Book Title: Kailas Shrutasagar Granthsuchi Vol 2
Author(s): Mahavir Jain Aradhana Kendra Koba
Publisher: Mahavir Jain Aradhana Kendra Koba

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Page 440
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatith.org Acharya Shri Kailassagarsur Gyanmandir ४२० कैलास श्रुतसागर ग्रंथ सूची ९२८०.” सारस्वतप्रक्रीया सह टीका - प्रथम वृत्ति, प्रतिपूर्ण, वि. १८वी, मध्यम, पृ. ८१, जैदेना., प्र.वि. संशोधित, पंचपाठ, पदच्छेद सूचक लकीरें, पू.वि. तद्धित प्रक्रिया प्रथम वृत्ति है., (२६४१०.५, २-६x४४-४६). सारस्वत व्याकरण, आ. अनुभूतिस्वरूप, सं., गद्य, आदि:-; अंति: सारस्वत व्याकरण-दीपिका टीका, आ. चन्द्रकीर्तिसूरि, सं., गद्य, वि. १६२३, आदिः सरस्वती सदाभक्त; अंति:९२८१. उपासकदशाङ्गसूत्र, अन्तकृद्दशाङ्गसूत्र,अनुत्तरौपपातिकदशासूत्र की टीका, संपूर्ण, वि. १७वी, श्रेष्ठ, पृ. २३, पे. ३, जैदेना.,प्र.वि. ग्रं.ग्रं.१३००., (२६४११, १७४५५-५६). पे.-१. उपासकदशाङ्गसूत्र-वृत्ति, आ. अभयदेवसूरि , सं., गद्य, वि. १११७, (पृ. १अ-१६अ), आदिः श्रीवर्द्धमानमानम्य; ___ अंतिः कुर्वतां प्रीतये मे. पे..२. अन्तकृद्दशाङ्गसूत्र-टीका , आ. अभयदेवसूरि , सं., गद्य, (पृ. १६अ-२१आ), आदिः अथान्तकृतदशासु किमपि; ___ अंतिः ननु विधीयतां सर्वतः. पे.-३. अनुत्तरौपपातिकदशाङ्गसूत्र-टीका , आ. अभयदेवसूरि , सं., गद्य, वि. १२वी, (पृ. २१आ-२३अ), आदिः अथानुत्तरौपपातिकदशा; अंतिः अन्तकृद्दशाङ्गवदिति. ९२८२. ठाणाङ्गसूत्र सह वृत्ति, पूर्ण, वि. १७वी, श्रेष्ठ, पृ. ४३९-५(४३५ से ४३८,४३१)=४३४, जैदेना., प्र.वि. मूल-१०स्थान; प्र.पु.-मूल-ग्रं. ३७५०; टीका-१०स्थान; प्र.पु.-टीका-ग्रं. १४५००., त्रिपाठ, (२५४११, ९-१६x४४-५०). स्थानाङ्गसूत्र, आ. सुधर्मास्वामी, प्रा., प+ग, आदिः सुयं मे आउसं तेणं; अंतिः मङ्खलिपुत्तस्सतवेतेए. स्थानाङ्गसूत्र-टीका, आ. अभयदेवसूरि , सं., गद्य, वि. ११२०, आदिः श्रीवीरं जिननाथं; अंतिः टीकाल्पधियोपि गम्या. ९२८३. प्रद्युम्न चरित्र, संपूर्ण, वि. १८वी, मध्यम, पृ. १०१, जैदेना.,प्र.वि. सर्ग-१६, (२६४११, १९x४४-४६). प्रद्युम्न चरित्र, मु. सोमकीर्ति, सं., पद्य, वि. १५३३, आदिः श्रीमन्तं सन्मतिं; अंतिः श्रीसर्वज्ञ प्रसादतः. ९२८४. राम चरित्र, संपूर्ण, वि. १८५४, श्रेष्ठ, पृ. १५५, जैदेना., ले.स्थल. राधनपुर,प्र.वि. सर्ग-१०,प्र.ले.श्लो. (५३३) मङ्गलं लेखकानां च; (६०५) भग्न पुष्टि कट ग्रिवा; (२१) जिहां ध्रु सायर चंद रवि, (२६४११.५, १३४४२-४४). राम चरित्र, गणि देवविजय, सं., पद्य, वि. १६५२, आदिः अथ श्रीसुव्रतस्वामि; अंतिः विणिग्गया वाणी. ९२८५.” कल्पसूत्र सह टबार्थ व व्याख्यान+कथा, अपूर्ण, वि. १८वी, श्रेष्ठ, पृ. २४३-४(२०७,२१० से २१२)=२३९, जैदेना., प्र.वि. प्रारंभ के कुछेक मूलपाठ का टबार्थ नही दिया है., संशोधित, टिप्पण युक्त विशेष पाठ, पू.वि. बीच-बीच व अंत के पत्र नहीं हैं., (२६४१०.५, ५४२६-२८). कल्पसूत्र, आ. भद्रबाहुस्वामी, प्रा., गद्य, आदिः णमो अरिहन्ताणं० पढमं; अंति:कल्पसूत्र-टबार्थ', मागु., गद्य, आदिः-; अंति: कल्पसूत्र-व्याख्यान+कथा* , मागु., गद्य, आदिः नाणं पञ्चविहं; अंति:९२८६. उपदेशमाला सह वृत्ति, पूर्ण, वि. १५५८, श्रेष्ठ, पृ. ९२-४(४ से ५,७.९)=८८, जैदेना.,प्र.वि. प्रारंभमे संपूर्ण मूलपाठ और बादमे मात्र प्रतिकपाठ दीया है., (२७.५४११, १३-१४४४४). उपदेशमाला, गणि धर्मदास, प्रा., पद्य, आदिः जगचूडामणिभूओ उसभो; अंतिः वयण विणिग्गया वाणी. उपदेशमाला-हेयोपादेया वृत्ति, गणि सिद्धर्षि, सं., गद्य, वि. १०वी, आदिः हेयोपादेयार्थोपदेश; अंतिः साधनपरः खलु जीवलोकः. ९२८७. श्रेणिकराजा रास, संपूर्ण, वि. १८वी, श्रेष्ठ, पृ. ३७, जैदेना., प्र.वि. खण्ड-४; प्र.पु.-मूल-ग्रं. ८१०, (२६.५४११, ११४२३ ४३). श्रेणिकराजा रास, आ. सोमविमलसूरि, मागु., पद्य, वि. १६०३, आदिः सकल ऋद्धि मङ्गलकरण; अंतिः मङ्गल जयकार. ९२८८. अभिधानचिन्तामणीनाममाला, संपूर्ण, वि. १८०८, श्रेष्ठ, पृ. ४४, जैदेना., ले.स्थल. पोरबंदर, ले.- ऋ. मयाचन्द, प्र.वि. For Private And Personal Use Only

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