Book Title: Paryushanasthahnika Vyakhyan
Author(s): Manivijay
Publisher: Hirachand Hargovan Kapadia

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Page 55
________________ भाषान्तरम् पर्युषणाष्टाह्निका व्याख्यान ५ ॥ “सो जयउ जेण विहिया, संवच्छर चउमासिअ सुपव्वा। निद्धम्माण वि हवइ, जेसिं पभावा धम्ममई ॥१॥" भावार्थ:-जे मनुष्ये संवत्सरी तथा चौमासी आदि सुपर्वर्नु आराधन करेल छे ते जयवंता वत्तों, कारण के जे | पर्वना महिमाथकी निर्वस परिणामवाळा जीवोने पण धर्मने विषे बुद्धि थाय छे. कारण के पर्वना महिमानो प्रभाव पण एवो ज छे. वळी पण गुरुमहाराजना वचनरूपी अमृतरसवडे करी सिंचाएल पंडित पुरुषोना हृदय थोडा ज उपदेशथी भेदाइ जइ (बोधने पामी) भद्रिकभावी थइ जाय छे; परंतु घणो ज उपदेश आपवावडे करी ज्ञानीपुरुषो पण मूर्ख माणसना अंतरने भेदवा समर्थमान थता नथी. जेम मुशलधारा वरसादने वरसावनार मेघनी धारावडे करीने पण मगशेलीओ पाषाण कदापि काळे लेशमात्र भेदातो नथी तेमज मूर्ख माणसना हृदयने विविध प्रकारनी लब्धिी जेने उल्लास पामी छे तेवा ज्ञानी अने प्राभाविक पुरुषो पण भेदी शकता नथी. ते कारण माटे मूर्ख माणसने उपदेश आपवो सर्वथा वृथा छे. तथा तेनी पासे शास्त्रनी उक्ति (वचनश्रेणि) नो वरसाद वरसाववो ते पण वृथा छे. वळी मूर्ख माणस ते हित-अहितने तेमज उचित-अनुचितने पण जाणी शकतो नथी ते मूर्ख माणस शंग-पूच्छविहीन (शींगडा-पूछडा विनानो) संसाररूपी वनने विषे परिभ्रमण करे छे, अने धर्मने जाणी शकतो नथी. ते मूर्खना उपर उदाहरण सांभळो. ॥ १ ॥

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