Book Title: Hindi ke Mahakavyo me chitrit Bhagavana Mahavira
Author(s): Sushma Gunvant Rote
Publisher: Bharatiya Gyanpith

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Page 73
________________ पाँच मुट्ठियों से लोच कर उन्होंने प्राकृतिक नग्न श्रमण वेष धारण किया। ध्यानस्य हो ये चिन्तन करने लगे । ‘णमो सिद्धाणं' कहते हुए सिद्धों को नमस्कार करके पंच महाव्रत और पिच्छी कमण्डलु धारण कर सर्व सावद्य का त्याग करके पद्मासन लगाकर सामयिक में लीन हो गये। 'सिद्धाणं' उच्चारण के साथ ही महावीर को 'मन:पर्यय' ज्ञान उत्पन्न हुआ । बाहरी विचारों से मन को रोककर मौन भाव से अचल आसन में तीर्थकर महावीर आत्मचिन्तन में निमग्न हुए। (7) कुलग्राम में प्रवेश, राजा द्वारा महावीर-वन्दन-अर्चन-निर्ग्रन्थ होने के बाद भगवान कुलग्राम में आये। वहाँ के राजा बकुल ने भक्ति से वन्दना की और चन्दन - अर्चन किया। राजा वकुल ने नवधा भक्ति से भगवान को खीर का आहार दिया । फलस्वरूप उनके घर पर पंचाश्चर्यों की वर्षा हुई। भगवान मौन अवस्था में एकान्त स्थानों, निर्जनवनों में तपश्चर्या करने लगे। चतुर्थ सर्ग - भगवान महावीर की तपसाधना एवं समता भावना (1) मुनि दीक्षा लेने के बाद महावीर वन में विहार करते रहे। श्मशान भूमि पर तपश्चर्या करते रहे। गुहा में शयन करते रहे। छठे, आठवें दिन उपवास करते थे और इस प्रकार छह मास तक अनशन तप भी किया। कठोर तप साधना करते हुए कठिन परीषों पर विजय भी प्राप्त की। महान् कार्य सिद्धि के लिए महान् परिश्रम करना पड़ता है। श्री वर्द्धमान को अनादि समय के कर्मबन्धन को नष्ट करने के लिए कठोर तपश्चर्या करनी पड़ी। जब वे आत्म-साधना में मग्न हो जाते, तब कई दिन तक एक ही आसन में अचल बैठे या खड़े रहते थे। कभी-कभी एक मास तक लगातार आत्मध्यान करते रहते थे। उस समय भोजन-पान आदि बन्द रहता था, किन्तु इसके साथ बाहरी बातावरण का भी अनुभव न हो पाता था। शीत ऋतु में पर्वत पर या नदी के तट पर अथवा किसी खुले मैदान में बैठे रहते थे। ग्रीष्म ऋतु में वे पर्वत पर बैठकर ध्यान करते थे। ऊपर से दोपहर की धूप नीचे से गरम पत्थर चारों ओर से तू (गरम हवा ) महावीर के नग्न शरीर को तपाती रहती थी, किन्तु तपस्वी बर्द्धमान को उसका भान नहीं होता था । वर्षा ऋतु में नग्न शरीर पर मूसलाधार पानी गिरता था। तेज हवा चलती थी, परन्तु महान् योगी तीर्थंकर महावीर अचल आसन से आत्म चिन्तन में रत रहते थे “अहा जब आता वर्षा काल, गगन में बिछ जाता घनजाल । दामिनी दमकी उल्कापात, झड़ी लग जाती थी दिन-रात ।। " (वही, पृ. 147) वन में सिंह दहाड़ रहे हैं, हाथी चिंघाड़ रहे हैं, सर्प फुंकार रहे हैं, परन्तु परम आधुनिक हिन्दी महाकाव्यों में वर्णित महावीर चरित्र : 79

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