Book Title: Chandana
Author(s): Niraj Jain
Publisher: Bharatiya Gyanpith

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Page 36
________________ देने चली गयी। ___कुछ ही समय में फल और जल से भरा सकोरा लेकर भीलनी फिर वहाँ आयी। सामने रखकर मुझसे ग्रहण करने का आग्रह किया। मैंने अनिच्छापूर्वक वह सब परे हटा दिया और उस कृपा के लिए उसका आभार माना। इस बीच मैंने लक्ष्य किया, मेरे आभूषण भीलनी को लुभा रहे थे। प्रातःकाल से ही वह ललचाई दृष्टि से बार-बार उन्हीं की ओर देख रही थी। मैंने एक एक कर सारे आभूषण उतारे और उसे दे दिये। अब मैं दासी-पण्य में विक्रयार्थ प्रस्तुत होने जा रही थी, वहाँ दासियों का विनिमिय होता है, राजकुमारियों का नहीं। दासी की देह पर न आभूषणों का गौरव बढ़ने वाला है, न दासी का मान। थोड़ी ही देर में भील अपने प्रमुख को साथ लेकर आ गया। दोनों ने एक बार पुनः मुझे समझाने-धमकाने का प्रयास किया। मुखिया ने यह भी बताया कि उसकी माता ने विरोध नहीं किया होता तो वह मुझे किसी भी प्रकार यहाँ से जाने नहीं देता। अब वे दोनों अपनी असफलता से क्षुब्ध मुझे दासी बनाकर बेचने के लिए उतावले हो रहे थे। बिना किसी विलम्ब के वे उसी समय मुझे दासी-पण्य ले जाने के लिए सन्नद्ध थे। भीलनी ने एक प्रच्छन्न पीड़ा के साथ संकेत किया और मैं उनके साथ चलने को प्रस्तुत हो गयी। उन दोनों ने एक वृद्ध पुरुष को और साथ ले लिया जो सम्भवतः विनिमिय-विशेषज्ञ रहा होगा। उसने आते ही एक तटस्थ-सी दृष्टि डालकर मेरे शरीर के मोल का अनुमान लगा लिया, सन्तुष्टि से सिर हिलाया और मुखिया के साथ आगे आगे चलने लगा। मुझे मध्य में चलने का आदेश हुआ। भील मेरी चौकसी करता पीछे चल रहा था। सँकरी वन-वीथिकाओं पर प्रायः दो घड़ी तक चलकर हमने एक नदी पार की। नौका पर लोग वार्तालाप कर रहे थे उससे ज्ञात हुआ कि हम यमुना पार कर रहे हैं और कौशाम्बी हमारा गन्तव्य है। कौशाम्बी नाम सुनते ही मेरे मन में नयी आशा का संचार होने लगा। यह तो मेरी मृगावती दीदी के राज्य की राजधानी है। यहीं तो उनका निवास है। मुझे लगा अब मेरी सारी विपत्तियों का अन्त आ गया है। राजमहल तक समाचार पहुँचने की देर है, फिर मेरा उद्धार करने मेरी दीदी स्वयं हाट में आने में भी संकोच नहीं करेगी। उदयन तो जैसा खड़ा होगा वैसा ही अपनी छोटी मौसी के लिए दौड़ा चला आएगा। कौशाम्बी के प्रतापी नरेश दण्डित करेंगे इन दुष्टों को। चन्दना::35

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