Book Title: Anusandhan 2004 08 SrNo 29
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मोहरिते सच्चवयणस्स पलिमंथू (ठाणंगसुत्त, ५२९) । । अनुसंधान श्री हेमचन्द्राचार्य प्राकृतभाषा अने जैनसाहित्य विषयक संपादन, संशोधन, माहिती वगेरेनी पत्रिका संपादक : विजयशीलचन्द्रसूरि कलिकालसर्वज्ञ श्रीहेमचन्द्राचार्य नवम जन्मशताब्दी स्मृति संस्कार शिक्षणनिधि, अहमदाबाद 2004 Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मोहरिते सच्चवयणस्स पलिमंथू (ठाणंगसुत्त, ५२९ ) 'मुखरता सत्यवचननी विघातक छे' अनुसंधान प्राकृतभाषा अने जैनसाहित्य-विषयक संपादन, संशोधन, माहिती वगेरेनी पत्रिका २९ संपादक: विजयशीलचन्द्रसूरि श्री हेमचन्द्राचार्य कलिकालसर्वज्ञ श्रीहेमचन्द्राचार्य नवम जन्मशताब्दी स्मृति संस्कार शिक्षणनिधि अहमदाबाद ओगस्ट २००४ Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनुसंधान २९ आद्य संपादक : डॉ. हरिवल्लभ भायाणी संपादक : विजयशीलचन्द्रसूरि संपर्क : C/o. अतुल एच. कापडिया A-9, जागृति फ्लेट्स, पालडी महावीर टावर पाछळ अमदावाद-३८०००७ प्रकाशक : कलिकालसर्वज्ञ श्रीहेमचन्द्राचार्य नवम जन्मशताब्दी स्मृति संस्कार शिक्षणनिधि, अहमदाबाद प्राप्तिस्थान : (१) आ. श्रीविजयनेमिसूरि जैन स्वाध्याय मन्दिर १२, भगतबाग, जैननगर, नवा शारदामन्दिर रोड, आणंदजी कल्याणजी पेढीनी बाजुमां, अमदावाद-३८०००७ (२) सरस्वती पुस्तक भंडार ११२, हाथीखाना, रतनपोल, अमदावाद-३८०००१ मूल्य : Rs. 50-00 मुद्रक : क्रिश्ना ग्राफिक्स, किरीट हरजीभाई पटेल ९६६, नारणपुरा जूना गाम, अमदावाद-३८००१३ (फोन : ०७९-२७४९४३९३) Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशकीय जैन जगत्मां अनेक मुनिवरो, साध्वीओ, गृहस्थो तथा विद्वानो द्वारा संकलित-सम्पादित थईने अनेक अनेक पुस्तको के ग्रन्थो प्रकाशित थतां ज रहे छे. झेरोक्स ऑफसेट पद्धतिथी, अनेक पूर्वमुद्रित अने वर्तमाने अलभ्य एवा ग्रन्थोनुं पुनर्मुद्रण पण विपुल प्रमाणमां चाली रह्युं छे. आ प्रवृत्ति अलभ्यने लभ्य बनावनारी होई उपकारक तो अवश्य गणाय. परन्तु खूंचे ते एटलुंज के आ ज ग्रन्थो पर उपलब्ध विविध हस्तप्रतिओनो सहारो लईने, तेनी पाठशुद्धि, पाठान्तर - संकलन वगेरे संस्करण करवामां आवे तो केटली बधी उपादेयता तथा उपकारकता वधी जाय ! आनन्द थाय छे के आ दिशामां जैन मुनिमण्डलमां जागृति आवी रही छे, अने अनेक मुनिवरो आ पद्धतिना सम्पादन - प्रकाशन तरफ वळ्या पण छे अने काम पण करी रह्या छे. आ दिशा सर्वत्र उघडो ! शी. Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १. ऋषभशतक सं. मुनि कल्याणकीर्तिविजय 1 २. श्रीमुनीचन्द्रनाथविरचित पन्नरतिथि सं. विजयशीलचन्द्रसूरि ३. श्री आदिनाथवीनती सं. डो. रसीला कडीआ ४. श्री अंतरीक (अंतरिक्ष ) पार्श्वनाथ छंद सं. डो. रसीला कडीआ ५. जैन कथासाहित्य डॉ. हसु याज्ञिक ६. प्राकृत - अंग्रेजी बृहद् कोष का निर्माण डॉ. नलिनी जोशी ७. चर्चा हसु याज्ञिक / शी. मुनि भुवनचन्द्र ८. विहंगावलोकन ८. माहिती : नवां प्रकाशनो अनुक्रम आवरणचित्र : एक जूना पानां पर चित्रित सुशोभन 23 58 64 74 91 96 109 103 Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पण्डित हेमविजयगणिविरचित ऋषभशतक ___ सं. मुनि कल्याणकीर्तिविजय प्रथमतीर्थंकर श्रीऋषभदेव भगवाननी स्तवनास्वरूपे रचायेखें आ ऋषभशतक काव्यतत्त्व तथा वर्णननी दृष्टिए अनुपम छे । तेना रचयिता, पं. श्रीकमलविजयजी गणिना शिष्य पं. श्रीहेमविजयजी गणि छे । ऐतिहासिक संदर्भमां तेमनो परिचय आ प्रमाणे छे : परंपरा : तपागच्छाधिपति सहस्रावधानी आचार्य श्रीमुनिसुन्दरसूरिना राज्यमां थयेल श्रीलक्ष्मीभद्रगणिनी शाखामां शुभविमल थया । तेमना शिष्य अमरविजय, अने तेमना शिष्य पं. श्रीकमलविजयगणिना शिष्य पं. श्रीहेमविजयगणि थया, जेओ एक उत्तम कवि अने समर्थ ग्रन्थकार हता । काळ : तेमणे रचेली कृतिओना रचनाकाळना आधारे तेमनो समय विक्रमनी १६मी शतीना उत्तरार्धथी प्रारंभी १७मी शतीना पूर्वार्ध सुधीनो होवानुं अनुमानी शकाय छे । तेमनो स्वर्गवास वि.सं. १६८१मां विजयप्रशस्ति महाकाव्यना १६ सर्ग रच्या बाद थयो हतो । साहित्य सर्जन : तेमणे अढळक प्रगल्भ अने उत्तम संस्कृत कृतिओनी रचना करी छे : पार्श्वनाथ चरित्र (सं. १६३२) जिनचतुर्विशति स्तुति (सं. १६५०) (जेमां प्रत्येक स्तुतिनां ५-५ पद्य छे, अने ४-४ श्लोकना २४ कमलबन्ध छ; जेमा १६ चरणना आद्य अक्षर भेगा करवाथी विविध गुरुभगवंतोनां नाम बने छ।) ऋषभ शतक (सं. १६५६) कथारत्नाकर (सं. १६५७) विजयप्रशस्ति-महाकाव्य (सं. १६८१)(आ काव्यना १६ सर्गो रची १. 'जैन साहित्यनो संक्षिप्त इतिहास' तथा 'जैन संस्कृत साहित्यनो इतिहास'ना आधारे । Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनुसंधान-२९ तेओ स्वर्गस्थ थया हता, शेष ५ सर्ग तथा समग्र काव्यनी टीका तेमना गुरुभाई वाचक विद्याविजयना शिष्य वाचक गुणविजये रचेली छे । आ काव्यमां मुख्यत्वे विजय सेनसूरि महाराजनुं ऐतिहासिक जीवनवृत्त तेमणे आलेख्युं छे । कहे छे के-आ काव्य रघुवंशनी बरोबरी करी शके तेवू छ।) आ सिवाय पण तेमणे अन्योक्तिमुक्तामहोदधि, कीर्तिकल्लोलिनी, सूक्तरत्नावली, सद्भाव शतक, स्तुति त्रिदशतरङ्गिणी, कस्तूरीप्रकर, विजयस्तुति व. कृतिओ तथा सेंकडो स्तोत्रो रच्यां छे । गुजरातीमां पण तेमणे घणी रचनाओ करी हशे ते तेमणे रचेल कमलविजयरास, समता सज्झाय (जुओ अनुसन्धान - २४) व. परथी जणाई आवे छे । तेमनी प्रतिभा तथा विद्वत्ताथी अंजायेला वाचक गुणविजयजी तेमनी प्रशस्ति करतां कहे छे : "ते सुकवि हेमविजयनुं वाग्लालित्य हेमसूरि जेवं हतुं, अने तेमने देव-गुरुने विशे अत्यन्त भक्ति हती । वळी, तेमनी कवितारूपी कान्ता कोने आश्चर्य पमाडती नथी- के जेणे रज विना पण यशरूपी पुत्रने जन्म आप्यो?" ___ कृतिपरिचय : प्रस्तुत कृतिमां कर्ताए तेना नामने अनुरूप ज श्री ऋषभदेव भगवाननी स्तुति करी छ । आ कृति श्रीजम्बूनाग मुनि विरचित जिनशतक (प्रायः सं. १०२५)नी अनुकृति स्वरूप छे । जिनशतकमां स्रग्धरा छन्दमां सो (१००) पद्यो छे, जेमा २५-२५ श्लोकोना चार परिच्छेदो छ । प्रत्येकमां अनुक्रमे जिनेश्वर भगवंतना चरण-हस्त-वदन तथा वाणीनुं विविध अलंकारोथी अलंकृत वर्णन जम्बू मुनि ए कर्यु छे । (जुओ काव्यमाला, गुच्छ-७) आ जिनशतकने सामे राखीने ज जाणे हेमविजयजीए शार्दूलविक्रीडित छन्दमां सो श्लोको रच्या छे । अहीं पण २५-२५ श्लोकोना चार परिच्छेद छ । परंतु तेमणे तद्दन जुदा विषयो लईने ते परिच्छेदो रच्या छे । ते छे अनुक्रमे १. जुओ विजयप्रशस्ति महाकाव्यनी टीकामां करेली प्रशस्ति ।। Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 १. भगवान- लांछन वृषभ, २. भगवाननी बे पत्नीओ-सुनन्दा तथा सुमंगला, ३. भगवाने दीक्षा वखते लोच करती वेळा इन्द्रनी विनंतिथी राखेली केशजटा, तथा ४. भगवानना वार्षिक तपर्नु श्रेयांस द्वारा इक्षुरस वडे थएल पारणुं । आ चारेय विषयो तेमणे भगवानना जीवनक्रमानुसार ज गोठव्या छ । जेमके, भगवान जन्म्या त्यारथी ज तेमना शरीर पर वृषभ, लांछन हतुं, त्यार बाद यौवनवयमां सुनन्दा-सुमंगला साथे तेमनो विवाह थयो, पछी दीक्षा लेती वखते लोच करतां रहेवा दीधेल केशनी जटा, अने पछी एक वर्षना निर्जळा तप बाद श्रेयांसकुमारे इक्षुरसथी करावेलुं पारणुं । परमार्हत कवि धनपाले ऋषभपंचाशिका तथा 'ते धन्ना जेहिं दिट्ठो सि'- ए ध्रुव पदवाळी ऋषभस्तवना (अनुसन्धान-२४)मां ऋषभदेव प्रभुनी अत्यन्त माधुर्य अने प्रसन्नता भरेली तथा अनेक नवी उपमाओ अने कल्पनाओथी छलकाती भावभीनी स्तवना करी छे । ज्यारे अहीं तो कवि मात्र चार ज विषयोने लक्ष्यमा राखी विविध कल्पनाओ तथा अलंकारोथी परिपूर्ण स्तवना करी रह्या छे जे वांचतां ज हृदय तरबतर थई जाय छ । __प्रत्येक विषयनां उदाहरण जोईए । १. (प्रथम परिच्छेद - पद्य ५) वृषभलांछनवर्णन (१) बुद्धिमान पुरुषोना हृदयरूपी गोचरमां चरती, उल्लसित चरण तथा उत्तम रसयुक्त, भगवाननी गौ-वाणीए ज मने अत्यन्त पुष्ट कर्यो छे; माटे ते भगवाननी सेवा करवाथी ज हुं कृतज्ञोमां अग्रणी गणाईश, एवं विचारीने वृषभे लांछनना मिषे जेमनो आश्रय लीधो ते जिनने अमे स्तवीए छीए । (२) (पद्य २०) आ भगवाने पोतानी गतिथी हंस-ऋषभ तथा गजने जीती लीधा । तेथी हारेला त्रणमांथी प्रथम-हंस देवलोकमां चाल्यो गयो, अने अन्तिम-गज वनभूमिमां जतो रह्यो; ज्यारे वचला वृषभे-महापुरुषोनो कोप प्रणाम करीए (नहि) त्यां सुधी ज रहे छे - एवं विचारी लांछनना व्याजे जेमनां चरणोनो आश्रय कर्यो ते जिनपति तमारी सम्पत्तिने पुष्ट करो। For Private.& Personal Use only . Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनुसंधान-२९ २. (द्वितीय परिच्छेद - पद्य-११) कन्याद्वयविवाहवर्णन (१) अश्विनीकुमारोए भगवाननी त्रिभुवनथी पण चढियाता गुणवाळी गाढ रूपश्रीथी पराभव पामीने उपदा (भेटणां) रूपे पोतानी बे बहेनो (भगवानने) भेट धरी । (त्यारे) जेमणे बन्नेना प्रतीक स्वरूप, अनन्यसदृश बे कन्याओगें पाणिग्रहण कर्यु तेवा, अनेक नरेन्द्रोथी वन्दित जिनने अमे वंदीए छीए । . (२) (पद्य-१५) पशुपतिने गंगा अने गौरी एम बे प्रियाओ छे, (ते ज रीते) सूर्यने छाया अने छवि (प्रभा), विष्णुने श्री तथा गोपी अने कामदेवने रति तथा प्रीति(एम बब्बे पत्नीओ छे); आ रीते बधा देवोनो बे (पत्नी)नो मत, तेओमां (देवोमां) वर्तता मारे माटे पण योग्य छे एम विचारी जेमणे बे स्त्रीओ साथे लग्न करू, ते प्रभु लक्ष्मी माटे थाओ । ३. (तृतीय परिच्छेद-पद्य ४) जटावर्णन (१) हे महाव्रतिन् ! तुं मारा भाई (यम)नो निर्दयतापूर्वक नाश करवा माटे उत्सुक न था- एवी विज्ञप्ति करवानी इच्छावाळी कालिन्दी (यमुना) ज जाणे भगवानना कर्ण पासे न आवी होय ! तेवी जेमना कर्णमूलमां लटकती केशराजी शोभी रही ते भगवान तमने चिरकाळ सुधी श्री माटे थाओ । (२) (पद्य १२) हृदयरूपी कुण्डमां रहेलां शीतलकिरणोथी धवल ध्यानामृतने रक्षवानी इच्छाथी जाणे ब्रह्माए श्यामल सर्प (रक्षक तरीके) मूक्यो होय एवा, जेमनी भुजा पर विलसता अतसीना पुष्पतुल्य केशसमूहे सौभाग्यने धारण कर्यु ते भगवान सत्पुरुषोनी आबादी माटे थाओ । ४. (चतुर्थ परिच्छेद - पद्य ५) इक्षुरसपारणवर्णन (१) भगवान राजाओमां प्रथम, व्रतधारीओमां प्रथम, तेमज अरिहंतोमा प्रथम छे, (तेमना) उग्र तप, आ पहेलुं पारणुं छे; अने सर्वरसोमां इक्षुरस ज प्रथम (श्रेष्ठ) रस छे, तो भगवानने तेनाथी ज शुभ भोजन थशेएवी बुद्धिथी श्रेयांसे धरेलो इक्षुरस जेमणे पीधो ते जिनने अमे स्तवीए छीए। Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 (२) (पद्य २१) जेनी वृद्धि विषमां छे, जेनी जन्मस्थिति विषनी साथे छे, जेनी सत्ता विषगृहमां छे, जे विषधरोथी वीटळायेलुं छे अने जे वळी नामथी अमृत (तरीके) थयुं (कहेवायुं) तेवा स्वर्गना भोजनरूप (अमृत)थी आ यतिने शुं ? एवं विचारीने श्रेयांसे रसथी आपेलो इक्षुरस जेमणे धारण कर्यो (स्वीकार्यो) ते तमारा कल्याण माटे हो । आवी अनेक कल्पनाओ तथा उत्प्रेक्षाओ कविए आ शतकमां भरी दीधी छे जेनो रसास्वाद तो वांचवाथी ज माणी शकाशे । रचनास्थळ-संवत् आ कृतिनी रचना सं. १६५६मा स्तम्भतीर्थ (खंभात)मां थई छे, अने तेनुं संशोधन पं. श्रीलाभविजयगणिए करेलुं छे । प्रतिपरिचय : आ. श्री योगतिलकसूरिजी द्वारा प्राप्त थयेल, राधनपुरना सागरगच्छ जैन पेढीना भंडारनी डा.६/६३ क्रमांकनी हस्तप्रतनी झेरोक्ष नकल परथी आ कृतिनुं सम्पादन करवामां आव्युं छे । प्रतिनुं लेखन अकबरपुर (खंभात)मां थयेलुं छे । आ प्रति मूळ प्रतिनो प्रथमादर्श होय तेवू प्रान्ते लखेल पुष्पिकाथी जणाय छे । अने जो ते साचुं होय तो आश्चर्य ए वातनुं छे के आ प्रतिना लेखनमां थोडी अशुद्धिओ तो रहीज छे, साथे केटलांक अक्षरो । पदो । पंक्तिओ पण छूटी गयां छे ! ते सिवाय पण झेरोक्षमां केटलेक स्थळे अक्षरोनी छाप बराबर न उठी होवाथी ते उकेलवामां मुश्केली थई छे । ते छतां केटलांक स्थानो / अशुद्धिओ पू.गुरुभगवंतनी सहायथी उकेल्यां छे, परंतु थोडां स्थानो अणउकल्यां रही गया छे, ते सुज्ञ वाचकोने उकले तो जणाववा विनंति । प्रतिना अक्षर सुन्दर छे, प्रत्येक पृष्ठमां प्राय: १३ पंक्ति छे अने छेल्ला (८/२)पृष्ठमां १२ पंक्तिओ छे । कृतिनुं ग्रन्थाग्र २५० श्लोक प्रमाण छ । ऋषभशतकम् ॥६०॥ , नमः सिद्धम् ॥ स्वस्ति श्रीमति यत्र मित्रमहसि प्राप्ते दृशोरध्वनि, स्निग्धाब्जैररिकैरवैश्च युगपल्लेभे प्रमोदोद्गमः । Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तं विश्वत्रयचित्तचातकचयप्रह्लादने तोयदं श्रीमन्नाभिनराधिराजतनयं कुर्मो मनोवर्त्मनि ॥१॥ पात्रं पुष्टिपटुः पथः पथयिता प्राधान्यहेतुः प्रभुविश्वेऽस्मिन्नयमेव देवतिलको जज्ञे ममाऽहर्निशम् । यं भेजेऽङ्कमिषाद् वृषः शुभगतिर्मत्वेति सल्लक्षणं ध्यायामस्तमशेषदोषविमुखं नित्यं जिनाधीश्वरम् ||२|| पावित्र्येण कटिश्रिया विभुतया वर्यार्जवेणो (णा ) ऽपि यजिग्येऽहं विभुनाऽमुनाऽतिबलिना मत्वेति चिह्नच्छलात् । यं गौगौरव (गौर्गौरव) वानन्यगतिकः शिश्राय विश्वाधिपं दध्मः पद्ममिवाऽलिनः प्रणयिनस्तं तीर्थनाथं हृदि ||३|| अस्मिन् गर्भमुपेयुषि प्रथमतो दृष्टोऽहमस्याऽम्बया लक्ष्मीमेष मयैव विश्वविदितां धत्ते व (च) धन्योद्धुरः । अङ्केऽप्येष बिर्भात शस्तकमले मामेव देवोत्तमः सेवा मेऽस्य घटेत यं वृष इति ध्यात्वाऽऽश्रितस्तं स्तुवे ॥४॥ कुर्वत्या चरणं लसच्चरणया हृद्गोचरे धीमतां निन्ये पुष्टिमहं महस्विरसया गाढं गवास्यप्रभोः । अनुसंधान - २९ तेनाऽमुष्य निषेवणादहमदो भावी कृतज्ञाग्रणीर्ध्यात्वेत्थं भजति स्म लाञ्छनमिषाद् यं गौः स्तुमस्तं जिनम् ॥५॥ शश्वत्संश्रितसर्वमङ्गलमभूद् गात्रं च शक्ति शुभा मन्युध्वंसविधायिनीय नितमां भालं दलाब्जाद्भुतम् । ऐश्वर्यं गुरु यस्य विश्वविदितं तस्यैव पादाब्जयोः स्थाने मत्स्थितिरित्यकाममभजद् यं गौः स वः श्रेयसे ॥६॥ अस्मादस्मयचित्तवृत्तिसुभगात् सञ्जानया यद्गवा यच्छन्त्या रसमुज्ज्वलं प्रजनितः प्रौढप्रभावानहम् । किं तत् सूत्रितसर्वसम्मदमहं मुञ्चामि मातामहं यस्याऽङ्कं न जहौ वृषः सुखसखं मत्वेति सोऽस्तु श्रिये ||७|| Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 ग्रामान्तवि (नि) वसन्तमत्र मनुजास्तन्वन्ति सांवाहिनं त्र (त्रा) सं यच्छति सिंहिकातनुरुहो नान्ते वनान्तेऽपि मे । त्रासाद् मद्गतिरेष एव भगवान् भर्ताऽयमाद्यश्च मे मत्वेत्यङ्कमिषाद् यमीशमभजद् गौर्गौरवायाऽस्तु सः ॥८॥ ध्वस्ता मत्पतयः समेऽपि तरसाऽमुष्य प्रतापव्रजैः सर्वे मत्पतयो नमन्त्यमुमयं मत्स्वामिनां वाऽग्रणीः । विश्वेऽस्मिन् मम विश्वसंस्तुतमतेस्तद्दास्यमस्योचितं गौर्यत्पादयुगं श्रितोऽङ्कमिषतो मत्वेति वः पातु सः ||९|| स्वः शास्तीव धनं घनं तनुभृतामेनं घनच्छायया संछत्रः पटुपल्लवैः परिवृतो दास्यत्यसावादितः । एवं ज्ञापयितुं किमम्बुजभुवाऽमुष्यैकचिह्नच्छलादङ्केऽकारि वृषः श्रियं स तनुतां देवः सतां ज्ञानभूः ॥१०॥ स्त्री-स्तम्बेरम-कानन- द्रुम- नदी - भोज्याधिपा अप्सरःशुभ्रानेकप-नन्द [न] र्तुमहिरुड् गङ्गा-सुधा शक्रताम् । प्रापुर्यस्य पुरः स्थितास्त्रिजगतीनाथस्य तत् सोऽङ्कगोऽमुष्यैवाऽर्हति गां न्यधाद् विधिरतो यत्पादयोः सश्रिये ॥ ११ ॥ हन्यादूर्जितमार्यवृत्तविमुखं नेतैतदङ्कः स्मरं वैराग्याम्बुजपुञ्जभञ्जनकरी (रो) घात्योऽस्त्यथी (थो) मेऽपि सः । मत्वैवं भगवान् वृषं वरगतिर्योऽङ्के दधावात्मनस्तं संसारविकारवारिजविधुं वन्दामहे श्रीजिनम् ॥१२॥ आबाल्यादपि गोरसैः प्रियरसैः सन्तुष्टचित्तस्य मे । स्थातुं हीमुचि नोचितं च्युतधियां वृन्दे पशूनां ध्रुवम् । चक्रे यत्पदयोरुपास्तिमृषभो मत्वैवमङ्कच्छलात् तं छायासुभगं महीरुहमिवाऽध्वन्यः श्रये श्रीजिनम् ॥ १३ ॥ प्रोच्चैश्चित्तचमत्करी म[म] गति: सम्पत्तिहेतुर्नृणां बाल्यादप्यमुना बलेन सहजस्याऽप्याददे स्वामिना । 7 Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनुसंधान-२९ स्थानं निर्गतिकस्य मेऽयमुचितो विश्वत्रयीनायकस्तस्थौ यत्क्रमयोवृषोऽङ्कमिषतो ध्यात्वेति वः सोऽवतात् ॥१४॥ गौरस्यैव ममोपभोगसुभगा पुष्णात्यसावेव मां भूयोभिश्चरणैः स्थिती रसवरे हगोचरस्यैव मे । ध्यात्वैवं गतपङ्कमङ्कमभजन्नित्यं यदीयं वृषः पाथोराशिरिवैष रातु भवभीमुक्तः श्रियं मौक्तिकीम् ॥१५॥ यो(या) जाड्याम्बुजभञ्जने द्विपवधूौरस्य विश्वेशितुः सैवैनं जननीव शावमनिशं पुष्णाति पुण्याकृतिः । तेनाऽत्रैव वृषोऽयमु[च्च]सुगतिश्चिह्नच्छलादच्छलं यत्पादौ सृजतेति वारिजभुवा ध्यातं स्तुमस्तं जिनम् ॥१६।। विष्णोर्नीरधिनन्दनी कुमुदिनी नित्यं तुषारत्विषः पौलोमी च बिडौजसः कमलिनी भूच्छायविध्वंसिनः । युक्तोमाऽपि तथा प्रिया वृषधरस्यैवेति तद्वल्लभं यं चक्रे वृषलाञ्छनं जलजभूर्नाथः स वोऽस्तु श्रिये ॥१७॥ लोकेऽहं शिशुनाऽमुना प्रकटितो यूनाऽप्यहं पालितो वृद्धि वार्धकधारिणाऽतिशयतः संप्रापितः सर्वदा । तेन स्यामनृणोऽहमस्य चरणोपास्त्येति जानन् वृषो यत्पादाम्बुजयुग्ममङ्कमिषतो भेजे भजे तं जिनम् ॥१८॥ गोपालस्य गवां द्रुतं दशशती यत्तुण्डकुण्डोद्भवं रम्यं गोरसमत्ति दृगजमहसांमित्रं पिबत्यन्वहम् । तेनैतत्पदयोर्मम स्थितवतो भावी स्वकैः सङ्गमो मत्वा गौरिति यत्क्रमेऽङ्कमिषतस्तस्थौ तमीशं स्तुमः ॥१९॥ [गत्या] येन जिता गतिप्रतिभटा हंसर्षभानेकपास्तन्मध्यात् प्रथमोऽगमत् सुरगृहं वन्यावनीं चाऽन्तिमः । कोप: स्यान्महतां प्रणत्यवधिको मत्वेति मध्योऽश्रयद यत्पादौ ध्वजदम्भतः स जिनपः पुष्णातु वः सम्पदम् ॥२०॥ Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 श्लाघाहेतुमुषापतेर्ध्वजमुमाभर्तुश्च लात्वा बलादेणं चाक्ष(क्षि)णि लाञ्छने च वृषभं बिभ्रद् भृशं हारिणि । स्वस्वाङ्के स्पृहया कलानिधिमहाव्रत्याश्रितो यो बभौ तद्वाग् देवगवा[क्ष]चारुचरणा दिश्यात् सतां गोरसम् ॥२१॥ यः स्वामी वृषवानपि प्रतिदिनं नोच्चैः सुरासक्तिमान् नो मातङ्गसखो बभूव भुवने नाऽपि द्वि[जि] ह्वाश्रयः । इत्याकारसतत्त्वजोऽजनि महान् भेदः सतां निन्दितो यस्मिन् सत्यपि चित्रहेतुमहिमा सार्वः स वः श्रेयसे ॥२२॥ आसंसारमिदं स्वयं विदधतः पाथोजयोनेर्जगज्जात: सच्चरणोऽयमेव भगवान् श्रीनाभिराजाङ्गजः । तन्मां पोषयितैष एव मतिमान् मत्वेति यत्पादयोश्चके चिह्नमिषाद् वृषः सुखमनाः सेवां स दिश्याच्छ्रियम् ॥२३॥ मीनेनेव पयोधिजातनुरुहो दम्भोलिनेवाऽद्रिभिद् दैत्यारातिरिव द्विजिह्वरिपुणा केकावतेवाऽग्निभूः । यः शोभां बिभरांबरांबभूव (बिभराम्बभूव) भगवाञ् शश्वद् वृषेणाऽद्भुतां देयाच्छर्म सतां स देवतिलकस्तोयं तडित्वानिव ॥२४॥ शश्वद् यस्य मुखे वृषस्थितिरभूत् पाश्र्वं वृषोपासितं श्रेयःश्रीशरणं च चारुचरणद्वन्द्वं वृषेणाऽद्भुतम् । इत्थं यस्त्रिजगतीपतिवृषमयो रेजे गुणानां निधिः म्नं(तं) चेतस्यनघं वहेम विजयश्रीहृद्यमाद्यं जिनम् ॥२५॥ श्रीऋषभशतकसरसी-विविधालङ्कारकमलपरिकलिता । श्रीलाभविजयपण्डितमतिशरदा निर्मला जयति ॥२६॥ ॥ इति पण्डितश्रीकमलविजयगणिशिष्यभुजिष्य-पं. हेमविजयविचारचिते (विरचिते) श्रीऋषभजिनशतके ऋषभलाञ्छनवर्णनो नाम प्रथमः स्तवः सम्पूर्णः छ।।१॥छ।। Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 10. अनुसंधान-२९ स्वस्तिश्रीव्रजराजिनिर्जरवधूवृन्दैरमन्दादरैरुद्गीते गतिरान्तरा भवतु मे श्रीनाभिराजात्मजे । सङ्गं स्वर्गि(ग)तरङ्गिणीयमुनयो थो यथा पाथसां यः पाणिग्रहणं विरचयत् रेजे द्वयोः कन्ययोः ॥१॥ एकस्मिन् ह्युभयोस्तु वस्तुनि मनोरोधे विरोधे स्थितिः स्यादेवाऽञ्जनजालशालि वहतोः श्यामत्वमन्तमिथः । मा भूदेकमृगीदृगीक्षणसुखान्मन्नेत्रयोस्तत्कलिः ढे ऊढे युगपज्जिनेन युवती येनेति वः पातु सः ॥२॥ विश्वं विश्वसृजः सुखेन सृजतो विश्वत्रयं यो नृणां रत्नं चाऽत्र सुमङ्गला बलिगृहस्त्रीणां सुनन्दा पुनः । स्वःस्त्रीणां तदधीशदत्तमिव यस्तत् पर्यणैषीत् तयोद्वन्द्वं सन्निभमात्मनः स भगवान् भूयाद् विभूत्यै सताम् ॥३॥ आवाभ्यां मुमुचे रि(चि)रन्तनतरक्रोधाविरो(?) मिथः स्वामिस्त्वामधिगम्य सिद्धिसदनं शान्तं रिपुभ्यामपि । तन्नौ स्वीकुरु यो रमां गिरमपि स्त्रीयुग्मदम्भात् प्रभुः(भु)स्ते द्वे ज... इवोदुवाह भगवान् श्रेयः श्रिये सोऽस्तु वः ॥४|| याम्योदक्ककुभोर्गतिं कृतवता ये अजिते ऊजिते सम्पत्ती रविणो(णा)ऽतितीव्रमहसं यस्य प्रतापप्रथाम् । बाढं सोढुमशक्तिना जलजदृग्युग्मच्छलाद् ढौकिते ऊढे प्रौढपराक्रमेण विभुना ते येन सोऽस्तु श्रिये ॥५॥ सत्पक्षः कमलाकरप्रणयिधीः शश्वद् विधिप्रीतिभूः श्रीमन्मानसवाससङ्गतिरतो यद् राजहंसोऽभवम् । स्याद् द्वाभ्यां रहितस्य मे न तु कथं तत्पक्षि(क्ष)तिभ्यां गतिर्येन स्त्रीद्वयदम्भतो भगवता ते स्वीकृते स श्रिये ॥६।। छायाकान्तिपतिः पितेव यमुनाभ्रातुर्निशाकौमुदीयुक्तश्चन्द्र इवाऽतिसुन्दररसाधीशप्रमोदप्रदः । Page #16 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 स्मेराक्षीयुगलेन मञ्जुलमभात् पाणौ गृहीतेन यस्तं निःशेषविशेषविद्वरगवीगेयं स्तुवेऽहं जिनम् ||७|| सर्वज्ञं नरकच्छिदं च हृदये विज्ञाय वामाद्वयव्याजाद् विश्वविलोचनालिनलिनी ह्लादैकहेलिच्छवी । सोल्लासं श्रयतः स्म शैलतनया पाथोधिपुत्री च यं पुण्यः पुण्यपथप्रकाशनपटुर्भूयात् स वः प्रीतये ॥८॥ ऐश्वर्यं वृषभध्वजत्वमननघं (मनघं ) यस्मिन्नवेक्ष्य प्रभौ नष्टे स्वामिनि चित्तजन्मनि रति- प्रीती तदेणीक्षणे । नित्यं निर्गतिके इव प्रणयिनं यं चक्रतुः स्त्रीद्वय - व्याजाद् विश्ववनप्रसूनसमयः पुष्णातु पुण्यं स वः ॥९॥ स्नेहाढ्ये सुदृशे अनश्वरमहे सत्पात्रिके दीपिके जाते ये सुदृशौ विधेर्विदधतो विश्वातिते (गे) एव यः । गृह्णाति स्म करेण दर्शनधिया सत्कर्मधर्माध्वनोः श्रीमन्तः प्रथयन्तु पुण्यपटवः पादास्तदीयाः शिवम् ॥१०॥ दस्त्राभ्यां भुवनातिशायिगुणया रूपश्रिया सान्द्रया ध्वस्ताभ्यामुपढौकिते उपदया [ तत्] स्वस्वसाराविव । यो जग्राह करेण तत्प्रतिनिधी कन्ये उभे निर्निभे नम्रानेकनरेन्द्रवन्दितपदं वन्दामहे तं जिनम् ॥११॥ ऊर्ध्वाधः ककुभोः प्रतापपटलैराकान्तयोर्भीततद्भर्तृभ्यामुपढौकिते इव निज (जा) स्थानश्रियां मण्डने । [ लि? ] प्राभृतके प्रभुः प्रणयवान् पाणौगृहीते उभे यश्च सुचिरं चिनोतु रुचिरां चारित्रचर्यां स वः ॥१२॥ आद्यस्तीर्थकृतां तथा क्षितिभृतां भावी समेषामयं विश्वेऽस्मिन्निति तच्छ्रियोः प्रतिभुवौ मत्वेव कन्ये उभे । यः पूज्यैः परिणायितः किल रति- प्रीती इव श्रीसुतः श्रीमान्नाभिसुतः प्रयच्छतु स वः पद्मामुदन्वानिव ॥ १३ ॥ 11 Page #17 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 12 अनुसंधान-२९ स्यात् पित्रोर्युगपत् पवित्रपदयो पुण्यपुण्यात्मनोः कर्तुं भक्तिमलं विलम्बरहितां नैका स्नुषा जातुचित् । ध्यात्वैवं परिणीतवान् विनयवांस्तत्कर्ममर्मक्षमे यो द्वे पद्मविलोचने अवतु वस्तापादिवेन्दुर्भवात् ॥१४॥ द्वे गङ्गागिरिजे प्रिये पशुपतेश्छायाछवी भास्वतः श्रीगोप्यौ च तमोरिपोरपि रति-प्रीती च चेतोभुवः । यो द्वैवं(धं?) मरुतां मतः समुचितस्तद्वर्तिनः मेऽपि स ध्यात्वैवं परिणीतवान् प्रभुरुभे यः मुत्तुवो(सुभ्रुवौ) स श्रिये ॥१५॥ एकामेव हि युग्मजातमनुजास्तन्वन्ति तन्वी ध्रुवं पूर्वेषां प्रथमः क्रमः क्रमजुषोऽप्येष ध्रुवं मूलतः । उच्छेद्योऽस्ति ममेति योऽत्र तदभिज्ञानाय सद्ज्ञानवान् कान्ते द्वे परिणीतवान् स कुरुतां कैवल्यकेली(लिं) सताम् ॥१६॥ नाऽऽप्ता: पङ्क्तिविभेदिनः स्युरिति यो भोगार्थमभ्यर्थितः स्वःस्त्रीभिर्वृसुधाभृतां युवतिभिश्चाऽनेकशो वाग्भरैः । कामोर्वीरुहवारिवाहसदृशो द्वे सुध्रुवी वू(व्यू)ढवांस्तासां तुष्टिकृते पृथक् पृथगसौ स्वामी श्रिये वः सदा ॥१७॥ लोकेशत्वगभीरताजितसरोजन्मासनाम्भोनिधिक्ष्मापाभ्यां स्वसुते उपायनकृते साक्षादिव प्रेषिते । यो दोर्दण्डमखण्डचण्डमहसं बिभ्रद् भ[ ]भासुरः कन्ये द्वे परिणीतवान् प्रथयतु श्रेयांसि भूयांसि सः ॥१८॥ आसीदग्निवृषो धृतामृतरुचिः साक्षादसावीश्वरस्तेनोमा च सरस्वती च मरुतामस्यैव यक्ते प्रिये । . सञ्चिन्त्येति विरञ्चिनोभयवधूव्याजात् तयोर्दत्तयोः पाणि पीडयति स्म योऽस्तु पुरुषापीडः स पीडापहः ॥१९॥ एकां मां रमणीमनन्यगतिकामन्यां च सिन्धोः सुतां दत्ते नाभिनराधिपेन गुरुणा बाल्येऽपि भुञ्जन् प्रभुः । Page #18 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 13 स्पर्धामाश्रितया सहात्मपतिना यः पर्यणैषीत् स्त्रियौ द्वे मात्राऽपि समर्पिते इव युवा वः पातु सोऽर्हद्गुरुः ॥२०॥ यं चेन्दुं च विचिन्त्य चेतसि चिरं जैवातृकत्वात् समौ ब्राम्यौ तत्कृतये विधिर्विहितवान् कन्ये उभे सन्निभे । एकं वीक्ष्य वलक्ष[पक्ष] युगलं शुक्लैकपक्षं परं तद्दत्तामुदुवाह यस्तदुभयीमप्येककः स श्रिये ॥२१॥ सूर्यं वीक्ष्य रजस्वलामपि सदा भुञ्जानमम्भोजिनीनित्यैकाम्बरचारिणं च दयितं दुःखै शं व्याकुलाम् । छायां गां च समागतामिनतया ख्यातस्त्रिलोकीपतिः स्त्रीरूपां परिणीतवान् सपदि यस्तं संमुगः(संस्तुमः) स्वामिनम् ॥२२॥ मत्वा मामृषसं(भं) मदर्थमकरोद् गां स्पष्टमष्टश्रवा मां चेन्द्रं जयवाहिनीं जयकरीमेते च मामाश्रिते । नो लोकेशनिदेशलोप उचितश्चित्ते विचिन्त्येति यश्चक्रे द्रागुभयोस्तयोरुपयमं स्त्रीरूपयोः सोऽवतात् ॥२३॥ अस्त्यव्यस्तधनो महाव्रतिसुहृद् भतॆष मद्देवरो मत्सख्योरमुना समं परिणये स्यात् तद्वियोगो न मे । मत्वैवं शिवया वशाद्वयमिषाद् द्वे एव ते ढौकिते यः स्वामी परिणीतवाञ् शिवसखः श्रेयःश्रिये सोऽस्तु वः ॥२४॥ नेता य: कलयाम्बभूव कमलां लोलेक्षणाभ्यां रतिप्रीतिभ्यामिव मन्मथो हरिकुलोल्लासी कलावत्सुहृत् । स श्रीनाभिनरेशवंशसरसीजन्माब्जिनीवल्लभः कान्त्या तप्तनवीनहेमविजयः पुष्णातु वः सम्पदम् ॥२५।। श्रीऋषभशतकसरसी विविधालङ्कारकमलपरिकलिता । श्रीलाभविजयपण्डितमतिशरदा निर्मला जयति ॥२६॥ ॥ इति पण्डितश्रीकमलविजयशिष्यभुजिष्य-पं. हेमविजयगणिविरचिते श्रीऋषभशतके कन्याद्वयविवाहवर्णनो नाम द्वितीयः स्तवः सम्पूर्णः ॥ Page #19 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 14 अनुसंधान-२९ कल्याणद्युति यस्य बाहु-शिरसि श्यामा सहस्रत्विषः कोडे स्थास्नुकलिन्दसूरिव दधौ शोभा लुठन्ती जटा । तं श्रेयोवनवारिवाहसदृशं विद्यानवद्यैर्यतिवातैर्वन्दितपादपद्ममनघं नाभेयदेवं स्तुमः ॥१॥ कि लोकत्रयचित्तवृत्तिमथनप्रह्वस्य चेतोभुवक्ष्माराजस्य भुजालतामसिरसावुच्छेत्तुमुद्यत्त (द्युक्तवान् ?) । रोलम्बच्छविरंसदेशपतितो यत्केशपाशो बभौ देवं दर्पकदर्पसर्पविनताजन्मानमीहामहे ॥२॥ स्फूर्जच्छक्तिमताऽतिधन्यधवलध्यानैकसप्ताचिषा निर्दग्धोल्बणकर्ममर्मसमिधां धूमस्य किं धोरणिः । प्राप्तो यद्भुजमूर्ध्नि मूर्धजभरो रोलम्बनीलो लसत्प्रीति वस्तुनुतां स संसृतिसरिन्नाथैककुम्भोद्भवः ॥३।। मा ध्वंसाय महाव्रतिस्त्वमदयं मद्भातुरौत्सुक्यवान् भूयाः कर्तुमनाः कलिन्ददुहिता विज्ञप्तिमेनामिव । कर्णाभ्यर्णमुपेयुषी श्रवणयोर्मूले लुठन्ती बभौ राजी यस्य शिरोरुहां स भगवानस्तु श्रिये वश्चिरम् ॥४॥ देवेन्द्रैः कुमुदेन्दुसुन्दरतरैः सञ्चालितैश्चामरैः श्लिष्टा यच्छ्रतिपार्श्वयोरधिगता जात्याञ्जनाभा जटाः । दैवात् सम्मिलितैर्जलैर्दिविषदां नद्या मिथः सङ्गताः कल्लोला इव यामुनाः शुशुभिरे सोऽर्हज् शिवायाऽस्तु वः ॥५॥ स्पर्धी सार्धमहं त्वदङ्गमुखजैः कर्ताऽस्मि नो सौरभैः स्तेनाऽकीर्तिकरी कुरङ्गजठरावस्थानजां वेदनाम् । स्वामिन् ! भिन्ध्यभिधातुमित्युपगता कस्तूरिकेव स्वयं यं स्कन्धशिरोजराजिमिषतस्तं तीर्थनाथं स्तुमः ॥६॥ भुक्तायाश्चिरमृद्धराज्यकमलालोलेक्षणाया व्रतादानस्याऽवसरे सरागविनयादालिङ्ग्य यान्त्या इयम् ।। Page #20 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 15 लेखा कज्जलपेशलाक्षिपयसां किं स्कन्धयोः सङ्गता श्रेणी यस्य शिरोरुहां श्रियमधात् पायादपायात् स वः ॥७॥ हा ! नैकाऽपि मया महोदयशिला पूर्णीकृतौजस्विना सप्तानामपि मध्यतश्च नरको नैकोऽपि रिक्तीकृतः । व्यज्ञायि स्वमकीर्तियुग्ममनिशं येनेति भाऽलकाः स्वस्कन्धोपरिगा द्विधा शितितमास्तं दध्महे हृद्गहे ||८|| घ्राणानन्धरविन्दकुन्दकुमुदीमोदश्रियां जित्वरं घ्रातुं सौरभमास्यसम्भवमसौ किं स्मैत्यलीनां ततिः । कालिन्दीसलिलोमिवर्मितशरद्वयोमोपमो निःसमो यस्याऽसे शुशुभे लुठञ् शिरसिजस्तोमः स्तुमस्तं जिनम् ॥९॥ द्वे मोक्षस्य ..... पद्धतिधुरे सार्धं द्वयोः स्कन्धयोर्यस्योव्यौं वहतस्तदेक पिशुने चिह्न इवोद्धर्षजे । दोर्मूोः पतितौ पृथग् जलधरश्यामौ श्रियं बिभ्रतुश्चारू यच्चिकुरोच्चयौ चयमयं प्रीणातु पुण्यात्मनाम् ॥१०॥ भर्ता भोगभृतां त्वमेव बलवांश्चाऽचाऽमी वयं भोगिनस्तेनाऽस्मत्कुलकालतो गरुडतो नः पाहि दासानिति । किं विज्ञप्तुमितास्त एव फलिनीनीलोत्पलश्यामला लग्ना यच्छुतिमूलयोः शुशुभिरे केशाः स ईशः श्रिये ॥११॥ हृत्कुण्डस्थमनुष्णधामधवलं ध्यानामृतं रक्षितुं देवेनाऽम्बुजजन्मना विनिहितः किं श्यामलः कुण्डली । यद्दोर्मूर्धनि मूर्धजव्रज उमापुष्पोपमः प्रोल्लसन् सौभाग्यं बिभराम्बभूव भगवान् भूत्यै सतामस्तु सः ॥१२॥ माऽस्मिन् दुष्टदृशां दृशामसदृशां दोषः मुखध्वंसकृद् भूयाद्विश्वमनोरमे भगवतः काये निकाये श्रियाम् ।... मत्वेत्यब्जभुवाऽऽञ्जनी जनितमुद्रेखा कृता कि स्वयं यस्याउंसे पतिताऽलकालिरभसात् सोऽर्हन् श्रियं रातु वः ॥१३।। Page #21 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 16 अनुसंधान-२९ न्यस्ता संयमबालयाऽलिफलिनीसंकाशवासोङ्गिका सद्यस्काञ्जनरत्नकङ्कणभृता भावाद् भुजेवाऽऽत्मनः । यस्याऽऽनन्दवतः शिरोरुहततिः स्कन्धे लुठन्ती बभौ श्रेयस्वी भगवान् श्रिये श्रितवतां ज्ञानार्णवः सोऽस्तु वः ॥१४॥ भिन्नोर्मिप्रसरा स्वसाऽपि नृपतेर्दत्तप्रमोदा सुधी[:] हंसानां सहसेयमुत्तरति किं शृङ्गाद् गिरेः स्वःसदाम् । दृष्ट्वा यस्य सुवर्णवर्णवपुषः स्कन्धे लुठन्ती जटां श्यामां चित्त इति व्यचिन्ति चतुरैः पायात् स वस्तीर्थराट् ॥१५॥ पद्माह्लादलसद्गुणोत्करकला कूलङ्कषाकूलयोः किं याता अभिराममुद्गममी सर्वेऽपि दूर्वाङ्कराः ।। रेजुर्यस्य पृथक् पृथक् स्थितिसृजः केशाः प्रभोरंसयोस्तं प्रावीण्यपटुप्रसिद्धिकमलागेहं स्तुवेऽहं जिनम् ॥१६॥ उप्ता अंसशरावयोः सुभगयोः किं मुक्तिसीमन्तिनीवीवाहाय शिवावदानवयवाङ्कराः प्रवृद्धिस्पृशः । केशास्तालतमाल[जाल]सदृशो यत्स्कन्धयो रेजिरे तं वन्दे विनयावनम्रशिरसि न्यस्ताग्रहस्तः (तं) प्रभुम् ॥१७॥ ईशेऽस्मिल्लपनच्छलाच्छ्रितवति श्वेतद्युतौ साम्प्रतं स्थातुं वैरिणि नैव मे भुजशिरोनिश्रेणितो नश्यतः । अङ्कस्येत्यसिता इवाउंहियुगलन्यासोद्भवा पद्धतिर्यत्स्कन्धे पतिता स्म भाति चिकुरश्रेणिः स वः श्रेयसे ॥१८॥ देव ! त्वं पुरुषोत्तमोऽसि तमसो दस्युस्तमोऽहं पुनहन्ता तेन मम त्वमेव तदहं न ध्वंसनीयस्त्वया । किं विज्ञप्तुमिति श्रुतेस्तटमितः स्वर्भाणुरेष स्फुटं यत्स्कन्धे शुशुभे शिरोजनिचयः पायात् स वः श्रीजिनः ॥१९।। न स्पर्धां ध्वनिना त्वया सममहं कर्ताऽस्मि तेन प्रभो ! मद्दोषं द्विकपुष्टताख्यमयशोमूलं त्वमुन्मूलय । Page #22 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 इत्याख्यातुमिवाऽऽगत: पिकयुवा यत्कर्णपार्श्वे लसन् वालौघः कलयाम्बभूव कमलामस्तु श्रियेऽर्हन् स वः ||२०|| तुङ्गानङ्गपतङ्गदाहनिपुणे नित्यामृतस्नेहयुग् हृत्पात्रे पृथुधीदशे प्रकटितप्रौढप्रकाशप्रथे । शुक्लध्यानदशेन्धने शुचिरुचो यस्यांऽसभाक् कुन्तल - व्यूहः कज्जलतामुवाह स जिन: पुष्णातु पुण्यानि वः ॥ २१ ॥ आधिव्याधिविरोधवारिगहनात् संसारनीराकराद् घोरादुत्तरतोऽसदेशलसिता: शेवालवल्लयः किमु ? | यस्य स्कन्धतटे जटा घनघटा श्रीकण्ठकण्ठोपमा रेजुर्विश्वगुरोर्गुरोरवतु वः क्लेशात् स आद्योऽर्हताम् ॥२२॥ पर्जन्यास्तव सेवकाः पुनरहं तेष्वेव सौ[ भाग्यवान् ? ] --- [म] हाबलो बलवतां मुख्योऽपि भूयाद् भवान् । किं विज्ञापयितुं भुजङ्गमभुजाबहौघ एष श्रवोमूले मुक्त इति व्यभाद् यदलकस्तोमोऽसयोः स श्रये ||२३|| पद्मानन्दविधायिना न शुचिना वक्त्रेण वीर ! त्वया श्रीर्नेया निधनं सदामृतरुचेश्चन्द्रस्य बन्धोर्मम । एतद् वक्तुमिवाऽऽगता कुवलयश्रेणिः प्रभोः कर्णयोर्यस्या ं सस्थलशालिनीश्रियमधात् केशालिरव्यात् स वः ॥ २४ ॥ श्रेणिं क्षोणिरुहामिवाऽमरगिरिः कादम्बिनीबन्धुरां यः केलिं कलयाञ्चकार चिकुरव्रातं वहन् मूर्धनि । दिश्यात् स प्रवराणि बिभ्रदनघं वर्ष्माऽस्तसत्पद्मिनीगर्भादित्यमदीनहेमविजय श्रीधाम धामानि वः ॥२५॥ श्री ऋषभशतकसरसी विविधालङ्कारकमलपरिकलिता । श्रीलाभविजयपण्डितमतिशरदा निर्मला जयति ॥ २६ ॥ ॥ इति पण्डित श्रीकमलविजयगणिशिष्यभुजिष्य- पं. हेमविजयगणिविरचिते श्री ऋषभशतके जटावर्णनो नाम तृतीयः स्तवः सम्पूर्णः ||३|| 17 Page #23 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 18 अनुसंधान-२९ श्रेयस्वत्यनघे मम स्थितवत: क्रोडे पितुः शैशवे दत्ता(त्त्वा)ऽऽदावपि यं हरि[वि]हितवानिक्ष्वाकुरित्यन्वयम् । दीक्षायामपि भुक्तिरत्र घटतो तानेव तावद् हृदि ध्यात्वेतीक्षुरसेन यः प्रविदधे प्राक् पारणं स श्रिये ॥१॥ आसीज्ज्येष्ठमिदं मदीयमनघं तीव्र तपो वार्षिक ज्येष्ठेनैव रसेन तेन घटते श्रीकारणं पारणम् । मत्वैवं मधुरेण यो विहितवानिक्षो रसेनाऽशनं वर्षान्ते वृषभः स रक्षतु जगत् संसारनीराकरात् ॥२॥ प्राग्जन्मार्जित विघ्न कर्मसमिधः संवत्सरो दुस्तरो जज्ञे ज्वालयतस्तपोहुतभुजा तीव्रांशुतीव्रण मे । तत्तन्नो भविताऽमुनैव तुहिनः कायो मदीयो भृशं मत्वेतीक्षुरसं पपौ प्रथमके यः पारणे तं स्तुवे ॥३॥ अन्यन्मत्तपसो तपो भगवतां भावि त्रयोविंशतेस्तत् प्राक् पारणकेऽपि भिद् भवतु मे मत्वेति तत्पारणे । पौरस्त्ये परमानमेव कलयन्नब्दान्त आदीश्वरश्चोक्षेणेक्षुरसेन तत्प्रविदधे यः पारणं तं स्तुमः ॥४॥ आद्यः क्षोणिभृतामयं व्रतवतामाद्यस्तथैवाऽर्हतामाद्यः पारणमाद्यमुग्रतपसः पौण्ड्रस्तथाऽऽद्ये(द्यो) रसः ।। सर्वेष्वेष रसेषु तद्भगवतोऽनेनैव भुक्तिः शुभा श्रेयांसेन धियेति ढौकितमपाद् यस्तं स्तुमस्तं जिनम् ॥५॥ पूर्वं पावकपक्वमोदनमसौ नाऽस्ति स्म वेश्मस्थितो दीक्षायामपि पारणे प्रथमके स्तादेवमेव ध्रुवम् । श्रेयांसेन वितीर्णमैक्षवरसं ध्यात्वेति धन्यात्मना यः प्रीतः पिबति स्म पुण्यपदवीपान्थः प्रभु पातु सः ॥६॥ सद्गाम्भीर्यरसेशतातिशयतोऽनेनाऽस्म्यहं निर्जितो मा भूयोऽपि बली पराभवतु मामेषोऽधुनेत्यब्धिरी (?) । Page #24 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 19 बुद्धयैवाऽमृतमेनदैक्षवरसव्याजात्कृतं प्राभृतं । स्वामी यस्तदपात् स पातु भवतः पुण्यात्मनामग्रणीः ।।७।। क्लृप्तोऽयं दलशः प्रयच्छति रसं रम्यं च निःपीडितोऽप्येष प्रोज्झति नो निजां मधुरता-मिक्षुस्ततः सत्तमम् । हृत्स्थस्तेन ममाऽधुनाऽतिधवलध्यानद्रुरेतद्रसाद् भावी भद्रफलो धियेति तमधाद् योऽन्तस्तमीडे प्रभुम् ॥८॥ गच्छद्भिनिधनं द्रुमैर्दिविषदां माधुर्यमत्रैव किं स्वं न्यस्तं विदतेति दत्तमनघं माधुर्यवर्यं मुदा । इक्षोरेव रसं रसेश्वरभुवा श्रेयांससज्ञेन यः पुण्यात्मा पिबति स्म पेशलपदः पुष्णातु वः स श्रियम् ॥९॥ लोकास्तोकमनोविनोदविदुषा कर्ता( )ऽस्मि कर्ता मुदा स्पर्धा सार्धमहं त्वदीयवचसा माधुर्यधुर्येण नो । तापात् पाहि तपस्विनं हुतभुजां तन्मां जिनेन्द्राऽधुना किं विज्ञप्त इतीक्षुजं रसमिमं योऽपात् स वः श्रेयसे ॥१०॥ सम्पन्नः सुमना अयं --------- ------- ---------- ढौकितं श्रेयांसेन धियेति यस्तमपिबत् सम्पत्प्रदः सोऽस्तु वः ॥११॥ उप्तः स्याद् यदि पुण्यभाजि भगवत्क्षेत्रेऽत्र पूर्वं मया माधुर्यस्य खनी रस: फलमहं प्राप्तोऽस्मि तदबीजजम् । श्रेयांसेन धियेति यत्करभुवि न्यस्तो रसः पुण्ड्भूः क्षेत्रान्तर्निदधे स एव तरसा येनेशिता स श्रिये ॥१२॥ आसीदेष वलक्षपक्षयुगलः श्रीराजहंसो जिनो धत्ते गोरसतां रसोत्तमतयो(या) युक्तोऽयमिक्षो रसः । एतत्पानममुष्य साम्प्रतमिति ध्यात्वेति यं ढौकितं श्रेयांसेन पपौ प्रभुः प्रथितधीर्यः सोऽस्तु वः शर्मणे ॥१३॥ ---- Page #25 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 20 अनुसंधान-२९ पत्राणां प्रकरोऽस्ति तोरणकृते पुष्पं पिकप्रीतये सौरभ्यं प्रसन्न मुदे मधुलिहां यस्या रसालावलेः । तेनाऽस्यैव रसः प्रकाममुचितस्तस्या रसालेशितुः श्रेयांसार्पितमित्यपात् तमखिलं यः श्रेयसे सोऽस्तु वः ॥१४॥ ऊधस्यं जठर[स्थव ?]स्तु मिलनात् सर्वं भृशं कश्मलं सर्पिोरसजं तथाऽन्नमखिलं तत्कृर्णवाश्रितम् । अस्य स्ताददनार्थमैक्षवरसो निर्दोष इत्याशया श्रेयांसेन वितीर्णमेनमदधद् यः स श्रिये वः प्रभुः ॥१५॥ दीक्षाऽऽदायि मनोज्ञमुक्तिरमणीदूती व्यधायि, स्फुरन्माहात्म्यं च तपो रसाय विभुना ज्येष्ठाय येनाऽऽब्दिकम् । तन्मेसो(?)भवतात् प्रभोरिति धिया तत्कारणं ढौकितं श्रेयांसेन य ऐक्षवं रसमधात् तं दध्महे हृद्गृहे ॥१६॥ प्राग्जाते: स्मरणाद्रसं सुमधुरं प्रापं(प्राप्य) प्रभुं प्रेक्ष्य यद् दातव्योऽद्य स एव तत् प्रथमतोऽमुष्मै मया स्वामिने । पौत्रेणेत्युपदीकृतं सुकृतिना श्रेयांसनाम्नैक्षवं यो जग्राह रसं रसाय भवतां शान्ताय सोऽस्तु प्रभुः ॥१७॥ भर्ता यः सलिलं विना कृततपो वर्षोपवासात्मकं सा तज्जा तड़पैति ----ना नीरेण नाशं कथम् ? । तद्ध्वंसायं रसं ददामि मधुरं ध्यात्वेति दत्तं दधौ श्रेयांसेन रसं रसालजमसौ यः सोऽस्तु वः स्वस्तिकृत् ॥१८॥ अन्यत्राऽनुपलब्धितो मधुरता चित्तस्य किं मोरटद्वाराऽऽधायि सुधेक्षुभिः क्षितितलात् स्वादुस्तदीयो रसः । श्रेयांसेन सुधेत्यढौकि विबुधाधीशाय यस्मै मुदा हस्ताभ्यां निपिबन् सतं(तां) वितनुतां श्रेयांसि भूयांसि वः ॥१९॥ ज्येष्ठो योऽस्ति रसो रसेषु मधुरो भत्रे कृतज्ञाय चेदेतस्मै प्रवितीर्यतेऽयमपि मे दत्ते द्रुतं तं बहुम् । Page #26 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 तद्बीजं रसमेनमैक्षवमिति श्रेयांसविश्राणितं यः स्वामी निजकानने निहितवान् सोऽर्हञ् श्रियं रातु वः ||२०|| वृद्धिर्यस्य विषे विषेण च समं जन्मस्थितिः सद्विषागारे यद्विषिभिश्च वेष्टितमभून्नाम्नाऽमृतं यत्पुनः । स्वर्भोज्येन किमस्य तेन यतिनो मत्वेति दत्तं दधौ श्रेयांसेन रसाद् रसालजरसं यः श्रेयसे सोऽस्तु वः ॥२१॥ मा लात्वात्तमदङ्गजः प्रियवृषादानो बली मा[म] सावित्थं त्रासवता सता पविभृता श्रेयांसतां बिभ्रता । अन्यस्माद् विगतस्पृहस्य भवताद् भक्त्यै सुधाऽस्योपदा दत्तेतीक्षुरसा (स) च्छलाद् भगवतः सा यस्य सोऽस्तु श्रिये ॥२२॥ देशानिभ्यभरप्रभूतनगरान् हित्वा पुरं हास्तिनं प्राप्तः पद्ममभूषयन्मम गृहं यो राजहंसः शुचिः । ज्येष्ठेनैव रसेन भुक्तिरुचिता ज्येष्ठस्य तन्मे पितुः पौत्रेणेति रसं प्रदत्तमदधद् यः पौण्डुमेष श्रिये ||२३|| चारित्रस्मितचक्षुषोऽपि दमिना पाणिग्रहो निर्ममे मर्त्यामर्त्यसमक्षमक्षयसुखानन्दाय भर्त्राऽमुना । तद्रोगो (तदयोगो) मधुराद्रसादधिगतादेवेति पौत्रेण यः प्रत्तं पौण्ड्रमपाद्रसं प्रभुरसौ भूयात् सतां भूतये ॥ २४ ॥ पीयूषं निपिबन् सुरैरिव हरिः शश्वत्सुपर्वाञ्चितो यादोभिर्मुदि रोधयन्निव पय: सिन्धो रसोल्लासवान् । भुञ्जानोऽञ्जलिना व्यलोकि मनुजै रक्षो रसं यो जिनो भूयाद् दीधितिक्लृप्तहेमविजयः स्वामी स वः शर्मणे ||२५|| श्री ऋषभशतकसरसी विविधालङ्कारकमलपरिकलिता । श्रीलाभविजयपण्डितमतिशरदा निर्मला जयति ||२६|| श्रीहीरहीरविजयव्रतिराजपट्टपद्मांशुमद्विजयसेनमुनीन्द्रराज्ये । 21 Page #27 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 22 अनुसंधान-२९ श्रीस्तम्भतीर्थनगरे रस-बाण-भूप (१६५६) वर्षे समाप्तिमगमत् शतकं सदर्थम् ॥२७॥ ॥ इति पं.श्रीकमलविजयगणिशिष्यभुजिष्यपण्डितश्रीहेमविजयगणिविरचिते श्रीऋषभशतके इक्षुरसपारणा-वर्णनो नाम चतुर्थः स्तवः । श्रीऋषभशतकं समाप्तम् ॥ अकब्बरपुरे प्रौढे श्रीसङ्घः सकलोऽनघः । अलीलिखत् प्रतिरेताः (प्रतिमेतां) प्रथमं(मां) श्रुतभक्तये ॥१॥ ॥ ग्रन्थाग्रं - २५० ॥ Page #28 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रीमुनीचन्द्रनाथविरचित पन्नरतिथि ॥ सं. विजयशीलचन्द्रसूरि ( भूमिका ) पडवा (एकम) थी लईने पूनम सुधीनी १५ तिथिने तेमज चन्द्रमानी १६ कळाने केन्द्र बनावीने रचायेली एक विलक्षण प्रकारनी रचना अत्रे प्रस्तुत छे. कुल १७ विभाग के 'चाल' मां पथरायेली आ रचनानुं नाम, तेनी एकमात्र उपलब्धं प्रतिना हांसियामां लखाया प्रमाणे, 'पन्नर तिथि' छे; रचनाना प्रान्ते पुष्पिकामां लखाया मुजब 'श्रीतिथकला' छे; अने कर्ताए छेल्ली चालमां लख्युं छे ते प्रमाणे 'आगमसारउधार' अथवा 'द्वादशांगसारउधार' एम नाम लागे छे. अहीं तो प्रतिना प्रत्येक पाने लखायुं छे ते नाम 'पन्नर तिथि' ज राखवामां आव्युं छे. आ रचनाना कर्तानुं नाम 'मुनीचन्द्रनाथ' उर्फे 'धर्मदत्तदेव' छे, जे जैनोना कोई मतना साधु होय तेम लागे छे. समग्र रचनामां क्यांय मन्दिर के मूर्ति परत्वे अछडतो पण उल्लेख नथी, ते जोतां तेओ श्वेताम्बर परन्तु मूर्तिपूजक नहि एवा कोई गच्छना (कदाच लोंकागच्छ) साधुजन होय तेवी कल्पना थाय छे. आ कविनी के तेमनी रचनानी नोंध 'गुजराती साहित्य कोश' तेमज 'जैन गुर्जर कविओ' मां पण मळती नथी, ते वात नोंधपात्र छे. कर्ताना समय विषे, आ ज कारणे, कोई चोक्कस विगत आपवानुं शक्य नथी. जो के रचना १८मा शतक करतां वधु जूनी न होतां तेथी अर्वाचीन होवानो सम्भव अधिक जणाय छे. आम छतां, आ मुद्दे विमर्श के ऊहापोहने अवकाश छे ज. समग्र रचना १५१ कडीमां पथरायेली छे. आदिना तथा अन्तना ४४ दोहराने बाद करतां बाकीनी १७ 'चाल' एक ज छन्दमां छे, जे सवैया प्रकारनो, ३० मात्रानां चरणवाळो कोई छन्द जणाय छे. भाषा मुख्यत्वे गुजराती छे, छतां तेमां हिन्दी, मारवाडी, अरबी वगेरे भाषाओनी छांट सारा प्रमाणमां जोवा मळे छे. Page #29 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 24 अनुसंधान-२९ कर्ताए दरेक 'चाल'ना प्रारम्भे प्रतिपाद्य विषय, वर्णन करती अवतरणिका आपी छे, तेमां पोताना नाम साथे जोडेलां विविध विशेषणो (षटदर्शनेश्वर, माहाब्रह्मस्वरूप श्रीसद्गुरु इत्यादि) जोतां तेओ खूब तत्त्ववेत्ता तेमज तत्त्वरसिक होय तथा गूढ तात्त्विक भावोना प्रखर ज्ञाता होय तेवी छाप ऊपसे छे, अने समग्र रचनानो ऊंडाणथी अभ्यास करनारने ते छाप यथार्थ होवानी प्रतीति पण थया विना रहेती नथी. ब्रह्मविद्याना तेमज जैन, वैदिक तथा इस्लामनी तत्त्वविद्याना अधिकारी विद्वान् तेओ हशे ज. कृतिनो उपरछल्लो अभ्यास करतां एम जणाय छे के आ रचना, कोई मुसलमान तत्त्वपिपासु अमीर के सूबा के सुलतानने, जैन, हिन्दू तथा इस्लाममां वर्णित अथवा मान्य बाबतोमां क्यां एक्य छे अने क्यां मतभेद छे, ते समजाववा माटे बनावाई छे. आ कृतिमां 'आलमनाथ', 'हे जवनाधिप' आवा सम्बोधनात्मक प्रयोगो जोवा मळे छे, जेथी उपर कहेली धारणा पुष्ट थाय छे. वैदिक संप्रदायो अनुसार एटले के वेद अने पुराणो प्रमाणे ईश्वरनुं अस्तित्व तेमज जगत्कर्तृत्व प्रसिद्ध छे, अने ते वात जैन आगमो माटे अमान्य-अस्वीकार्य छे; तो इस्लाम साथे आ बन्ने धाराओगें कई हदे अने केवी रीते सन्धान थाय छे, ते विषय- प्रतिपादन आ रचनानुं मुख्य अंग होय तेवू, अल्पमतिथी, समजाय छे. परन्तु आनो ऊंडो अभ्यास थाय तो ज तेना हार्द लगी पहोंचाय, ते पण स्वीकारवू ज पडे. प्रथमनी-पडवानी ढाळमां - प्रथम कडीमां 'आगम देवंद्रशन्नं' एवो पाठ छे, ते 'देवेन्द्रस्तव प्रकीर्णक' नामे आगमना नामनुं सूचन करतो हशे, तेवो भास थाय छे. पछीनी बीजथी तेरस सुधीनी 'चालो'मा आचारांगथी लईने दृष्टिवाद-अंग-एम द्वादशांगीनां आगमोनां नाम क्रमशः गुंथेलां जोवा मळे छे, जेथी आ रचना जैन आगमोने अनुसारी छे तेवी छाप पडे छे. जैन परिभाषाना अनेक शब्दो ठेर ठेर छूटथी वपराया छे : समकीति, युगादिनाथ, बोधि, तीरथनाथ, जिणंदा वगेरे. तीर्थंकरो पैकी प्रथम बेएक 'चाल'मां युगादिनाथनो तथा छेल्ली बेएक 'चाल'मां पारसनाथनो-एम बेनो ज नामोल्लेख छ; अन्यनो नथी. हिन्दू धाराने लगती शब्दावली पण मोटी छ : पूरण ब्रह्म, शंभु, । Page #30 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 अलख नारायण, ब्रह्मा विष्णु महेश, अथरवण वेद, साम- जजुर - रघुवेद, पुरुषोत्तम, लक्ष्मीनारायण, ज्याग वगेरे. तो इस्लामी के अरबी शब्दप्रयोगो पण ओछा नथी : खलक, जिहांन, खामंद खावंद, खुदा, कुराण, कत्तेब, काफर, हरामी, हमद, केहर, मेहरी, हज्ज, खयर, बंदगी, दोजग, भिस्त, करामात वगेरे. कर्तानी दृष्टि तथा प्रयास समन्वयपरक छे ते वात बहु ज स्पष्टपणे जणाय छे. 25 प्रत्येक 'चाल' नुं अछडतुं अवलोकन करीए तो प्रारम्भिक ४ दोहरामां 'जैन'- अनुसारी मंगलाचरण होवा छतां, तेमां 'अल्लह'- अल्ला शब्दनी गुंथणी ध्यान खेंचे तेवी छे. प्रथम 'पडवा' नी 'चाल' मां संसारनी निःसारतानुं अद्भुत वर्णन छे, अने तेमां 'पडवा'नुं नहि तेवो उपदेश पण आपवामां आव्यो छे. 'पडवा' नो अर्थ 'पडवुं' एम करीने तेनाथी बचवानी शीख आपवामां कवि सुरेख चमत्कृति सर्जी शक्या छे. आ 'चाल' मां 'हंदो, कहंदा, भरंदा' ए बधा 'दा' वाळा प्रयोग खास ध्यानपात्र छे. बीजी 'बीज'नी 'चाल' मां पण 'लहंदा' वगेरे प्रयोगो थया छे ज, उपरांत तेमां 'आलमनाथ अमीणो सामी' ए प्रयोग विशेषे ध्यानार्ह छे. रचनाकार सम्भवत: 'चारण' कुलना होय अने चारणी बोलीना आ प्रयोगो तेमन्ने माटे सहजसाध्य होय तेवी कल्पना, आ अने आवा विविध प्रयोगो जोतां तथा बळकट छन्दमां थयेली बळूकी रजूआत जोतां, करवानुं मन थाय छे. त्रीजी 'त्रीज'नी 'चाल' मां आदिनारायणरूप ब्रह्मा-विष्णु-महेशने खलक (जगत्) ना रचनाकार (कर्ता) तरीके वर्णवीने तरत ज असुरपति खावंद खुदानां पण एवांज त्रण रूपो होवानुं तथा आसुरी आलमनो ते कर्ता होवानुं वर्णन करे छे; अने ते पछी तरत ज जैनना ईश्वर ते सृष्टिना कर्ता नथी, अर्थात्, जैनमते ईश्वर सृष्टिनो कर्ता नथी, तेवुं स्पष्ट प्रतिपादन कर्तुं छे. अने आ रीते निज - पर - शासननो भेद तेमणे यवनाधिप समक्ष स्पष्टतया वर्णवी बताव्यो छे. Page #31 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 26 अनुसंधान-२९ चोथी 'चोथ'नी 'चाल'मां पहेली ज कडीमां चारनी कमाल दर्शावतां, चोथो युग, चोवट, चोथु अंग, चतुर्विध जगत्, चार गति, चार वर्ण एम तमाम पदार्थोने सांकळी ले छे. वेद-पुराण-कुरान ने सिद्धान्त (जैन आगम) ने साथे साथे राखीने तेमां आवती भिन्नतानु सौम्य अने रुचिकर भाषामां बयान आ 'चाल'मां थयुं छे. अहीं 'आदिशगति-आद्यशक्ति'नो सौ प्रथमवार उल्लेख थयो छे. ४ वेदोनां पण नाम छे. आमां चार वेद तथा १४ पूर्व वच्चे समन्वय साधवानो प्रयास थयो होय एवो भास थाय छे. समग्र प्रतिपादन खरेखर खूब रसंप्रद छे. पांचमी 'पांचम'नी 'चाल'मां 'आदि शक्ति'नो उल्लेख तो छे ज, पण वधुमां 'केवल' (ज्ञान)ने 'जोगण' तरीके ओळखावीने तेने शासन ने मोक्षनी 'धणीयाणी' गणावी छे. वळी, यवननी न(य?)वन धणी, शैवनी शैवी, तेम जैनना साहिबनी जैनी शक्ति-एम पण लखे छे. वळी, इस्लाम तथा ईसाई लोको 'आदम अने हवां'ने बाबा-बीबीना आदि युगल तरीके माने छे ते वातने याद करीने वैदिकोना मते ते लक्ष्मी-नारायण, ब्रह्मा तथा ब्रह्माणी, शिव अने पार्वती, तेमज जैनमते ते जिनराज अने शासनदेवी-निर्वाणी एटले के केवलज्ञानरूप योगण छे - एवं पण प्रतिपादन कर्ताए अहीं कर्यु छे. अहीं कर्ताए 'निगम' शब्द वापर्यो छे. ते आगळ उपर १३मी तथा १५मी 'चाल'मां पण आवे छे. आगम-निगम के अगम-निगम' एवा प्रयोगोमां आवता 'निगम' शब्दना अर्थमां ज आ प्रयोग होवो जोईए. जो के जैनोना विविध गच्छोमां एक निगमगच्छ के निगममत पण हतो - १५-१६मा शतकमां. ते गच्छने मान्य निगम-शास्त्रो पण उपलब्ध (अप्रकट) छे ज. कर्ताना मनमां ते मान्यता होय अने ते सन्दर्भमां 'निगम'नो प्रयोग कर्यो होय, तो पण बनवाजोग छे. वस्तुतः तो आ समग्र रचनानी हाथपोथी- प्रथमवार अवलोकन करवानुं थयुं त्यारे प्रथम छाप 'निगममत'नी आ रचना छे - एवी ज ऊपसेली. पण ए तो मात्र अटकळ ज. निर्णय पर पहोंचवा माटे तो निगमोनुं अध्ययन करवू पडे.. ___पांचमी चालमां 'पंचम अंग' (भगवतीसूत्र नामे आगम)ने त्रणेक वार संभायुं छे. कडी ५मां 'आदिशगति'नो उल्लेख छे, तो 'अशूरां' (असुर) Page #32 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 तथा 'आशूर' (आसुरी) शक्तिनो पण उल्लेख छे. छठ्ठी कडीमां वळी 'शेतान, हरांमी, काफर, हमद, केहर' ए अरेबिक शब्दोनो सन्दर्भ खास ध्यानाह छे. तो ७मी कडीमां 'मरद - महेरी, नार- नरोत्तम, श्राविका - श्रावक' ए जोडलांपरक शब्दसमूह, तेमज आगळ जतां ते ज कडीमां 'मेहरी विना हज्ज (हज) न थाय के वेद-याग पण न थाय, माटे आदि शगत ( शक्ति तत्त्व) नुं आराधन (करवुं घटे) ' ए मतलब (स्थूल अर्थमां )नी पंक्तिओ - खास अध्ययनीय लागे छे. 'आदिशक्ति'नो आ आग्रह ज, कर्ता चारण होय तेवी छाप ऊपसावी जाय छे. - आ छ छठ्ठी 'चाल'मां छठ्ठे आगम-ज्ञातासूत्र, छठ तिथि, छ द्रव्य बधां जैन तत्त्वोनुं निरूपण थयुं छे. छ युगनी पण वात छे. छ युग आरा. 'घट घट साहिब देख तुं ग्यांनी' ए पंक्ति कबीरनी 'घट घट में वह सांई रमता' ए पंक्तिनी याद आपी जाय छे. आमां 'कहेर' न करवानी ने 'खयर, महेर ने बंदगी' तेमज 'कुरुणा' - (करुणा) वगेरे करवानी शीख, वेद-पुराण - कुराणना नामे आपी छे. -- सातमी 'चाल' मां सातमा अंगसूत्र ( उपासकदशा) नो निर्देश सातम साथे मेळ सधाय तेम करेल छे. उपासक एटले श्रमणोपासक श्रमणने अहीं 'गुरु', 'पीर' तरीके अने उपासकने 'सेवक', 'मुरीद' तरीके ओळखावेल छे. 'जती - वृत्त' (यतिव्रत) वाळा गुरु ते पीर, एवं स्पष्टीकरण त्रीजी कडीमां पण छे. 'सिद्धान्त' एटले 'वेद, पुरांण, कतेब', अने तेनी आज्ञा ते 'फरमाण, हुकम, आगन्या' एम पण समजूती कडी ४मां छे. 'आपणो साहेब ( पीरगुरु) जे पंथ बतावे ते पंथे सदा चालवुं अने 'कहेर' तथा 'हंसा' (हिंसा अने त्रास) छोडवा - एवी शीख पण आपी छे. आम वर्ते ते ज साहेबना साचा सेवक; बाकी 'केहर' करवाथी तो 'दोजग' (नर्क) ज पामे, 'भिस्त' (बेहिस्त - स्वर्ग) न मळे. वळी ७ व्यसननां निवारणनी पण शीख आमां आपी छे. 27 आठमी 'चाल' बहु रहस्यपूर्ण होय तेम लागे छे. तेमां जैन परिभाषाना खासा शब्दो तो छे ज; पण तेमां एक बाजु जैनमान्य लोकपुरुषनुं शब्दचित्र आलेखेलुं जणाय छे, तो तेनी साथेज, योगमार्गना षट्चक्रो, कुंडलिनी नाग, - Page #33 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 28 अनुसंधान-२९ कमलदल, अनहदघंटा-अनहदचक्र - आ बधी वातो पण गुंथी लेवामां आवी छे. ते जोतां कृतिकार कोई नीवडेल हठयोगी होय तेवी छाप पडे छे. नवमी 'चाल'मां नवमुं अंग (आगम), नोम तिथिनी साथे नव रंग, नव रस, नव वाड, नव दुर्गा - आ बधुं पण वणी लेवायुं छे. तीर्थंकरना समवसरणनु चित्रात्मक वर्णन पण छे, तो 'अनहद नोबत गाजें' लखीने तेने यौगिक रूप आपवानो गर्भित संकेत पण थयो छे. छप्पन्न दिक्कुमारीने 'योगण' (योगिनी) रूपे वर्णवी छे. समवसरणमां इंद्र द्वारा मंडायेल अखाडो (खेल) अने छत्रीश रागमय गीत तथा नाटक चाली रह्यां छे तेमज त्रिभंगी वाजां वागतां होवानो पण उल्लेख छे. आखंय वर्णन जैन मान्यतानी साथे साथे यौगिक प्रक्रिया, पण बयान आपी रह्यु होवान भासे छे. अहीं पण 'अमीणो' ए चारणी प्रयोग जोवा मळे छे. दशमी 'चाल'मां दशमा अंग (आगम)नी तथा दशम तिथिनी वात तो छे ज, पण तेमां मुख्यत्वे 'दया'नी अने 'हिंसा'न करवानी वात थई छे. 'दया' ए साधुनी शासनमाता होवा, विधान प्रथम कडीमां ज थयुं छे. कडी ६मां आश्रव-हंसा (हिंसा) ते परशासन, अने संवर ते निज (जिन)शासनएवं सुस्पष्ट प्रतिपादन थयुं छे. हिंसा ते परशासननी माता छे, केवल (ज्ञान) रूप करुणाली माता ते सिद्धनी धणियाणी छे, एवं पण निरूपण छे. आमां विद्यालब्धि, मंत्रविद्याने 'करामात' तरीके वर्णवी छे. विक्र लबध एटले वैक्रियलब्धि अर्थात् देवमाया. ११मी 'चाल'मां ११मुं अंग, अग्यारस तिथि, ११ रुद्र, ११ अंग, ११ प्रतिमा इत्यादिनुं स्वरूप जोवा मळे छे. 'अलख नारायण', 'संकर', 'ब्रह्मा केशव रुद्र', 'युगवेद' आ बधी शब्दावली तथा तेनी समन्वयात्मक अने खण्डनात्मक चर्चा पण मजानी छे. १२मी 'चाल'मां बारमा अंग 'दृष्टिवाद'नी जिकर थई छे. १२ कला, बारस तिथि, १४ पूर्व-बधुं संयोजित थयुं छे. १४ पूर्व- प्रमाण के, विपुल-विशाल होय ते समजाववानी पण मथामण थई छे. ॐ कार ए आदि पद, तेना त्रण पद 'अ-उ-म्', ते सत्त्व-रजस्-तमस् ए त्रिगुण तथा ब्रह्माविष्णु-महेश ए त्रिमूर्तिरूप होवानी वात जरा विलक्षण जैन दृष्टिए वर्णवी छे. Page #34 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 दृष्टिवाद ए बावन अक्षरथी आगळ नी बाबत ( बावनबारो ? ) छे एम पण सूचवायुं छे. १३मी 'चाल' मां पुनः 'निगम' जोवानुं सूचन मळे छे. आ चालमां ब्रह्म अने ब्रह्माण्ड अनन्त - अगम होवानुं वर्णन छे. केवलज्ञान ते शक्ति, साहिब ते नाथ (पति), तथा ज्ञानमां भासता अनन्त पर्याय ते अनन्त प्रजा रूपे कविए वर्णवेल छे. 29 १४मी 'चाल' मां चौदश तिथि, १४ भुवन, १४ कळा, इत्यादिना आलम्बने सिद्ध-मोक्षपद - केवलज्ञान इत्यादि वातोनुं निरूपण छे. आमां 'निवाज' ( नमाज) तथा 'संध्यावन्दन' अने साथे 'पडिकमणुं' आ त्रणनी तुलना नोंधपात्र छे. महदंशे आखीय रचनामां अमुक निरूपण सतत पुनरावर्तित थतुं होवानुं लागे. -- १५मी 'चाल' मां पूनमतिथिनी अने १५ कळानी वात थई छे. सिद्धना १५ भेदने पण सांकळवामां आव्या छे. आ चालमां पण 'निगम' शब्द त्रणेक वार आवे छे, जेमां ९मी कडीमां तो 'निगम' ने वेद-पुराणसिद्धान्तनी साथेज गोठव्यो छे. १२मी कडीमां 'मोक्ष' रूप सिद्ध नगरीने शिवपुर - पाटण तरीके ओळखावीने तेनी तुलना 'भिस्त-मदीना' (स्वर्गमां मदीना नगरी ? ) साथे करी छे. १६मी 'चाल' मां जीवमांथी १६ कळाए सिद्ध- शिव थएल आत्माना तथा तेना निवासरूप मोक्षना स्वरूपनुं विशद वर्णन छे. आखी कृतिमां प्रथमवार अहीं १३मी कडीमां 'पारसनाथ' एवं नाम जोवा मळे छे. १७मीं 'चाल' कलशरूप ढाळ जणाय छे. तेमां प्रत्येक कडीमां 'मुनीचन्द्रनाथ - धरमदत्त देव' नुं नामाचरण थयुं छे. 'पारसनाथ' नो उल्लेख पण एकथी वधु वार थयो छे. छठ्ठी कडीमां कर्ता कहे छे के 'पन्नर तिथ' नामे आ रचनामां आगमवाणी निरूपी छे, अने वेद- कुरान - आगमनुं मन्थन करीने माखण तारवीने तेनुं आ रूपे घृत कर्तुं छे, अने ए रीते जिनेश्वरनां गीत गायां छे.' प्रान्ते ४ दोहरा छे, जेमां १५२ गाथामय 'आगमसारउधार' अर्थात् Page #35 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनुसंधान-२९ 'आगमसारोद्धार' नामनी आ रचना होवानुं सूचवायुं छे. कर्तानुं नाम 'धर्मदत्त' होय तेवी छाप पडे छे. प्रतिलेखक 'मुनी रूपचंद' छे, अने तेणे आ रचनाने 'तिथकला' तरीके ओळखावेल छे. आ आखीये रचना अनेक दृष्टिथी अध्ययन करवा योग्य लागे छे. आ तबक्के तो तेनो प्रारम्भिक के अछडतो परिचय ज करावी शकायो छे. परन्तु आ रचना एकवार प्रकाशित थई जाय ते बहु महत्त्व, छे. आशा छे के आमां विविध क्षेत्रना अभ्यासीओने रस पडशे अने आ रचनाना बाह्यआन्तर एम उभय रूप परत्वे तेओ नवो नवो अभ्यास आपशे. आमां आवता पारिभाषिक शब्दोनो कोष थवो जरूरी छे. पण केटलाक शब्दोना अर्थ समजाता नथी तेथी हाल साहस कर्यु नथी. श्रीमुनीचन्द्रनाथविरचित पन्नरतिथि ॥ श्रीगुरुभ्यो नमः ॥ अथ श्रीषटदर्शनेश्वर माहाब्रह्मस्वरूप श्रीसद्गुरुधर्मदत्तदेव श्री मुनीचन्द्रनाथप्रकासीते षट्दर्शनशास्त्रसारोधारे श्रीजिनागमसिद्धान्ते माहातत्वसुद्ध ज्ञाननय हेतु ब्रह्मकेवलतिथीकलावांणी लिख्यन्तेः दोहराः श्री जिनशाशनसामीया अल्लख अगोचर आदि । परमेश्वर परिब्रह्म पद युग युगनाथ युगाद ॥१॥ . अजर अमर अती आगम गम अल्लह अवाह अपार । अक्षय अव्यय अद्वैत पद, सिध निरंजन सार ॥२॥ युग युग आदि धरण जिण उपजें धर अवतार । जंगम उज्जल योगसीध आगमधर अधिकार ॥३॥ युग आदि जिन योगेस्वरा युग जागवयो धर्म । आगम वांणी उच्चरां परिब्रह्म पार मरम ॥४॥ Page #36 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 31 अथ श्री मुनींचन्द्रनाथ षटदर्शनेश्वर श्री ब्रह्मैव ब्रह्मज्ञ ज्ञान उपदेश प्रथम प्रतिपदातिथी लोकस्वरूपप्रकाश श्रीभगवंत सरणांगत परमपदहेतु . तत्त्ववाणीः चालिः परिब्रह्म पच्छांण्यो लोक समाणो आतम जांणो अखे नाथ निरंजन हे निकलंकी पार परम परक्खे । उज्जल पक्ष कहां सिध हंदो ए संसार कशन्नं दोय पक्ष पन्नर तिथ दाखां आगम देवंद्रशन्नं ॥१॥ पडवा पहेलो तिथ कहंदा जिव भरंदा जोणल्लख चोरासीय षांण लिक्खंद्दा चउगत च्छकसमाणं । देख चउद भवन्ने दाखां जीवे जीव जगंदा एह संसार असार अनादि सुभर जीव भरंदा ॥२॥ जोणि जोण भमंते जीवें ल्लखां मांनवलधौ आरजदेश-कुलें अवतरयो प्राजो पून्य प्रसीधो । चेतो मानव चित्त विचारी फेरा फोकट कीधा साथें साहेब नांहिं संभार्यो लाखे पातक लीधा ॥३॥ एह संसार माहा अंधकुप जीव पडतो जाणी अलख निरंजन देव आराहो पुरण ब्रह्म पीछाणी । पडवा टालो आतम भालो जालव जोग जगंदा मुनीचन्द्रनाथ वदे जुग जीता, सोही साहब हंदा ॥४॥ इति लोकजीवाय षद्रव्यव्यापक प्रतिपदातिथी कलाकथनानन्तरं, अथ श्रीमुनीचन्द्रनाथप्रकाशके बोधबीजसम्यक्त्वसाधन तीर्थोपदेश आराध बीजतिथी कलाहेतु वांणी : चालः साहेब साचो बीज संभारो बीजें बीज लहंदा ग्यांन सदा गुरुजी निज दाखें भायें वांण भणंदा । Page #37 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 32 आगम बोध माहानिध उज्जल सूरा सोह चढदा आतमबीज अखे अविनासी कीधें ब्रह्म कहंदा ॥१॥ बीजें बुध्य लहो नित बोधी केवल सीध कहंदा एक निरंजन जोति अनंती जोते जोत जगंदा । आगमबीजें बीज आरोपण बीजउदे युग पार पुरण ब्रह्म शदाशिव साश्वत आद्य अलख अपार ॥२॥ अनुसंधान - २९ साचो सुध लहिं समकीत्ति बीज बोध विचार आगमवांण वदें भगवंता आचारंग मझार । बीजें अंगें बोध जगाड्यो साधां हंदे सांइ जात जती - व्रत सूरा वीरा साचे साम सखाइ ||३|| आलमनाथ अमीणो साहेब जागव जोग जिणंदा तीरथनाथ धणी त्रिहुं लोके दाखें वांण दिणंदा । धर्म धडें करी धीरा हंदो ध्यावें धार धरंदा मुनीचन्द्रनाथ वदें युग जालम सोही साध कदा ||४|| इति बोधबीज सम्यक्त्वरत्नसाधन तीर्थोपदेश आराध बीजतिथिकलासाधननन्तरः अथ श्रीब्रह्मसीधान्तसिधतत्त्वजोति जगतेश्वर श्रीमुनिचन्द्रनाथ प्रकासिते निजपरसम्यक्त्वमिथ्या [त्व] द्विद्वा(धा? ) चैत्य (त) न्य ब्रह्मसिधजोतिअवगाह त्रिजतिथी कलाहेतु नयज्ञांनवांणी : चालि: त्रिजें त्रण्ये तत्त्व विचारो त्रीजें अंग तवंदा त्रण्य भवन तिणें शिर सांइ ध्यांनी जेथ धरंदा । नाथ निरंजन हे निकलंकी साहिब शांति सुधारे पुरण राज करें पुरसोत्तम तेथ तवंता तारे ॥ १॥ ज्योति शंभु जगदीश धणी जे ज्योति झलामल दीशें ते महिनाथ अनंता तेजें त्रिविधा रूपनिवेशे । Page #38 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 33 करता ब्रह्म कहां परमेश्वर खलक रचे खुद सोइ निज परमेश्वर ब्रह्म निरालो शिवनगरीमांहे दोहि ॥३॥ आलमनाथ कहां परिब्रह्म दोविध साहेब दाखां अलख नारायण दोय धणी च्छे सुरअसुरांपति दाखां । आदिनारायण हे त्रिविध विध ब्रह्मा विष्णु महेश ए कर्ता त्रिहुं लोकधणी में खलक रचें बहुवेश ।।४।। एम असुरांपति हे परमेश्वर हे खुद खावंद सोही ए पण त्रिविधा रूप तवंदा आसुरी आलम होइ । जैन तणो जगदीश्वर जालम हे निजब्रह्मनिवासी अणकरता परमेश्वर सोही सर्व धणी एह आस ॥५॥ जैन महेश्वर हे जवनाधिप जोति अलख स्वरूप युं परमेश्वर परज अनंती त्रिविधा त्रिहुं युग भुप । इणविध निज-पर सासणभेद आदि अलख अपार मुनीचन्द्रनाथ वदे अवधूता ज्योति स्वरूप विचार ॥६॥ इति ब्रह्मसिद्धान्तसिधतत्त्वज्योतिअवगाह षटविधब्रह्मजगतेश्वर मीमांशेश्वर ब्रह्मां १ शांख्यदर्शनेश्वर विष्णु २ न्यायकदर्शनेश्वर शै(शि)व ३ पातां(तं)जली त्रैराशिक तथा चार्वाक्य तथा जवनेश्वर अल्लाह ४ बौध साक्यदर्शनेश्वर बौधिसिध तथा शक्तिदेव ५ जैनदर्शनेश्वर अरिहंत तथा सिघभगवंत ज्ञानशक्तिदेव ६ एवं निज १ पर ५ द्विधा जैन शैव । शैव द्विधा देवी १ - आसुरी २ । दैवी त्रीगुण आसुरी पि त्रिगुण चिकधा । एवं षटमतेश्वर निज परसम्यक्त्व ज्ञानचेतना मिथ्या माया कृत्यज्ञानचेतना एवं चैतन्य ब्रह्म सिधतत्त्वज्योति त्रिजतिथीकलाकथ नानन्तरः अथ श्रीकर्ता ब्रह्म जगत्रेश्वर श्रीमुनीचन्द्रनाथप्रकाशिते चतुर्विधलौकीकविस्तार तथा चतुर्विधवेदशास्त्रविधि चतुर्थीतिथि कलाहेतु नयज्ञानहेतु वाणी : चालि : चोथे युगधणी चोवट मांडी चोथें अंग अपार चिहुविध खलक जिहांन करंदा चिहु गत वरण विचार । Page #39 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 34 अनुसंधान-२९ बीज थकी जिम झाड बोहि विध वशत्तरीयो युगवेद थड डाला आदि दशेविध जांणो बीजमां एहनो भेद ॥१॥ आदिधणी करता-जुगसाहिब कीधो हे खलक विधान निज जगदीश्वर सत्ता लेइ आव्यो एथ निदान । खुद खामं(वं)द खलक खुदा अनहद आसुरी श्रेष्ट अपार विष्णु देव नारायण त्रिविधा दैवी श्रेष्ट विचार ॥२॥ जैन सत्ता जगदीश्वर जागे सो जिनराज कहंदा जैन तणी ज्येष्ट रचाणी ग्यांनी लोक गहंदा । देख धणी युगसाहिब साचो त्रिविधा रूप धरांणो वेद पूरांण कुरांण सिद्धान्ते भाषे भेद समाणो ॥३॥ च्यारे वेद वली युग च्यारे चोगत वरण हे च्यार चोवट लोकधणी युग मांड्यो आदि शमति अपार । अथरवण वेदमां आश्व(शु)री भेद जेथ कुरांण कहंदा सांम जजुर रघुवेद त्रण्ये महि दैवि वांण भणंदा ॥४॥ च्यारे वेद महि सत्त आगम देख सिद्धान्त विचार जैन तणो जगदीश्वर बोलें आगमसिध अपार । च्यारे वेद सदालिंग साचा चवदे पूरवमांहिं पिंड ब्रह्मंडमां परज रमांणो क्रीया शगति जगाहि ॥५॥ च्यारे वेद चतुरदश पूरव माहे कुरांण कत्तेब (ब) लोकधणी लेइ उरसीथी आयो मांड्यो खेल हशेब । परिब्रह्म चिदानन्द हे पुरुसोत्तमः आदिसगत आराधे दोय मिली युग त्रिण्ये दाखां लोकनी माया वाधे ॥६॥ आशूरी माया अशूर हवंदा दैवी देव करंदा त्रिविधा रूप धरो धणीयाणी जोणी जोण भरंदा । अलख नारायण देव जिणंदा चोविस रूप धरावे मुनीचन्द्रनाथ धरे अवतारि युगमांहि साहिब आवें ॥७॥ Page #40 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 35 इति श्रीकर्ता ब्रह्म जगत्रेश्वर चतुर्विध लौकीकविस्तार चतुर्विध वेदशास्त्रे लौकविधि चतुर्दशपुर्व वेदोमे चतुर्वेद पुर्वामै तथा द्वादशांग द्रष्टीवादचतु ध्येन चतुः जिन-लोक-व्याख्यान-चतुर्भेदलोकविस्तार चतुर्थीतिथीकलाकथनानन्तरः अथ श्रीज्ञानशक्तेश्वर श्रीमुनीचन्द्रनाथप्रकासिता लोकालोके निजपरसम्यक्त्वमिथ्या सासण निजनिज-ज्ञानमायाशक्तिआराधन निजनिजनाथआराधन निजनिज सिधसासणप्राप्ती पांचम सिधगतिशाशणस्थित आराध पंचमीतीथी कलाहेतु नयवांणी : चालिः पंचम अंग तिथी युग प्राजो चवद भवन पर सोहें आदि सगति कहो भगवती माथे धणी ते धार्यों हे । चोवीस दंडकमांहि सजांणी षट् द्रव्य नाडी भेद असुर सुर नागंद लख चोरासी पूर्यो पिंड उमेद ॥१॥ मानवलोकमांहें धर्म साधो पंचम थांन चढंदा चोथ तिथि युग च्यारे हुया पंचम मोक्ष वहंदा । केवल माया जैन तणी जे जोगण केवल जागे शाशण मोषतणी धणीयांणी एह निरवांणी आगें ॥२॥ नवन धणी जे जवन आराधे शैवी सैव संभारें जैन तणो युग साहिब जैनी जैन शगत अपारे । आदम बाबो बीबी हवां , लषमीनारायण छाजें श्रीजिनराजनि शाशणदेवी देख निगम पद गाजें ॥३॥ ब्रह्माने ब्रह्मांणी रूपें शिव पारवती सोहें करतारूप तणो छे आगम ए परसासण जोहे । श्रीजिनशाशन हे निरवांणी पारनी खलक वीधारे देखि भविजन मानव सोहि पंचम याच्छा तारे ॥४॥ पांचमतिथ आराधा(ध)न कीजें पांचमें अंग अपार आदि शगति निज परसासण जागवीजोगभंडार । Page #41 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 36 अनुसंधान-२९ अलख धणी जे अशूरां हंदो आशूर तेह संभारे शैव धणी शिवलोक कहंदा जैन धणी जिन धारे ॥५॥ आपणो साहेब सोह आराधे सोह धणीना जांणो शेतान हरांमी लोकमें होवें सोही काफर जांणो । आप उसहीकी हमदमें चालें केहर न कीजे कोइ शो युग साहिब आपणो तारे पंचमें पहुंचे सोही ।।६।। मरद महेरी नार नरोत्तम श्राविक श्रावका संगि जोडि मली युगसाहिब समरे अगम आराध अभंगी । मेहरी बिनां कुच्छ हज्ज न होवें वेद न होवें ज्याग देख सीद्धान्त आराधन होवें आद शगत्त अथाग ॥७॥ निजपरशाशण साहेब समरो धर्मधणीनो धारो आगमशाशण पांचमें अंगें आतमा आपणी तारो । गुरुदेवनी आगना ए फरमांण आपणो नाथ आराधो मुनीचन्द्रनाथ धणी त्रिहु लोके पंचमें अंगें लाधो ॥८॥ इति श्री ज्ञानशक्तेश्वर श्रीधर्मदत्तदेव सर्वज्ञ ज्ञानेश्वर प्रकाशिते लोकालोके निज पर निजनिज ज्ञान मायाशक्तआराध निजनिजनाथभजना निजनिजसिध सासणप्राप्ती पंचमांग भगवतिसिधगतः शाशणस्थितिआराध पंचमतीथी कलाकथननन्तरः अथ श्रीषट्जीव पर्जे[श्व]र श्रीमुनीचन्द्रनाथप्रकासिके षद्रव्यादि षटविधीभेद जीवाजीवविचार षष्टमी तिथीकलाहेतु नयज्ञानवांणी : चालः छठे अंगें ज्ञाता सोही छठी तिथ विचारे जोयो जगमांहि जिहांन रचांणी छयेविध काय संभारे । परपंच पुदगल खेल पचीशे छठो जीव जडंदा पांचे द्रव्य ने छठो चैतनः य्युं षट द्रव्य कहंदा ॥१॥ Page #42 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 पांचे द्रव्य अनि परपंची बुझो पंडविचार छठो चैतन साहेब समरो जेहनी परज अपार । त्रिविधा परज त्रिहुविध ठाकुर आपणी आपणी साथि निज पर भेद में भावनी परजा दोयविध त्रिविधां भांति ॥२॥ एम खलक जिहांनमे जोवा साहेब हंदो नूर त्रिविधा भेदमें आलम रीत प्रगट्यो साहिब पूर । षट लोकमही वली नूर खुदानुं केशव कीध निवाश श्रीजिनराज वस्या युगमांहिं एके पिंड आवाश ||३|| घट घट साहिब देख तुं ग्यांनी जीव षटे युगमांहि कहेर न कीजें कोयनो जांणी शाहिब छे सहु पांहि । वेद पुरांणकुरांण सिद्धान्ति जोयो अर्थ विचारी त्रिहु लोक धणी युगसाहिब सोही पिंड ब्रह्मंड मझारि ॥४॥ तेहतणी कुरुणा दिल राखो भाषो साहेब भव आपणो नाथ भजो भगवंत अलष निरंजन देव । खयर महेर नें बंदगी साधो दांन दया दम सोही दांन सील तप भाव त्रणेविध वेद कुरांण सिद्धान्तमे उही ||५|| सार को सहु वेद कुराणें पांच तत्त्व विचार पांचे थावर छठो चैतन हे षटकाय मझार । छठी तिथ देख विधाता लेख्या लेख अपार कीधां कर्म सहुंनें आवें सुखदुख पिंड मझार ||६|| कोय विधाता बीजो नाहीं आपणो आतम जांणो पिंडमे चैतन लोक विधाता पिंड ब्रह्मंड घडाणो । लोक अधीश विधाता लोकें पिंडमें तेह पशारो कीधां कर्म सदालिग बांधें आगल तेह विचारो ॥७॥ जोडी प्रीत अलखधणीसुं छोडो कर्म संभारी ए अवतार जे मानव लाधो मोटो लोक मझारी । 37 Page #43 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 38 _अनुसंधान-२९ जे जेहनो छे साहिब सोहि बंदगी भजना ध्यान मुनीचन्द्रनाथ बडे अवधुत्ता दाखें ब्रह्मगनांन ॥८॥ इती श्रीषट्जीवपर्जेश्वर श्रीमुनीचन्द्रनाथ षद्रव्यादि षटविधि जीवाजीववीचार षष्टमी तीथी कलाकथननन्तरं : अथ श्रीमुनीचन्द्रनाथजी प्रकाशीके सप्तमांगे श्रमणोपासकसेवकपदस्थिति धर्मस्वजनसंगसामीसेवक स्थितिस्थापना सप्तमी तिथी कलाहेतु नयज्ञांनवांणी : चाल: सातमें अंगें साथ सज्यो हे सातम तथ वखाणा जालम जेह वडा जोगेस्वर जे गुरु पीर वंचाणा तेणे सेवक साथमे लावो श्रावक पंथ सुधारे देख मुरीद जे साहिब हंदा भावें भक्ति विचारे ॥१॥ षटदर्शन उपासक होवें आपणो तीरथ साधे धर्म धणी जुगधोरी ध्यावें नाथ निरंजन लाधे । साहिब हंदा मानव मेली वाछल हेत विचारो साजण ए दुनीयानां सरवे तेमांहि नाथ तुमारो ॥२॥ जे कोए साहिब हंदा सूरा पंथ वहंदा पूरा ते सहु साजण ताहरां बुझो साहब तेह हजुरा । जीत जतीवृत हे गुरु पीर सेवक सेवा सारो धर्मधणी जिनराजनो मांडें नाथ भजें युग पारे (रो) ॥३॥ वेद पुरांण कतेबि वांचें जोये सिद्धान्त विचारी जे फरमांण हुकम चलायो आगन्यां सोह संभारी । आपणो साहेब जे देखलावें तेणें पंथ चलंदा केहर कमाइ हंसा छांडें सोहि साहेब हंदा ॥४॥ साहिबना छे सोही साचा कुडा केथ कमा केहर थकी जे दोजग पांमे भिस्त कहांथी पावें । Page #44 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 39 दोजग नर्क पयाले बंधो कीधां कर्म हरांमी सिध निरवाण जे भिस्त न पाइं हुयो दोजग दामी ॥५॥ एह संसार अथाह अनोधो आलम खेल अपार ते भवसागर मांहि पडतो भुलो भव मझार । म भूलो मानव सातम उगो सात कला शशी वाधी सेवक होय में सतगुरु सेवो साची सेवा लाधी ॥६॥ सात वशन नीवारो भाई साहिब साथ सगाइ साचे साहिब साच मांने जेसी कीध कमाइ । साहिब हंदा जेह कहंदा साचा शान्त सधीरा सेवक होई सेवा सारे जालम जे गुरु पीरा ॥७॥ जालम हि जगनाथ जिणेशर तीर्थधणी युग छाजें अलख नीरंजन तेथ आराहो भवनां बंधण भाजें । साहिब साथें प्रीत सजोडी साची सेव करंदा मुनीचन्द्रनाथ बडे अवधुता युं निरवांण लहंदा ॥८॥ इति श्रीमुनीचन्द्रनाथगुरुप्रकाशिके सप्तमांगे श्रमणोपासकसेवकस्थितिस्थापना सप्तमीतिथीकलाकथननन्तरः अथ श्रीमुनीचन्द्र-नाथप्रकाशिके श्रीयोगारंभे योगनिधिज्ञाने लोकनालब्रह्मंड चैतन्यशक्तीस्वरूप अष्टमी तिथी कलाहेतु नयज्ञांनवांणी : चालः आठमो अंग अणुत्तर बोलें आठमि तिथ वखाणो आठम लोक अपार कहंदा पंड ब्रांड पछाणो । चउद भवन सगत जे उभी वेद कुरांण वखाणे आद शगत जे बीबी हवां छे आगम शाशण जाणे ॥१॥ आदि अगम युगे धणीयांणी पीठ ब्रह्मंड रचाणी पुदगल खेल रच्यो एह काया एह षट् द्रव्य समाणी । Page #45 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 40 अनुसंधान-२९ दो विध त्रस्य ने थावर देही पिंड सवे युग पुर्यो चैत्यन्य आपसत्तामांहे साधे जोण भरी जग जुर्यो ॥२॥ वसनाडिमहि तुं देखत वांछां पंड ब्रॉड विचार षट् चक्र रचीनें षोहण बांधो मांड्यो गर्भ मझार ।। सात पयाले जे साव धरंदा साते दोजग जांणो मुलसठाणे नाग मंडाणा चहुविध पंकज थांणो ॥३॥ गणाधीपती असुराहद्दनायक वामी दाहेणवासो गुझ तणो षटपंकज खोलो भवनपती जिहां भासो । ब्रह्मा सासणनो छे सामी असुरां राज चलावें वांमी दाहणनाडिमां बुझो बीजो चक्र बनावें ॥४॥ नाभीमंडल केसव बेठो दशेविध पंकज दीसे मेरुथकी जे मूल मंडाणो देख असंख्या द्वीपें । मानव लोक कह्यो इण भौमी तीरज जोण अपार त्रीजे चक्र थकी छे ताली नीशरीयो युगपार ॥५॥ शौधर्म आदि द्वादश लोके पंकज बारे बोले आठदलां अध पंकज जोतिक मनराजा जिहां डोले । अनाहद चक्र महि शिवशाशण वामी दाहिण नाडि सोले पंकज पीठ रचाणो ग्रीवामंडल वाडि ॥६॥ आगे भुह अनुत्तर आवें पांचे. इंद्री प्राजो त्रिविधा तत्त्व रह्यां तिण थांने पंकज दोयसरा जो । ब्रह्मतणो जे थान अणुत्तर जिहां गुरु पीर जगाडे हजार दलें जिहां खेल रचाणो आगमपंथ आखाडे ॥७॥ ध्वन्य अनाहद्द घंट गरजे चोसठ मणना मोती चोसठ पंकजमां ध्वन गाजें जांण जलामल जोति । आगि चक्रशिला छे तालुं ते परसिध कहंदा अलष धणी जुगसाहिब सोही बेठो राज करंदा ॥८॥ Page #46 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 41. आठम तिथ आराधन कीजे शाशणदेव संभारो पिंडब्रह्मंड परज अनंती मांहें नाथ तुमारो । आदिनि योगणनें शिर बेठो आदि निरंजण जोगी आठमतीथ आराहण कीजें निज साहिब उपजोगी ॥९॥ धर्मधणी जिनराज जगाडें तीरथभेद अखाडे पिंडब्रमंडमें तीरथ थापी साहिब सांत जगाडें । आठम तिथनें चंद उजालो टालो अंधेरी रात मुनीचन्द्रनाथ बडे गुरु पीर बेठे साहिब साथ ॥१०॥ इति श्रीलोकनालज्ञानेश्वर श्रीमुनीचन्द्रनाथप्रकाशिते योगनिधिज्ञाने लोकनालपिंडब्रह्मंडे चैतन्यशक्तव्यापक अष्टमीतिथीकलाकथननन्तरः अथ श्रीनवरसज्ञानेस्वर श्रीमुनीचन्द्रनाथजी पर्मजोगेश्वरप्रकाशिते श्रीनवरसरूप नवरंगपारब्रह्मनिजजगदीशर केवलस्वरूपपिंडब्रॉडे दर्शनतत्त्व नवमी कलातिथी नवमांगे हेतु नयज्ञानवांणी : चालः नवमें अंगें अंत करंदा नवमी तिथ वखांण नवमें जे गुणठाणे आयो होसे केवलनांण । केवलज्ञांनतणो भंडार नाथ अमीणो सोही देखि जिनेशर जालम जोगी गाजे ज्ञानमे जेही ॥१॥ नवरंग केवलना[ह] हमारो नवरस रूप बिराजे माथे छत्र धर्यां छे त्रण्ये अनहद नोबत गाजें । शीशे मुगट मणी सोहंदा कुडल कांन कलंदा पंचरंग पीतांबर मेखल पेंहरां बाजूंबंध जडंदा ॥२॥ हार अनोपम कंठें राजें मोहनमाला छाजें आगे चक्र धर्यो धणी मेरे तीन भूवनमें राजे । उंची इंद्रध्वजा फरराइ त्रीगढ कोट हवंदा चैत तणी च्छाया युगसाहिब बेठो राज करंदा ॥३॥ Page #47 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 422 अनुसंधान-२९ साहिब बेठो देख सिहासण चामर चिहुंदिश ढालें नवरंग हमारो केवल सांमी आगे सेवक भालें । इंद्र सजोडो नवरस नाटक साहिबना गुण गावें देख धणीनी केवललीला जोगारंभ जगावें ॥४॥ साहेब जोग जगाडे साचो भोगतणो भंडार नाथ हमारो हे नवरंगो दीठो तेह दीदार । युगधणी युगयुगो आदि केवल धर्म जगा. भक्त-उधार करे भगवंता आगमपंथ अषाडे ॥५॥ ए नवरंगो साहिब निरखी सेवक साहेब हुंदा भजन भजंदा भाव करंदा युं फरमाण वहंदा । देख अलेखधणी युगराजा कीरत देव करंदा तुं बहोनामी अंतरजामी केवल आदि जिणंदा ॥६॥ नवरस केवल नवलकलामें नवरंग सील धरावें नवधा विध वाड करी ध्रम रोप्यो आगमपंथ जगावें । नवदुरगाइ मंगल गावें योगण छप्पन्नकुमारी शाशणमाता जोगधणीयांणी धर्मधणी शिर धारे ॥७॥ जिनशाशननी सामण साची केवलरूप धरंदा युगधणी लखमीवरलीला बेठो राज करंदा ।। त्रिभोवनटीलो देख धणीने राग छत्रीशे रंगे मांड्यो नाटक खेल त्रिभंगी वाजा सघलां वाजे ॥८॥ नवरस केवल नेह जगाडे इंद्र अखाडो मांडे जागवयो जिणशाशण जंगी कीरत्त हे त्रिहुं खंडी । केवलसामी आतम पांमी देहीमा राज करंदा मुनीचन्द्रनाथ बडे जुग जालम सोही साहब हंदा ॥९॥ इतीश्रीनवरसज्ञानेश्वर श्रीमुनीचन्द्रनाथप्रकाशिते निजजगदीस्वर Page #48 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 नवरसकेवलस्वरूपदर्शननन्तर अथ श्रीमाहाविद्याज्ञानेश्वर श्रीमुनीचन्द्रनाथजी प्रकाशिते दशमांगे दशमाहाविद्या श्रीजिनशाशणमाहालब्धीसिद्धीकरण ज्ञान तथा प्रकृतिमायास्वरूपप्रकाश दशमीतिथीकलाहेतु नयज्ञांनवांणी : चालि: दशमें अंगें देवी दाखां देख दया कुरुणाली साधां केरी सासणमाता आगमअंगिं भाली । दशे विद्या दशमी तिथ देखो दोयविध वेद वंचाणी हंसा सासण लोक मंडाणो कुरुणा हे निरवाणी ॥१॥ करामात नें विद्यालबधी परशाशण परमांणो हंसा मात वडी हीदवांणी फोरवणा फरमाणो । करामात कत्तेब कुरांणी वांचे विद्या वेद वखाणे आगमशाशण लबध वतावें साध जके सोही जांणे ॥२॥ मंत्र मंडाण विद्या परशाशण आतमशक्ति अपारे साध माहाबल फोरवी साधें रूप रचे वसतारे । ए परसासन केरी माता हंसा रूप वखांणं विक्रे लबध करे बलवंती देखो लोक रचाणं ॥३॥ लोक तणी जे माया सघली हंशादेवी भेद सुभाशुभ लोक पसारो साधें बोले आगम वेद । केवलमाता हे कुरुणाली सिधतणी धणीयांणी सीधतणा जे शासन वाधे केवल छे निरवांणी ॥४॥ केवल लबध पमाडे सोही अतीसय विद्या उपें करामात धणीनी देख जगाडे केवल मंडप जोपें साधा हंदी सामण माता तारण देव दयाली संवररूपें साध सुधारे आगमपंथ उजाली ॥५॥ आश्रव हंसा हे परसासण लोकतणो वसतार संवर ते निजसासण सिधा केवल लोक अपार । 43 Page #49 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 44 अनुसंधान-२९ करम निवारो आश्रव टालो संवर भालो भाइ लोक थकी परलोक सिद्धान्तें जोति जोत समाइ ॥६॥ दशे विद्यामांहि लोक मंडाणो बहुलो छे विसतार आगे केवल अगम जगा. सोल विद्यामांहि सार । जेणा जीवतणी तुमे राखो भाषो आगम भेवा निज पर विद्या शाशण साधो दाखी , जिनदेवा ॥७॥ विद्या खोल वखार ज मांड्यो तीर्थधणीनो थापो पाषंडवाद सवे पर छेदो आगम केवल जापो । चवदे पुरव शाशणविद्या दशमें अंगविचार परशाशण पेहले खंध विचारो बीजे छे निज सार ||८|| एह दोयतणी विध जांणी साधे जेह जोगेश्वर मोहोटा जोगतणा घरमांहे सरवे सिधतणा छे जोटा । परकृती माया केवलमाया जोगतणा घरमांहिं जोगतणी जे माया जागे देख जोगेस्वर प्रांहि ।।९।। जीत जतीवृत सुरा जीपें पंच माहावृतधारी आगमविद्या देख आराहे आपणी शक्त संभारी । श्रीजिनशाशण आगममंडल केवल ते विध जांणे मुनीचन्द्रनाथ जोगेश्वर जालम आगम पंथ वखांणे ॥१०॥ इति श्रीदशमांग माहाविद्याज्ञानेश्वर श्रीमुनींचन्द्रनाथजी दशमांगे दशमाहाविद्या हंसा तथा दया आश्रव संवररूप श्रीजिनशाशननिजपरविद्यालबधी सिद्धीकरण ज्ञानमाता दयाभगवतीस्वरूप एवं द्विविद्धा चैतन्यपर्जयः शक्तज्ञानदेवी दशमीतथीकलाकथनंनन्तरः अथ श्रीएकादशमांग सर्वज्ञ ज्ञानेश्वर श्रीमुनीचन्द्रनाथजीप्रकाशिते एकादशमांगे कर्मविपाकनिराकरण सर्वज्ञ कलाप्रकाश एकादशी तिथीकलाहेतु नयज्ञांनवांणी : Page #50 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 45 चालः आगें तिथ अग्यारे अंगें करमविपाकनें छोडो आव्यो देख इग्यारमे ठाणे आगें केवल जोडो । अंग इग्यार लखावो भाई साधांने तेह दीजें विद्यासासणनें विसतारो आगमपंथ ठवीजें ॥१॥ रुद्र इग्यार क रचाणो (?) ते परसासण भाषे ते परपंच विपाक छंडावो अंग अग्यारनी साधे । पडिमाभेद एकादश मंडो आतमचंद उजालो तीरथनाथ धणीनी वांणी तीरथ आप संभालो ॥२॥ सूत्रतणी जे विद्या जांणो सोही साध सधीरा वेदपुरांण कुरांण पच्छांणो जालम च्छे गुरुपीरा ॥३॥ जे जिनराज भजे भगवंता श्रीजगनाथ जिणंदा त्रिविधा जे परमेश्वर मांहें केवल आप कहंदा । वेद पुरांण कुरांण सिद्धान्ते जोयो अर्थ विचारी पारतणो पुरसोत्तम बेठो अणकरता अधिकारी ॥४॥ . करता दोय कहो परमेश्वरः अलष नारायण आपें संकर लोकधणी जे साचो भौण बहेविध थापें । ब्रह्मा केशव रुद्र कमावें वसतरयो युग वेद अंग अग्यारे आगम मांड्या सासण सिधसंवेद ॥५॥ मारग ए छे सीधां हंदो सूरा तेह पच्छांणे. ए जिनशाशन उजल अंगें आगम वेद वखांणे । पर करता परमेश्वर दाखें बोली वेद कुरांण लोकतणी जे लीला देखें करमतणें मंडाण ॥६॥ आपतणो परमेश्वर केवल सिधतणो जगदीस दोयविध आगे करत वसंभर शाशण दोय जगीस । Page #51 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 46 अनुसंधान-२९ अंग इग्यारे आप भणीने साधो संजम सार पार तणी जे लीला पामो आगल ऋधि अपार ॥७॥ सूरा वीरा साध हवंदा पंथ चढंदा पूहरा जीत जती जोगेसर जालम साहेब तेण हजुरा । धोरी धर्मतणा धरजुत्ता तीरथ संग उधारि अंग इग्यारेही यागम भाषे केवलनाथ संभारि ॥८॥ छोडि कर्मतणां फल कडवां सुखदुख लोक संसार एह वीपाकतणां फल जांणी धर्म धरै निरधार । धन्य जके नर नारी ध्यावें श्रीजिनराज जिणंदा मुनिचंदनाथ इग्यारे अंगि केवलरूप कहंदा ॥९॥ इती श्रीएकादशांगेस्वर श्रीमुनीचन्द्रनाथप्रकाशिते कर्मविपाकनिराकरण सर्वज्ञ । चैतन्य स्वरूप कलाप्रकाश एकादशी गुणस्थापन केवलपर्जाय स्फुरत एकादशी तिथी कलाकथननन्तरः अथ श्रीदृष्टिवाद द्वादशांगेश्वर श्रीमुनीचन्द्रनाथजीप्रकासिते द्रष्टीवाद सिधान्तमूल बीजादिसवीस्तरसर्वज्ञभावप्रकाश तथा कर्मउपशमक्षिपकश्रेणी द्वादशी तिथी कलाहेतु नयज्ञांनवांणी : चाल: बारमे अंग तिहां थित( तिथ) बारस बारकला उजवालो द्रष्टीवाद में चवदे पूरव चोथो भाग संभालो । असंख्य समुद्रे उपम आखी विद्या एवडी भाखी लोकतणो वसतार लखांणो अलख निरंजन साखी ॥१॥ देख भले वली पुरण आगें ते महि अगम अपार पुरण ब्रह्म कह्यो परसोत्तम आदि शगत मझार ते पुरणब्रम माहेथी प्रगटें दोविध शक्त वखांणो इच्छा शक्त अपार धरे छे क्रीया शक्त कमांणो ॥२॥ Page #52 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 एह दोय लीटी पूरण आगें तेहतणो विशतार पूरण मांहे लीयो परमेश्वर मांड्यो लोक संसार । आदें तकार उपायो ते मांहें त्रण्य विचार देख अकार उकार मकारे त्रपदी ते वशतार ॥३॥ राजस तत्त्व तमोगुणमांहें ब्रह्मा विष्णुमाहेसा त्रिवधा आपणी शक्त वधारे मांहें आदि जिणेश । एह मुल मंडाण को संसारनो कंद कह्यो वृक्षमुल ॐ कार तणी ए रचना बावन अक्षर स्थुल ||४|| लोक चउदतणो ए सासण मांड्यो वेद मंडाण पुरणमें प्रगट्यो परमेश्वर ए दष्टीवाद वखांण । बावन अक्षरथी बहो वाधें दृष्टिवाद अपार पुरणथी संसार वखांणां अनन्तघणो वसतार ॥५॥ चउद भवन तणी जे लीला हेक प्रमाणुंए आदि द्रष्टिवादमें सरवे दाखुं लोकतणी गत लाधें । चेतन सामी परज अनंती एक पिंड निरधार एम अनंता जीव अनंते चउद भुवन मझार ||६|| द्रष्टवादें साहिब देखें एक परजथी आदि लोकालोकतणो वसतार साहिब जांणें वादि । साहेबथी कुच्छ छांनो नांही जांणे सहु जगदीस बारमें अंगें बोहोविध भाषें बार क्रीया जुग ईश ||७|| देख विभंग त्रिभंगीरूपें परसासण परमाण द्रष्टीवाद भणें भवसागर आगमभेद मंडाण । द्रष्टिवाद जिहां भव तायो अलख अगोचर माया मुनीचन्द्रनाथ योगेश्वरजी तो कीधी केवल काया ॥८॥ इति श्री दृष्टिवाद द्वादशांगेस्वर श्रीमुनीचन्द्रनाथप्रकासीते दृष्टीवाद - 47 Page #53 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनुसंधान - २९ मूलबीजादिसविस्तरपुर्णब्रह्ममध्यात् सर्वदृष्टीवादपयां (?) त लोकविस्तार द्वादशमी तिथीकलाकथननन्तरः अथ श्रीतल (त्त्व) ज्ञ संयोगकेवलज्ञान लोकालोकप्रकासिक चैतन्यब्रह्म निजनिजस्वरूप निजनिजविद्यास्थिति तेरसतिथि कलाहेतु नयज्ञांनी (न) वांणी : 48 चाल: तेरस जांणो आतम हंदो: तेरस तेथ वखांणां तीरथनाथ धणी युगसाहेब तीरथ तेथ पच्छांणां । जोग संजोगीय केवल हुंदा तेरस तिथ उजवालो चंद चढ्यो चढति युग जोति देख निगम निहालो ॥१॥ अनत अपार अगम निगमे साधा हंदो सांइ तेरस बुझ्यो तेरस ठाणे पंड ब्रह्मंडा मांहें । पिंड ब्रह्मंडमें देख प्रसारो साहिब सरव सुजांण असंख्य प्रदेश अनंता परजें मांड्यो तेथ मडांण ॥२॥ अनन्त अनंतो भेद विचारो एक प्रदेश मझार एम अनंत ब्रम (ह्म) सुधारस आतमज्ञांन अपारि । भौमसत्तारा देख निरंजन वांचे तेथ कुरांणं आप अलखधणीनें लाधो निगम लह्यो फरमांणं ॥३॥ केवल ब्रह्म लह्यो कुंरुणानिध वांचें वेद पुराणं ब्रह्म नारायण हे माहाविष्णु निरगुणनाथ वखांणं । केवलनांण कहे अरहंता आगम वेद वचांणं सिधांतसिरोमण यार लहंदा युं भगवंत सुजाणं ॥४॥ तेरसमांहे खलक रचंदा देख ब्रह्मंड अपारि लोकालोकतणा जे शाशण दीठा देही मझारि । अलखनारायण देव जिणंदा बुझ हवंदा बोहोली त्रिहुं युग लोकधणीनी परजा ब्रह्मज्ञांनमें खोली ॥५॥ Page #54 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 केवल ब्रह्म लो कुरुणानिध साहिब केवलनाथ केवल सक्त अनंती परजा खेले साहिब साथ । पांचे ज्ञांनतणो परिवार श्रुतसखी निजसंग नाथ निरोत्तम हे नवरंगो राजत हे रसरंग ॥६॥ तीरथनाथ धणी त्रिहुं लोकें मांड्यो तेथ मंडांण केवलभाषित धर्म जगाडो तेरस पार वखांणं । बारे अंगथी तेरस बुझें तेरे क्रिया तिथि साधें धन्य जीके नर नार धणीनां आगमपिं (पं) थ आराधे ॥७॥ तेरस लाधो तत्त्व निरंजन केवलज्ञांन अनंतो केवल पर्य रमे कमलापती केवलराज करंदो धन्य जीके नरनार अनंतो धर्म धडे करी ध्याव्ये (?) तेरस बुझे तेथ चढदा साहिब हंदा कावें ॥८॥ तेरस लोक में नाह ज साधें तेरस हें निरवाणं केवलभाषीत धर्म जिणंदा दाखे ते फरमाणं । केवल पंथ जती जीहां होवें धर्म शती जती जांणें मुनीचन्द्रनाथ जती जुग जालम तेरस केवल मांणे ॥९॥ इति श्रीतत्वज्ञसंजोग केवलज्ञांनपर्जेस्वर श्रीमुनीचन्द्रनाथप्रकाशिते चैतन्यब्रह्म निजनिजस्वरूप निजनिजविद्यास्थिति अनंत अनंतार्थ माहा केवलरस प्रकाश तेरसतिथी कलाकथननन्तर अथश्री सिधतत्त्वज्ञांन चैतन्य अनंतपर्जेस्वर श्रीमुनीचन्द्रनाथजीप्रकाशिते उपयोगज्ञांनशक्तिआराध सिधसासणस्थितिकरण माहारसवच्छल आगमआराध चतुर्दशीतिथी कलाहेतु नयज्ञांनवांणी : चालः चतुर्दश साधी आगम वाधि तेथ कीया फरमाण चउद भुवन संजोगनी बाजी संक (के) ले निरवाणं । चउदकला शशी सोह चढदा चउद भवन उजवालो आतम देश प्रदेश भरंदा जोण झलंदा टालो ॥१॥ 49 Page #55 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 50 अनुसंधान-२९ चउद भवन तिणें सीर सांइ ते दिश तिथ हकारे पंथ वहंदा साहिब हंदा जाए ज्योति मझार । चउदश पूनम तीथ उजाली पोसह परव आराहो सामीवच्छल साहिब हंदो तीर्थधणी जुग ध्यायो ॥२॥ आगमपंथ चतुरदश मोटी आगम शाशण ओपें ज्योति झलामल सिधा हंदी केवल मंडप जोपें । जोति जोत जगावी जोगण उपयोगण तिहां आवें अजोग धरी उपयोग चढंदां पुन्यम तेथ चलावें ॥३॥ लोकतणी संयोगण जोगण योग संकेलण कीधा सिध अनन्तसगतधणी छे जोगण ज्योति जगाइ आपणी शक्त अनंतीय जोगण लेई मिलो तिहां भाई ॥४॥ चउदे कांडना वेद जे च्यारे पुरव चउद पसारो दृष्टीवाद चवद भवने मुक्यो एह वखारो । उपयोगण वेद आराधे आगल सिध अनंता जेथे केवल लोक अनंतो वासो पंथ लीयो निज तेथे ॥५॥ चतुरदश साहिब तेथ संभारो आगमधर्म विचारो केवल गुरुजी ज्ञान देखा. आगम सिध अखाडो । केवल सदगुरु पंथ वहंदा शिष्य चढंदा साथें धन्य जके नरनारी परजा वलगा सदगुरु हाथि ॥६॥ इणविध आपनी पर्जना मानव सदगुरु साथि लीधा सूरा वीरा साथ सजीने पंथ प्रयाण ज कीधा । एह अजोग में जोग जे आगें तेह नगर दिश चाले केवल सदगुरु केवल परजा देख अगमपंथ हाले ॥७॥ चतुरदश बुझो केवलमांहि एह अगमतिथ आखी नित निवाज नि संध्यावन्दन पडिकमणां बुध भाखी । च्यारे यार ने च्यारे ही माणस चतुरविध संघ मिलावें वच्छल पोस करंता चाले आप धणी निज ध्यावें ॥८॥ Page #56 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 ____51 51 इण विध आतम देख अजोगी केवल पंथ कमावें अगम अगाध माहातिथ आखी बुझें केवल भावें । चवदश भेद तणा पडछंदा केवल बुझ कहंदा मुनीचन्द्रनाथ हुये अवनासी निगमपंथ चढंदा ॥९॥ इति श्रीसिधतत्त्वज्ञांने चैतन्यपर्जेश्वर श्रीमुनीचन्द्रनाथजीप्रकासीके योगज्ञांनशक्त उपयोगज्ञानशक्त चतुर्दशगुणस्थांनकस्थितीउपयोगकलासाधननिरगुण सिधस्थांनप्राप्ती सिधसासणस्थितीकरणमाहारसवच्छल आगमआराध चतुरदशीतिथीकलाकथननन्तरं ।। अथ श्रीपंचदशीपर्मसिधस्थांनथीती(तिथि) ज्ञानेश्वर श्रीमुनीचन्द्रनाथजीप्रकाशिके श्रीनिज पर आद्य अनाद्य ब्रह्मराजलीला पंचदशीतिथी कलाहेतु नयमाहाज्ञांनवांणी चालः पुरण तिथमें हुयो उजवालो पुनम चंद पशारो पूरण देख पन्नरमा लोकमें अलख धणी निरधारो । पन्नर कला परसिध अनादि अलख नारायण राजा परम अनंती सीध अनंता लोकालोक अवाजा ॥१॥ सोल कलानो सांम हमारो सो निज परज विचारो श्रीजिनराजनगरमंहिं राजा अनन्तकला निरधारो । अनन्त अनन्त कलाने थोकें एक कला निरधार एहवी कला पन्नरे सिध एके सिध अनन्त अपार ॥२॥ आदि सिध कह्या परभेदें एक करतारथ प्राजा एहवा सिध अनन्त अनन्ता एक अनादिक राजा । एम अनंता दोष अनादिक पन्नरकला प्रभु राजे परमधणी परता परमेश्वर अलख अगोचर गाजें ॥३॥ अकर्ता ब्रह्म अगाधमें गाजें परविध दोय पराजा परजा लोक अनंती प्राझी पन्नरलोकमें झाझा । अनन्त अनन्त कला बहु एके एहवी सोल विचार सोल कलाना सिध हे आदिक सिध अनन्त अपार ॥४॥ Page #57 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 52 अनुसंधान-२९ अनन्त अनन्ता सिध मिलीने तीर्थधणी, तेज चढती चढती सोल कलाना आदिक सिध सहेज । एम अनंता आदिक सीधा तेज अनन्त अपार एक अनादिक सिधकला छे सोल कला विस्तार ॥५॥ एम अनंता सिध अनादिक तेज मीले ततसोही एक धणी युग सिध अनांदिक एम अनंता तोही । ए निज सासण सोल कलाना सिध अनन्त अपार साद्य अनाद्य चढंता जोतें तेजें तेज मझार ॥६॥ अनन्त अनादिना सिध अनंता निज पर निगम शरूपें तेमांहें नाथ वडेरा बुझो त्रिहुं जुग परजा भुपिं । आदितणा जे सिध अपारि अनन्त अनंता आवें निजना निज रहें निरवांणे परना लोक पठावे ॥७॥ सीध अनंता परज अनंती त्रिहुविध ठाकुर राजें देख अनंता साहिब बेठा अनहद राजमें गाजें । अनादितणा जे सिध कह्या , आपण आपण भेदें तेह तणा जे तेथ हवंदा देखो निगम संवेदि ||८|| निगमें वेद कुरांण सिधान्त तेथ अच्छे त्रिहुं वेद राज अदल चले सीध हंदो अगम नगरमांहे भेद । तेथ अनंती केवलविद्या अनन्त अनंते भेदें तेह अनंतामांहेथी आवी एक कला इण वेदें ॥९॥ वेद पूरांण कुरांण सिद्धान्त तेहतणा विसतार चउद भुवनतणी जे विद्या दीशे खेल अपार । आदि आनादना सिध अनंता उजल लोक अपार निज पर सासण नगर संपूरण पन्नरमो निरधार ॥१०॥ अलख निरंजन आदि गुंसाई ध्येय नारायण धांम श्रीजिनराज भजे भगवंत साहिब केवल साम । Page #58 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 केवलरांणी श्रीभगवती केवलकमला च्छाजें सिधनगर रखवाली सासण केवलजोगण गाजें ॥११॥ अलख धणी जुगसाहिब साचा केवल राज करंदा करत विसंभर आदि जिणेशर पुरण राज धरंदा । शिवपुर पाटण भिस्त मदीना सिधनगरी नीरवांण मुनिचन्द्रनाथ नगरमांहि आए कीधो वास पुराणं ॥१२॥ इति श्रीपंचदशीसिधस्थांनस्थितिज्ञानेश्वर श्रीमुनीचन्द्रनाथजीप्रकाशिते श्रीनिजपर आदि अनादिक सिध ब्रह्म अनन्तअनन्तकलाराजलीलापंचदशीसिधतिथीकलाकथननन्तरः अथ श्रीषोडशकला श्रीसिधज्ञांनशक्तेस्वर श्रीमुनीचन्द्रनाथजीप्रकासिके आदिअनादिकशिवसीधपुरनगर श्रीराजलीला सोलसमीकलाहेतु नयज्ञांनवांणी : चालः सोल कला संपूरण सामी सासण राज करंदा नगरतणे विच मोहल विराजें श्रीजिनराज करंदा । सिध अनंतामांहें सामी केवलछत्रधरा जे सिध अनंता छत्रपति हे अगम केवलरीध गाजें ॥१॥ सोल कलामें अनादि अनंती सिधतणा परिवार ते निजसासण साहेब सोहें छत्रधरा निरधार । तीर्थधणीनी परज अनंती आदिक सिध अशेश राजा परजा निज निज सामी केवलराज नरेश ॥२॥ अनादिक सिध अनंतामांहें मुले विच विराजे सोलकला संपूरण सरवे सत्तर तेहनें छाजें । सोल कलानो भेद संपूरण सत्तर कलामांहें पावें अगम अगाधधणी धर राजे कोण केवल तेह गावे ॥३॥ Page #59 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 54 अनुसंधान-२९ सत्तर माहेली एक अनंती सोल कला वसतार सोलकलानी ए कलामांहें परज अनन्त अपार । एक परजनी सोल कलानो सिध कह्यो निरधार ए सिध सासण सिधां हंदो आगम अगम अपार ॥४॥ सत्तर कलानो मूल अनादि एक कला तेह बुझो एक कलामां सिध अनंता तीर्थधणी तीहां जुझो । तीरथनाथ अनादिक राजा तेहनी परज अनन्त सोल कलाना सीध अनंता एक धणी माहंत ॥५॥ आदियो तीरथनाथ धणी जे मूल अनादिकवंशी आदिक सीधतणो परीवार सोलकला शिवतंसी । एम अनादिकना धणीनो सोल कला वसतार आदिक तीरथनाथ धणीना सिध अनन्त अपार ॥६॥ ए सिध सासण सिधा हंदो सिधपुर पाटण राजे रिध अनंती सिधा हंदी कोट कलानीध गाजें । एकेका सिधनी सोल कलामां सिध अनन्त अशेश एक कलामां परज अनंती सोल कला शनिवेश ॥७॥ एक परजनी सोल कला जे एक कला निरधार ए ब्रीडमें एक कलाना जीव अनन्त अपार । ए सिधसासण सिधा हंदो आगम हे वसतार भविजिन जीवसत्ता सिध वाधे सिधनगर वशतार ॥८॥ सर्व अनंती ऋध संसारे एक कलामांहें माये एक कलामांहें अनंत अनंती एहवी सोल कहाए । एहवी सोल कलानो सीध परजानो छ सोही एहवा परजना सिध. अनंता एक तीरथपत जोही ॥९॥ एक तीरथपति एक कलामां एहवी सोल विराजे एहवा सिध अनन्त अनन्ता आदि अनादिना गाजें । Page #60 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 पन्नर कलाना पर परमेश्वर तेहनी परज पराझी सोल कलाना निज परमेश्वर परज अनन्तमे बाजी ||१०|| तीर्थधणी जे अनंता सिधा तेहनो तेह परीवार अनादितणा जे सिध अनंता निजनिज ते निरधार । ए परिवार अनंतो सीधां सोल कलानो सरवे सत्तर कलानो स्वामी वीचें अगम निगम अभेवें ॥११॥ ए सिधसासण अलख अपारें ज्योतिलिंग मझार अवगाह अनंतो ज्योति झलामलमाहें नगर वसतारे । त्रीवली त्रीगढ तेज अनंतो सिध अनंतामांहि नवरंगो केवलनयर विराजे केवल तेथ अगाहिं ॥ १२ ॥ अलखधणी गतवरला बुझें पारनगर वसतार केवलज्ञांन कलामांहे देखें एक अनन्त अपार । लोकालोक अलोक अलोकां बुझें पार पच्छाणं मुनीचन्द्रनाथ धणी निज पाशि पारसनाथ वखाणं ||१३|| इति श्री सोडसकला श्रीसीधज्ञानेशक्तेस्वर श्रीमुनीचन्द्रनाथजीप्रकाशिते आदिअनादिकसिधपुरनगर श्रीराजलीला सोडसमीकला। इति सोलकला संपूर्णः । ज्ञानवाणी समाप्तः ॥ अथ श्री आगमविद्या केवलज्ञांनपर्जेश्वर श्रीमुनीचन्द्रनाथजीप्रकासिके सुध भौमीनीवास तथा आगमसारवांणी माहातमकथन हेतु ज्ञांनवांणी ॥ चाल: पारसनाथ धणी परमेश्वर सिध अनादिक राजा मांहिं आदिक पार सिधा नाथ अनंत प्राजा । इण चोवीसें पारसनाथ तीर्थधणी युगराजे पारससासणमां जेह सिझें तेह धणी तेह छाजें ॥१॥ 55 Page #61 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 56 अनुसंधान-२९ पारसनाथ प्रभूनो अंसी पुत्र सदा निज साचो नाथनो पुत्र जे नाथ कहावें आगमवांणमे वाचो । मुनीचंद्रनाथ धणी अवधूता पुरणब्रह्म गुसाइ सिधनगरमांहिं झंडा रोप्या पारसनी ठकुराइ ॥२॥ पारसनाथ तणा जे पुत्ता जालम हे अबधूता छत्रधरा जोगेश्वर छाजे धर्मधणी धर्मदत्ता । त्रीगढ ज्योति झलामल नयरी उजल भोम अवतार पारस राजतणी हद्दमांहें शाशण सिध मझार ॥३॥ सोलकलासंपूरण सिधा जोगारंभ जगाड्यो मुनीचंद्रनाथनी नोबत गाजें मांड्यो धर्म अखाडो । घोर गगन[में गरजे गाजें अनहद भेरी वादे नवरंगा नेजा धज फरुके छत्र धणीशिर च्छाजें ॥४॥ मुनीचंद्रनाथ धरमदत्त देवा कोटीध्वज कहावें केवलज्ञांननी जोत अनंती जोतें जोत जगावें । निज परजा नवरंगी सोहें तीरथ च्यार प्रकारे ग्यांन कला गुरुजी हीत दाखें आगमनें अधिकारी(रे) ||५|| पन्नरे तीथमाहे वांण अनंती भाखी आगम भेवा वेद कुरांण सिद्धांत विचारी काढ्यो माखण देवा । माखणनो वली घृत कीयो हे अगम माहानिध पारे लोकालोकधणी परमेश्वर भाख्यो आगमसारे ॥६॥ केवलज्ञांन अनंत कलामें आगमवाणी वखांणि श्रीजिनराज जोगेश्वर गायो पार परम पीच्छाणी । आलम खलक अपार अनंती युग परमेश्वर जाणे वेद पुराण कुरांण सिधांते आगमभेद वखांणे ॥७॥ सोही साहेब आप संभालो ध्यान धरो निज राजा भव जल सागर पार उतारें सरसे सहि वि(नि)ज काजा । Page #62 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 57 केवलवाण कथीपो भाख्यो भणसे जे नरनारी तेहनी सामीण तेहने तारें केवलधांम मका(झा?)री ||८|| धन्य धणीना जे जगमाहे धर्म सदालिंग ध्यावें मुनीचंद्रनाथजी आगम भाखें होस्य कोडि कल्याण ॥९॥ इती श्रीमुनीचंद्रनाथप्रकाशिके द्वादशांगसारउधारे माहाआगमब्रह्मसिधान्त ब्रह्मज्ञी चैतन ब्रह्म विचार पंन्नर तिथीकलाहेतुनय तथा सोडशसिधकलाहेतुनय अनन्तार्थनिजपरचैतन्यकलारूपब्रह्मसिधान्तवांणी समाप्ता । दोहरा ॥ आगमसारउधार रस पुरण केवलज्ञांन । सोलकला संपूरणें वांणी ज्ञाननिदान ॥१॥ पणयालीस गाहा आगली एक सत्त आगमवाण । भणसें आतमभावसुं होसें कोडि कल्याण ॥२॥ पात्र जोइ परचो करी दीजें केवलवाण । धर्मदत्त गुरुदेशना तरसें ते निरवांण ॥३।। सिधवांणी साची सही अगम अनंत अपार । भणतां गुणतां पांमीए सिधसासण जयकार ॥४॥ इति श्रीतिथकला संपूर्णः ॥ लि. मुनी रूपचंदः ॥ Page #63 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्री आदिनाथवीनती संपा. डो. रसीला कडीआ ला.द.भा.सं. विद्यामन्दिर, अमदावादना ज्ञानभंडारना त्रूटक पुस्तक परथी प्रस्तुत कृतिनी नकल करी छे. प्रतनी स्थिति श्रेष्ठ छे. प्रतमांना सुन्दर, नानकडां अक्षरो जोतांनी साथे गमी जाय. पण सुन्दर होय ते सुवाच्य होय ज एम बने नहि. आ कृतिने उकेलवामां सारो एवो समय गयो. श्री लक्ष्मणभाई तथा प्रो. रमणिकभाई शाहना मार्गदर्शननो लाभ मळ्यो होवाथी, अहीं ते बन्नेनो आभार मानी लउं छु. एक ज पृष्ठनी आ प्रतनी पाछळ प्राकृत भाषामां थोडा मोटा अक्षरोमां लखायेली एक अन्य कृति पण छे. बन्ने कृतिओ संपूर्ण छे. प्रतनी वच्चे बिनवपरायेल छिद्र छे. तेनी आसपास चोरस आकृति छे अने एमां अक्षरो पूरेल नथी. कृतिने अंते रचनासमय के लेखनसंवत के स्पष्टतया रचनाकारनामा अपाया नथी. अन्तिम पंक्तिमा आवतुं 'सुरेन्द्रसूरि' विशेषणमां श्लेष आपीने पोतानुं नाम जणाव्युं होय एम लागे छे. कृतिनी भाषा, लेखनशैली वगेरेने जोतां तेनो समय अनुमाने १५मा सैकानी आजुबाजुनी होय तेम जणाय छे. भाषामां प्राकृत-संस्कृत शब्दोनो वपराश, अपभ्रंशनी छांट उपरांत कोई चोक्कस स्थळनी बोलचालनी भाषा-लोकबोलीनो विनियोग थयो जणाय छे. श्री नरसिंह महेताना 'नीरखने गगनमां' पदमांनो 'ने' जेवो 'न'नो प्रयोग अहीं विशेष जोवा मळे छे. जुओ 'वारि न सील खोडि'. प्रथम पंक्तिमांनी 'हस्व ई' अलंकरण रीते छे. कृतिमां भावाभिव्यक्ति पण सुन्दरतया थई छे. भक्त हृदयनी आरजू, भगवान ऋषभदेव प्रत्येनी एकनिष्ठा अहीं सुपेरे प्रगट थई छे. मध्यकालीन गुजराती साहित्यना भक्तिपरंपराना पदोमां 'आदिनाथ वीनती' स्तवन ओ समयना उत्तम भक्तिकाव्योनी हरोळमां ऊभं रही शके तेवं सक्षम छे, जेनी नोंध लेवी घटे. 'आदिनाथ विनति'ओ घणी लखाई छे ते मध्ये आ कृति तेनी लिपि, भाषा तथा अर्थ-ए सर्व दृष्टिले शोभती कृति छे. Page #64 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 59 श्रीसुरेन्द्रसूरिकृत (?) श्रीआदिनाथवीनती श्री आदिनाथ अवधारि करि प्रसादु, तइं विनवउं हिव जिसइं रहितप्रमादु आगइ घणा भवभवार्णव वारि पूरि, हउं मेलविउ कीयउ तव कर्म दूरि. १ गाढउ जिवीनउ करुणानिवास, केडउ न छांडउ मुज कर्मदासु किमइ करी प्राणी विनाणी आजु, ए सीष(ख)वी सामि तु सारि काजु. २ संमोहनिद्राभरि आजु जागी, जउ चित्ति जोयउ परमार्थि लागी तउं एकु शत्रुजय तीर्थनाथु, तउं देवु दीठउ जाई आदिनाथु. कृपा करी कर्म तणी सधाडि, तउं हाकि हेला करि कर्मवाडि दारिद्रमुद्रा प्रभु वेगि छोडि, तउं आवती वारि न सील खोडि. असंख्य सेव्या मई भूमिपाल, दीठ्या सवे देस महाविसाल जोया घणा धातु तणा विवाद, लोभांधि मूक्यां सवि सा[धु?]वाद. ५ अकृत्य कीधां गणना व्यतीत, मई मंत्र साध्या भुवन प्रतीत इसे घणे कष्टि निकृष्टि थाइ, ए देहु पीडिउं न हुइ भलाइ. सौभाग्यु हुउं भुवि जीह दूरिं, न मापनउ रूपुं तिसरं सरीरि न चिंतव्या चित्ति मनोर पूगा, ते जीव जाया कुण काजि जोगा. तउं एक चिंतामणि कामुधेनु, तउं एकलउ कल्पु निमोपमानु तउं एकु रुडइ मनसौख्य पूरइ, बीजा घणा देव किमर्थं कीजइ. ८ तउं दुबळा पीहरु देवदेव, तू एकलानी कही इकु टेव बोलिउं न भावइ इम वीनवीतां, कखा(षा)य वइरी किम तई ति जीता. ९ तउं एकु दामोदरु शूलपाणि, तउं एकु सोमेश्वर राख हाणि तई एकि बोध्या विधिमार्गि बोलइ, तइ एकि पीड्या सविजीव सेवइ. १० तउं एकु आखंडलु लोकपालु, तू एक पखि भुवि आलमालु (आलवालु ?) तु आगिलउ कोइ नथी त्रिलोकि, मया करीउ तउ हिव मइं विलोकि. ११ . Page #65 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनुसंधान-२९ तउं एकु लोकोत्तमु, तउं अलक्षु, तउं एकु सर्वेश्वरु मउं जिदक्षु तई एकि धर्मद्रुममूल स्थाप्या, तई एकलइ शास्त्र सवे प्रकाशां(श्या) १२ तउं सिद्धिनारीसुख कालिं लीणउ, हउं हीडतउ भूतलि कष्टि रीणउ तउं शाश्वतउं सौख्यु हूउं निर्चित, एयं सरीषा(खा) तू छइ सचिंत. १३ स्वरूपुं रुडउं जगि वीतराग, भेदि नही तइं रमणी[अ]तिराग सर्वज्ञ लोकोत्तरु तू पुराणु, तू ऊपिलउ कोइ नथी सुजाणु. तउं एकु संसार-समुद्र पारु, पामिउ तु जगन्नाथु करउ जुहारु जाणिउ नही कोइ न देवुदेवी, मू एक लागि तुज नाम वीवी. ए देसु रुडउ नगरीसु धन्यु, सुजाति नीकी कहीयइ गुणन्यु तउं उपनउ जिवु सुद्दीसु एक्कु, प्रशस्यु बोलई भुविरेकु लोकु. जे नित्यु पूजइ तइ धर्ममूलु, ते वेगि पामइ सु[ख]सिंधुकुलु इसउं विचारी तव नामि लागउ, संसार कारागृहवास भागउ. मूकउ सवे ऊतरु तारि नाथ, विच्छेदि जाइं मेलि न मोक्षसाथ कीधउ अलीढउ प्रभु दीस एता, रूडा करे ऊपरि मूज चेता. निसंबला संबलु आपि देव, एत्थं करतउ नितु तुज सेव ए विनति चित्ति करी अवधारि, मू आवतउ दुःखु धणी निवारि. मागउ नही राज्यु, न देवलोकु, न आदरउं चित्ति मनुष्यलोकु ए आपणउ स्वामि सुरेन्द्रसूरि, करइ नही चित्ति किमइ न दूरि. २० श्रीआदिनाथवीनती. Page #66 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 61 अघरां शब्दोना अर्थ कडी : १ हउं = हुं (में) मेलविउ = मेळव्या कीयउ = करो तव = तो कडी : २ जिवीनउ = जीवोने माटे केडउ = केडो सारि = सार / साध कडी : ३ जउ = जो जोयउ = जोयु कडी : ४ सधाडि = धाड सहित तउं = तुं हाकि = हांक /दूर कर दारिद्रमुद्रा छोडि = कृपणपणुं छोडी । प्रसन्नता आपी वारि न = अटकाव ने खोडि = खोड । ऊणप हेला = रमत / झडपथी । सरळताथी कडी : ५ सा[धु]वाद = सारो वाद /संवाद कडी : ६-७ व्यतीत = पूर्वे । अतीतमां गणना = गणतरी बहारना । अगणित जीह = जाणे के / जेनाथी मनोर = मनोरथ प्रतीत = प्रतीति / जाणे छे. तिसउ = तेवू निकृष्टि थाई = कशुं न वळ्युं जोगा = योग्य कडी : ८ कल्पु निमोपमानु = कल्पवृक्षनी उपमा आपी शकाय . तेवो मन सौख्य = मननुं सुख Page #67 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 62 कडी : ९ पीहरु = पीयर भावई फावे छे. कडी : १० राखि = राख / अटकाव हाणि = हानि कडी : १४ कडी : १५ कडी : १६ = राखि हाणि = हानि थती अटकाव विधिमार्गि = विविध रीते कडी : ११ आखंडलु = ईन्द्र एकि = एकना द्वारा पीड्या = पीडित / दुःखी कडी : १२ जिदक्षु मउं आलमालु = आलवाल = क्यारो / थांभलो जोवानी ईच्छा तइं **** हुं = त्वया तें / तारा वडे कडी : १३ रीणउ = पीडा पामवुं - सचित - चिंता - समजदारी राखनार ऊपिलउ = उपरनो / चडियातो वीवी = विचि = तरंग / मोजुं (अहीं रढ) नीकी = सारी गुणन्यु = गुणज्ञ उपनउ = जन्म्यो / पेदा थयो जीवु जीव रूपे सुद्दीसु सारो देश ? कडी : १८ अलीढउ = न जोडायेलुं ऊतरु = उत्तर / जवाब / उतरवुं. अनुसंधान- २९ Page #68 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 63 एता = आटला चेता = चेतना दीस = दी[व]स ? मू = मारा पर । मने / मारे माटे कडी : १९ संबलु = भाथु ठे. एसएम.जैन बोर्डिंग टी.वी.टावर सामे, ड्राइव-इन-रोड, अमदावाद-५४ Page #69 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वाचक भावविजयकृत श्री अंतरीक (अन्तरिक्ष) पार्श्वनाथ छन्द - (सं.) डो. रसीला कडीआ ला.द.भा.सं. विद्यामन्दिर, अमदावादना ग्रन्थभण्डारनी (नं. ३०२३६) ४ पृष्ठनी प्रत परथी प्रस्तुत नकल करवामां आवी छे. प्रतनी स्थिति श्रेष्ठ छे अने तेमां चित्र पत्रांक आपेला छे. हांसियो बन्ने बाजुओ छे. छेवाडे बे अने हांसियानी शरुआतमां ऊभी त्रण लीटीओ दोरेली छे. आंकणी अने अंक पर गेरु भुस्यो छे. प्रारंभे भले मींडं अने अंते समाप्तिसूचक वाक्य छे. कृतिनो वर्ण्यविषय अन्तरिक्ष पार्श्वनाथजीन महिमागान छे. दूहा, अडियल्ल, चालि, देशनामोनो वर्णवतो छन्द, छप्पय, आर्या, गाहा एम विविध छन्दोमां आ कलियुगमां पण जागता-हाजराहजूर एवा प्रभु श्री अन्तरिक्ष पार्श्वनाथना विघ्न, रोग, शोक, संकटनिवारक स्वरूपने वर्णवेल छे. धरतीथी सदा अद्धर रहेती एवी मूर्तिने प्रणमी पुरुषादाणीय पार्श्वनाथना बिम्ब तथा फणा कवि झडझमकयुक्त वर्णन करे छे वाचकना मनने मोही ले छे. चारणी साहित्यनी झाडझमकनी असर अहीं वरताय छे. पार्श्वनाथ प्रभुनी प्रतिमा- रूपवर्णन खूब सुन्दर छे. अन्त्यानुप्रास अने प्राससांकळीथी निर्मित आ कृति श्रवणमधुर बनी छे. अन्तरीक्ष पार्श्वनाथ प्रभुनो महिमा देशभरमां तो खरो ज पण विदेशे-अरबस्तान, सिलोन, इराक, अफघानिस्तान, बलुचिस्तान, चीनमां पण एटलो ज छे तेवी कविनी वात, प्रभुना महिमासूचक छे. कडी २५ थी कडी ३१ सुधीनां स्थळनामोनो एक जुदो अभ्यास भौगोलिक सन्दर्भने ध्यानमा राखीने करवा जेवो खरो. . कृतिमांना अंकने में सुधारी सळंग नंबर आप्या छे. कृतिमा ११ नंबर अपायेल नथी. १५ नंबर बे वार अपायो छे पण एने सुधारीने अहीं मूक्या छे. ष नो ज्यां ख ना अर्थमां छे त्यां ख करीने ज मूक्यो छे. अन्ते कवि पोतानी गुरुपरम्परा (विजय देवगुरु-विजय प्रभसूरि) आपी पोतानुं नाम (भावविजय वाचक) आपे छे. उपरांत प्रस्तुत कृतिनो समय पण आपे छे. वि.सं. १७५० मागशर वद १४ना रोज कृति रचाई छे Page #70 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 65 ||३|| अने ते पाटणमां पं. भाग्यविजयगणि, सकल मुनिमण्डली तथा मुख्य मुनि श्री प्रेमविजयना वाचनार्थे रचाई होवानुं जणाव्युं छे. आम, समय, रचना स्थल, रचनाकार तथा रचनाना हेतुनी विगतो साथेनी आ कृति अन्तरिक्ष पार्श्वनाथनां पद्योमां तथा ऐतिहासिक दृष्टिले महत्त्वनी छे. श्री अंतरीक (अन्तरिक्ष) पार्श्वनाथ छन्द दूहा सरसती मात माया करी, आपो अविचल वाणि पुरिसादाणी पास जिण, गाउं गुण मणि खांणि ॥१॥ अदभुत कौतिक कलियुगें, दीसे एह अदंभ धरथी अधर रहे सदा, अंतरीक थिर थंभ ॥२॥ महिमा महि मंडल सबल, दीपे अनुपम आज अवर देह(व) सूता सवे, जागे तूं जिनराज एक जीभ करि किम कहुँ, गुण अनंत भगवंत कोडि जीभ करि को कहे, तोहे न आवे अंत ॥४॥ तूं माता तूं हि ज पिता, त्राता तूंहि ज बंधू मन धरि मुझ उपरि करें, करुणा करुणासिंधु ॥५॥ छंद अडयल्ल करि करुणा करुणा रस सागर, चरण कमल प्रणमें नित नागर निरमल गुण मणि गण वयरागर, सुरगुरु अधिक अछे मति आगर ॥६॥ कामकुंभ जिम कामितदायक, पद प्रणमें सुरवरनर नायक मथित सदुर्मय मनमथसायक, अष्ट कर्म रिपुदल घायक ॥७॥ नवनिधि रिद्धिसिद्धि तुझ नामें, मनवंछित सुख संतति पामे जे प्रभु पद पंकज सिर नामें, बहुला सुरमहिला तस कामें ॥८।। बहुल वसे विवहारी वातं, वर सिरिपुर वसुधा विख्यातं जिहां राजे जिनवर जग तातं, अंतरीक अनुपम अवदातं ॥९॥ Page #71 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 66 अनुसंधान-२९ छंद चालि अवदात जेहनो जगत्र जाणे गुण वखाणे सुरधणी परसाद प्रभुनें प्रगट परभव पामिओ प्रभुपदफणी महिमा वधारे विघन वारे करे सेवा अति घणी तुम्ह नाम लीनो रहे भीनो अवर देवह अवगणी ॥१०॥ नर नाथ कोडि हाथ जोडि, मान जोडि इम कहे प्रभु नाथ चरणे जिके सरणे रहे ते परपद लहे . अति जेह उतकट विकट संकट निकट नावे ते वली भय आठ मोटा निपट खोटा दूरथी जाइं टली ॥११॥ छंद चालि जे रोग भयंकर दुष्ट भगंदर कुष्ट खय नख सखालि हरखा अंतर्गल वलि अमल ज्वर विषमज्वर जाई तास दीसे अति माठा वलि व्रण चाठा नाठा जाई तेह तुम दरिसण सामी शिवगति गामी चामीकर सम देह ॥१२॥ जलनिधि जलगज्जे प्रवहण भज्जे वज्जे वायु कुवाय थरहर तिहां धुज्जे हरिहर पुज्जे किज्जे बहुल उपाय मनमांहि कंपे हइहइ जंपे कुणहि किंपि न थाय इणे अवसर भावे प्रभुने ध्यावे पावे ते सुख थाय ॥१३॥ झडफे तरुडाला पानका जाला काला धूम कलोल उच्च लता देखी जाय उवेखी पंखी पड्य दंदोल पंखी जन नासे भरीआ सासे त्रासे धूजे तेह पंडिआ तिण ठामे प्रभुने नामें कुसलें पामें गेह ॥१४|| फणनें आटोपे मणिधर कोपे लोपे जे वलि लीह धसमसतो आवे देखी धावे लबकावे दो जीह बीहे जन जातां देखी रातां लोअण तस विकराल कीधे गुणगानें प्रभुनें ध्याने अहि थाइं विसराल ॥१५॥ Page #72 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 67 पापें पग भ[र]ता हीडे फिरता करता अति उनमाद घोटक जिम छूटे अतिआ कूटे लूटे निपट निषाद वनमा जे पडिआ चोरें नडिआ अडवडियां आधार इणि अवसर राखे कुण प्रभु पाखे भाखे वचन उदार ||१६|| छंद मदमत्त मयगल अतुल बल धर जास दरिसण भज्जओ केसरिअ सीह अबीह अतीहें मेह सम वड गज्जओ विकराल काया(ल) कराल को सींहनाद विमुक्कले सुखधाम प्रभु तुम नाम लेतां तेह सींह न ढुक्कले ॥१७॥ गललाट करतो मद्द झरतो कोप धरतो धांवले भर रोस रातो अधिक मातो अति कुजातो आवए घर हाट फोडे बंधु त्रोडे मान मोडे नृप तणुं तुम्ह नाम ते गज अजा थाई वसे आवे अति घणुं ॥१८॥ रणमाहिं सूरा भडे पूरा लोह चूरा चूरए गज कुंभ भेदे सीस छेदे वहेलो हित पूरओ दल देखि कंपे दीन जंपे करय प्रबल पुकारले तुम्ह स्वामि नामें तिणें ठामें वरे जय जयकारओ ॥१९॥ भय आठ मोटा निपट खोटा जेम रोटा चूरिए अश्वसेन धोटा तुम प्रसादे मन मनोरथ पूरिए महिमाहि महिमा वधे दिन दिन चंद ने सूरिज समो जस जाप जपता ध्यान धरतां पार्श्व जिनवर ते नमो ॥२०॥ ___छंद अडयल्ल छाया पडल जाल सवि कापे, आंखे अधिक तेज वलि आपे पन्नगपति प्रभुने परता, अविचल राज काज थिर थापे ॥२१॥ पदमावति परतो बहु पूरे, प्रभु प्रसाद संकट सवि चूरे अलबत्त अलंगी जाई दूरे, लखमी घर आवे भर पूरे ॥२२॥ Page #73 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 68 अनुसंधान - २९ महिमंडल मोटो तूं देवह, चौसठ इन्द्र करे तुझ सेवह त्रिभुवन ताहरुं तेज विराजे, जस परताप जगत्रमें गाजे ॥ २३ ॥ केता देस कहुं वलि नामें, प्रभुनी कीरति जिण जिण ठा पुर पट्टण संवाहण गामे, सुणतां नाम भविक सुख पामे ||२४|| छंद देसनाम अंग वंग कलिंग मरुधर मालवो मरहट्ट अ कास्मीर हूण हमीर हब्बस सवालख सोरट्ठ ए कामरूअ कूंकण दमण देखें जपे तोरो जाप ए इणि देस अविचल प्रबल प्रतपे पास प्रगट प्रताप ए ॥ २५ ॥ लाट ने कर्णाट कन्नड मेदपाट मेवात ए वलि नाट घाट वेराट वागड वच्छ कच्छ कुशात ए सतिलंग गंग फिरंग देसें जपे तोरो जाप ए इणि० ||२६|| वलि ओड तोड सगोड द्राविड चउड नट महाभोट ए पंचाल ने बंगाल बंगस सबर बब्बरकोट ए मुलतान मागध मगध देसें जपे तोरो जाप ए इणि० ॥२७॥ नमि आड लाड कुणाल कोसल बहुलि जंगल जाणिई खुरसाण रोणअ इराक आरबं तुस (रु) क वार्त्त वखाणि कुरु अच्छ मच्छ विदेह देसे जपे तोरो जाप ए इणि० ॥२८॥ कासीअ केरल अने केकइ सूरसेन संडिब्भअ गांधार गुर्जर गाजणें वडिआर गूड विदर्भओ आभीर ने सौवीर देखें जपे तोरो जाप ए इणि० ॥२९॥ Page #74 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 00 नेपाल नाहल अमल कुंतल अजल कज्जल देस ए प्रतकाल चिल्लल मलय सिंहल सिंधु देस विसेस ओ खसखान चीन सिलाण देसें जपे तोरो जाप ए इणि० ॥३०॥ कणवीर कानड कुलख काबिल बुलख भंग विभंग ए मलिआर मधु हल्लार हिरम जपय गुहि गुलवंग ए वलि वसाण दुसाण देसें जपे तोरो जाप ए इणि० ॥३१॥ छंद छप्पय प्रतपे प्रबल प्रताप ताप संताप निवारण दस दिसि देस विदेस भमति भविजन सुखकारण रोग सोग सवि टले मिले मनवंछित भोगह दोहग दुक्ख दरिद्र दूर सवि टलें वियोगह स्वर्ग मृत्यु पातालमें त्रिहुं भवने प्रगट्यो सदा पार्श्वनाथ प्रताप तुझ आपे अविचल संपदा ॥३२॥ छंद चालि अविचल पद आपे थिर करी थापे जगव्यापक जिनराज उपद्रव सवि जाई सुर गुण गाइं वसि थाई नरराज दीपे परद्वीपे रिपुनें जीपे दीपे जिम दिनराज पद पंकज पूजे प्रभुना रीझे सीझें वंछित काज ॥३३॥ तुं छे मुज नायक हुं तुज पायक लायक तुज्झ समान कुण छे जग माहें साहि बाहे राखे आप समान तूंहि ज ते दीसे विस्वावीसे हीयडुं हीसे हेव देखुं हुं नयणे जंपू वयणे निरमल तुम्ह गुण देव ॥३४॥ सिंधुर सुंडाला मद मतवाला दुंदाला दरबार झूले मनि गमता रंगे रमता उच्चा लता वार Page #75 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनुसंधान-२९ तरकीत जाला आगल पाला झंझाला तरवार झालीने दोडे होडाहोंडे जोडे बहु परिवार ॥३५।। हयवर पाखरिआ रथ जोतरिआ घुघरीना धमकार सोवन चीतरिआ नेजा धरिआ परवरिआ असवार गज बेठा चाले रिपु मनि साले माले लिखमी सार एहवी ऋध पामे प्रभुने नामे सफल करे अवतार ॥३६।। आर्या अवतार सार संसार माहिं, तेह जननो जाणिइं धन कमाइ धरम थानिक, जिणे लखमी माणिइं ॥३७॥ दूहा सुंदर रूप सुहामणु, श्रवण सुणी नरनारि कोडि कर जोडि रहे, दरिसणने दरबारि ॥३८। छंद अर्धनाराच-रूपवर्णनम् प्रियंगु वन्न नील तन्न देखि मन्न मोहओ सनूर सूर नूर थें अधिक्क जोति सोहओ अमंद चंद वृंद थे कला कलाप दीप्पओ सुरेन्द्र कोटि कोटि थे जिणंद जोर जिप्पओ ॥३९॥ अभूल फूलबान के कबान तो न लग्गओ दुजोध क्रोध योध वैरि मान छोडि भग्गओ अदीन तूं सुदीन बंधु देहि मुक्ख मग्गओ शरण्य जानि स्वामि के चरण कुं बिलग्गओ ॥४०॥ सज्योति मोति योति थे सुदंत पंति दीप्पो गुलाल लाल ओष्ट थे प्रवाल माल छिप्पओ सुवास खास वास थें कपूर पूर भज्जओ प्रलंब लंब बाहु थें मृणाल नाल लज्जओ ॥४१॥ Page #76 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 अनूप रूप देखते जिणंद चंद पासए पदारविंद वंदतें कुपाप व्याप नास दरिद्द पूर चूरकें त्रपुर मोरि आसओ अनाथ नाथ देइ हाथ करि सनाथ दास अ ||४२ || कमठ्ठ हठ्ठ गंजनो कुकर्म मर्म भंजनो जगज्जनातिरंजनो मद द्रुम प्रभंजनो कुमत्ति मत्ति मंजनो, नयन्न युग्म खंजनो जगत्र अगजनो सो जयो पार्श्व निरंजनो ||४३|| गाहा पास एह निज दासनी, अवधारो सरदास नय देखाडि दरिस, पूरो पूरण आस ॥४४॥ चकवा चाहे चित्तस्युं, दिनकर दरिसण देव चतुर चकोरी चंद जिम, हुं चाहुं नितमेव ॥ ४५ ॥ निस भरी सूतां नींदमें, दीवूं दरिसण आज परतिख देखाडी दरिस, सफल करो मुज काज ॥४६॥ तुम्ह दरिसण सुखसंपदा, तुम्ह दरिसण नवनिधि तुम्ह दरिसणथी पामि, सकल मनोरथ सिद्धि ॥४७॥ छंद चालि अंतरीक प्रभु अंतरयामि, दीजे दरिसण शिवगति पामी गुण केता कहि तुम्हं स्वामि कहतां सरसती पार न पामी ॥४८॥ कीधो छंद मंद मति सार, हित करि चितमां धर्यो वारू बालक जदवातदवा बोले, मातानें मनि अमृत तोले ॥ ४९ ॥ किधुं कवित चितने उल्लासें, सांभलतां सवि आपद नासे संपद सघली आवे पासे, भावविजय भगतें इम भासे ॥५०॥ 71 Page #77 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 72 अनुसंधान-२९ छंद छप्पय कियो छंद आनंद, वृंद मनमांहि आणी सांभलतां सुखकंद, चंद जिम सीतल वाणी श्री विजयदेव गुरुराज आज तस गणधर गाजे श्री विजयप्रभसूरि नाम काम समरूप विराजे गणधर दोय प्रणमी करी, थुण्यो पास असरणसरण भावविजय वाचक भणे, जयो देव जय जयकरण ॥५१॥ इतिश्री अंतरीक पार्श्वनाथ छंद सदानंद संपूर्णम् संवत् १७५० सा वर्षे मार्गसिर वदि १४ शुभवासरे लिखितोयं पं. भाग्यविजयगणिना सकलमुनिमंडलीमुख्यमुनिश्रीप्रेमविजयवाचनाय श्रीपत्तनमहानगरे ॥ अघरा शब्दोना अर्थ कडी : १ पुरिसादाणी =पुरुषोमां प्रधान, प्रसिद्ध, आप्त पुरुष, आदरणीय खांणि = भंडार कडी : २ धर = पृथ्वी कडी : ६ वयरागर = हीरो, रत्नविशेष, हीरानी खाण कडी : ७ सायक = बाण कडी : ८ सुरमहिला = देवी, बहुला = धणी कडी : ९ अवदात = वृत्तान्त, चरित्र, गुण, यश, यशस्वी वृत्तांत कडी : ११ जिके = (तेना), जे कडी : १२ चामीकर = सुंदर कडी : १३ प्रवहण = वहाण , भज्जे - भांगे कडी : १४ झडफे = ? दंदोल = संशय । मूंझवण / तोफान । धांधल / कोलाहल कडी : १५ जीह = जीभ, अहि = साप विसराल = गुम थर्बु । अदृश्य थq Page #78 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 73 कडी : १७ अबीह = निर्भय कडी : २० निपट = तद्दन । घणा धोटा = पुत्र कडी : २४ केता = केटला कडी : ३३ सीझे = सिद्ध करे । पूरे कडी : ३५ सिंधुर = हाथी कडी : ३६ पाखरिआ = शणगारेला कडी : ३९ अमंद = त्जस्वी थें = तमे कडी : ४३ गंजनो = गंजन । चूरो करनार अगंजनो = अपराजित | गांजी शके नहि तेवो खंजनो = चपळ कडी : ४६ परतिख = प्रत्यक्ष कडी : ४९ जदवातदवा = जेम तेम Page #79 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन कथासाहित्य डो. हसु याज्ञिक १. जैनकथासाहित्य : परिचय - महत्त्व व्याख्या : जैन कथा साहित्य एटले जैन धर्ममां गद्यमां अने पद्यमां विविध प्रकारमा अने स्वरूपमां जे कथाओ मळे छे, तेनुं साहित्य. आवी कथाओमां धर्मना सिद्धांतोनुं स्पष्टीकरण करती, मंत्र, तप, शील, संयम, व्रत वगेरेनुं महत्त्व समजावती, धर्मना मुख्य तीर्थंकरोनां जीवननां महत्त्वनां पासांओ पर प्रकाश पाडती, आ धर्म साथे संकळायेला राजाओ, प्रधानो, साधु-साध्वीओ, श्रावक-श्राविकाओ, वगेरेने विषय करती अने धर्म, अर्थ, काम अने मोक्ष ए चार पुरुषार्थ जोडे संकळायेली तेमज विविध घटनाओ अने रसथी मनोरंजन करती रचनाओनो समावेश थाय छे. कथा-वार्ता : 'कथा' शब्दना मूळमां 'कथ' एटले के कहेवू ए धातु छे. कोई पण मानवी के मानवेतर पात्रना जीवनमां बनेली के पछी कल्पेली, विशेष अर्थ अने चमत्कार धरावती घटनाओने कथा कहेवामां आवे छे. कथा साथे बीजो पर्याय 'वार्ता' पण प्रयोजाय छे. ए शब्दना मूळमां 'वृत्त' एटले के 'बनेटु' एवो अर्थ छे. परंतु आ परथी कथा एटले कल्पेखें अने वार्ता एटले बनेलुं कहेवू : एवो अर्थनो भेद नथी. 'कथा' मुख्यत्वे धर्म साथे संकळाती वार्ता माटे प्रयोजाय छे. वार्ता सामान्य रीते मनोरंजन माटेनी चमत्कारमूलक घटनाओनां कथन माटे प्रयोजाय छे. __कथा कहेवी अने सांभळवी भारतनी प्राचीनतम परंपरा छे. एना मुख्य बे वर्गो छे : १. धर्म माटेनी २. लोकोना मनोरंजन माटेनी. आ भेद कथाना उपयोगना हेतुनी दृष्टिले छे. कोई कथा एक ज होय परंतु ए धर्मना साहित्य, अंग बने छे त्यारे हेतुनी साथे ज एनां रूपमां पण केटलोक फेर Page #80 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 75 पडे छे. धर्ममां प्रयोजाती मनोरंजक कथानां रूपरंग बदलाय छे. परिचय : विश्वना बधा ज धर्मोओ पोताना धर्मना मुख्य देव-देवी, तपस्वी, तीर्थ वगेरेना माहात्म्य माटे कथानो आधार लीधो छे तथा दरेक धर्मे पोताना धर्मना तत्त्वज्ञान अने तेना सिद्धांतोने समजाववा माटे कथानुं माध्यम अपनाव्यु छे. जैनधर्ममां पण आ रीते ज कथाओनो उपयोग को छे. परंतु जैन धर्मनी कथाओनी केटलीक विशेषता छे. विशेषता : जैनधर्मनी प्रथम विशेषता ए छे के एनुं सैद्धांतिक अने कथाश्रयी बन्ने प्रकार, साहित्य मात्र संस्कृतमां ज नथी परंतु अर्धमागधी तथा अन्य प्राकृत, अपभ्रंश अने जूनी मध्यकालीन भाषाओमां छे. तीर्थंकरोए लोकोनी भाषामां ज धर्मनो उपदेश आप्यो अने .ए माटे धर्मनी इतिहासमूलक कथाओ उपरांत लोककथाओने पण स्थान आप्यु. आथी लोकोना ज हैयानो जेमां धबकार संभळातो हतो एवी ज कथाओ लोकोनी ज बोलीमां कहेवामां अने लखवामां आवी. संस्कृतमां पण केटलीक कृतिओ रचाई परंतु मुख्य ने मूळभूत माध्यम तो लोकभाषाओ- ज रह्यु. कथाओ क्या क्यां : जैन धर्मना साहित्यमां कथाओ आगममां, एना परना टीका-विवरणोमां मळे छे. अनेक कथाओ विविध प्राकृत भाषाओमां प्रबंध, चरित, महाकाव्य, रासा, पद्यकथा वगेरेमां मळे छे. बारमासी, फागु जेवा साहित्यिक स्वरूपोमां पण मुख्य आधार कोइ मुख्य पात्रोनी मुख्य अने सूचक एवी घटनाओनो ज लेवामां आवे छे. महत्त्व : जैन कथा साहित्य, अनेक रीते महत्त्व छे. एमां मुख्य : १. भारतनुं प्राचीन अने मध्यकालीन साहित्य जैनकथासाहित्ये हस्तप्रतना Page #81 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनुसंधान-२९ लिखितरूपमा जाळव्युं छे. काळना प्रवाहमां अने विधर्मी आक्रमणोमां भारतनी प्राचीन-मध्यकालीन कथाओनी रचनाओ नाश पामी. परंतु जैनधर्ममां आवी कृतिओ हस्तप्रतना लिखित दस्तावेजी रूपमां रही. भारतमां ज नहीं परंतु विश्वमां पण अन्यत्र आवो आटलो प्राचीनमध्यकालीन कथा साहित्यनो वारसो जैन सिवाय बीजे क्यांय जळवायो नथी. कोइ पण कथा केटली जूनामां जूनी छे, ए जाणीने निर्णय करवो होय त्यारे आ जैनसाहित्य ज दस्तावेजीरूपनो आधार छे. २. एमां मात्र जैनधर्मने स्पर्शती ज बाबतो नथी परंतु भारतीय आर्योनी संस्कृतिनो पांचहजार वर्षनो इतिहास पण छे. आ कथाओने आधारे ज छेल्लां पांच हजार वर्षना भारतीय समाजनी राजकीय, आर्थिक, धार्मिक, नैतिक, सांस्कृतिक गतिविधि जाणी शकीले छीओ. कया काळे केवी सामाजिक स्थिति हती, केवां-केटलां राजकीयादि परिवर्तनो थयां, प्रजा पर एनी केवी असर पडी, समाजमां केवा, केटला, कया कया वर्गो हता : आवां बधां ज पासांओ पर जैनकथासाहित्य प्रकाश पाडे छे. कोइ पण कला के कोइ पण विद्या विशे जाणवू होय, शिल्प, स्थापत्य, चित्र, साहित्य, संगीत, नाटक, आयुर्वेद, धनुर्वेद, अस्त्रशस्त्रकला, चित्र, साहित्य, संगीत, नाटक, आयुर्वेद, धनुर्वेद, अस्त्रशस्त्रकला, अंगविद्या, रसायण : आवा कोइ पण अंगनो छेल्ला पांच हजार वर्षनो भारतीय इतिहास जाणवो होय तो पण पूरती ने दस्तावेजी सामग्री जैनकथासाहित्य पूरी पाडे छे. ३. भारतभरनी अने विश्वभरनी हजारो लोककथाओनां कुळमूळ जाणवां होय तो ते माटेनी बधी ज दस्तावेजी सामग्री पण जैनकथासाहित्य पूरी पाडे ४. धर्मना मूळभूत तत्त्वज्ञान-सिद्धांत समजावे छे. ५. तीर्थंकरो, साधु-साध्वीओ, स्थापत्यो, राजवीओ, अमात्यो, श्रेष्ठिओ, दानवीरो, मुख्य श्रावक-श्राविकाओनां चरित अने जीवनकार्यनी वीगतो पूरी पाडे छे. ६. आ धर्मना उद्भव-विकासनो तो इतिहास आपे छे अने केवी, कइ-कइ, Page #82 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 77 केटकेटली अनुकूळताओ - प्रतिकूळताओ वच्चे आ मानवधर्म स्थिर थयो, तेनुं चित्र स्पष्ट करे छे ते साथे ज भारतीय मूळना प्राचीन वेदधर्म अने बौद्ध धर्म पर पण प्रकाश पाडे छे. भारतीय मळना धर्मो वच्चे जे संघर्ष अने समन्वय थयां, तेनो निर्देश पण मळे छे. १.१.२ जैन कथासाहित्य- मूळ जैन कथासाहित्य- मूळ प्राचीनतम छे. ईसवी संवतना आरंभ पहेलाना त्रण हजार अने पछीना बे हजार : आम आ परंपरा पांच हजार वर्ष जेटली प्राचीन होवानुं तो पश्चिमना विद्वानो पण स्वीकारे छे. भारतीय मत प्रमाणे आ परंपरा एथी पण जूनी छे. मूळ : आ कथासाहित्यना मूळने जाणवा माटे एनी कथाओ क्यारे, केवी रीते, क्या क्या उद्भवी छे, ते जाणवू पडे. आ दृष्टिले आ कथासाहित्यनां मुख्य मूळ बे छे : १. जैन अने २. समग्र भारतीय अर्थात् केटलीक कथाओ एवी छे, जे धर्मना ज उद्भव-विकासनी साथे आ क्षेत्रमा ज जन्मी अने प्रचारमा आवी. बीजा वनी जे कथाओ छे ते भारतनी एक समान अने मुख्य के सर्वसाधारण धारा छे तेमांथी जैन कथासाहित्यमा आवी छ : १. तीर्थंकरो, तीर्थो, जैनस्थापत्यो, जैनधर्म साथे परोक्ष रीते जेमनो संबंध रह्यो एवां राजवंशो, मंत्रीओ, श्रेष्ठिओ, साधु-साध्वीओ, श्रावकश्राविकाओ, जैनधर्मनां मुख्य सिद्धांतो, 'तत्त्वो, व्रतो, मंत्रो वगेरे साथे संकळायेली कथा : आ वर्गनी बधी ज कथाओना उद्गम-विकास जैनधर्मना ज पोतिका के अंगभूत एवा प्रवाहमां थयो छे. २. उपरना वर्गमां जेनो समावेश नथी थतो तेवी बोधक-उपदेशक दृष्टांतमूलक कथाओ, मनोरंजनात्मक लोककथाओ : भारतीय समग्र अने सर्वसामान्य धारामांथी आवी छे. वैदिक धर्म अने बौद्ध धर्ममां पण आ सामान्य धारानी कथाओ आवी छे. आ कोमन-स्ट्रीममांथी त्रण प्रकारनी कथाओ जैन कथा साहित्यमां Page #83 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 78 अनुसंधान-२९ आवी : १. पुराकथारूप Mythological २. दंतकथात्मक Legendary Tale ३. मनोरंजक लोककथात्मक रामकथा, कृष्णकथा अने पांडवकथा : आ त्रण भारतीय समान धारानी त्रण मुख्य पुराकथाओ छे. एनो उद्भव-विकास सर्वसामान्य एवी लोकधारामां थयो. एमांथी आ कथाओ वैदिक, बौद्ध अने जैन ए त्रण भारतीय मूळना आर्यधर्मोमां प्रयोजाइ अने दरेक धर्ममां ते केटलाक भेद साथे, पोतानी रीते विकसी. भारतीय वैदिक धर्मना केटलाक संप्रदायमां अवतार-वाद मुख्य बन्यो अने राम तथा कृष्ण भगवान विष्णुना अवतारो मनाया अने पूजाया. बौद्ध अने जैन धर्मो अवतार-वाद स्वीकारता नथी एथी एमां केटलांक रूपान्तर थयां अने पुराणकथा के पुराकथा Myth ने बदले दंतकथा Legend जेवू रूप बंधायु. परंतु आ कथा अने पात्रोने सीधो संबंध जैनधर्म साथे पण रह्यो एथी एनां स्थान-महत्त्व पौराणिककथा तरीके जळवाया. जैन स्रोतनी रामकथा पद्मचरित / पद्मपुराणमां छे. कृष्णकथा प्राकृत 'वसुदेव-हिंडी'मां छे. आ प्रवाह ज पछी आगळ चाले छे अने तेना पर चरित, रासा वगेरे रूपमां अनेक रचनाओ थई छे. बीजो प्रवाह दंतकथानो छे. एमां उदयन-वासवदत्ता, श्रेणीक, अभयकुमार, विक्रमादित्य वगेरेनो समावेश थाय छे.. __त्रीजो प्रवाह मनोरंजक लोककथाओनो छे. दंतकथानो वीरविक्रम एटलो लोकप्रिय बन्यो के अने आधारे विक्रम अने शनिश्चर, विक्रम अने वेताळ, एवी अनेक कथाओ जन्मी. पंचदंड, सिंहसनबत्रीसी जेवी कृतिओ रचाइ. इसुनी चोथी-छठ्ठी सदीथी उदयन-वासवदत्तानी कथाओ भारतमां लोकप्रिय बनी चूकी हती. अने दशमी-बारमी सदीथी ते छेक अढारमी सदी सुधीमां विक्रमकथा भारतभरमां लोकप्रिय रही. एना पर अनेक कृतिओ रचाइ. नंदबत्रीसी, सूडो बहोंतेरी पण एवी ज लोकप्रिय कथाओ हती. प्राचीन अने मध्यकालीन समयनी आ बधी ज कथाओ जैनकथासाहित्यमां स्थान Page #84 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 79 पामी एटलं ज नहीं परंतु जैन प्रवाहमां पण एनां अवनवां रूपो बंधाया. समय-समये आ कथाओ रूपांतर पामती रही अने एना परनी बहुसंख्य रचनाओ थइ. 'सूडाबहोंतेरी'ने अन्य कामकथाओ तो जैनस्रोतमां ज उद्भवी अने विकसी छे. संसारनी असारता दर्शाववा अने विषयासक्तिथी मन दूर रहे ए माटे जैन यतिओ द्वारा आ प्रकारनी कथाओ लखवामां आवी. रूपकग्रन्थि वाळी कथाओ पण सामान्य स्रोतनी छे. मन, शरीर, आत्मा वगेरेने रूपक द्वारा संवाद रूपे कथाओ रजू करे छे. तन रेंटियो छे के आत्मा माटे तो भाडाना मकान जेवू छे : आ भारतीय तत्त्वज्ञानलोकस्वीकृत एवं रूपक छे. आने विषय करीने दरेक भारतीय धर्ममां अनेक कथाओ छे. जैनकथासाहित्यमां आवी अनेक चोटदार, मर्मस्पर्शी कथाओनां रूप बंधायां अने तेना पर दृष्टांतथी मांडीने ते प्रबंध सुधीनी रचना थइ. धर्म-धर्म वच्चेना मान्यताभेद, मतभेद अने मनभेदनी असर दरेक धर्मना कथासाहित्य पर पडी छे. आ प्रकारमा अनेक कथाओ रचाइ एमाथी ज प्रवल्हिका अने मंथलिका जेवा वार्ता प्रकारो अस्तित्वमां आव्या. प्रारब्ध चडे के पुरुषार्थ : ए वाद पर विविध कथाओ छे. अन्य धर्मो अने मान्यताओ पर हास्यकटाक्ष अने उपहास करती कथाओ, स्वरूप सामान्य स्रोतनुं छे, परंतु एमांथी कटाक्षसभर धूर्ताख्यान अने भरडाबत्रीसी-भरटक द्वात्रिंशिका-अने विनोदकथासंग्रह जेवी कृतिओ तो जैन कथासाहित्यमां ज रचाइ अने जळवाइ छे. जैनकथानां मूळ : जैन कथासाहित्यनां प्राचीनतम मूळ आगममां छे. अर्धमागधीमां अहीं धर्मना तत्त्वज्ञाननी साथे ज कथाओ पण मळे छे. आगमना त्रीजा चूळामां मळती महावीर प्रभुना जीवननी कथा, पांचमा अंगनी भगवतीविवाह पण्णत्ति, छठ्ठा अंगमां महावीरस्वामीना मुखे कहेवाती नायाधम्मकहा वगेरे इसवीसन पूर्वेनी प्राचीनतम जैनकथाओ छे. एमां दृष्टांतकथा, रूपककथा, साहसशौर्यकथा, परीकथा, चोर-लूटारा कथा, पुराणकथा अम अनेक प्रकारो जोवा मळे छे. आगमना सातमा, आठमा अने अगियारमा ए त्रण अंगनुं Page #85 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 80 अनुसंधान-२९ जैनकथासाहित्यना उद्गम-विकासनी दृष्टिले महत्त्व छे. सातमा अंगमां महावीरनी धर्मदेशनाथी ध्यान अने तपथी मोक्षदशा प्राप्त करनारनी कथा छे. आ कथाओमां देहना असह्य दुःखदर्दोने तपस्वीओ स्वेच्छाओ हसता मुखे सहन करे छे. आत्मतत्त्वनी प्रतीति अने देहभावथी मुक्ति ते शुं छे, ते आवी कथाओथी प्रगट थाय छे. आगमसाहित्य पछीनो कथासाहित्यनो बीजो तबक्को चरित अने प्रबंधोनो छे. आमां प्राकृत, अपभ्रंश उपरांत संस्कृत भाषामां पण रचायेली कृतिओ मळे छे. पछीना त्रीजा तबक्कामां तो छेक ओगणीसमी सदीना अंतभाग सुधी जैन कथासाहित्यमां अनेक कृतिओ रचाइ. आवी कृतिनी कथा मुख्यत्वे रासरूपे छे. बारमासी, फागु वगेरेमां पण आधारतंतु कथानो ज रह्यो छे. - जैनकथासाहित्यनी कृतिओने कथानकना कथातत्त्वना स्वरूप-प्रकार प्रमाणे १. पौराणिक २. चरित्रात्मक ३. लोककथात्मक ४. विवरण कथा (जे टीका ग्रंथो, बालावबोधो, कथाकोशमां होय) एवा वर्गमां वहेंची शकीले. तीर्थंकरोना जीवनने स्पर्शती कथाओ, पौराणिक प्रकारनी गणी शकाय. विलासवती, सुकुमाल, प्रद्युम्नादि, नागकुमार, सुलोचना इत्यादि धर्मख्यात पात्रोनी कथाओ चरित्रात्मक वर्गनी छे. समरादित्य, तरंगवती, वगेरे लोकरंजनात्मक कथाओना वर्गनी छे. कथाकोश, बालावबोध वगेरेमां आवा दरेक प्रकारनी कथाओ संक्षेपमां अने सरळ भाषामां आपवामां आवे छे. १.१.३ अन्य धर्मोनुं कथासाहित्य जैनेतर अन्य मुख्य भारतीय धर्मो बे छ : १. वैदिक धर्म २. बौद्ध धर्म १. वैदिकधर्म- कथासाहित्य वैदिक धर्म, ब्राह्मणधर्म, सनातनधर्म के हिंदुधर्मने नामे ओळखातो धर्म परंपरागत अने मुक्त धारा छे. ए कोइ एक व्यक्ति के वादकृत नथी. आथी आ धर्ममां उपास्य देव-देवी प्रमाणे अने व्यक्तिस्थापित वाद अने Page #86 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 81 उपासनाने कारणे विविध धर्मसंप्रदायो अस्तित्वमां आव्या. आ उपरांत भारतमां ज वसवाट करनारी मूळभुत केटलीक जातिओना धर्मो पण वैदिक धर्ममां काळक्रमे जोडाया अने एमांथी पण केटलाक संप्रदायो अस्तित्वमां आव्या. देव-देवी प्रमाणे वैष्णव, शैव अने शाक्त : अर्थात् विष्णुपूजक, शिवपूजक अने देवीपूजक एम त्रण मुख्य संप्रदाय छे. चोथो वर्ग निर्गुण उपासकोनो छे अने तेमां पण कोइ अवतारी के पयगंबरी मनाता मुख्य धर्मपुरुष प्रमाणे जुदा जुदा पंथ छे. वैष्णवमांथी ज व्यक्तिस्थापित संप्रदायना रूपमा पुष्टिसंप्रदाय अने स्वामिनारायण संप्रदाय अस्तित्वमां आव्या. शैवमां पाशुपत, लकुलीश वगेरे अनेक संप्रदाय छे. तांत्रिक, मांत्रिक, कापालिक, वामपंथी, अघोरी वगेरे उपासना-पद्धतिना पंथो पण काळक्रमे शैव साथे संकळाया. पार्वती साथे ज भारतनी विविध जातिओनी देवीभक्ति शैवमा समावेश पामी. शिवजीना परिवारना गणेश साथे गाणपत्य संकळाया. पशुपूजा, प्रेतपूजा, सूर्यपूजा, नंदिपूजा वगेरेना पेटा अनेक धर्मो पण शैव साथे संकळाया. निर्गुणधारामां पण विविध व्यक्तिस्थापित अनेक पंथो-संप्रदायो छे. आ बधानो समावेश वैदिक धर्मना विविध संप्रदायना रूपमां थाय छे. आम आ महावटवृक्ष छे, जेने अनेक शाखा अने शाखामूळ साथे अनेक जुदा थड पण छे. परंतु ए सहु पोतपोतानी मूळभूत आस्था साथे वेदने स्वीकारे छे. स्वाभाविक छे के आ महावटवृक्षy कथासाहित्य प्राचीनतम, विपुल, विशाळ अने वैविध्यसभर होय. एमां संस्कृत-प्राकृत उपरांत बधी ज भारतीय भाषाओमां रचायेवं कथासाहित्य छे. आ परंपरा पण पांचेक हजार वर्षनी प्राचीनता धरावती होवार्नु पश्चिमना विद्वानो स्वीकारे छे, भारतीय मत प्रमाणे ए आथी पण प्राचीनतम छे. आ धर्ममां १. वेद २. वेदोत्तर साहित्य ३. वीरगाथा ४. पुराण ५. प्रशिष्ट महाकाव्य काळ एवा समयना चार-पांच तबक्काना युगो छे. वेंदमां ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद अने सामवेद ए चार छे.ऋग्वेद प्राचीनतम छे. एना दश मंडळमां यम-यमी अने पुरुरवा-उर्वशी जेवी प्रख्यात कथाओ छे. वेदना मंत्रो अने सूक्तोमां अनेक कथाओ अने पात्रोनो निर्देश थयो छे. एनी सवीगत कथाओ वेदोत्तर साहित्यमां मळे छे. उपनिषद, Page #87 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनुसंधान - २९ ब्राह्मणग्रंथ, आरण्यक वगेरे वेदसंलग्न छे अने एमां अनेक कथाओ छे. ऐतरेय ब्राह्मण : ७- १३.१८मां शुनःशेपनी, शतपथ ब्राह्मण १ - ४.५ अने ८. १२मां मन अने वाणी वच्चेना विवादनी कथा : आम अनेक कथाओ मळे छे. उपनिषदमां भारतीय तत्त्वज्ञान साथे ब्रह्म, आत्मा, माया वगेरेने स्पष्ट करती कथाओ छे. प्राणी कथा तो वेदमां पण छे. छांदोग्य उपनिषदमां भोजन माटे भसी शके एवा कूतरानी शोधनी, हंसो वच्चेना संवादथी आकर्षाता रेंकवनी, वृषभ, हंस वगेरे द्वारा उपदेश प्राप्त करता सत्यकामनी कथा छे. 82 वेदोत्तर साहित्य पछीना कथा साहित्यना सर्वोत्तम शृंग रामायण अने महाभारत छे. प्राचीन साहित्यनो आ बीजो तबक्को प्रो. मेकडोनल इ.स. पू. ५०० थी इ.स.पू. ५०ना वर्षनो जणावे छे. वीरचरितकाळमां कुबेर, गणेश, कार्तिकेय, लक्ष्मी, पार्वती जेवां नवां देवदेवीओनी कथाओ मळे छे अने नाग, यक्ष, गंधर्व, राक्षस जेवां मानवेतर पात्रोनो कथांमां प्रवेश थाय छे. भारतीय संस्कृतिना आत्मा जेवा रामायण अने महाभारतनी कथाओ भारतीय आर्योना संघर्ष अने समन्वयनो कथा द्वारा इतिहास आपे छे. महाभारतमां वेदव्यास कुरुवंशनी कथा साथे पांडव - कौरवना भीषण युद्धनी कथा आपे छे. गीता जेवो तत्त्वज्ञाननो उत्तम ग्रन्थ आ कथामां मळ्यो छे. रामायणकथा द्वारा वाल्मीकि उत्तम आदर्श राज्य, राजवी, दंपती अने कुटुंबनुं चित्र आपे छे. देश-विदेशनी अनेक जातिओ अने तेमनी भाषाओमां रामकथा पहोंचे छे. पुराणसाहित्यमां देवदेवीओना माहात्म्यनी साथे ज अनेक ऋषीमुनीओ, राजवीओनी कथा मळे छे. विपुलसंख्यामां लोककथाओ पुराणोमां मळे छे. आ पुराणोनुं साहित्य भारतीय आर्योंना सामाजिक, राजकीय, सांस्कृतिक इतिहासनी सामग्री पूरी पाडे छे. प्रशिष्ट संस्कृतना गाळामां कथा निमित्ते उत्तम महाकाव्यो अने नाटको मळे छे. 'कादंबरी' जेवी उत्तम कथा, दशकुमारचरित, पंचदंड, हितोपदेश, कथासरित्सागर जेवा कथाना आकरग्रन्थो पण आ धारामां मळ्या छे. २. बौद्ध साहित्य प्राचीन परंपरा धरावता बौद्ध साहित्यनुं कथासाहित्य १. पिटक २. Page #88 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 जातक अने ३, अवदानमां मळे छे. १. पिटक : धर्मतत्त्वने सरळ अने सर्वगम्य बनाववा माटे बौद्ध धर्ममां लोकभाषामां कथाओ कहेवाइ अने लिखितरूपमां पालि भाषामां संग्रहनुं रूप पामी. आ धर्मना सारिपुत्त मोग्गल्लान, महाप्रजापति, उपालि, जीवक वगेरेनी कथा पिटकमां मळे छे. भगवान बुद्ध धर्मसिद्धांत समजावी उपदेश आप्यो, तेनी कथा विनय पिटकमां छे. जातक अने पिटकनी कथाओ वच्चेनो महत्त्वनो भेद ए छे के आ बन्नेमां आवती कथाओ बुद्ध द्वारा कहेवाती दर्शाववामां आवी छे, परंतु जातकनी बधी ज कथाओने बुद्धना पूर्वभव साथे सांकळवामां आवी, एवं पिटकमां नथी. आम छतां पिटकनी कथाओ बुद्धना जीवन पर प्रकाश पाडे छे. केटलीक कथाओ संवादमां रजू थई छे. छन, अस्सलायन, दीघनिकाय, मज्झिमनिकाय वगेरे कथाओ तो हकीकतमूलक छे. अंगुलिमाल, रथ्थपाल, मखादेव वगेरे पात्र ने तेमनी कथाओ पिटकमां छे. विमानवत्थु अने पेतवत्थुनी कथाओ सद्कर्मोनां परिणाम दर्शावी कर्मना सिद्धांतने पुष्ट करे छे. केटलांक पात्रो अने घटनाओ कल्पित होवा छता एमां वास्तविक जीवननी भूमिका जोवा मळे छे. संसारना मोहमांथी मुक्त बनी वैराग्य पामतां पात्रोनी कथाओ पण अहीं छे. प्रख्यात विद्वान विंटरनित्झ नोंधे छे के वार्ताना माध्यमे धर्मनो उपदेश देवानु पूर्वे पहेलां जाण्यु. पश्चिम पछी ए मार्गे गडे. ____धम्मपद अने जातकनी जेम पेतवथ्थु अने विमानवत्थुनी टीकाओ गद्यमां छे. कथाना दृष्टांतथी सिद्धांतनुं स्पष्टीकरण करवामां आवे छे. अहीं दंतकथा Legend पण छे. बौद्ध धर्मनो प्रचार सिलोन अने बीजा विदेशोमां थयो ते साथे भारतनी कथाओ चीन-जापानमां पण पहोंची. विनयपिटक अने सुत्तपिटकमां बुद्धना जीवननी वास्तविक तथा कल्पनामूलक कथाओ छे तेमांथी सुत्तपिटकनी निदाघकथा घडाइ. २. जातक : बुद्धना पूर्वभव साथे संकळायेली कथाओ जातकमां संपादित थई छे. कथाओना वक्ता भगवान बुद्ध पोते छे. अहीं संस्कृति अने समाजना सारभूत तत्त्व जेवी अनेक भारतीय लोककथाओ जातकमां छे. Page #89 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 84 अनुसंधान-२९ आवी कथाओ पूर्वभवथी बुद्धना जीवननो संदर्भ धरावती होवाथी लोकोओ धर्मवृत्तिथी आ कथाओ श्रद्धाथी सांभळी अमर बनावी. जातकनी कथाओ मुख्यत्वे गद्यमां छे. कथानो सार अने बोधउपदेश पद्यमां अपाया छे. आ प्राचीन परंपरा छे. ओल्डनबर्ग अने वेबर जेवा कथासाहित्यना विद्वानो जणावे छे के भारतीय कथाओगें मुख्य माध्यम गद्य छे, केटलाक पद्यात्मक अंशो आखे आखी वार्ताने याद राखवा माटे उपयोगी बने छे. जातकमां पद्यनी संख्याने आधारे कथाओ- संपादन करवामां आव्यु छे. कुल बावीस विभागो छे. जेम जेम आ विभागनो क्रम आगळ वधे छे, तेम तेम एमां आवती कथाओमां प्रयोजातां पद्योनी संख्या पण वधे छे. ३. अवदान : अवदान (पालिमां अपदान)नो अर्थ 'नोंधवां जेवां कृत्यो' थाय छे. बौद्ध धर्ममां दीक्षित साधु-साध्वीओनां जीवननी महत्त्वनी घटनाओ पर रचायेली कथाओना संपादनने अवदान कहेवामां आवे छे. जेम बुद्धना जीवन साथे संलग्न कथा ते जातक, तेम बौद्ध थेरा (साधु) अने थेरी (साध्वी)नी जीवन-आधारित कथाओ ते अवदान. थेरागाथामां पंचावन वग्ग (वर्ग) छे अने दरेक वर्गमा १० अवदान छे आम कथासंख्या पांचसोपचास छे. थेरी गाथामां आवा चार वर्ग छे. अहीं साधु-साध्वीओनां जीवननी घटनाओ पात्रना आत्मकथनरूपे आलेखाय छे. सारिपुत्त, मोग्गल्लान, कस्सप वगेरे प्रख्यात थेराना अने महाप्रजापति गोतमी, खेमा, किसा गोतमी प्रख्यात थेरीओ छे. निराशापूर्ण अने आपत्तिभरी जीवननी यातनाओ वेदनाओ वेठ्यां पछी वैराग्य पामतां पात्रोनी अहीं कथा मळे छे. अवदान मुख्यत्वे पालि भाषामां ज लखायेलां छे, परंतु दिव्याराधन, जातकमाला, कल्पमंडितिका जेवी बौद्ध कथासाहित्यनी रचनाओ संस्कृतमां पण छे. दिव्यराधननी कथानुं तो इ.स. २६५मां चीनी भाषामां भाषान्तर पण थयुं छे. १.१.४ जैनकथाओ- मनोविज्ञान कथाओना मनोविज्ञानने बे छेडाअथी तपासी शकाय : Page #90 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 85 १. धर्म साथे कथाओ संकळाइ ते पाछळनां मनोवैज्ञानिक कारणो के दृष्टिबिन्दु अने २. धर्मसाहित्यमा आवती कथाओगें मनोविज्ञान, एटले के कथाओनी श्रोताओ पर पडती मनोवैज्ञानिक असर. __ आ बन्ने पासां परस्पर पूरक छे. १. कथा पाछळनुं मनोविज्ञान प्राचीन काळथी ज भारतीय धर्मोओ अने ते पछी विश्वना बीजा पण धर्मोओ धर्मना प्रचार-प्रसार-स्पष्टीकरण माटे विशेष अने मुख्य आधार कथानो लीधो. धर्मना तत्त्वज्ञान अने तेना सूक्ष्म-संकुल सिद्धांतोने स्पष्ट अने सर्वग्राह्य बनाववा माटे दृष्टांत कथाओनो आश्रय लीधो. नियम, व्रत, जप, पाठ, पूजन-अर्चन वगेरेना प्रभाव अने माहात्म्य माटे पण कथाओनो आधार लीधो. धर्मपंथनी मुख्य व्यक्तिओ अने तेमनां जीवनकार्यने तथा संस्थारूप विविध स्थापत्यो अने पवित्र तीर्थो साथे पण कथाओ सांकळवामां आवी. आम करवा पाछळनुं स्पष्ट कारण ए छे के कथा द्वारा कोई पण सूक्ष्म अने संकुल वात सरळ अने सर्वग्राह्य बने छे. कथा द्वारा श्रोताना मनहृदयमां नवी सृष्टि रचाय छे अने तेनी ज कायमी असर पडे छे. कथा द्वारा धर्मनो अने संस्कृतिनो इतिहास जळवाय छे अने ते अनुयायीने प्रेरणा अने निष्ठा, श्रद्धा आपे छे. आवं कार्य धर्म साथे ज जेने सीधा संबंध छे तेवी धर्मकथा करे छे. परंत दरेक धर्मपंथोए पोतानां धर्म-परंपरा साथे सीधो संबंध न होय एवी लोकप्रिय अने मनोरंजक लोककथाओनो पण थोडां परिवर्तनो साथे उपयोग कर्यो छे. आनुं कारण ए छे के आ प्रकारनी कथाओ एटली रोचक, चमत्कारयुक्त, प्रभावशाळी अने लोकप्रिय होय छे के धर्मानुयायी वार्ताना रसे पण वक्तव्य-उपदेशादि सांभळे अने तेनी असर ग्रहण करीने एनी धर्मश्रद्धाना संस्कारो दृढ थाय. कथा- आQ महत्त्वपूर्ण योगदान होवाथी प्रत्येक धर्ममां कथाने अग्र स्थान अने महत्त्व मळ्यां छे. Page #91 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 86 अनुसंधान-२९ २. जैनकथाओ- मनोविज्ञान : जैनधर्ममां पण कथाओ धर्मना तत्त्वज्ञानने स्पष्ट अने सर्वग्राह्य बनाववा प्रयोजाइ. तीर्थंकरो, तीर्थो, व्रत-नियम वगेरेनां प्रभाव अने माहात्म्य माटे पण कथाओनो उपयोग थयो. मनोरंजक लोककथाओ श्रोताओने आकर्षवा अने ए द्वारा ज्ञान-उपदेश आपवा माटे घटतां परिवर्तनो साथे रजू करवामां आवी. ___आ उपरांत पण एक विशेष अने विशिष्ट शक्ति बौद्ध अने जैन कथाओमां छे. आ बन्ने धर्मनी कथाओमां संसारनी असारता अने वैराग्यवृत्तिना संस्कारो दृढ करवानी शक्ति छे. आ दृष्टिले आ कथाओ विषयलोलुप संसारी जीवोनी मानसिक रीते सारवार करवानी पद्धति छे. मोटा भागना धर्मो माणसनी अज्ञात तत्त्व सामेनी भयवृत्ति अने बधा ज प्रकारनी माणसनी इच्छाओ, आशाओ, आकांक्षाओने संतोषे अने प्रार्थना अने पश्चात्ताप कर्ये बधां ज गुनाओ-पापोनी माफी आपे एवा दयाळु पिता जेवा इश्वरनी कल्पनाथी अनुयायीओने धर्म तरफ आकर्षीने धर्माभिमुख राखवानो मनोवैज्ञानिक अभिगम अपनावे छे. 'ध प्रोडिगाल सन'नी बायबलकथामां एर्नु मूर्त रूप छे. परंतु भारतीय तत्त्वज्ञानमां कर्म अने तेनां फळ के परिणामनो सिद्धांत आथी जूदो ज छे. माणसने, प्राणीमात्रने तेनां कर्मोनां फळ भोगव्ये ज छूटको छे. एमां जप तप पश्चात्तापथी कोई त्रीजी महासत्ताना हस्तक्षेप अने माफीनो स्वीकार नथी. प्राणीमात्रे जाते ज कर्मनां फळ हसते के रडते मुखे भोगववानां ज छे. आ सिद्धांतने कारणे जैनधर्मनी कथाओ क्रमविपाक रूपे जे कंई यातना-कष्टादि पडे ते सहन करवानी ज नहीं, सामे पगले जाते ज ते बधुं वहोरी लेवानी मानसिक शक्ति कथाना माध्यमे माणसने सिद्ध करावी आपे छे. आथी ज जैनधर्मनी कथाओमां मानसिक अने शारीरिक यातनानां आलेखनो थयां छे. जीवतां सळगावी मूकवामां आव्यां होय, वेगे दोडतां रथनां चक्रो नीचे दबाइ कचडाइने मरतां होय, हिंसक पशुओनां तीणां नहोर अने दांतथी मृत्युना मुखमा होमातां होय, पोताना ज हाथे पोतानां ज शरीर पर सडेला भागोमांथी खरतां कीडांने फरी पोतानां घावना धारां पर मूकीने जाते ज काळी बळतरानी असह्य वेदनानो अनुभव करतां होय एवां पात्रो जैन Page #92 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 87 कथाओमां ज मळशे. अन्य आवां पात्रो अने आलेखनो भाग्ये ज मळशे. आवी कथाओ ज जिजीविषाना प्रबळ उत्कटतम आकर्षणथी मुक्त थवाथी मानसिक शक्ति सिद्ध करी आपे छे. इन्द्रियजन्य उपभोगथी मनने मुक्त करवानी केळवणी पण आवी कथाओ द्वारा मळे छे. देहनो अध्यास छूटे अने देहथी आत्मा भिन्न अने तटस्थ द्रष्टा छे, ए स्थितिना अनुभव माटेनी मानसिक सिद्धि, सज्जता आवी कथाओ आपे छे. संसारना संबंधो मिथ्या छे एवं समुद्रदत्त-समुद्रदत्तानी तेर नातरानी कथा सिद्ध करे छे. एना मिथ्यापणानी प्रतीति करावे छे. संसारना व्यामोहथी मुक्त रहेवाना हेतुओ ज कामकथामां स्खलननां गाढां चित्रो आलेखाया छे. आम एक प्रकारनी मनोवैज्ञानिक सारवार करवान कार्य आवी कथाओ करे छे. पूरक विगत अने माहिती [१] कथाना प्रकार : १. अग्निपुराण, अध्याय ३३७ प्रमाणे १. आख्यायिका, २. कथा, ३. खंडकथा, ४. परिकथा, ५. कथानक २. हरिभद्राचार्य प्रमाणे १. अर्थकथा २. कामकथा, ३. धर्मकथा अने ४. संकीर्णकथा ३. ध्वन्यालोक (आनंदवर्धन) प्रमाणे : १. परिकथा, २. सकलकथा, ३. खंडकथा, ४. आख्यायिका, ५. कथा काव्यानुशासन (हेमचंद्राचार्य) प्रमाणे कथाना १. उपाख्यान, २. आख्यान, ३. निदर्शन ४. प्रवल्हिका, ५. मन्थल्लिका, ६. मणिकुल्या, ७. परिकथा, ८. खंडकथा, ९. सकलकथा, १०. उपकथा, ११. बृहत्कथा. (विशेष विगत माटे जुओ : मध्यकालीन गुजराती कथासाहित्यः डो. हसु याज्ञिक, गुजरात साहित्य अकादमी, गांधीनगर, १९८८, पृ. १७ थी २९) त माटे जुआ : मीनगर, १९८८, Page #93 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 88 अनुसंधान-२९ [२] जैन कथाओ १. कइ कथा कया व्रतादि साथे जोडाई छे तेनो संदर्भ : देवद्रव्यभक्षण : संकास श्रावक अभिग्रह : जीर्णशेठ संक्लिष्टकषाय : अग्निशिख, अरुण मुनि, बाळमुनि श्रावकव्रत : श्रावकपुत्र सदाचार : सुदर्शन शील : शीलवती अणुव्रत : श्रीमति अने सोमा अहिंसा : कुटुंबमारी सत्यव्रत : वहाणवटी ब्रह्मचर्य : पतिमारिका ईर्यासमिति : वरदत्त मुनि भाषासमिति : संगत साधु एषणासमिति : नंदिषेण चोथी समिति : सोमिल मुनि पारिष्ठापनिका समिति : धर्मरुचि पांचमी समिति : नागश्री पुरुषार्थ-प्रारब्ध पर : पुण्यसार-विक्रमसार अप्रमादसेवन : तेलपात्रधारक जातिस्मरण : राजपुत्र भावाभ्यास : नर सुंदरी (विगत माटे : आनंद-हेम-ग्रन्थमाला : पुष्प : १८ प्रा. उपदेशपद महाग्रन्थनो गूर्जर अनुवाद : आ.श्री. हेमसागरसूरि, पं. लालचंद्र भ. गांधी, मुंबई, ई.स. १९७२) Page #94 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 89 २. तीर्थंकरादि गौतमस्वामि नेमिनाथ महावीरस्वामी जंबूस्वामी भरतेश्वर-बाहुबली ब्रह्मदत्तचक्रवर्ती श्रेणिक वसुतेज जयानंदकेवली कुमारपाल पादलिप्त पौराणिक पद्मचरित वसुदेवहिंडी नलदमयंती श्रावकादि कोष्ठशेठ पुष्पचूला शाल-महाशाल-गागली गौतम-पुंडरिक आर्यमहागिरि, सुहस्ति अवंतिसुकुमाल अंगारमर्दक-गोविंदवाचक मेघकुमार पुरोहित पुत्रीओ : रति, बुद्धि, ऋद्धि, गुणसुंदरी शंख-कलावती Page #95 -------------------------------------------------------------------------- ________________ au अनुसंधान-२९ इलाकुमार उत्तमकुमार स्थूलभद्र-रथिक लोककथात्मक मूलदेव-शशधर नंद-सुंदरी अंबड विद्याधर चंडप्रद्योत-मृगावती-अंगारवती उदयन-वासवदत्ता चंद्रगुप्त-चाणक्य विक्रम, विक्रमचरित, विक्रमसेन, सिंहासनबत्रीशी, वेताळपचीशी, पंचदंड, खापरो चोर, शनिश्चर माधवानल-कामकंदला ढोलामारु आरामशोभा उदयसुंदरी, कर्पूरमंजरी, मलयसुंदरी, रसमंजरी चंदन-मलयागरी, सदेवंत-सावलिंगा, चित्रसेन-पद्मावती हंसावती-वछराज-देवराज देवदत्ता-रतिसेना-वसंतसेना (विशेष विगत : मध्यकालीन गुजराती जैन साहित्य : सं. जयंत कोठारी, कांतिभाई शाह, श्री महावीर जैन विद्यालय मुंबइ, १९९३मां; जैनकथासाहित्य : केटलीक लाक्षणिकता, हसु याज्ञिक : पृ. २० थी ३३) ३, शीतल प्लाझा, लाड सोसा. पासे, वस्त्रापुर-बोडकदेव, अमदावाद-५४ Page #96 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विश्व के समूचे जैनियों के लिए ललामभूत प्रकल्प : प्राकृत-अंग्रेजी बृहद् कोष का निर्माण (१) लेख का प्रयोजन : ५ जनवरी २००४ के दिन भाण्डारकर प्राच्य विद्या संस्था में जो विध्वंसकारी घटना घटी, उसकी तीव्र प्रतिक्रियाएँ देश-विदेश में उमड उठी। पूज्य आचार्यश्री पुण्यविजयजी भाण्डारकर संस्था के एक प्रभावी फाउण्डरमेम्बर तथा डॉ. रा. ग. भाण्डारकरजी के निजी दोस्त भी थे। जैनविद्या के क्षेत्र में अनुसन्धान का काम करनेवाले सभी जैन स्कॉलर्स तथा विद्वान साधुवर्ग पाण्डुलिपियों के (manuscripts, हस्तलिखित) सन्दर्भ में लगभग एक सदी से भाण्डारकर संस्था के सम्पर्क में रह चुके हैं। पूज्य श्री विजयशीलचन्द्रसूरीश्वरजी अपने विहार के दौरान कम से कम ३-४ बार तो संस्था में पधार चुके हैं। मार्च २००४ में भी पुणे वास्तव्यमें आपने संस्था के सम्पर्क किया । संस्था के हालात देखकर गौडी पार्श्वनाथ मन्दिर ट्रस्ट को प्रेरित करके एक लक्ष रूपयों की धनराशि देकर भरसक सहायता की । आगे भी सहायता दिलवाने का इन्तजाम किया। . भाण्डारकरके प्राकृत-अंग्रेजी बृहद्-कोशकार्य में महाराजसाहब को अपूर्व दिलचस्पी थी । आपने खुद पधारकर, पूरे दो घंटे तक डिक्शनरी के शब्दसंग्रह (Scriptorium) और अर्था निर्धारण पद्धति के बारे में बारीकियोंसे तहकीकात की। सब सिस्टिम जानकर आप तहेदिल से प्रसन्न हुए। पूरे भारतवासियों को जानकारी मिलने के लिए आपने मुझको प्रेरणा दी। उसीके फलस्वरूप यह दीर्घलेख लिख रही हूँ। (२) डिक्शनरी की परियोजना और आरम्भ : समूचे प्राचीन जैन ग्रंथों को समाविष्ट करनेवाला बृहद्-कोश (Comprehensive dictionary) निर्माण करने की मूल परियोजना, भारत के मशहूर उद्योगपति स्व. श्री नवलमलजी फिरोदिया की थी। उन्होंने सन् १९८६ में 'सन्मति-तीर्थ' नाम का ट्रस्ट स्थापन किया। इस प्रॉजेक्ट के लिए उस में दस लाख रूपयों की राशि जमा की। भाण्डारकर संस्था के उस समयके सेक्रेटरी डॉ. Page #97 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 92 अनुसंधान- २९ रा. ना. दाण्डेकरजी से संपर्क किया । विश्व के जानेमाने भाषाविद् और प्राकृतजैनविद्या के महारथी डॉ. अमृत माधव घाटगेजी से भी कोल्हापुर में जाकर संपर्क किया । कोश के मुख्य संपादकत्व की जिम्मेदारी स्वीकृत करने के लिए उन्होंने उनको राजी किया। पुणे में संस्था के नजदीक उनके रहने का भी इंतजाम किया । डिक्शनरी का प्रारूप (Scheme) बनाने की जिम्मेदारी उनपर सौंप दी । डॉ. घाटगेजीने छह महीने तक पूरी योजना बनायी, प्रश्नावली बनाकर देशविदेश भेजी, कोश कार्य के लिए १००० प्राकृत जैनिसम संबंधी किताबों का ग्रंथालय तैयार किया और इंटरव्यू लेकर चार असिस्टंट चुने । १ अप्रैल १९८७ में डिक्शनरी के काम का प्रारंभ हुआ । | आज इस महत्त्वाकांक्षी प्रकल्प की प्रेरणाभूत तीनों हस्तियाँ इस दुनियामें नहीं है, फिर भी तीनों के उत्तराधिकारी बडी लगन से इस प्रकल्प को यथाशक्ति आगे बढ़ाने में जुटे हैं। प्रकल्प का सालभर का खर्चा लगभग दस लाख रूपये हैं । भाण्डारकर संस्था और सन्मति - तीर्थ के अध्यक्ष श्रीमान् अभयजी फिरोदिया खर्चे का आधा-आधा हिस्सा उठा रहे हैं । (३) बृहद् - कोश को आवश्यकता और उसका सामान्य स्वरूप : इस कोश का पूरा. नाम इस प्रकार है A Comprehensive and Critical Dictionary of Prakrit Languages (with special reference to Jain Literature) पहले तो यह बात है कि इस प्रकार के नये कोश की क्या आवश्यकता है ? इसके पहले बनी हुई डिक्शनरियाँ क्या काफी नहीं है ? इसके पहले बने हुए कोशों की कमियाँ बताने के बदले इसकी विशेषताएँ कहती हूँ । (१) इस प्रकार का कोश अंग्रेजी में नहीं बना है । भविष्यकाल में भी बननेकी आशा लगभग नहीं के बराबर है। एक बार कोश अंग्रेजी में बनें तो दुनिया की सभी भाषाओं में रूपांतरित हो सकता है I (२) इस कोश के आधारभूत ग्रंथ लगभग ५०० हैं । पहले बनी हुई डिक्शनरियोंसे यह व्याप्ति काफी बड़ी है । (३) इस में सभी जैन और जैनेतर ग्रंथ उपयोग में लाएँ हैं, जो प्राकृत भाषामें लिखे हैं। जैन संस्कृत के शब्द यहाँ समाविष्ट नहीं है । Page #98 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 ___ (४) 'प्राकृत' यह नाम बिलकुल सर्वसाधारण है। इस कोशमें सात प्रकार की प्राकृत भाषाओं का समावेश किया है । अर्धमागधी, जैन माहाराष्ट्री, जैन शौरसेनी, माहाराष्ट्री, शौरसेनी, मागधी और अपभ्रंश । माहाराष्ट्री, शौरसेनी और मागधी इन भाषाओं में जैनेतर साहित्य और नाटकीय प्राकृत साहित्य लिखा हुआ है। ताकी ४ भाषाओं में समूचा प्राचीन जैन साहित्य पाया जाता है। प्राय: श्वेतांबर प्राकृत साहित्य अर्धमागधी और जैन माहाराष्ट्री में है। दिगंबर आचार्यों ने तात्त्विक ग्रंथो के लिए जैन शौरसेनी और चरित ग्रंथो के लिए अपभ्रंश भाषा अपनायी है। (५) इस कोश में भाषाओं का इतिहास और कालक्रम ध्यान में रखा है। (६) डिक्शनरी प्रॉजेक्ट शुरू होनेपर पहले पाँच सालतक शब्दों का चयन करके पाँच लाख शब्दपट्टिकाएँ (word-slips) तैयार की । वे सब अकारानुक्रम से (Alphabetically) लगाकर शब्दसंग्रह (Scriptorium) पूरा किया है। पाच साल के बाद एडिटिंग का काम शुरु हुआ । अबतक शब्दकोष के १००० पृष्ठ तैयार हुए है। 'अ' से शुरु होनेवाले सभी शब्द १००० पृष्ठोंमें अंकित है। (४) कोश-कार्य की प्रगति और वेग बढ़ानेकी योजना : हर साल लगभग १०० पृष्ठ तैयार होते हैं (इसका मतलब हर साल २५,००० शब्द अर्थ और अवतरण (meaning with citations) सहित अंकित किये जाते हैं। हर साल १०० पृष्ठोंका एक लघुखंड (Fasicule) तैयार होता है। ३ या ४ साल बाद लघुखंड एकत्रित करके खंड (Volume) बनता है। फिलहाल तीसरे व्हॉल्यूम का तीसरा फॅसिक्यूल बन रहा है । 'आ' से शुरू होनेवाले सभी शब्द एक साल में पूरे हो जाएंगे। श्रीमान अभयजी फिरोदिया डिक्शनरी का और एक युनिट बनाना चाहते हैं। उस युनिट का ट्रेनिंग शुरू हुआ है। अगर उस युनिट का काम स्वतंत्ररूप से चले तो डिक्शनरी का वेग डेढ गुना हो जाएगा। मतलब आनेवाले २० साल में डिक्शनरी पूरी करने की उम्मीद रखते हैं। (५) कोश में शब्द देने का तरीका; एक उदाहरण : प्राकृत शब्द का प्राथमिक रूप प्रथम बोल्ड टाइपमें देते हैं। उसके बाद कोष्ठक में सोपसर्ग शब्द तोडकर प्रथम प्राकृत के अनुसार रोमनायझेशन करके देते हैं । इसके बाद उसके नजदीक के संस्कृत शब्द का रोमनायझेशन देते हैं। Page #99 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 94 अनुसंधान-२९ कोष्ठक समाप्त करके उसका निश्चित व्याकरण देते हैं। पहले शब्द के अर्थ अलग अलग करके अवतरण सहित देते हैं । अवतरण में भाषाक्रम (linguistic order) और कालक्रम (Chronology) ध्यान में रखते हैं। एक उदाहरण प्रस्तुत करती हूँ। [37459f (aņu-satthi < anu-śāsti (śiști) f. 1. instruction, religious teaching, preaching, Amg. तिविहा अणुसट्ठी पण्णत्ता etc. Thāna. 3. 314 (194); etc. (अर्धमागधी के क्रमानुसारी अवतरण) JM. आहरणं तद्देसे चउहा अणुसट्ठि तह उवालंभो Dasave Ni. 73; (जैन माहाराष्ट्री के क्रमानुसार अवतरण) Apa. अणुसट्ठि जहट्ठिय विहिय ताहं Vilaka. 11.35.9; 2. praise, JM. अणुसट्ठि थुइत्ति एगट्ठा NisBhā. 6608; 3. permission, order, JM. इच्छामो अणुसढेि पव्वज्जं देय मे भयवं Sursuca. 6. 207; पुण वि पह सिंहासणमारुहिउं ताण देइ अणुसट्टि Kumā Pra. 214.8.] (6) कोश में प्रयुक्त संक्षेप (abbreviations) : कोश में मुख्यत: तीन प्रकारों के संक्षेप प्रयुक्त किये हैं । पहले तो व्याकरण के (grammatical) संक्षेप हैं, जैसे कि - f.-feminine, m.-masculine, n.-neuter, adj. - adjective etc. उसके बाद विविध प्राकृत भाषाओं के नामों के संक्षेप बनाये हैं, जैसे कि- Amg. - Ardhamāgadhi, Apa.Apabhramsa etc. अनन्तर ग्रंथों के नामों के भी संक्षेप बनाये हैं, जैसे किAyar.-Acāranga, Utt.-Uttaradhyayana, SatAg.-Satkhandagama etc. (7) शब्दों का चयन (Selection of Worlds) : प्रायः शब्द एकपद शब्द हैं। दो पदों से युक्त समास (Compounds) भी दिये हैं। अगर अर्थ की दृष्टिसे महत्त्वपूर्ण हो तो क्वचित् तीन पदोंसे युक्त समास भी दिए हैं । जैसे 'अणेग' शब्द के बाद अणेगकरण, अणेगक्खरिय, अणेगगणणायग, अणेगचित्त इत्यादि समास भी दिये हैं। क्रिया या धातुओं से बने हुए कृदन्त रूप और विविध तद्धित रूप भी दिये हैं। उदा. अणुचर-क्रियापद के बाद अणुचरंत, अणुचरमाण, अणुचरिउं, अणुचरिता, अणुचरिदव्व, अणुचरियइस प्रकार के रूप भी अर्थ और व्याकरण सहित दिये है। विशेषनाम दिये हैं लेकिन उनसे जुड़ी हुई कथाएँ वगैरे नहीं हैं। Page #100 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 95 (८) बृहद्-कोश में काम करनेवाले रीसर्च स्कॉलर्स (१) प्रो. आर.पी.पोद्दार (मुख्य संपादक) (सन्मति-तीर्थ) (२) डॉ. नलिनी जोशी (सहायक संपादक) (भाण्डारकर) (३) डॉ. कमलकुमार जैन (सहायक संपादक) (भाण्डारकर) (४) डॉ. मीनाक्षी कोडणीकर (सहायक संपादक) (भाण्डारकर) (५) प्रो.जी.बी.पनसुले (असोसिएट एडिटर) (भाण्डारकर) (६) डॉ. ललिता मराठे (ज्यूनियर) (सन्मति-तीर्थ) (९) अत्यंत जटिल तथा बौद्धिक कसौटी का कार्य : ____ अनेक देशी-विदेशी विद्वान तथा अनुसंधानात्मक कार्य के प्रति लगाव रखनेवाले साधु-साध्वियों ने इस कोशकार्य के जटिलता की तथा अर्थानिर्धारण के कार्य में निहित बौद्धिक आह्वान की मुक्तकंठ से प्रशंसा की है। यह कार्य इसी तरह आखिरतक अच्छी तरहसे संपन्न होने की शुभकामनाएँ भी दी है। (१०)भाण्डारकर संस्था में कोशकार्य के लिए अलग धनराशि की आवश्यकता : सन्मति-तीर्थ ट्रस्ट इस कोशकार्य के लिए प्रतिवर्ष ५ लाख रूपयोंका धनराशि खर्च कर रहा है। भाण्डारकर संस्था के द्वारा प्रतिवर्ष ५ लाख रूपयों की व्यवस्था की जाती है। यह संस्था प्रायः समाजके द्वारा प्रदान किये हुए धनराशि पर ही चलती है। आजतक के इतिहास से यह सिद्ध हुआ है कि इस संस्था के द्वारा अंगीकृत कार्य कितना भी विशाल हो, समूचे समाजने अपने आर्थिक सहयोग से वह संपन्न कराने में सदैव सहायता की है। पूरे विश्व के जैनियों के लिए इस लेख द्वारा मैं आवाहन करती हूँ कि पूरे जिनवाणी के एक-एक शब्दार्थनिर्धारण से बननेवाले इस बृहद्-कोश के लिए आप भाण्डारकर प्राच्य विद्या संशोधन मंदिर की दिलोजान से सहायता करें! जय जिनेन्द्र ! जय भारत ! डॉ. नलिनी जोशी सहायक संपादक, प्राकृत डिक्शनरी प्रॉजेक्ट, भाण्डारकर प्राच्य विद्या संस्था पुणे-४ (महाराष्ट्र) Page #101 -------------------------------------------------------------------------- ________________ चर्चा . 'बुद्धिप्रकाश' मार्च २००४मां 'गुजरातना इतिहास लेखनमां रही जता मुद्दाओ' लेखमां श्री नरोत्तम पलाण लखे छे : ___"आचार्य हेमचन्द्रे ढोलामारुना जे अपभ्रंश दुहा उद्धृत करेला छे, ते जूनागढना राजकवि लुणपाल मेहडुरचित छे. कदाच आचार्यश्री आ जाणता पण हशे, परंतु अणहिलपुर पाटणना वर्णनमां जेम एना स्थापक विशे आचार्यश्री मौन छे, तेम आ दुहा रचनारनुं नाम लेता नथी ! रसिकलाल छो. परीख, आ विशेर्नु अनुमान मने योग्य लागे छे. शा माटे पाटणना वर्णनमां चावडानो उल्लेख नथी ? तो कहे छे के कदाच सिद्धराज जयसिंह जेवाने शत्रुनुं नाम लेवू न रुचे माटे. आ ज गणतरी जूनागढना कवितुं नाम न लेवा पाछळ पण जणाय छे." (पृ. ३३,३४) ___आ विधानो अंगे चर्चा करवी जरूरी छे. कलिकालसर्वज्ञ श्री हेमचन्द्राचार्य, सिद्धराजने खुश करवा के राखवा प्रतिस्पर्धी राज्यना कविनी रचनानो उपयोग करवा छतां नामोल्लेख न कर्यो, एवं तारण, मारी दृष्टिले पूर्वधारणा अने गृहीत परथी करेलुं निगमन छे अने हेमचन्द्राचार्य पण कोई राज्याश्रित पंडित होय अने आश्रयदाताना राजीपा माटे प्रवृत्त होय एवं ठसाववा मथे छे. गुजरातना उत्तमोत्तम भारतीय क्षेत्रना पण्डित माटे आवो तर्काश्रय अने आरोप निराधार छे. पहेलुं तो ए के ढोलामारुनो जे दूहो बन्ने स्रोतमा छे ते जूनागढना राजकवि लुणपाल मेहडुनो ज छे ? लुणपाल महेडु समकालीन छे ए निःशंक छे ? होय तो आ दूहो एमनो मौलिक ज छे के परंपरागत छ ? महेडुनी कृतिनी हस्तप्रत क्यारनी? केटली जूनी ने श्रद्धेय ? दुश्मन राज्यना समकालीन चारणी कविनी हस्तप्रत पाटण पहोंची ? क्यारे ? कई रीते? कया संजोगमां? आजनी जेम जे कोई लखे ने जेवू कोई लखे ते छपाई जाय अने बधे पहोंची जाय ए परिस्थिति मध्यकाळमां न हती. बहु ज अपवाद रूप पण्डितो, कविओनी रचनाओ, एमना जीवनकाळ दरमियान हस्तप्रतरूपे बीजे पहोंचती. कर्ताने अने कृतिने सिद्ध -प्रसिद्ध थतां अने एवी कतिओनी हस्तप्रतो लखातां अने प्रसरतां लांबो समय लागतो. हस्तप्रत साथे सीधुं काम पाडनार ते जाणे छे. आ बाजुओ राखीओ तो बीजी महत्त्वनी बाबत ए छे के आचार्यश्रीओ अने महेडुए बन्नेए Page #102 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 97 एमना काळनी कथानी परम्परामांथी दूहो लीधो होय, एवो संभव न होय ? कोई पण पद्यकार कोई कथाने कृतिनुं रूप आपे छे त्यारे ए कथाना परम्परागत संलग्नअंग जेवा दुहाओने पण पोतानी कथारचनामां स्थान आपे छे. 'नन्दबत्रीसी'नी कोई पण रचनामां 'पडपासा पोबार'नो बधा ज उपयोग करे छे. मारु ढोलानी कथाओना, कबीरवाणीना अभ्यासी अने पेरीसनी युनिवर्सिटीमां भारतीय सन्तवाणीना अभ्यासनो पायो दृढ करनार अने फ्रान्कवा मालिझों जेवी शिष्यानी परम्परा धरावनार स्व. डॉ. वोदविले मारुढोलानो अभ्यास करीने, एनी विविध रचनाओना आधारे, ते कथाना परम्परागत मूळभूत दूहाओ क्या, केटला तेना पाठनो निर्णय कर्यो छे. एमां संभवतः आ दुहो होई शके. जैन स्रोतमां कुशळलाभे पण मारु-ढोलानी कथा दुहा-चोपाईमां बांधी छे. अमां पण परम्परागत, कथाना मूळ अंगरूप दुहाओ छे. आ बधुं जाण्या के चकास्या वगर ज ए दुहो चारण कविनो ज छे अने तेनो उपयोग करवा छतां राजाने खुश राखवा एनो नामोल्लेख टाळ्यो : आवां अनुमान अने आरोपमां संशोधन-स्वाध्यायनो रस-अधिकार केटलो ? ते सवाल अवश्य उद्भवे छे. __ हसु याज्ञिक ३, शीतल प्लाझा, वस्त्रापुर, अमदावाद-५४ (२) नोंध : श्रीनरोत्तम पलाणना निरीक्षण परत्वे केटलुक ज्ञातव्य : १. हेमचन्द्राचार्य द्वारा उद्धृत दुहा लुणपाल महेडुना होय के गमे तेना होय, पण अपभ्रंश (प्राकृत) व्याकरणमां उदाहरण लेखे तेनुं उद्धरण टांकवानुं होय त्यारे त्यां तेना प्रणेता नाम लखवानुं व्याकरणकार माटे जराय आवश्यक नथी. आचार्ये ते व्याकरणमां आपेलां बहुसंख्य उदाहरणो अन्यान्य अनेक रचनाओमांथी लीधां छे, अने तेमां एकमां पण तेमणे तेना रचनार- के मूळ ग्रन्थ, नाम आपेल नथी. डॉ. भायाणीए आवां अनेक उदाहरणोनां मूळ स्थानो शोधी आप्यां ज छे. वस्तुतः मध्यकालमां आवी, आजना सन्दर्भप्रचुर शोधपत्रोमा प्रवर्ते छे तेवी प्रथा ज न हती. एटले आचार्ये दुहाना रचनार नाम Page #103 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनुसंधान - २९ न लीधुं होय तो तेमां 'असूया' होय अथवा 'राजानी खुशामत करवानी वृत्ति' होय एवी कल्पना करवामां आपणी मनोवृत्तिनुं हेत्वारोपण आचार्यमां थतुं जणाय छे, जे शिष्टतानी मर्यादाने अतिक्रमे छे. 98 २. सिद्धराजने जूनागढना राणा साथे शत्रुता होय तेटलामात्रथी ते त्यांना विद्वान् कविना नामोल्लेख परत्वे पण सूग धरावतो होय अने तेनी सूगने कारणे हेमाचार्य पण ते नाम लेवानुं टाळे, आ नरी हास्यास्पद अने मनःकल्पित कल्पनामात्र छे. एवं ज होत तो शत्रुराजना कविना मनाय छे ते दुहा ज आचार्ये लीधा न होत ! आचार्यने तथा राजाने आटला बधा क्षुद्र धारी लेवा, ते अत्यन्त गेरवाजबी छे ज; इतिहासना भीतरी प्रवाहोनी अल्पज्ञता पण तेथी सूचवाय ज. ३. पाटणना स्थापकनुं नाम न लीधुं के चावडा विशे तेओ मौन छे ते वातने आचार्यनी खुशामतिया वृत्ति प्रवृत्तिसूचक मानवी ए तो नर्यो अन्याय छे. आचार्ये स्वीकारेली मर्यादा ए छे के तेओ सोलंकीवंशने ज वर्णववा चाहे छे, अने तेमां पण व्याकरणने सांकळीने ज वर्णन आलेखवा मागे छे. तेमने मन गुजरातनुं पोतीकुं सर्वांगसम्पन्न व्याकरण रचवुं ए ज केन्द्रवर्ती बाबत छे; राजानुं के तेना वंश आदिनुं वर्णन तो आनुषंगिक बाबतमात्र छे. आ तथ्यनो ऊंडाणपूर्वक विचार करवामां आवे तो घणा सवालो शमी शके. ४. चारणी साहित्यनुं मूल्यांकन, उपादेयता, उपयोगिता तथा इतिहासमां तेनी अगत्य - आ बधुं स्वीकारवुं के न स्वीकारवुं ते तो विद्वानोनो विषय गणाय. परन्तु तेनो पक्ष रजू करवा जतां, तद्दन अनावश्यक रीते, हेमचन्द्राचार्य वगेरेने ऊतारी पाडती कल्पनाओ के संकेतो आपवां, ते तो केवळ अनुचित चेष्टा ज बनी रहे छे. ५. वस्तुतः तो चारणी साहित्यना पक्षधरोए गौरव अनुभववुं जोईए के एक जबरदस्त जैन साहित्यकारे पण, पोते नवा दुहा रचवानुं सामर्थ्य धरावता होवा छतां, कोई चारण कविनी रचनाओ (जो खरेखर तेम होय तो), पोताना मौलिक ग्रन्थमां गुंथी अने तेने अमर बनावी, तेनी प्रतिष्ठा वधारी. ओम पण तेओ कही शके के हेमाचार्ये जो चारणी रचनाने आटली इज्जत बक्षी, तो आजे ए ज कुळनी रचनाओ साथे वेरोआंतरो केम ? अलबत्त आ माटे विधेयात्मक दृष्टि होय ए आवश्यक गणाय. शी. Page #104 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विहंगावलोकन (अनुसन्धान २७नुं) ___ मुनि भुवनचन्द्र अनु. २७ मां संस्कृत अने संस्कृतेतर प्राचीन भाषाओनी वानगी प्रस्तुत करती एक रसिक कृति 'षड्भाषामयं पत्रम्' प्रगट थई छे. 'बुद्धिमानोनो समय काव्यशास्त्रविनोद वडे पसार थाय छे अने मूर्खाओनो समय व्यसन, ऊंघ अने कलहमां जाय छे'- एम एक सुभाषित कहे छे. पंडित वर्ग अने उच्च शिक्षित शासकीय वर्गमां केवो विद्याविनोद थया करतो हतो तेनो नमूनो आ कृतिमां छे. पृ. ९ पर श्लोक १८मां 'भग्नं' छपायुं छे त्यां 'भग्गं' एवं प्राकृत रूप होवू घटे. अभिनय माटेनी सूचनानां वाक्यो कौंसमां मूकवानी पद्धति सम्पादके स्वीकारी नथी, पण ते वाचक माटे स्वीकारवा योग्य छे. सम्पादक विद्वद्वर्य म. विनयसागरजीए कृतिनी भूमिकामां कृतिसम्बद्ध तथ्यो जे रीते आप्या छे ते नूतन संशोधको माटे दिग्दर्शक बने एवं छे. 'कल्प व्याख्यान मांडणी'मां कल्पसूत्रना व्याख्यान समये मुनिवरो केवी भूमिका रचता तेनी झलक मळे छे. प्रस्तुत मांडणीमां सर्व गच्छोना प्रभावक पूर्वाचार्योनुं नामस्मरण थयुं छे ते प्रेरणादायी छे. उच्च साहित्यिक स्पर्शवाळी रजूआत आमां छे, ते ए वखतना श्रोताओनी तेवा प्रकारनी सज्जताने पण व्यंजित करे छे. आमां त्रिपदीने 'अंगत्रय' एवं नाम अपायेखें छे जे एक नवीन वात छे. पृ. २३ पर 'सुमतिसूरिए ४ शाखा अने पांचमा प्रधाननी स्थापना करी' एम छे. आ 'प्रधान' एटले शुं तेनो फोड सम्पादके पाड्यो नथी. पृ. २० पर त्रण अशुद्ध श्लोको छे ते तत्त्वार्थ आद्यकारिकामांथी लेवाया छे. पृ. २१ पर त्रीजी पंक्तिमां 'नावा ग्रामगुणाः' छे त्यां 'नो वा ग्रावगुणाः' एवो पाठ समीचीन जणाय छे. 'लाभोदय रास' जेवी महत्त्वनी कृतिनी पुनः संशोधित वाचना आ अंकमां अपाइ छे. एक विशिष्ट कृतिनुं अनुसन्धानकार्य आगळ चाले छे. वि. Page #105 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 100 अनुसंधान-२९ सेनसूरिजीना शान्त-प्रखर व्यक्तित्वनी रेखाओ आ रासमां अंकित छे. रासकर्ता भक्त-शिष्य छे तेथी भावविभोर वर्णन भले थयुं होय, पण रासमांथी ऊपसता तथ्यो ओछा रोमांचक नथी. इतिहास लेखको माटे कृतिनी उपयोगिता स्वयंसिद्ध छे. कृतिमां ऊर्दू शब्दो सारा प्रमाणमां छे, तेथी ऊर्दूभाषाविद द्वारा कृतिनो परिष्कार थाय ए इच्छनीय छे. क. २९ : 'सोईउ रसरूप'. आवो पाठ विषयानुरूप नथी. 'सोई उ (ओ)रसरूप' एम वांचवामां आवे तो अर्थसंगति थाय : अकबर कहे छे के 'जेने जोऊ छु तेनुं स्वरूप तो कंइ बीजं ज जणाय छे.' क. ३० : 'अ पूठे' नहि पण 'अपूठे' साचुं छे. 'अपूठी' शब्द महोपाध्यायजीए पण वापर्यो छे. शब्दकोश : २४. 'आसकारां'नो अर्थ 'आशाकारी-आश्वासन देनार' एवो कल्प्यो छे ते बेसतो नथी. आ शब्द ऊर्दू होई शके. २७. बुहडि : 'बहुरि' (वारंवार)नुं भ्रष्ट रूप होई शके.. ३९. सबाब : 'सबब'नुं भ्रष्ट रूप होई शके. सबब - कारण, प्रयोजन, 'प्रयोजन होय तो कथन करे' एवो पंक्तिनो अर्थ पण बराबर बेसे. ८२. नलवटि : कपाळ, भाल. ११२. पाखर : जैन साहित्यमा 'पख्खर' 'पाखरियो' एवा शब्द सिंहना सम्बन्धमां मळे छे. 'पांखोवाळो सिंह' एवो सम्बन्ध अहीं पण बेसे छे. १२३. दूसमन समय : आवो ज शब्द क. १४३मां पण छे अने त्यां 'दुश्मन सामे' एवो अर्थ लई शकाय तेम नथी. 'दूसम समय' - 'दुःषम काल' एवो अर्थ लेतां त्यां अर्थ संगति थाय छे. माटे 'दूसमन' वाचनभूलना कारणे आव्यो होवानुं प्रतीत थाय छे. 'श्री संभवनाथ कलस'नो प्रथम संस्कृत श्लोक अशुद्ध रह्यो छे. 'भिन्द्रवंधू', 'संस्नप्यते', 'बिम्बं' एम शब्दो शुद्ध भरीने मूकवानी जरूर Page #106 -------------------------------------------------------------------------- ________________ August-2004 101 हती, क.प्र.मां 'फूल' छे त्यां 'फल' जोईए. क. २६ : 'निकायकना' छे त्यां 'निकायना' जोईए. मेघकुमारनी सुप्रसिद्ध सज्झायनी जूनी वाचना रसीला कडिया द्वारा सम्पादित थईने आ अंकमां रजू थई छे. क. १२ मां 'रुडई' छे त्यां 'रडई' वधु योग्य ठरे. क. १४ मां 'हंसचूलिका' छे, पण 'हंसतूलिका' होवानी शक्यता वधु छे. क. ३८मां 'तेह' छपायुं छे, पण साचो शब्द 'नेह' छे. 'आदिनाथ वीनति पूजा' एक भावपूर्ण रचना छे. शत्रुजययात्राना प्रथम दिवसे ज अथवा यात्रा पछी संस्मरण रूपे आवी रचनाओ करवानी एक परिपाटी ज एक वखत प्रचलित हती. कोई धारे तो आवो एक संग्रह तैयार करी शके. श्री पार्श्वचन्द्रसूरिनी आ ज ढबनी एक स्तवनकृति छ : 'भली भावना विमलगिरि भेटवानी....' क. १८ मां 'जे जे हार' छे त्यां 'जे जुहारई' इवो पाठ सरलताथी निश्चित थई शके एवो हतो. मूळ प्रतनी अशुद्धि सम्पादके यथाशक्य गाळवी जोईए अने कौंसमां पण शुद्ध पाठ आपवो जोईए. क. १९मां पाठवचननी आवी ज भूल छे. 'मधुर कर मालती' नहीं, पण 'मधुकर मन मालती' एम वांचq घटे. हेल (कडी ६) एटले धक्को नहीं, पण 'रमत, मोज, क्रीडा. मूळमां 'हेल दे' छपायुं छे त्यां 'हेलई' होवानुं समजाय छे. हेलई = मोजथी. क. २३मां 'अमृत विर' पाठ बरोबर नथी. अक्षरो पण खूटे छे. बीजी प्रतमांथी शुद्ध पाठ न मळे तो संभवित पाठ पण कौंसमां बताववो जोइए. अहीं 'अमृत [सर]वर' जेवो पाठ होइ शके. कडी १मां 'अलजउ' शब्द पण 'अलज्यउ' एम भूतकाळy क्रियापदरूप समजवानुं छे. शब्दकोशमां 'अलजउ'नो अर्थ 'आतुर' लख्यो छे ते भ्रमपूर्ण छे. अलजउ = आतुरता अने अलज्यउ = आतुर थयेलो. अनु. २५ मां छपायेल प्रमाणसार नामक संस्कृत लघुग्रन्थ श्री नगीनभाई ज. शाह जेवा विद्वान द्वारा सम्पादित-प्रकाशित थई चूकेलो - एनी जाण पाछळथी थई, पण ए संशोधित प्रकाशनना आधारे 'प्रमाणसार'नी Page #107 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनुसंधान- २९ अनु. मां प्रगट थयेल वाचनाने सुधारवानो मोको सम्पा. श्री शीलचन्द्रसूरिजीए झडपी लीधो छे. आ शुद्धिपत्रक जोवाथी हस्तप्रतोना लिपिकारो - लहियाओ द्वारा मूल ग्रन्थमां केवी केवी अशुद्धिओ प्रवेशी शके छे. तेनो सरस ख्याल नूतन अभ्यासीओने मळशे. 102 ग्रन्थने बराबर समजवो ए सम्पादकनी प्रथम फरज छे अने आवो तार्किक ग्रन्थ समजवो कठिन होय छे ए पण आ सम्पादनना माध्यमथी जाणी शकाय छे. 'चाणाक्य' विशे दक्षिणमां रचायेला एक ग्रन्थमां जे कथा मळे छे तेना उपर श्री शीलचन्द्रसूरिनी एक अभ्यासनोंध आ अंकमां छे. 'चालाक' शब्दनुं मूळ 'चाणाक्य = चाणाक्ष मां होय ए आ लेखमांथी जाणवा मळे छे. कथासाहित्यमां कल्पना अने तथ्योनुं केतुं मिश्रण थई जतुं होय छे, तेमज तथ्यो पण केटली हदे अस्तव्यस्त थता होय छे तेनुं सरस निदर्शन आ कथामां जोई शकाय छे. जैन देरासर ३७०४३५ जि. कच्छ, गुजरात नानी खाखर Page #108 -------------------------------------------------------------------------- ________________ माहिती नवां प्रकाशनो १. सुमइनाहचरियं कर्ता : श्रीसोमप्रभाचार्य. सं. डॉ. रमणीक शाह, प्रका. प्राकृत ग्रन्थ परिषद् (P.T.S.) अमदावाद, ई. २००४ 'कुमारपालपडिबोहो' जेवी सुदीर्घ रचना अने 'सिन्दूरप्रकर' जेवी विविध काव्यरचनाओ वडे विद्वज्जगत्मां सुप्रसिद्ध श्रीसोमप्रभसूरिनी एक प्राकृत चम्पूकाव्यात्मक रचना आ ग्रन्थरूपे प्राप्त थाय छे, ते प्राकृतप्रेमीओ माटे उत्सवरूप घटना छे. ____ आ ग्रन्थनो गुजराती अनुवाद थोडांक वर्षो अगाउ थयो छे, जे प्रकाशित पण थयो छे. त्यार पछी घणा वखते मूळ रचना प्रकाशन पामी छे, ते नोंधq जोईए. . . आवा ग्रन्थ, तज्ज्ञ विद्वानना हाथे सम्पादन थाय त्यारे सहज रीते ज शोधपूर्ण अने अध्ययनात्मक प्रस्तावना माटे तथा विविध रीते महत्त्वपूर्ण एवां परिशिष्टो माटे जिज्ञासा तथा अपेक्षा रहे. परन्तु ते बन्ने वाते अहीं मात्र निराशा सांपडे छे. वर्षो पर्यन्तनी व्यस्तताने कारणे ग्रन्थ- सम्पादन न थई शक्यं तेवी सम्पादकनी वात स्वीकारी लईए तो पण, ज्यारे मोडे मोडे पण प्रकाशन थतुं ज हतुं तो प्रस्तावना-परिशिष्टो मूकायां होत तो सम्पादकनी विद्वत्तानो तथा ग्रन्थनी विशिष्टताओनो आपणने घणो बधो लाभ मळ्यो होत तेम लागे छे. २. हितोपदेश : 'हितोपदेशामृत' विवरण समेतः. कर्ता : आ. प्रभानन्दसूरि. विवरणकार : आ. परमानन्दसूरि. सं. आ. कीर्तियशसूरि. प्रका. : सन्मार्ग प्रकाशन, अमदावाद, ई. २००४ पोथीस्वरूपे प्रकाशित आ ग्रन्थ पुस्तकाकारे पण प्रसिद्ध थनार छे. विक्रमना १३-१४ मा शतकमां थयेला ग्रन्थकारे रचेल आ ग्रन्थ प्रायः प्रथमवार प्रकाशन पाम्यो छे. आ ग्रन्थमां अनेक उपयोगी टिप्पणो तथा जरूरी परिशिष्टो तैयार करनार साध्वी श्रीचन्दनबालाश्रीजीए आम करीने ग्रन्थनी उपयोगिता वधारी छे. Page #109 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनुसंधान - २९ ३. सानुवाद व्यवहारभाष्य कर्ता : श्रीसंघदासगणि महत्तर, अनुवाद : मुनि दुलहराज प्रका. जैन विश्व भारती, लाडनूं. ई. २००४ मूल ग्रन्थनुं सम्पादन कर्या पछी हवे तेनो (हिन्दी) अनुवाद - ग्रन्थ प्रकाशित थाय छे. विद्याजगतने उपयोगी छतां, आ अनुवाद प्रकाशित थवाथी, आवा विशिष्ट अने छेदसूत्रपरक ग्रन्थनो अबोध तथा अर्धदग्ध जनो केटलो बधो दुरुपयोग करशे ? ए प्रश्न समस्यारूप बनी रहेशे, ते नि:शंक छे. इतर आगमग्रन्थो तथा छेदसूत्रात्मक ग्रन्थो वच्चेनी विषयगत भिन्नता आचार्य महाप्रज्ञजी जेवा प्राज्ञ पुरुषना ध्यानमां होय ज; अने ए भिन्नताने लक्ष्यमां लईने आवा अनुवादोने अप्रगट ज रहेवा दई, मूळ ग्रन्थोनां सम्पादन- प्रकाशन सुधी ज पोतानी आगमवाचनाने मर्यादित राखे, तेवो हार्दिक अनुरोध करवानुं मन थाय छे. ४. जैन संस्कृत साहित्यनो इतिहास भाग १-२-३ ले प्रो. हीरालाल रसिकदास कापडिया सं. आ. विजयमुनिचन्द्रसूरि प्रका. आ. ओंकारसूरि ज्ञान मन्दिर, सूरत. ई. २००४. (भाषा गुजराती) 104 सद्गतही. र. कापडियानुं कार्य एक रीते one man university जेवुं हतुं. तेमणे करेलां सर्जनो, संशोधनो सम्पादनो, प्रकाशनो, सूचिकार्यो एटलां मातबर, श्रेष्ठ, गंजावर अने स्वयंपूर्ण छे के एटलां कार्यो करवा माटे आजे तो १० विद्वानोनी एक टुकडीने २५ वर्ष आपो तोय ते बधां काम करी शके के केम ते सवाल छे. आवा श्रेष्ठ विद्वाने पचासेक वर्षो पूर्वे तैयार करेल जैन संस्कृत साहित्यना इतिहासनो मूल्यवान् सन्दर्भग्रन्थ, आजे तो अलभ्यप्राय बनी रह्यो हतो. एनुं पुनः प्रकाशन थाय तो संशोधको अने अभ्यासुओने घणो उपकार थाय तेम होवा छतां ए कार्य अद्यावधि थतुं नहोतुं. आ कार्य शोधरसिक आ. मुनिचन्द्रसूरिए उपाडी लीधुं, अने सुपेरे आ ग्रन्थनुं पुनः प्रकाशन ३ पुस्तकोमां कराव्यं ते खूब आवकारदायक घटना छे. तेमणे यथावत् प्रकाशन कर्तुं होत तो पण चाली जात. पण तेने बदले तेमणे, वाचकोनी सुगमता खातर, घणी घणी बाबते नवी अने सरल व्यवस्था करी दीधी छे; नव प्रकाशित के नवप्राप्त ग्रन्थो विषे पण उपयोगी जाणकारी आमां आमेज करी छे, तथा बीजुं पण केटलंक जरूरी सम्पादनकार्य कर्तुं छे, जेनी माहिती ते ग्रन्थनी प्रस्तावनामां तेमणे आपेल छे. 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