Book Title: Paryushanasthahnika Vyakhyan
Author(s): Manivijay
Publisher: Hirachand Hargovan Kapadia
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भाषान्तरम्
पर्युषणाष्टाह्निका व्याख्यान
॥२०॥
पामी दीक्षा अगीकार करी, व्रतनुं पतिपालन करी, काळधर्म पामी बारमे देवलोके उत्पन्न थयो. अन्यदा नंदीश्वरद्वीप प्रत्ये गमन करतां थका देवताओनी आज्ञा थवाथी हासा अने प्रहासाए विद्युन्माली देवने कर्जा के पटहने ग्रहण कर. एटले ते बोल्यो-अरे ! हुं महारा गलाने विषे पटहने नाखु के ? आवी रीते अहंकार अने हुंकार करनारा विद्युन्मालीना गळाने विषे पटह लाग्यो, अने महेनत करतां छत्तां पण कंठस्थलथकी मुक्त थयो नहि. ते अवसरे ते प्रकारनो देखाव देखी नागिल देवता अवधिज्ञानवडे पूर्वभवन स्वरूप जाणी त्यां आव्यो. जेम घूवड नामर्नु पक्षी सूर्यनां तेजने सहन करी शकतुं नथी तेम विद्युन्माली तेना तेजने सहन करी शक्यो नहि तेथी नासवा लाग्यो; जेथी तेजनुं संहरण करी नागिल देवताए का के-तुं मने ओलखे छ ? विद्युन्माली बोल्यो के इंद्रादिकने कोण ओलखी शकतुं नथी ? पछी श्रावकना रूपने प्रगट करी पाछलो भव देखाडी विद्युन्मालीने प्रतिबोध कर्यो, तेथी ते कहेवा लाग्यो के हुँ मानवभव हारी गयो, हवे हुँ केम क ? त्यारे देवताए कड्युगृहस्थावस्थाने विषे काउस्सग्ग ध्याने रहेला भावयति श्रीमान् वीरपरमात्मानी मूर्तिने कराव (भराव) के जेथी परभवने | विषे बोधीबीजनी प्राप्ति थाय. एवां वचनो नागिल देवताए पोताना मित्रने उंचगतिने विषे स्थापन करवा माटे कह्या. त्यारबाद विद्युन्माली महाहिमवान् पर्वतथकी जातिवंत चंदनने लावी मूर्ति बनावी, प्रतिष्ठा करी, कल्पवृक्षना पुष्पनी माळाथी पूजीने उत्तम चंदनना डाबडामा प्रतिमाने स्थापन करी, डाबडानुं मुख बंध करी समुद्रने विषे जइ गगनमंडळमां अद्धर रह्यो. ते समये समुद्रने विषे एक वहाण छ मासथी उत्पात थवाथो महादुर्दशाने विषे आवी पडेलं. ते उत्पातने संहरण करी विद्युन्माली देवे सांत्रिक (पोतर्वाणक) ने कहा के-आ डाबडाने विषे
बा॥ २० ॥

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