Book Title: Jain Mahapurana Kalaparak Adhyayana
Author(s): Kumud Giri
Publisher: Parshwanath Shodhpith Varanasi

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Page 15
________________ २ : जैन महापुराण : कलापरक अध्ययन करण पर पउमचरिय एवं पद्मपुराण ( रामचरित ) तथा हरिवंशपुराण ( कृष्णचरित ) की रचना की गयी। इन पुराणों के बाद २४ जिनों एवं अन्य शलाकापुरुषों से सम्बन्धित महापुराणों या चरितग्रन्थों की रचना हुई । जैन पुराणों में महापुराण सर्वाधिक लोकप्रिय और विशद् था। महापुराण आदिपुराण और उत्तरपुराण इन दो भागों में विभक्त है। आदिपुराण की रचना जिनसेन ने लगभग नवीं शती ई० के मध्य और उत्तरपुराण की रचना उनके शिष्य गुणभद्र ने ९वीं शती ई० के अन्त या १०वीं शती ई० के प्रारम्भ में की।२ महापुराण में जैन देवकूल के २४ तीर्थंकरों तथा १२ चक्रवर्ती, ९ बलभद्र, ९ नारायण, ९ प्रतिनारायण सहित कुल तिरसठ शलाकापुरुषों (श्रेष्ठजनों ) के जीवन चरित को विस्तारपूर्वक वर्णन हुआ है। सामान्य धारणा के अनुसार जिस ग्रन्थ में किसी एक शलाकापुरुष का वर्णन होगा वह पुराण और जिसमें अनेक शलाकापुरुषों का उल्लेख होगा वह महापुराण कहा जाएगा। __विद्वानों द्वारा किसी विशेष जैन पुराण या पुराणों के आधार पर सांस्कृतिक अध्ययन से सम्बन्धित कई महत्त्वपूर्ण कार्य किये गये हैं किन्तु अभी तक किसी चरित या पुराण साहित्य के आधार पर कलापरक अध्ययन का कोई समुचित प्रयास नहीं किया गया है। जैन ग्रन्थों में सांस्कृतिक जीवन के विभिन्न पक्षों के साथ ही कलापरक सामग्री भी प्रभूत परिमाण में मिलती है जिनका जैन मूर्तिकला एवं स्थापत्य के अध्ययन की दृष्टि से विशेष महत्त्व है, क्योंकि इन ग्रन्थों के आधार पर ही तीर्थंकरों एवं जैन देवकुल के अन्य देवों का मूल स्वरूप निर्धारित हुआ और उन्हें मूर्त अभिव्यक्ति मिली। कलापरक अध्ययन की दृष्टि से आदिपुराण एवं उत्तरपुराण अर्थात् महापुराण (दिगम्बर परम्परा) की सामग्री का विशेष महत्त्व है क्योंकि उनका रचनाकाल ( ९वीं-१०वीं शती ई० ) तीर्थंकरों सहित अन्य शलाकापुरुषों तथा जैन देवों के स्वरूप या लक्षण निर्धारण का काल था। इन ग्रन्थों की रचना के बाद ही श्वेताम्बर और दिगम्बर परम्परा में निर्वाणकलिका ( पादलिप्तसूरिकृतल० १०वीं-११वीं शती ई०), मन्त्राधिराजकल्प ( सागरचन्द्रसूरिकृत१२वीं-१३वीं शती ई० ), प्रतिष्ठासारसंग्रह ( वसुनन्दिकृत-ल० १२वीं शती ई०), प्रतिष्ठासारोद्धार ( आशाधरकृत-१२२८ ई०), आचारदिनकर ( वर्धमानसूरिकृत-१४१२ ई०) एवं प्रतिष्ठातिलकम् ( नेमिचन्द्रकृत-१५४३ ई०) जैसे शिल्पशास्त्रीय ग्रन्थों की रचना हुई जिनमें जैन आराध्यदेवों के प्रतिमालक्षण का विस्तारपूर्वक निरूपण हुआ। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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