Book Title: Jain Vrat Vidhi Sangraha
Author(s): Labdhisuri
Publisher: Jain Sangh Madras
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यावहियं पडिकमी, एक लोगस्सनो काउस्सग्ग करी पारी प्रगट लोगस्स कहेवो. पछी खमा० दह इच्छकारी भगवन् ! मम मुंडावेह, मम सव्त्रविरइसामाइयं आरोवेह. गुरु० कहे श्रारोत्रेमि पछी खमा० दइ इच्छाकारण संदिसह भगवन् ! मुहपत्ति पडिले हुं ? गुरु कहे पडिलेह. इच्छं कही मुहपत्ति पडिलेही नांदने पडदो करावी चे वांदणा देवा. पडदो कढावी खमा० दइ इच्छकारी भगवन् ! तुम्हे थम्हं सम्य सामा० श्रु०सामा० सर्व०वि० सामा० आरोवावणी काउस्सग्ग करावो. शिष्य एम कहे त्यारे इच्छं करेमि काउस्सगं अन्नत्थ कही गुरु अने शिष्य बन्ने एक लोगस्सनो काउस्सग्ग सागरवरगंभीरा सुधी करे. पछी प्रगट लोगस्स कहेवो. पछी मुहूर्त्त वेलाए ऊं श्वासे त्र नत्रकार गणनापूर्वक त्रण चपटी लेवी. पछी खमा० दह इच्छकारी भगवन् ! सम्यक्त्व आलापक उच्चरावोजी. एम कही पृथक् पृथक् नवकारपूर्वक त्रण वार उच्चराववो. ( प्रथम उच्चर्यु | होय तो न बोलवो.)
॥ अथ सम्यक्त्व आलावो ॥
अहन्नं भंते तुम्हाणं समीचे मिच्छत्ताउपडिक्कमामि सम्मत्तं उवसंपजामि तं जहा - दव्ओ, खित्तओ, कालओ, भावओ, दव्वशोणं मिच्छत्तकारणाइं पञ्चरकामि, सम्मत्तकारणाई उवसंपज्जामि, नो मे कप्पइ अज्जप्पभिइ, अन्नउत्थिआए वा अन्नउत्थियदेवयाणि वा अन्न उत्थियपरिग्गही -
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