Book Title: Bruhad Sanskrit Hindi Shabda Kosh Part 03
Author(s): Udaychandra Jain
Publisher: New Bharatiya Book Corporation

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Page 365
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra स्नातकमन्त्रम् स्नातकत्वे समुत्सुकः। पौद्गलिकस्य देहस्य, धावन प्रोञ्छनातिगः ।। (समु० ९ / १७ ) स्नातकमन्त्रम् (नपुं०) सुसंस्कृत मन्त्र । • अर्हतमन्त्र। (जयो०वृ० २४ / ६० ) स्नात्वा (सं०कृ० ) [ स्नाक्त्वा ] स्नान करके। (भक्ति०) ० अभिषेक करके । स्नानम् (नपुं० [स्ना भावे ल्युट् ] ० स्नान, प्रमार्जन, प्रक्षालन । अभिषेक, अभिसिंचन । ० ० मार्जन, सुसंस्कारित करना। स्नानजलम् (नपुं०) अभिषेक जल (जयो०वृ०२/२८ ) स्नानजलं सतां शिरोमस्तकं www.kobatirth.org पुनाति पवित्रीकरोतीत्यर्थः । (जयो०वृ० २ / २८) स्नानद्रोणी (स्त्री०) नहाने का बड़ा पात्र । स्नानत्याग: (पुं०) स्नान का त्याग। जैन मुनियों के मूल गुणों में स्नान त्याग नामक गुण भी है। स्नानं ज्ञानसरोवरे यतिपते र्वासांसि सर्वादिशः । ( मुनि० २० ) स्नानद्रव्यं (नपुं०) अभिसिंचन की सामग्री । स्नानपात्रम् (नपुं०) नहाने का पात्र । स्नानभावः (पुं०) अभिषेक भाव। स्नानमकुर्वन् यावत् पुरा निपातयोर्लट् इति भूते लट् । (जयो०वृ० २/४० ) स्नानविधिः (स्त्री०) अभिसिंचन क्रिया, स्नानक्रिया, अभिषेक विधि, स्नाननियम । स्नानीय (वि०) प्रमार्जन योग्य, स्नान के योग्य । स्नापक: (पुं० ) [ स्ना + णिच् + ण्वुल् युक् ] स्नान कराने वाला भृत्य, ० अभिसिंचन शील मृत्य स्नापनम् (नपुं० ) [ स्ना+णिच् + ल्युट् +पुक् ] स्नान कराना, अभिसिंचन कराना। स्नायुः (स्त्री०) नस, मांसपेशी। स्नाव: (पुं०) कंडरा, मांसपेशी, नस। स्निग्ध (वि०) [स्निह् +क्त] ० चिकना, मसृण, तैलीय, तैलयुक्त, चुपड़ा हुआ। 'स्निह्यते स्मेति स्निग्धः ' ० ० । प्रिय, स्नेही, अनुरक्त, प्रेमी गीला, तर ० शान्त । • कृपालु, मृदु, सौम्य, मिलनसार । १२१८ Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 0 मोहक, रुचिकर, कोमल (जयो० ११ / ९) ० कान्ति स्निग्धः (पुं०) मित्र, हितैषी व्यक्ति । ० चमक, आभा, प्रकाश । स्निग्धम् (नपुं०) तैल, ० मोम | स्निग्धता (वि०) (स्निग्ध+तल+टाप् त्व वा] चिकनापन, सौम्यता, सुकुमारता । ० ० स्नेह, प्रेम । स्निग्धत्व (वि०) चिकनापन | " स्निग्धच्छाया ( स्त्री०) पनी छाया कान्ति युक्त छाया (जयो० ३ / ११३) स्निग्धतनु ( नपुं०) श्लक्ष्णशरीर, चिकना शरीर, आभा युक्त देह (जयो० १३/८) 0 स्नेह पूर्वम् वृद्धि गत शरीर । ( सुद० २/४३) स्निग्धा (स्त्री० ) [ स्निग्ध+टाप्] मज्जा, बसा । स्निग्धाङ्गी (स्त्री०) स्नेह भूमि (जयो० १५/८८) स्निह् (अक० ) स्नेह करना, प्रेम करना, अनुरक्त होना, प्रिय होना। दिनहोत वत्सं प्रति धेनुतुल्यां (सम्य० ९६ ) ० चिपचिपाना। ० सौम्य होना । स्नु (अक० ) टपकना, रिसना, झरना । ० बहना, स्त्रवित होना, बूंद बूंद गिरना । , स्नु (पुं०) (नपुं०) (स्ना+कु] भूखण्ड पर्वत श्रृंखला, सतह स्नु (स्त्री०) स्नायु कण्डरा, मांसपेशी । । स्नुषा ( स्त्री० ) [ स्नु+ सक्+टाप्] पुत्रवधू । स्नुह (अक० ) उलटी करना, कै करना। स्नेहः (पुं० ) [ स्निह्+घञ्] प्रेम, अनुराग, आसक्ति, प्रीति । प्रेमभाव। (जयो० ३/४२) ० तैल। (जयो० ६ / १३१) ० • चर्बी, नमी स्नेहछेदः (पुं०) प्रेम विच्छेद । स्नेहच्युतः (पुं०) वात्सल्य का अभाव । For Private and Personal Use Only स्नेहदोष: (पुं०) समाधिकरण के समय का दोष । स्नेहनं (नपुं०) तैल स्नेहनमुत्तरितमवतार्य । त्रिवर्गवर्त्मनि गत्वोद्धार्यम् (जयो० १२ / १०८ ) स्नेह्नकर्मन् (नपुं०) प्रेमोत्पादन, स्निग्धत्वार्थ। (जयो० १६ / २३) स्नेह पूर्वम् (अव्य०) अनुराग पूर्वक ।

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