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________________ जेनहितैषी [ भाग १४ हमारा विश्वास है कि इस दलके मुख्य प्रवर्तक अह तम्मिहु कालगए कुँअरपालेण तम्मयं धरियं । समयसार नाटक आदि ग्रन्थोंके सप्रसिद्ध लेखक जाउँतो बहुमण्णो गुरुव्व तेसिं स सव्वेसिं ॥ १९ ॥ और कवि प० बनारसीदासजी थे। अर्थात्-काल बीतने पर कुंवरपालने उस श्वेताम्बराचार्य महोपाध्याय मेघविजय- मतको धारण किया और तब वह सबका गुरुके गणिने वि० संवत् १७०० के लगभग आग- समान बहुमान्य हो गया। रेमं रहकर 'युक्तिप्रबोध' नामका एक प्राकत बनारसीविलासमें कॅवरपालकी वहुतसी ग्रन्थ स्वोपज्ञ संस्कृतटीकासहित बनाया था। रचनाओंका संग्रह है । ये बनारसीदासजीके यह ग्रन्थ प. बनारसीदासके मतका खण्डन मित्रोंमेंसे थे। मेघविजयजीके कथनसे मालूम करनेके ही उद्देश्यसे बनाया गया है-'वोच्छं होता है कि बनारसीदासका उत्तराधिकारित्व सुयणहितत्थं बाणारसियस्स मयभयं।' इन्हींको प्राप्त हुआ था। आश्चर्य नहीं, जो इसमें जगह जगह इस मतको 'बाणारसीय' या कँवरपाल मेघविजयजीके समयमें वर्तमान हों। 'बनारसीदासका मत कहकर उल्लेख किया पं० बनारसीदासजीकी मृत्यु सं० १६९८ के है। इससे मालूम होता है मेघविजयजीके समय बाद किसी समय हुई है। तक यह तेरहपंथके नामसे प्रसिद्ध नहीं हआ था। पं० बखतरायने अपने बुद्धिविलास नामक बाणारसीयमतका स्वरूप प्रकट करते हुए ग्रन्थमें लिखा है कि तेरहपंथकी उत्पत्ति वि० युक्तिप्रबोधके कर्ता लिखते हैं: सं० १६८३ में हुई । यह और मेघविजयजीका तम्मा दिगंवराणं एए भट्टारगा वि ना पुजा। बतलाया हुआ समय लगभग एक ही है । अतिलतुसमित्तो जेसिं परिग्गहो णेव ते गुरुणो ॥१६॥ र्थात् पं० बखतरामजीका बतलाया हुआ समय अर्थात्-इस मतके अनुसार दिगम्बरोंके भट्टार भी पं० बनारसीदासजीको ही तेरहपन्थका कोंको भी नहीं पूजना चाहिए। जिनके तिलतु प्रवर्तक माननेके लिए बाध्य करता है । घमात्र भी परिग्रह हो वे गरु नहीं हो सकते। ___ आगरेमें इस पन्थका उदय हुआ था, इसी जिणपडिमाणं भूसण-मल्लारुहणाइ अंगपरियरणं। कारण आगरा और उसके समीपके जयपुर वाणारसिओ वारइ दिगम्बरस्सागमाणाए ॥१७॥ आदि नगरोंमें ही इसका विशेष प्रचार हुआ और प्रायः इन्हीं दोनों नगरोंके विद्वानोंकी रचनाअर्थात्-जिन प्रतिमाओंको भूषण पहनाना, ओंसे यह पन्थ देशव्यापी हुआ है । इसके मालार्य आरोहण करना, केसर लगाना आदि सिवाय तेरहपन्थका अभीतक ऐसा कोई ग्रन्थ बोतोंका बाणारसीमतवालाने निषेध किया। नहीं मिला है जो सं० १६८० के पहलेका सिरिविक्कमनरनाहागएहि सोलससएहि वासेहिं। : हो। इससे भी मालूम होता है कि बनारसीदास असि उत्तरेहिं जायं बाणारसिअस्स मयमेयं ॥ १८॥ ही इसके मुख्य प्रवर्तक थे और उन्हींके ' बाणा___ अर्थात-विक्रम संवत १६८० में यह बना- रसीय मत' को पीछेसे किसी समय यह तेरहरसीदासका मत उत्पन्न हुआ। - पंथ नाम प्राप्त हो गया है। १५. बनारसीदासजी अपने समयके बड़े भारी पं० बनारसीदासजीके मुख्य प्रवर्तक होनेपर सधारको हाराह भी उनके पहलेके दिगम्बरी विद्वानों में मठवासिकिया था, उन्हें हम एक स्वतंत्र लेखमें प्रकट करेंगे।- योंके विरुद्ध विचार रहे होंगे। यह संभव है कि -लेखक । उन्होंने इस दिशामें थोड़ा बहुत प्रयत्न भी किया .
SR No.522877
Book TitleJain Hiteshi 1920 01 02 Ank 04 05
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granthratna Karyalay
Publication Year1920
Total Pages60
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jain Hiteshi, & India
File Size9 MB
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