Book Title: Tarangvaikaha
Author(s): Padliptsuri, Nemichandrasuri,
Publisher: Jivanbhai Chotabhai Zaveri
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सं० तरंग
वईकहा ॥४५॥
बन्नो
-55ameeraelaeone
बडुयस्स मज्झ । अभिवादं न करेसि अह पढम एयस्स सुद्दस्स तं चिय ।। ९८(१) ।।दक्विगहत्या वलयं विदिक्खिण्णविकरणा। अहियं । अहिवाएमि अञ्जो ति बेमि निविद्या तयं बडुयं ॥९९॥ तो सहसा उफ्फडिओ अहिं कहिति बडुओ करेमाणो। अहं तुझं लग्गा हीयत्थं भण्णं करेमाणो ||७००॥ वेसत्तणेण दटुं अहयं हियकारणं न इच्छामि । भग तो(भो)दि किं अही मंति भणइ सो मं पुणो बडुओ ॥१॥ तो तं बेमि पुणो हं अही इहं नस्थि होहि वीमत्थो । तो भणइ किं खु अलियं अहि वा तो तत्तिमं भणसि ।।२।। अहयं कासवपुत्तो हारियगोत्तो दुजाइवरवंसो। भागुलदहिकूरपसंगो छन्दोगो माहणो मि ॥३(१)। अह किं ते न सुयपुष्वो तो परिभूय भोदि तोससि सा एव कुणइ वो(को)लाहलबोले तो मम तत्थ ।। ४(१) ॥ तो सत्थवाहपुत्तेण तत्थ भणिओ अहो सिचतलोत्तमा । अणियं इमं ता विरस्स इह आगतं चाहा अबसर ।। ५(१) । अकालभासणयवेभवं धूअ होसि निल्लजो । अविणीए चच्चरइयुउच्छा वाघयं महं ।।६(१)। तो सत्थवाहपुत्तेण बंभणो भणिो कडुयवयणेहिं । मुहसक्कडिया देतो | ते संतो में गओ तत्तो ॥७॥ तंसि य निग्गयमेत्ते तुट्ठा परिरुण्णलोभिरी अहयं । देवा हु मे पसण्णा जं एम इओ गओ बडुगो ॥८॥ तो सो य इ(मं च)भणई भद्दे ! कत्तो सि किं च आगमणं । भण किं च कारओ लहु मा एवं जंति अच्छो ॥९(१)।। तुह बस्सह कर्ज भरइ अकामे कायव्वरण हविद्धा । बेमि यावाणं सामिणि ! इमाणि वयणाणि जंपइ य ।। १०|| कुलचंद ! विगाय
भूसण! अयमदरिदिय गुणगविय ! जसंसि!। सव्वजणमणयवेमय ! सुण विष्णप्पं इमं अप्पं ॥११।। सेद्विस्स उसभसेणस्स | बालिया नामओ तरंगवई । दियलोयवासिणीणं अणुसरिसी अच्छरवहणं ॥१२॥ चित्तिजमाणकामो तीसे हियए मणोरहारामो।
१ अ० अयं । २ अ० अहियं । ३ अ. अविणीय० ।
Democreer
॥४५॥
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