________________
32
आगम बोध माहानिध उज्जल सूरा सोह चढदा आतमबीज अखे अविनासी कीधें ब्रह्म कहंदा ॥१॥
बीजें बुध्य लहो नित बोधी केवल सीध कहंदा एक निरंजन जोति अनंती जोते जोत जगंदा । आगमबीजें बीज आरोपण बीजउदे युग पार पुरण ब्रह्म शदाशिव साश्वत आद्य अलख अपार ॥२॥
अनुसंधान - २९
साचो सुध लहिं समकीत्ति बीज बोध विचार आगमवांण वदें भगवंता आचारंग मझार । बीजें अंगें बोध जगाड्यो साधां हंदे सांइ जात जती - व्रत सूरा वीरा साचे साम सखाइ ||३|| आलमनाथ अमीणो साहेब जागव जोग जिणंदा तीरथनाथ धणी त्रिहुं लोके दाखें वांण दिणंदा । धर्म धडें करी धीरा हंदो ध्यावें धार धरंदा मुनीचन्द्रनाथ वदें युग जालम सोही साध कदा ||४||
इति बोधबीज सम्यक्त्वरत्नसाधन तीर्थोपदेश आराध बीजतिथिकलासाधननन्तरः अथ श्रीब्रह्मसीधान्तसिधतत्त्वजोति जगतेश्वर श्रीमुनिचन्द्रनाथ प्रकासिते निजपरसम्यक्त्वमिथ्या [त्व] द्विद्वा(धा? ) चैत्य (त) न्य ब्रह्मसिधजोतिअवगाह त्रिजतिथी कलाहेतु नयज्ञांनवांणी :
चालि:
त्रिजें त्रण्ये तत्त्व विचारो त्रीजें अंग तवंदा
त्रण्य भवन तिणें शिर सांइ ध्यांनी जेथ धरंदा । नाथ निरंजन हे निकलंकी साहिब शांति सुधारे पुरण राज करें पुरसोत्तम तेथ तवंता तारे ॥ १॥
ज्योति शंभु जगदीश धणी जे ज्योति झलामल दीशें ते महिनाथ अनंता तेजें त्रिविधा रूपनिवेशे ।
Jain Education International
For Private & Personal Use Only
www.jainelibrary.org