Book Title: Agam 15 Pannavana Uvangsutt 04 Moolam
Author(s): Dipratnasagar, Deepratnasagar
Publisher: Agam Shrut Prakashan

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Page 92
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir प-६, सा-५ जदि गमवक्कंतियखहयरपंचेंदियतिरिक्खजोणिएहितो उववञ्जति किं संखेज्जवासाउएहितो उवयचंति असंखेजवासाउएहिंतो उबवजंति गोयमा संखेज्जवासाउएहिंतो उयवजंति नो असंखेनयासाउएहितो उववअंति, जदि संखेनवासाउयगब्भयकंतियखहयर-पंचेंदियतिरिखजोणिएहिंतो उववञ्जति किं पञ्जत्तएहितो उर्ववनंति अपञ्जत्तएहितो उववर्जति गोयमा पज्जत्तएहितो उववर्जति नो अपजत्तएहितो उववनंति जदि मणुस्सेहिंतो उववति किं सम्मुच्छिम० गब्भवक्कंतिय० गोयमा नो सम्मुच्छिममणुस्सेहिंतो उदवति गमवक्कंतियमणुस्सेहिती उपवनंति, जदि गमवक्कंतियमणुस्सेहितो उववनंति किं कम्मभूमग० अक्रप्पभूमग० अंतरदीवग० गोयमा कम्मभूमगगमवक्कंतियमणुस्सेहितो उववनंति नो अकम्मभूमगगब्भवक्कंतियमणुस्सेहितो उववनंति नो अंतरदीवगगलावक्कंतियमणुस्सैहिंतो उववजंति, जदि कम्मभूमगगभवक्कंतियमणुस्सेहिंतो उववनंति किं संखेनवासाउएहितो० असंखेज्जयासाउएहितोः गोयमा संखेञ्जयासाउयकम्मभूमगगभवतियमणुस्सेहितो उववनंति नो असंखेजवासउयकम्मभूमगगल्भवकूकंतियमणुस्सेहिंतो उववजंति जदि संखेनवासायकम्मभूमगभवतियमणुस्सेहितो उववर्जति किं पञ्जत्तरोहितो० अपज्जतगेहितो० गोयमा पजत्तएहितो उदवनंति नो अपझत्तएहितो उववजंति एवं जहा ओहिया उववाइया तहा रणयप्पभापुढविनेरइया वि उववाएयव्वा, सक्करप्पभापुढविनेइरयाणं पुच्छा गोयमा एते वि जहा ओहिया तहेवोववाएयव्या नवरं-सम्मुच्छिमेहिंतो पडिसेहो कातव्यो, वालुचप्पभापुढविनेरइया णं भंते कतोहिंतो उववनंति गोयमा जहा सक्करप्पभापुढविनेरइया नवरं-भुयपरिसप्पेहितो वि पडिसेही कातव्यो, पंकप्पभापुढविनेरइयाणं पुच्छा गोयमा जहा वालुयप्पभापुढदिनेरइया नवरं-खहयरेहितो वि पडिसेहो कातव्यो धूमप्पभापुढविनेरइयाणं पुच्छा गोचमा जहा पंकप्पभापुढविनेरइया नवरं-चउप्पएहितो वि पडिसेहो कातव्यो, तमापुढविनेरइया णं पुच्छा गोयमा जहा धूमप्पभापुढविनेरइया नवरंथलयरेहितो वि पडिसेहो कातब्यो, इमेणं अभिलावेणं जदि पंचेदियतिरिक्खजोणिएहिंतो उववजंति किं जलयर० थलयर० खहयर० गोयमा जलयरपंचेदिएहितो उपवनंति नो घलयोहितो नो खहयरेहितो उववजंति, जदि मणुस्सेहितो उववजंति किं कम्मभूमएहितो अकम्पभूपएहितो अंतरदीवएहितो गोयमा कम्मभूमएहितो उववनंति नो अकम्मभूमएहितो उववनंति नो अंतरदीवएहिंतो जदि कम्मभूमएहितो उववजंति किं संखेजवासाउएहिंतो० असंखेज्जवासाउएहिंतो गोयमा संखेज्जवासाउएहिंतो उववज्जति नो असंखेज्जवासाउएहितो उदवर्जति जदि संखेजवासाउएहितो उववति किं पजतएहितो० अपञ्जतएहितोक गोयमा पजत्तएहितो उववझंति नो अपञ्जत्तएहितो, जदि पञ्जत्तयसंखेनवासायउकम्मभूमएहितो उववज्रति किं इत्थीहितो० पुरिसेहितो० नपुंसएहितो० गोयमा इत्थीहितो वि उववनंति पुरिसेहितो वि उववजंति नपुंसएहितो वि उववज्जति अहेसतमापुढविनेरइया णं भंते कतोहिंतो उचवज्रति गोयमा एवं चेव नवरं-इत्थीहितोपडिसेहो कातव्वो।१२५।-129 (३३५) अस्सण्णी खलु पढमं दोच्चं च सिरीसवा तइय पक्खी सीहा जंति चउत्थिं उरगा पुण पंचमि पुढविं (३२६) छठिंच इत्थीयाओमच्छा मणुयायसत्तमि पुढविं एसो परसुवदाओ बोधव्यो नरयपुढवीणं ॥१८४1-2 ||१८३||-1 For Private And Personal Use Only

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