काव्यका हिन्दी अनुवाद भी कराया जाय । तदनुसार स्वर्गीय बाबू दयाचन्दजी बी० ए० ने इस काव्यका अनुवाद करना शुरू कर दिया । जहाँतक हम जानते हैं, बाबू साहबने तीन चतुर्थांशसे अधिक अनुवाद तैयार कर लिया था और वे एक तामिल विद्वानकी सहायता से उसका संशोधन कर रहे थे कि अचानक ही उनका स्वर्गवास हो गया । उन्होंने अपने एक पत्रमें मुझे लिखा था कि “ ड ० अँगरेजी अनुवाद बहुत ही भ्रमपूर्ण है, इस लिए मैंने एक मद्रासी विद्वानका किया हुआ दूसरा अंगरेजी अनुवाद मँगा लिया है; साथ ही मुझे यहाँ एक तामिल विद्वानसे परिचय हो गया है जो मूल कुरलके अच्छे जानकार हैं । अब मैंने इन दोनों साधनों की सहायतासे अपने अनुवादका संशोधन करना आरंभ कर दिया है । काम धीरे धीरे होगा, परन्तु अच्छा होगा । " खेद है कि बाबू साहबकी यह इच्छा पूर्ण न हो सकी और हमारा मनोरथ भी मनका रह गया ।
पोपका
मौका आने पर साफ इन्कार कर बैठें और बूढ़ोंसे साफ साफ कह देवें कि अपनी पोती के बराबर लड़की के साथ शादी करनेमें तुम्हें शर्म आनी चाहिए । यदि जी नहीं मानता है, तो किसी अपनी ही उमरकी बुढ़ि याको देख लो । बस, बूढ़ोंकी अकल ठिकाने आ जायगी । इसके सिवाय जिनका एक बार ब्याह हो चुका है, उनको दोबारा कन्या के साथ ब्याह करनेका अधिकार ही नहीं रहना चाहिए । यदि वे ब्याह करना चाहें तो किसी विधवाके साथ करें। पर ये खरी बातें हैं । इन्हें न कोई सुनना चाहता है और न मानना ।
बाबू साहबके स्वर्गवास के बाद जब मैने उक्त अनुवादकी खोजकी तो मालूम हुआ कि उसका बहुतसा अंश नहीं मिलता। न जाने कोई उनके यहाँ से
-श्रीगड़बड़ानन्द शास्त्री ।
१५०
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अङ्क ५ ]
उसे उड़ा ले गया अथवा उन्होंने ही उसे किसीके पास संशोधन आदिके लिए भेजा था । मूल पुस्तकोंका भी कोई पता नहीं चला। हमारे पास जो अनुवाद आया वह प्रारंभ से लेकर ७५ नं० के पद्य तक और फिर ३८१ से लेकर ८९९ तकके पद्योंका है । बीच बीचमेंके भी कई पद्य छूटे हुए हैं। पूर्ण पुस्तकमें २६६० पद्य हैं । अर्थात् बाबू साहबका यह अनुवाद एक चतुर्थांशके लगभग है । अस्तु । जो, बच रहा है उसे ही गनीमत समझकर हम इसे धीरे धीरे जैनहितैषीके पाठकोंकी भेट कर देना चाहते हैं। इसे प्रकाशित करते हुए हमारे सामने यह भावना रहेगी कि स्व० बाबू साहब अब भी अपने प्यारे जैनहितैषी के लिए कुछ न कुछ लिखा करते हैं और इससे हमें बहुत ही सन्तोष होगा ।
कुछ
हम प्रयत्न कर रहे हैं कि इस काव्यका शेष अनुवाद भी किसी विद्वानसे लिखा लिया जाय आर वह पुस्तकाकार प्रकाशित हो । - नाथूराम प्रेमी । ] पहला सर्ग ।
१
स्तुति |
त्रुवल्लुव नायनार त्रुकुरल ।
6
१ - जैसे प्रत्येक वर्णमालाका प्रथम अक्षर अ ' होता है उसी प्रकार संसारकी प्रत्येक वस्तुका आदि ईश्वर है ।
२ - जिस मनुष्य में उसकी विद्या कला व्यर्थ है ।
ईश्वर भक्ति नहीं है,
३ - जिस मनुष्य में ईश्वर भक्ति है उसकी निश्चयसे मुक्ति होगी । ४- जो मनुष्य रागद्वेषरहित ईश्वरकी भक्ति उपासना करेगा, उसे जीवन में कुछ भी कष्ट नहीं होगा ।
५ - जो मनुष्य ईश्वरकी कृपादृष्टिका अभिलाषी रहता है वह अज्ञानजनित शुभाशुभ कर्मों के परिणामसे मुक्त होगा, अर्थात् उसे ज्ञानकी प्राप्ति हो जायगी और ज्ञानकी प्राप्ति होने से वह जन्म मरणके दुःखोंसे छूटकर निर्वाण पद प्राप्त कर लेगा ।
१५१
७ - जो मनुष्य परब्रह्म परमात्मा के चरणारविन्दको नमस्कार नहीं करता है, उसके दुःखोंका कभी अंत नहीं होगा ।
६- जो मनुष्य उस परमात्माके पदका अनुकरण करता है कि जिसने पाँचों इन्द्रियोंका निग्रह कर लिया है वह सदा अजर अमर रहेगा ।
८ - जब तक मुनुष्य दयानिधि परमात्मा के चरण-कमलकी वंदना नहीं करता तब तक धन धान्यादिक संसारिक पदार्थोंसे उसकी लालसा नहीं जाती ।
९ - जो मनुष्य अपना मस्तक अष्टगुणालंकृत परमात्मा के चरण कमल पर नहीं झुकाता है वह उन नेत्रोंके सदृश है कि जिनमें स्वयं अपने आपको देखनेकी शक्ति नहीं है ।
१० - केवल वे ही मनुष्य जन्म-मरण के समुद्र से पार होते हैं कि जो ईश्वरके चरणकी शरण लेते हैं ।
२ -- जलवृष्टिकी महिमा |
१ - संसार में प्राणियों का जीवन सामयिक जलवृष्टि पर निर्भर है, इसी कारण जलवृष्टि उनके लिये अमृतके तुल्य है ।
२ - जलवृष्टि द्वारा मनुष्यको प्रत्येक स्वादिष्ट पदार्थकी प्राप्ति होती है और जल स्वयमेव उसके भोजनका एक मुख्य अंग है ।
३-४- यदि जलवृष्टि न हो तो सम्पूर्ण पृथिवीमें यद्यपि वह समुद्रसे वेष्टित है, दुष्काल फैल जायगा और किसान लोग जमीनको जोतना छोड़ देंगे ।
५- जलसे ही पृथिवीको हानि पहुँचती है और जलसे ही फिर पृथिवीकी रक्षा होती है और जिनको हानि पहुँची थी उन्हें लाभ होता है ।
६ - यदि जलवृष्टि न हो तो हरी घासका एक तिनका भी कहीं नहीं उग सकता ।
७-यदि सूर्य समुद्रजलको सोखता रहे, परंतु वह फिर वृष्टिके रूपमें समुद्र में न आवे अगाध समुद्रका जल भी कम हो जायगा ।
८- यदि जलवृष्टि न हो तो न पृथिवी पर यज्ञ हों, न भोज्य हों, न दान हो, न धन हो और न धर्म हो ।
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१५२
जनहितैषी
[भाग १४
३-मुनियोंकी महिमा। ३०-उसी मनुष्यको ब्राह्मण कहना चाहिए २१-शास्त्रों में उन महापरुषोंकी बडी महिमा जो ब्राह्मणके कार्य करता है । ब्राह्मणका कार्य लिखी है जिन्होंने संसारिक वस्तुओंका सर्वथा
जीव मात्रके प्रति दयाका व्यवहार करना है। त्याग कर दिया है और जो मुनिजीवनका विधि
४-धर्मकी महिमा।
३१-जब धर्मसे इस लोक, परलोक दोनोंका पूर्वक पालन करते हैं।
.... सुख साम्राज्य मिल जाता है तब धर्मसे बढ़कर २२-जिस प्रकार मृतक मनुष्योंकी गणना मनुष्यके लिये कौन वस्तु है। करना असम्मव है उसी प्रकार मुनियाँकी महि- . ३२-धर्मसे बढ़कर कोई लाभ नहीं है और माका वर्णन करना मनुष्य की शक्तिसे बाहर है। धर्मकी विस्मृतिसे बढ़कर कोई हानि नहीं है। ___ २३-जिन महात्माऑन इस संसारको तुच्छ ३३-जिस प्रकार हो सके और जहाँ कहीं नाशवान और असार समझकर सांसारिक सुखों- हो सके मनुष्यको निरंतर यथाशक्ति धर्मकार्य का त्याग कर दिया है और मुनिमार्गको करने चाहिएँ।.. ग्रहण कर लिया है उनका महत्त्व इस लोकमें ३४-अपने हृदयको शुद्ध और निर्दोष सर्वाच्च है।
बनाओ, इसका नाम वास्तवमें धर्म है । इसके २४-जो महानुभाव अपनी इन्द्रियोंको उसी अतिरिक्त और सब केवल आडम्बर है। प्रकार अपने वशमें कर लेते हैं जिस प्रकार ३५-लोभ, द्वेष, क्रोध और दुर्वचन इन चार अकुंश हाथीको बशमें करता है वे स्वर्गभमि- बातोंका त्याग करके मनुष्यको धर्म करना चाहिए। के लिये उत्तम बीज हैं।
३६-अपने मनमें कभी यह बात मत सोचो २५-जिस योद्धाने अपनी पाँचों इन्द्रियों- कि मरते समय धर्म कर लेंगे, अभी क्या जल्दी को निग्रह कर लिया है उसके बलके स्वयं है। किंतु अभीसे धर्म करना प्रारम्भ कर दो। देवाधिदेव साथी हैं।
एक क्षणका भी विलम्ब न करो । क्यों कि
... मरते समय धर्म ही तुम्हारा एक मात्र सहायक ___२६-महापुरुष ही कठिन कार्योंको कर
और साथी होगा। सकते हैं; नचि पुरुषोंसे कठिन कार्य नहीं हो 3७-धर्मका फल वाणिद्वारा प्रकट नहीं सकते । ( कठिन कार्योंसे यहाँ पर तात्पर्य यम, किया जा सकता । इसका ज्ञान तुम्हें पालकीमें नियम, साधन, प्राणायाम इत्यादिसे है । ). बैठे हुए मनुष्य और पालकीको अपने कंधे
२७-जो मनुष्य स्पर्शन, रसना, घाण, पर रखकर दौड़कर लेजानेवाले मनुष्योंके देखचक्षु और श्रोत्र इन पाचों इन्द्रियोंके विषयको नेसे भली भाँति हो सकता है। भली भाँति समझता है और समझकर उनको ३८-यदि तुम अपने जीवन में निरंतर धर्मअपने वशमें रखता है, संसार उसके अधीन हो कार्य करो और एक दिन भी व्यर्थ नष्ट न करो
__ तो तुम पुनरागमनके झंझटसे मुक्त हो जाओगे। ___२८- ऋषियोंके वाक्योंसे उनका महत्त्व ३९-अपनी स्त्रीके साथ रमण करनेमें ही
सुख है । अन्यके साथ रमण करना दुःख और प्रकट होता है।
नाशका कारण है। २९-जिन महर्षियोंने संसारको सर्वथा त्याग .
४०-मनुष्यको केवल धर्मकार्य करना चाहिए दिया है उनका क्रोध इतना तीव्र होता है कि वे और अधर्मसे बचना चाहिए। स्वयमेव क्षणमात्रके लिये भी उसे रोक नहीं सकते।
जाता है।
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हिन्दीके नये और अपूर्व ग्रन्थ । सिंहल विजय।
देशकी सेनाके प्रतिष्ठित सेनापति हो गये। इतना ही सुप्रसिद्ध नाटककार द्विजेन्द्रलाल रायका यह सबसे ।
नहीं ये इंग्लिश, फ्रेंच, पुर्तगीज आदि अनेक भाषा
ओंके और डाक्टरी ज्योतिष, प्राणिशास्त्र आदि सबसे अन्तिम नाटक है। बहुत पुराने समयमें बंगालके
अनेक विज्ञानोंके धुरन्धर पण्डित झेगये। इस पुस्तकमें ए राजकुमारने सिंहल या लंकाको जाकर जीता था
उन्हींका शिक्षाप्रद जीवनात है। मू० ॥) और वहाँ बौद्ध धर्मका प्रचार किया था। इसी ऐति
विधवा कर्तव्य । एक बहुत ही अनुभवी हासिक कथानकको लेकर इस अपूर्व नाटककी रचना
विद्वानने इस पुस्तकको लिखा है। जैनियों और हिन्दुकी गई है। पितृ-प्रेम, पुत्र प्रेम, पति-प्रेम और बन्धु
ओंके प्रत्येक धर्म और पन्थकी विधवाओंका कल्याण प्रेमके इसमें अपूर्व चित्र खींचे गये हैं । रामायणमें
करनेकी इच्छासे यह लिखी गई है। इससे विधवाओंके केवल एक कैकेयी है, परन्तु इसमें आपको दो कैके
असह्य दुःख कम हो जायेंगे, वे घरमें शान्ति रखनेकी, याओं या विमाताओंके दर्शन होंगे। वहाँ केवल एक
बालबच्चोंकी सेवा करनेकी, अच्छी शिक्षा देनेकी, ही पत्नीभक्त पिता है; परन्तु यहाँ पत्नीभक्त पिताके
समाज-सेवा करनेकी, दीन दुखियोंको सहायता पहुँसिवाय एक विपिता भी है। इसकी नायिका लीला
चानेकी इस तरह अनेक प्रकारकी शिक्षायें पावेंगी और प्रतिनायिका कुवेणीका चरित्रचित्रण कविकी एक
और उनका निरर्थक जीवन समाज और देशके अर्थ अपूर्व सष्टि है। इन दोनोंके चरित्र प्रतिदानकी इच्छा लगने लगेगा। इसके उपदेश प्रत्येक विधवाके कानों न रखनेवाले निःस्वार्थ प्रेम और प्रतिदानके लिए तक पहुँचने चाहिए। सधवायें भी इससे बहुत लाभ व्याकुल वासनाविह्वल प्रेमके दो सजीव चित्र हैं। उठा सकती हैं । मूल्य ।) मेवाड़-पतनके समान यह भी विश्वप्रेम और देशभ
देश-दर्शन। ‘क्तिके भावोंसे भरा हुआ है। सुरुचिपूर्ण हास-परिहा.. सकी भी इसमें कमी नहीं है। एक बार पढ़ना शुरू
. अबकी बार मूल्य ३) की जगह २१) कर दिया । करके फिर आप इसे सहजहीमें न छोड़ सकेंगे । स्टज
गया है और सादी पुस्तकका मूल्य और भी कम · पर भी यह सफलतापूर्वक खेला जाता है । द्विजेन्द्र
अर्थात् १॥) है। इस ग्रंथका अधिकाधिक प्रचार . बाबूका यह सबसे बड़ा नाटक है। अभी हालही छप
हो, इसी लिए यह मूल्य घटाया गया है। चित्र पहकर तैयार हुआ है। मूल्य १०), सजिल्दका १ लेकी अपेक्षा दूने हैं, छपाई और बायंडिंग भी सुन्दर प्राकृतिक चिकित्सा । इसमें सब प्रकारके
है। ग्राहकोंको इसके प्रचारका प्रयत्न करना चाहिए। रोग होनेके कारण और उनके बिना कौड़ी पैसेके
देश-दर्शनमें देशकी शोचनीय अवस्थाका रोमांचप्राकृतिक उपाय बतलाये गये हैं। ठंडे पानीके टबमें
कारी दर्शन कराया है । इसके दरिद्रता और दुर्भिक्ष कटि-स्नान करना, मेहन-स्नान करना, बफारा ( वाष्प
सम्बन्धी प्रकरण पढ़नेसे हृदय दहल जाता है। इस स्नान)लेना, कोयलोंकी आँचसे पसीना लेना,धूप-स्नान
देशका दूसरे देशवालोंके साथ व्यापार, रोग, मृत्यु,
उम्र, शिक्षा, आर्थिक अवस्था आदि सभी बातोंमें करना, स्वच्छ जलको अधिक परिमाणमें पीना, लम्बी
संख्यायें देकर मिलान किया है । विवाह-संस्कारका .. साँस लेना, व्यायाम तथा प्राणायाम करना, स्वच्छ वायुका सेवन करना, आदि आदि उपायोंको बड़े
प्रकरण बड़े ही महत्त्वका है। उसमें विवाहका वैदिक छ लॅगसे इसमें बतलाया है। प्रत्येक गृहस्थके घरमें कालसे अबतकका इतिहास दिया है और बतलाया है -रहने योग्य पुस्तक है। मू० )
कि इस विषयमें देशका कितना पतन हो गया है। कर्नल सुरेश विश्वास। सुरेश विश्वास एक भारतके शहरोंकी स्वास्थ्यनाशिनी नारकीय दशा, बंगाली थे। ये छुटपनमें बड़े ही खिलाड़ी. उपद्रवी. वेश्याओंकी वृद्धि, लोगोंके नैतिक चरित्रका अधःपात, उद्धत और अवाध्य लड़के थे। पढ़ने लिखनेकी ओर किसानोंकी कष्टदायक अवस्था, मजदूरोंकी मुसीबतें इनकी जरा भी रुचि नहीं थी। ये घरसे भागकर यूरोप आदि विषयोंका भी अच्छा दिग्दर्शन कराया है। अमेरिका आदि देशोंमें वर्षों घूमते रहे और केवल हिन्दी में अपने ढंगकी एक ही पुस्तक है । माल्थसके स्वावलम्बनके बलसे उन्नति करते करते करते ब्राजिल सिद्ध न्तोको भारतपर अच्छी तरह घटाया है।
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________________ जैनहितैषी / Reg. 719. B. साम्यवाद। जैनग्रन्थ-उद्धारक कार्यालयके युरोपकी वर्तमान अशान्तिका स्वरूप सम तमाम ग्रन्थ / झनेके लिए अपूर्व ग्रन्थ / इसमें भगवान् हमने खरीद लिये हैं, इस लिए जिन भाहमहावीर और बुद्धदेवके समयके प्राचीन साम्यवादसे लेकर अबतकके व्यापारसंघवाद, श्रम योंको चाहिए वे हमसे मँगानेकी कृपा करें:-- जीविसंघवाद, अराजकतावाद, सोशियालिज्म, ऋषिमण्डल मंत्र कल्प ( मंत्र, पूजा बोल्शेविज्म, आदि भिन्न भिन्न प्रकारके साम्य- और साधन-विधिसहित)। दूसरी बारका छपा वादोंका स्वरूप, उनके सिद्धान्त, उनका और हुआ / मू० // ) उनके उत्पादक विद्वानोंका इतिहास, रूसकी। २प्रतिष्ठासारोद्धार पं० आशाधर कृत। भयंकर राज्यक्रान्ति आदि सभी बातोंको विस्तारपूर्वक लिखा है / इस विषयके सभी " संस्कृत और भाषाविधिसहित / इसकी सहायमहत्त्वपूर्ण ग्रन्थों और समाचारोंको पढ़ करके तासे वेदीप्रतिष्ठा बिम्बप्रतिष्ठा आदि सब काम यह ग्रन्थ लिखा गया है। जो लोग यह समझना कराये जा सकते हैं। म० 1 // ) और सजिचाहते हैं कि संसारमें आगे किस प्रकारके राज्य ल्दका 2) स्थापित होंगे और वर्तमानके अमीरों और गरी- 3 महावीरपुराण / भगवान महावीर तीर्थबोंके यद्धका परिणाम क्या होगा, उन्हें यह ग्रन्थ करका जीवन चरित / सकलकातिभद्रारकके अवश्य पढ़ना चाहिए / पृष्ठ संख्या ५००,मू०३) संस्कृतग्रन्थका पं० मनोहरलालजीकृत हिन्दी सगम-चिकित्सा / खाने पीने के नियमांका अनवाद / म० 1 // ) और 1 // ) विधिपूर्वक पालन करनेसे कैसे कैसे रोग आराम हो जाते हैं, यह बात इस अपूर्व पुस्तक पढ़नेसे 4 आलोचनापाठ भाषा, अर्थसहित / मालूम होगी और निरोग रहने के उपाय सूझ मूल्य-) पड़ेंगे। मूल्य दो आना। मैनेजर, जैन-ग्रन्थ-रत्नाकर कार्यालय, मूलाचार / आचार्य बट्टकरका सुप्रसिद्ध हीराबाग, पो. गिरगाव, बम्बई / / ग्रन्थ / मल प्राकृत, संस्कृतच्छाया और भाषाटीका सहित बहुत सन्दरताके साथ हाल ही छपकर तैयार बम्बईका माल / हुआ है / मूल्य लागत मात्र अर्थात् तीन रुपया / बम्बईका सब तरहका माल-कपड़ा, किराना, पाण्डव पुराण / स्टेशनरी, पीतल ताँबा, दबाइयाँ, तेल, साबुन श्रशुभचन्द्राचार्यकृत संस्कृत ग्रन्थका प० आदि-हमसे मँगाइए। माल दस जगह जाच' घनश्यामदासजी न्य यतीर्थकृत नटीन हिन्दी करके बहुत सावधानी और ईमानदारीके साथ। भाष नुवाद / वचनिकामें यह ग्रन्थ पहले पहल पहल भेजा जाता है। चौथाई रुपयेके लगभग पे छपा है / इसे जैनोंका महाभारत समझना भेजना चाहिये / एकबार व्यवहार करके देखिए। चाहिए / मूल्य साढ़े पाँच रुपये / हमारे यहाँ सब जगहके छपे हुए जैनग्रन्थ नन्हेलाल हेमचन्द जैन, कमीशन एजेण्ट, मिलते हैं। चन्दाबाड़ी, पो. गिरगाँव, बम्बई / Printed by Chintaman Sakharam Deole, at the Bombay Vaibhav Press, Servats India Socity's Building, Sandhurst Road, Girgaon, Bombay. Publshed by Nathuram Premi, Proprietor, Jain-Granth-Ratnakar Kargalaya, Hirabag, Bombay.