Book Title: Tarangvaikaha
Author(s): Padliptsuri, Nemichandrasuri, 
Publisher: Jivanbhai Chotabhai Zaveri

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Page 82
________________ सं० तरंगवई कहा ॥ ५६ ॥ Jain Educatio ॥ ७१ ॥ इ कह ताव पियए ! कह पुण्णेहिं व ( चि) र विउत्ताणं । जाओ समागओ जे इच्छियसुहागमो भीरू ॥ ७२ ॥ सुयणु ! समागमहेउं जइ न कओ चित्तपट्टओ [पु]हुंतो । न हु परियत्तियरूवा जाणंता एकमेकमो (कं तो) ॥ ७३ ॥ तुह चित्तपट्टकसमो (मा) णो णे सुंयणु ! जीवियव्वपरमत्थो । पेमपरिग्गहसंगोवं अणुग्गहो मे कओ कत्तो ॥ ७४ ॥ एयाणि य अण्णाणि महुरकण्णमणनिव्वुकराई। तं (कंत ! जं) एते किं चि विढं न वाएमि ॥ ७५ ॥ चिरपरिचियवइयर निज्जियं पितमहं विर(पिय)स्स लजंती। उयत्तियमुहपउमा अर्द्ध [सित्थि]च्छिकडक्खियं पेच्छं || ७६ ॥ कंठे घोली खाया रहउसुया धगधगंत हिययाहं । मयणेण 'तोरविया संपुष्णमणोरहारंभा || ७७ || आगारेहि य अहयं तहा पसण्णेहिं पुलकियंगी य । नावा तलं कमेणं उल्लिहमाणी पि पि ॥ ७८ ॥ तं नाह ! देव यामि वच निवेह उसे रायं तुहं अधा । समसुहदुक्ख सहाहं आणो भोजा अहं तुझं ।। ७९ ।। न परिहरिया तुझ कए कुलहरं चयंती । भत्ता य बंधव तिय मा हवरेज्जाहा सहत्था ॥ ८० ॥ अहं पि य हु अह सरीरं धरेअ तुह रमण ! रागपरित्ता । सुचिरं पि निराहारा तुज्यं वाहारमेत्तेण ||८१॥ न य हं तुमे विरहिया मुहुत्तमेतं पि धीरखारेजा । वाहारवइगरंतो हिययसुहकरं अलभमाणी ।। ८२ ।। एवं भणिओ मए सो परिणामसुहावहं मया घरिणि ।। हिबयाई माणुसाणं चलचिताई गणती ।। ८३ ।। तो भणइ मा कुमाही मो उक्कंठा पिउए कुलहरस्स । न वि ते विमालनयणे ! किंचि विविउणं करेजा है| ८४|| मारइयतिक्खनइमोत्तच वलसंपत्थिया अपरितंता । अनुकूलवायनोलियमसत्यभावउ नावा या ।। ८५ ।। अचिरेण अम्हे सुंदरि ! पण्डरभवणे सोहियमुदारणा । गच्छामो पमयच्छी कार्यदिणिदियं नयरिं ॥ ८६ ॥ तत्थ य पिउच्छिया मे तीसे १ अ० भाइ य २ अ० णे ३ अ० सुण ४ उत्तेजिता । tional For Private & Personal Use Only 1148 11 jainelibrary.org

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