Book Title: Jain Vrat Vidhi Sangraha
Author(s): Labdhisuri
Publisher: Jain Sangh Madras
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कहे, इच्छकारी भगवन् ! तुम्हे थम्हं ब्रह्मव्रत, ज्ञानपंचमी, रोहिणी, वीसस्थानक, मौन एकादशी तप आरोवियं इच्छामो भणुसहि, गुरु कहे श्रारोवियं आरोवियं खमासमणाणं, हत्थेणं, सुत्तेणं, अत्थेणं, तदुभएणं सम्मं धारिज्जाहि गुरु गुणेहिं बुढिजाहि नित्थारपारगाहोह. शिष्य इच्छं कही खमा० दइ तुम्हाणं पवेइयं संदिसह साहूणं पवेएमि, गुरु कहे पवेह. शिष्य कहे इच्छं खमा० दइ नांदने नवकार गण वा पूर्वक त्रण प्रदक्षिणा आपे. गुरु तथा सकळ संघ त्रण वखत मस्तक उपर वासक्षेप नाखे. पछी खमा ० दइ तुम्हाणं पवेइयं साहूणं पवेइयं संदिसह काउस्सग्गं करेमि, गुरु कहे करेंह. शिष्य कहे इच्छं. पछी खमा० दह ब्रह्मचर्यादि ( जे व्रत होय तेना नाम लेवा ) व्रतस्थिरिकरणार्थं करेमि काउस्सग्गं श्रन्नत्थ कही एक लोगस्सनो काउस्सग्ग सागरवर - गंभीरा सुधी करी पारी प्रगट लोगस्स कहेवो. पछी खमा० दइ यथाशक्ति पञ्चरकाण करे. खमा० दइ अविधि प्रशातना मिच्छामि दुक्कडं मागे. खमा० दह शिष्य कहे इच्छकारी भगवन् ! हितशिक्षा प्रसाद करोजी. गुरु उपदेश आपे.
यथा
देवदाणव गंधव्वा, जक्खरक्खस किन्नरा । बंभयारीं नमसंति, दुक्करं जे करंति ते ॥ १ ॥ इत्यादि गाथा भोथी उपदेश प्रापे.
इति ब्रह्मचर्यादिव्रत विधि.
* ॐ * ॐ * ॐ * ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ

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