Book Title: Chandana
Author(s): Niraj Jain
Publisher: Bharatiya Gyanpith

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Page 28
________________ अन्त कर लूँगी। उच्छ्वास-रोध निमिष मात्र में प्राण त्यागने की विधि मुझे ज्ञात है।" नम्रतापूर्वक सूचित किए गए मेरे दृढ़ संकल्प का भीलनी पर प्रभाव पड़ा। स्वभावतः नारी के मन में नारी के प्रति संवेदना होती ही है। मेरी विपत्ति ने भी उसे कुछ द्रवित किया होगा। उसने मेरे पैरों पर हाथ रखकर कहा “बहन ! अपनी चेरी मानकर ही मेरी बात मान लो। मैं तुम्हारे साथ छल नहीं करूँगी। तुम हमारे साथ चली चलो। मेरा पति जो ठान लेता है, उसे करके रहता है। अभी तुम्हें सहमत कराने के बहाने मैंने उससे थोड़ा-सा समय माँगा है। वह किसी भी क्षण आता ही होगा। कुटीर पर चलो, वहाँ उसे समझा-बुझाकर मैं तुम्हारी रक्षा का प्रयास करूंगी। विफल हो जाऊँ तो प्राण त्यागने का कौशल तो तुम्हारे पास है ही। जो तुम्हारे जी में आए सो कर लेना, मैं नहीं रोकूँगी। “वह बड़ा हठी है, आवेश में उचित-अनुचित का विवेक खो बैठता है। फिर तुम तो इस वन में निपट अकेली हो। यहाँ तुम्हारा रक्षक कौन है ? हम तुम्हें यहाँ छोड़ भी जाएँ तो जिसकी भी दृष्टि तुम पर पड़ेगी वह तुम्हारे साथ यही करेगा। वही तुम्हारा स्वामी हो जाएगा। हमारे वनांचल का यही चलन है, इसे यहाँ अनुचित नहीं माना जाता। "एक और काम की बात तुम्हें बताती हूँ-यहाँ तुम्हें कोई कितना भी डरायेधमकाये, पर जब तक तुम्हारी सहमति नहीं होगी, कोई तुम्हें विवश नहीं करेगा। हम राक्षसवंशी हैं। हमारे कबीले का अटल नियम है कि यदि किसी पुरुष ने कबीले के बाहर की किसी नारी को बलात् भोगने का दुस्साहस किया तो हमारे पूर्वज रुष्ट हो जाएँगे और उसका वंश नाश हो जाएगा। कबीले का भी अमंगल होगा। इसलिए साहस रखो, धीरज से काम लो और चलो हमारे साथ। ___ “तुम्हारे लिए मैं कुलदेवताओं की पुष्पार्चना करूँगी, वे अवश्य तुम्हारी रक्षा करेंगे। उनकी कृपा से तुम्हारा अनिष्ट नहीं होगा। तुम हठ मत करो, हमारे साथ चलना स्वीकार कर लो।" मेरी उस स्वयमागता सहेली का परामर्श पूरा हुआ था कि दूर से उसका पति आता हुआ दिखा। वह स्वयं उठकर उस ओर चली गयी। उन दोनों में कुछ बातें हुईं। मैंने तो रात्रि से ही अपने आपको भाग्य के भरोसे छोड़ दिया था। धैर्यपूर्वक कर्मोदय की लीला देखने का मैंने अपना मन बना लिया था, वैसा साहस भी जुटा लिया था। चन्दना :: 27

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